किसी 'खास' की जानकारी भेजें। कैलाश मण्‍डलोई : रायबिड़पुरा के अरविन्‍द गुप्‍ता

सब कुछ मुमकीन है अगर चाहें तो...

वैसे भारत जैसे देश में खासकर स्कूली शिक्षा को लेकर ज्यादातर खबरें निराशाजनक होती है। आए दिनों समाचार पत्रों में जो खबरें छपती रहती हैं वो शिक्षकों और शिक्षा तंत्र पर टीका-टिप्पणी लिए होती है। अक्सर कहीं शिक्षा पर चर्चा होती है तो उसमें भी नकारात्मक भाव अधिक होता है। शिक्षा के इस पूरे दृश्‍य में ऐसा तो नहीं कि हर कहीं अंधेरा ही अंधेरा है। कहीं न कहीं कुछ ऐसी मिसालें देखने को मिल ही जाती है जहाँ  कुछ बेहतर करने की कोशिशें जारी है। कुछ स्कूल ऐसे मिल जाएँगे जहाँ  शिक्षक बड़ी ही दिलचस्पी से पढ़ाते हैं। जहाँ शिक्षकों ने अपने बलबूते पर स्कूल की दशा को संवार दिया है। जहाँ शिक्षकों और बच्चों के बीच के रिश्ते प्रगाढ़ दिखाई देते हैं। जहाँ बच्चों को बेहतर शिक्षा मिलती है।

खरगोन जिले में ऐसी ही एक स्कूल है रायबिड़पुरा गाँव का कन्या माध्यमिक विद्यालय। इस स्कूल में खास क्या है? अगर आप ऊन से रायबिड़पुरा गाँव में घुसते हैं तो यहाँ सड़क के दाएँ ओर गाँव से सटे हुए एक स्कूल के दर्शन हो जाएँगे। स्कूल के सामने ही डाकघर है। साथ ही सड़क के दूसरी ओर गाँववासियों के घर बने हुए हैं। अगर बाहर से ही स्कूल में झाँके तो सलीके से लगे हुए खूब सारे हरे-भरे पेड़ और लॉन दिखेंगे। बेशक, इन पेड़-पौधों और लॉन की देखभाल होती होगी वरना ये कब के सूख चुके होते। इनकी देखभाल भी नियमित होती है। कोई तीस-बत्तीस प्रजातियों के पेड़ और लताएँ। स्कूल और बगीचे की चारों तरफ से सुरक्षा के लिए  दीवार। बगीचे में ही झण्‍डावंदन का चबूतरा।

कई दिनों से सुनने में आ रहा था कि रायबिड़पुरा गाँव की एक स्कूल की दशा को वहाँ के एक शिक्षक ने सुधार बदल दिया है। कैलाश मण्‍डलोई नामक इस शिक्षक के बारे में बताया गया कि उसे स्कूल के अलावा कुछ दूसरा काम सूझता ही नहीं। वह दिन-रात स्कूल और स्कूल की ही रट लगाए रहता है। आखिर एक दिन हम कैलाश मण्‍डलोई से मिल ही लिए। उन्होंने बस इतना ही कहा कि आप स्कूल आइए।

बताया जाता है कि कुछ वर्षों पहले यह स्कूल सामने की सड़क वाले जर्जर भवन में  लगता था। गाँव के घरों से घिरा हुआ पशुओं को बाँधने का स्थान था यह। गाँव के लोग इसी स्कूल के आसपास कूड़ा-कचरा फेंकते रहते थे। स्कूल के लिए पर्याप्त जगह भी नहीं थी।

सन् 2010 से इस स्कूल का भवन बन गया है और तब से यह नई जगह पर है। कैलाश मण्‍डलोई बताते हैं कि जैसे घर की साज-संभाल न की जाए तो वह जर्जर होता चला जाता है। वैसे ही स्कूल की नियमित सफाई और मरम्मत न हो तो वह गर्त में चला जाएगा। इसलिए नियमित सफाई और देखरेख होनी ही चाहिए। आखिर हमारा और बच्चों का अधिकांश समय स्कूल में ही बीतता है। जब स्कूल यहाँ शिफ्ट हुआ तो यहाँ सरकार ने भवन तो बनवा दिया मगर कंटीली झाड़ियाँ और बेतरतीब पेड़ और घास थी। गाँव के लोग इस स्कूल भवन के आसपास की झाड़ियों में शौच करते थे। हमारे लिए स्कूल के अन्‍दर घुसना भी मुश्किल था। स्कूल के बाहर बड़े-बड़े गढ्डे थे।

