किसी 'खास' की जानकारी भेजें। गिजु भाई का दक्षिणामूर्ति बालमन्दिर, भावनगर

यहाँ बच्चे बन्‍धन से मुक्त होने आते हैं।  

यह गिजु भाई का स्कूल है ,जहाँ उन्होंने शिक्षा के अपने सारे प्रयोग किए, देश भर से ढेरों कहानियाँ इकट्ठी कीं और बच्चों को सुनाई। कईयों को बच्चों ने नापसन्‍द कर दिया और सैकड़ों जो बच्चों को पसन्‍द आईं  उन्‍हें गिजु भाई ने लिख डाला। यह वही स्कूल है जहाँ शिक्षा में किए प्रयोगों को गिजुभाई ने दिवास्वप्न में भी लिखा है।

आकाँक्षा और मैं अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन के लिए गिजु भाई पर कुछ अलग सामग्री जुटाने के सिलसिले में भावनगर (गुजरात) आए हुए हैं। सुबह के सात बजे हैं और हम दक्षिणामूर्ति बालमन्दिर के गेट पर खड़े हैं। स्कूल एक टेकरी पर बना हुआ है। छोटे-छोटे बच्चे तांगे और ऑटो से उतर रहे हैं। बच्चों का  उत्साह देखकर लग रहा है जैसे रात भर घर पर रहकर भी उन्होंने स्कूल आने का इंतजार ही किया है। बच्चों के पास कोई बस्ता नहीं है। यहाँ एक नियम है कि बच्चे को केवल एक रुमाल देकर स्‍कूल भेजा जाए।

बहुत से शिक्षक मैदान में यहाँ–वहाँ खड़े है। बच्चे मैदान में दौड़ रहे हैं जैसे किसी बंधन से मुक्त होकर आए है। आते ही बच्चों को खेलने की स्वतन्त्रता है, कोई आदर्श स्थिति नहीं, कोई अनुशासन की बात नहीं, कोई लाइन नहीं। करीब आधा घण्टा बीत चुका है। तभी स्कूल की सीढ़ियों पर एक शिक्षिका नजर आती है। वह तिकोनी आकृति की घण्टी बजाती है। बच्चे भागकर अपनी कक्षाओं में चले जाते हैं। बैठने की व्यवस्था दरी है। बच्चों को अपने हिसाब से अपना साथी चुनने और उसके साथ बैठने की स्वतंत्रता है।

जिस कक्षा में हम बैठे हैं वहाँ आज बच्चों को स्वाद के बारे में बताया जाना है। खट्टा ,मीठा, तीखा, नमकीन  और सादा, सभी स्वाद के तरल पेय तैयार किए गए हैं । बच्चे छोटे-छोटे समूह में शिक्षिका की मदद कर रहे हैं। सौंफ का शरबत, इमली का खट्टा पानी, नमक का पानी, थोड़ा तीखा पानी और सबसे आखिरी में सादा पानी भरकर रख गया है। कक्षा में केवल 6 गिलास हैं और बच्चे 20। शिक्षिका बच्चों की सलाह से ही तय करती है कि एक-एक बच्चा सारे स्वाद का शरबत पीएगा और बाद में अपना गिलास धोकर अगले बच्चे को देगा। हर बच्चा शरबत पीता है। शिक्षिका गुजराती में हर बच्चे से कुछ बात करती है, वह उसे उस स्वाद से जुड़ी वस्तुओं के बारे में भी बताती है। अपना क्रम पूरा होने पर बच्चा दौड़कर नल तक जाता है। वहाँ रखे साबुन से अपना गिलास धोता है और अपने अगले साथी को देता है। शायद इसी स्वानुशासन की बात गिजुभाई ने अपने शिक्षा दर्शन में की है। इसी बीच एक बच्ची  हमारे पास आकर गिलास देकर कहती है, ‘तुम भी शर्बत पियो!’

बच्चों और शिक्षण प्रणाली पर शिक्षकों से बहुत सी अनौपचारिक चर्चा होती है। संगीत के शिक्षक हमें बताते हैं कि हमारे यहाँ बच्चों से पूछकर उस विषय पर गीत और कविता बनाने की परम्परा है। वो कहते हैं कि बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं, हमें उन्हें शान्ति से सुनना चाहिए। अपनी संगीत कक्षा से जुड़ी एक घटना को याद करते हुए वह बताते हैं कि एक दिन सुबह-सुबह एक बच्चा मेरे पास आया और बहुत नाराज होकर उसने मुझसे कहा कि, ‘अब तुम मुझे कभी भी मोटरगाड़ी का गीत मत सुनाना’। मैंने सोचा कि शायद वह इसलिए नाराज है कि उसे कोई मोटरगाड़ी में घुमाने नहीं ले गया होगा। एक–दो दिन बाद ही वह बच्चा मुझे स्कूल में कहीं मिल गया और मुझे याद आया कि उसने मोटरगाड़ी वाली कविता सुनाने के लिए मना किया था। मैंने उससे इसका कारण पूछ लिया। बच्चे ने बताया कि एक सफेद मोटरगाड़ी उसके घर आई थी और वह उसके दादा को लेकर चली गई और उसके दादा फिर कभी घर नहीं लौटे। शिक्षक बताते है कि उसके बाद हमने इस बात का खास ध्यान रखा कि उस बच्चे की कक्षा में मोटर का कोई गीत न गाया जाए।

