किसी 'खास' की जानकारी भेजें। केदार लाल शर्मा : शिक्षक से पहले मित्र

विद्यालय में नवप्रवेषित 5-6 वर्ष के बच्चों के अध्यापन के दौरान यह देखने में आया कि बच्चे वर्णमाला के अक्षरों या वर्णो को क्रमबद्ध रूप से रट सकते हैं एवं क्रमबद्ध बोलकर सुना भी सकते हैं, परन्तु वर्ण विशेष की पहचान करना उनके लिए इतना आसान नहीं होता है। 33 व्यंजन, 11 स्वर, मात्रा चिन्ह, 4 संयुक्त व्यंजन सहित वर्ण ड़,ढ, औ आदि विसर्ग अनुस्वार, अनुनासिक एवं हलन्त रूप इन सभी की सुदृढ पहचान कर लेना नवागत कोमल मस्तिष्क के लिए एक मुश्किल भरी चुनौती से कम नहीं है। उस पर भी यदि सिखाने का तरीका दबाव एवं दण्डयुक्त हुआ, कक्षा का वातावरण नीरस हुआ तो यही ज्ञान का समुद्र उन्हें डरावना लगने लगता है। उन्हें लगता है कि अध्यापक और अभिभावक मानो सम्मिलित साजिश करके उसे इस समुद्र में धकेल देना चाहते हों। यही वह मोड़ है जहाँ उनमें सीखने के प्रति वितृष्णा या आकर्षण पैदा हो सकता है यही एक संक्रमण बिन्दु है।

बच्चों से मैत्री सम्बन्ध

वातावरण को सरस बनाने के लिए विशेषकर कक्षा 1 एवं 2 के बच्चों से विशेष मैत्री सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया गया। सभी बच्चों को गोले में बैठाया जाता। मैं भी कभी-कभी उनके साथ ही गोले में बैठ जाता। आनन्द पोथी के चित्र दिखाकर उनसे प्यार से थपथपाकर प्रश्न पूछकर उनको बोलने के लिए प्रेरित करता। कविता एवं कहानी सुनाता, सुनता। दीवार पर अंकित खरगोश एवं कछुए की कहानी बच्चों को सुनाता। उनको बोलने के लिए हर सम्भव प्रेरित करता। जैसे क्या आपने खरगोश देखा है? अच्छा बताओ खरगोश के कान कहाँ पर है, पूँछ कौनसी है ? उनके माता, पिता, भैया, पालतू जानवर आदि के बारे में चर्चा करता। कई बार उनके साथ उनका प्रिय खेल जो वे कंचियों से खेलते हैं, खेलता। इन सबका परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे उन बच्चों की ग्रहण शक्ति, स्वभाव आदि के बारे में जानकारी मिली और स्थिति सीखने-सिखाने की आ गई।

छलनी पद्धति से समूह निर्धारण 

सभी बच्चों की ध्यान केन्द्रित करने की शक्ति एवं ग्रहण क्षमता कई कारणों से भिन्न हो सकती है। मुख्य रूप से बच्चों का ठहराव बच्चों सीखने की क्षमता को प्रभावित करता है। गाँव के परिवेश में अभिभावक बच्चों को खेतों में जानवर चराने हेतु जंगल में या घर पर छोटे बच्चों की देखरेख हेतु लगा देते हैं। कभी-कभी बच्चे 4-5 दिनों के लिए विद्यालय से गायब रहते हैं। तो कभी आल्टरनेटिव 3-4 दिनों तक अनुपस्थित रहते हैं। कोई-कोई बच्चे एक माह बाद, तो कई बच्चे अगले सत्र में ही विद्यालय में आ पाते हैं। इससे बच्चे की सीखने की क्षमता प्रभावित होती है। बच्चा जब भी वापस विद्यालय आता है, उसके सीखने का स्तर नियमित आने वाले बच्चों से कमतर हो जाता है। उसे वही नहीं पढ़ाया जा सकता जो नियमित आने वाले बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। कुछ बच्चे धीमी गति से सीखने वाले भी होते हैं। इसके लिए तात्कालिक सूझ के अनुसार समूहों का निर्धारण किया गया। समान स्तर वाले बच्चों का एक समूह। जिस प्रकार दवा बनाने वाला जड़ी बूटी को कूटता है एवं बारीक हो जाने पर छान लेता है। जो मोटे कण रह जाते हैं उनको फिर से कूटता है और छलनी में छान लेता है यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक सारी सामग्री चूर्ण में नहीं बदल जाती। ठीक इसी तरह सभी कक्षाओं में समूह निर्धारित करने के लिए तात्कालिक सूझ के अनुसार कुछ न्यूनतम दक्षताओं के मानक निर्धारित किए गए।

मैंने हिन्दी के अध्यापन के लिए टीएलएम का निमार्ण किया। इसके लिए कपड़े की सिलाई में उपयोग होने वाली बकरम का उपयोग किया। बकरम के चौकोर टुकड़ों पर अक्षर तथा मात्रा लिखीं। ये एक तरह से फ्लेश कार्ड बन गए। कार्डों के पीछे रूई चिपकाई।  इन कार्डों को किसी भी खुरदरे कार्डबोर्ड या कपड़े पर आसानी से लगाया जा सकता है। अपनी शाला में बच्चों को वर्णमाला तथा मात्राओं से परिचित कराने मैंने इसका उपयोग किया। ( इसके बारे में वे विस्तार से भाषा शिक्षण के लिए सहायक शिक्षण सामग्री  लेख में पढ़ा जा सकता है। बच्‍चों को भाषा सिखाने के लिए वे किस तरह के प्रयास कर रहे हैं, इस बारे में  साथ के वीडियो से जाना जा सकता है। -सम्‍पादक) 

केदार लाल शर्मा

राजकीय बालिका उच्च प्राथमिक विद्यालय, अरनिया केदार, विकासखण्‍ड एवं जिला टोंक, राजस्‍थान


वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2010 तथा 2011 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। केदार लाल शर्मा वर्ष 2010-11 में सीखने-सिखाने बेहतर शैक्षणिक प्रयासों के लिए चुने गए हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने केदार लाल शर्मा से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इस बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं। हम केदार लाल शर्मा, राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं।


 

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