कैलाश ने खुद यहाँ की झाड़ियों और पेड़ों को काटा और सफाई की। सुबह से ही स्कूल में आकर बैठ जाते ताकि लोग शौच के लिए यहाँ न आएँ, पशु अन्‍दर न घुसें। पशुओं की नाकाबन्‍दी के लिए चारों ओर से काँटों की बागड़ लगाई। स्कूल के बगीचे को तो सजाया-संवारा ही साथ ही स्कूल भवन में लड़कियों के शौचालय का प्रबन्‍ध भी किया। ये शौचालय एकदम साफ मिलेंगे। शौचालयों में पानी की माकूल व्यवस्था है। पानी के लिए स्कूल भवन में ही एक बड़ी टंकी बनाई गई। स्कूल में एक भी भृत्य का पद नहीं है। तो फिर इनकी सफाई कौन करता होगा? कैलाश कहते हैं, ‘मैं ही करता हूँ।’ रायबिड़पुरा के कन्या माध्यमिक विद्यालय के शौचालयों के प्रबन्‍धन से डायट और बी.आर.सी.कार्यालयों को सीख लेने की जरूरत है कि कैसे एक ग्रामीण विद्यालय सही अर्थों में साफ-सफाई को तवज्‍जो देता है। इसके लिए संस्थान के लोगों को ही नेतृत्व की बागडौर अपने हाथों में लेनी होती है।    

हाथ धोने के लिए नलों और वाश बेसिन की व्यवस्था की गई है। आखिर कैसे यह सब कुछ व्यवस्था की गई?  कैलाश बताते हैं, ‘जो भी पैसा शासन से आता है उसका सही इस्तेमाल कैसे हो बस यही बात ध्यान में रखना होता है। वैसे तो बी.आर.सी. कार्यालय (एस.एस.ए.) की ओर से एक इंजीनियर हर विकास खण्‍ड में होता है जो इस कार्य को संपन्न करवाता है। मगर हमें अपने स्कूल में क्या व्यवस्था चाहिए उसे तो हम ही अच्छे से समझते हैं। इसलिए इंजीनियर और ठेकेदारों को हमें बताना पड़ता है।’  

अब तक की बातचीत के बाद वे हमें एक कमरे की ओर ले गए। हमें लगा कि यह कोई कक्षा का कमरा होगा। जब इस कमरे में घुसे तो हमारी आँखें फटी की फटी रह गईं। हम देखते हैं कि एक हॉल में प्रयोशाला बनाई हुई है। ऐसी प्रयोगशाला जहाँ  विज्ञान के सैकड़ों प्रयोग किए जा सकते हैं। विविध प्रकार की सामग्री का प्रदर्शन किया हुआ। आखिर क्या नहीं है इस प्रयोगशाला में। कन्या माध्यमिक विद्यालय बनाम कैलाश मण्‍डलोई का यह दूसरा उजला पक्ष देखने को मिला। मापन-दूरी, आयतन, वजन के लिए स्केल, बाट, लीटर आदि आदि। चुम्‍बक तरह-तरह के- चकती चुम्‍बक, छड़ चुम्‍बक, रिंग चुम्‍बक। इनकी संख्या भी इफरात में। हर कुछ मिलेगा। दो दर्जन स्पेसिमेन तरह-तरह के जो अमूमन उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों की जीव विज्ञान की लेब में भी अब देखने को नहीं मिलते जो यहाँ पर हैं। प्रकाश, चुम्‍बक, विद्युत चुम्‍बक, बल, गति ध्वनि, मापन और तमाम अवधारणाओं पर प्रयोग करने की सामग्री। रसायन शास्त्र की बात करें तो कई तरह के रसायन, भौतिक तुला, लिटमस और बहुत कुछ। सूक्ष्मदर्शी, हेण्‍डलेंस और बहुत कुछ।

यहाँ कबाड़ से जुगाड़ (लिटील साइंस) भी है। फालतू बोतल से बनाई हुई फिरकनी भी है। कैलाश इसे चलाकर दिखाते हैं। मैं अचरज में पड़ जाता हूँ। बोतल को दबाने से अन्‍दर की हवा बोतल के मुँह पर लगी फिरकनी पर फिंकती है और फिरकनी घूमने लगती है। जिज्ञासु मन बार-बार चलाने को कहता है। इसलिए जिसके भी हाथ में यह मॉडल आता है उसे छोड़ने का दिल नहीं करता। आखिर खिलौने में भी विज्ञान के तत्व निहित हैं। डायट के दो साथी श्रीमती मगरे और जेपी पाटीदार दाँतों तले उँगली दबा रहे थे।

कैलाश बताते हैं, ‘ ये मैंने पुणे में सीखी थी। वहाँ अरविन्‍द गुप्ता से मिला था। उनसे  कई सारे प्रयोग सीखे। मेरे पास अरविन्‍द गुप्ता की कई सारी किताबें किताबें हैं।’ वे अलमारी खोलते हैं और कबाड़ से जुगाड़, पम्‍प ही पम्‍प खिलौनों का बस्ता... जैसी किताबें दिखाते हैं।