दक्षिणामूर्ति बाल मन्दिर को पूरे भावनगर में बहुत ही आदर दिया जाता है। हमें कुछ पन्ने और पुरानी तस्वीरें स्‍कैन करवानी थीं। हम एक फोटोकापी की दुकान पर पहुँचे। तस्वीरें और इतने सारे पन्ने देखकर दुकान वाले व्यक्ति ने हमसे पूछा कि, आप तो बाहर से आए दिखते हो, यहाँ क्या करने आए हो। जाहिर था व्यापारी तो हम दिख भी नहीं रहे थे। यहाँ मैं एक बात आपको बताना चाहूँगी कि भावनगर पानी के जहाज बनाने और तोड़ने का एक बहुत बड़ा केन्‍द्र है। साथ ही हीरे के व्यापार में भी यह देश में सूरत के बाद दूसरा स्थान रखता है। खैर हमने उसे अपने आने का मकसद बताया और उससे अपने काम के पैसे पूछे। उसने मुस्कुराते हुए कहा, अरे मैं वहाँ के काम के पैसे कैसे ले सकता हूँ, आपको पता है मैंने भी वहीं से पढ़ाई की है और अभी मेरे बेटे की बेटी भी वहीं पढ़ रही है। उसे उसके काम का भुगतान करने के लिए हमें बहुत मशक्कत करनी पड़ी।

यह अकेली घटना नहीं है ,पाँच दिन की इस यात्रा में हमने दसियों बार इसका अनुभव किया। मैं आज भी यह सोचती हूँ की सौ वर्ष पुरानी इस संस्था ने अपनी गरिमा को बचाए रखने के लिए क्या किया होगा? इस बात को सोचते हुए गिजु भाई का एक कथन हमेशा ही याद आ जाता है वह लिखते हैं, ‘ बच्चों ने मुझे प्रेम देकर नया बना दिया। उन्हें सिखाने में तो सच पूछें, तो मैंने सीखा। उनका अवलोकन करते हुए मुझे आत्मवलोकन का अवसर मिला, उन्हें नीचे से ऊपर ले जाते हुए, साथ-साथ मैं भी ऊपर चढ़ता गया। उनका गुरु होने के बावजूद मैंने उनका गुरुत्व देख लिया।’

दक्षिणामूर्ति ट्रस्ट के सौ वर्ष पुराने शिक्षक प्रशिक्षक केन्‍द्र के प्रधान अध्यापक विपुल व्यास बताते हैं कि,  ‘हमारे यहाँ बच्चों कि छोटी- छोटी बातों का ध्यान रखा जाता है और यही बात हम अपने शिक्षक प्रशिक्षण में भी विद्यार्थियों को सिखाते हैं। आज भी गुजरात में दक्षिणामूर्ति शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान की इतनी प्रतिष्ठा है कि यहाँ से निकले विद्यार्थियों को केवल साक्षात्कार से ही चुन लिया जाता है। हालाँकि अब यह संस्थान सरकार के अधीन है पर पढ़ाने और प्रशिक्षण का स्तर और चलन गिजुभाई के तरीके का ही है। इस प्रशिक्षण संस्‍थान के कारण बाल मन्दिर में विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात 3:1 है। जिससे हम बच्चों के विकास और अधिगम पर पूरी नजर रख पाते हैं।’

विपुल व्यास बताते हैं कि गिजु भाई के दो सपने अधूरे रह गए थे, एक चिल्ड्रन यूनीवर्स्‍टी बनाने का और दूसरा बाल-ज्ञानकोश (चिल्ड्रन एनसाइक्लोपीडिया) बनाने का, जिस पर अभी गुजरात सरकार काम कर रही है।

हमें लगा आरटीई में जिन प्रावधानों की बात हम आज कर रहें हैं और बहस छिडी हुई है कि इसे लागू करना कितना कठिन है या कितना सरल, गिजु भाई का दक्षिणामूर्ति स्कूल निर्बाध रूप से उसे पिछले सौ वर्षों से कर रहा है।


अज़ीमप्रेमजी फाउण्‍डेशन की कम्‍युनिकेशन एण्ड एंगेजमेंट टीम में कार्यरत रंजना ने पिछले दिनों उन्‍होंने अपनी एक अन्‍य सहयोगी आकाँक्षा के साथ भावनगर जाकर गिजुभाई के स्‍कूल तथा उनके शिक्षा दर्शन को समझने का प्रयास किया। यह आलेख उनकी इसी यात्रा पर आधारित है। फोटो भी लेखिका ने ही लिए हैं।                                         

टिप्पणियाँ

dksrenu का छायाचित्र

बहुत ही बढ़िया लेख है गिजुभाई बधेका के बारे में. रंजना जी ने जिस बारीकी से अवलोकन और अंकन किया है अनुभवों का, उसके लिए हार्दिक बधाई....

pramodkumar का छायाचित्र

दिवास्‍वप्‍न कई बार पढा था ा हर बार नया लगा ;कुछ नया मिला ा इस लेख को पढते हुए महसूस हुआ कि भावनगर पहंच गया हूं ा सफल प्रस्‍तुति है ा बधाई

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