उल्लेखनीय है कि रायबिड़पुरा गाँव में ताश खेलने का रिवाज प्राचीनकाल से रहा है। यहाँ ब्रिज नामक खेल खेलने के लिए विदेशों से लोग-बाग आते रहे हैं। इस खेल को बनाए रखने के लिए कुछ विदेशी मदद भी दी जाती रही है। इसी दौरान इस गाँव   में गोवा से नन्दिता नाम की एक महिला आई। वे इस स्कूल में आईं और देखा तो काफी प्रभावित हुईं। उन्होंने कैलाश मण्‍डलोई को गोवा आने का निमंत्रण दिया। कैलाश गोवा गए और वहाँ से लौटते हुए में पुणे अरविन्‍द गुप्ता से मिले। उल्लेखनीय है कि अरविन्‍द गुप्ता आजकल पुणे में रहते हैं और वे और उनकी टीम दिलचस्पी रखने वाले युवाओं को कम या बिना लागत के विज्ञान प्रयोग करना सिखाते हैं।

प्रयोगशाला में आपको वाल्व के सि़द्धान्‍त को समझाने के लिए हेंडपम्‍प मिल जाएँगे  जो देशज सामग्री से बनाए गए हैं। कैमरे की डिब्बी, सायकिल के ट्यूब और रिफील से तैयार हेंडपम्‍प! कोलगेट टूथपेस्ट की बेकार ट्यूब से हेंडपम्‍प! एक दिलचस्प प्रयोग जो कि अमूमन मैंने कुछ खास उस्तादों को ही करते देखा। हमने स्कूली शिक्षा में विद्युत ऊर्जा को यांत्रिकी ऊर्जा में बदलने का प्रयोग तो आसानी से (इतना आसान भी नहीं) करते देखा है। जैसे कि मोटर बना लेना। मगर यांत्रिकी ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने वाला सबसे आसान सा प्रयोग यहाँ देखने को मिला। इतना आसान कि हर कोई कहीं भी कर सकता है। टेप रेकार्डर में लगने वाली छोटी सी मोटर और एक एल.ई.डी. और तार बस। सर्किट बनाओ और मोटर को घुमाओ। बल्ब जलने लगेगा। बहुत ही आसान सा प्रयोग। संक्षिप्त में कबाड़ से जुगाड़ के सही अर्थों में यहाँ दर्शन किए जा सकते हैं।

स्कूल में काफी सारी किताबें भी हैं। दो-तीन लोहे की अलमारियों में किताबें रखी हुई हैं। कहानियों, कविताओं, विज्ञान के प्रयोग की किताबें, प्रशिक्षण के मॉडयूल और भी बहुत कुछ। कई तरह की पत्रिकाएँ जैसे कि समझ झरोखा, चकमक, गुल्लक, बाल भारती...। कई अखबारों में शिक्षा, समाज और विज्ञान आदि पर छपे लेखों की कतरनें। गुरुजी चिंचालकर के लेख वगैरह।

स्कूल में एक कोना सूचना का भी है जहाँ अखबारों की कतरनें वगैरा चस्पा की जाती हैं।

कैलाश विज्ञान के विद्यार्थी तो नहीं रहे। केवल आठवीं तक ही विज्ञान पढ़ा। मगर विज्ञान में दिलचस्पी खूब रखते हैं। अपने स्कूल में कैलाश विज्ञान और गणित विषय का शिक्षण करते हैं।

मुलाकात में कैलाश ने समस्याओं का जिक्र कम ही किया। समस्याएँ बताईं तो उनसे जूझने की कहानियाँ भी बताईं। उनका कहना है कि मेरा रिश्‍ता बन चुका है इस स्कूल से। मुझे मजा आता है इस कार्य को करने में, इसलिए करता हूँ। और क्या कर सकता हूँ इस पर सोचता रहता हूँ। उनका मानना है कि इस प्रकार के स्कूल और भी बनने चाहिए। स्कूलों को हम कैसे बेहतर बना सकते हैं इस पर हम शिक्षकों को ही कार्य करना होगा।

कैलाश को जिला प्रशासन ने कई बार पुरस्कृत भी किया।

और आखिर में : डायट खरगोन से इस यात्रा में जे.पी.पाटीदार और श्रीमती मगरे भी शामिल थे। स्कूल का नजारा देख उन्होंने कहा, ‘यहाँ तो हमारे डी.एड. के विद्यार्थियों की विजिट करवानी चाहिए। हम ऐसा भी कर सकते हैं कि डी.एड. के विद्यार्थियों की कक्षाओं में कैलाश मण्‍डलोई को आमंत्रित करें।


प्रस्‍तुति : कालूराम शर्मा, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, खरगोन, मध्‍यप्रदेश

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