किसी 'खास' की जानकारी भेजें। कुसुम नेगी

 

क्या शिक्षक जन्‍मजात होते हैं, बनाए नहीं जाते? क्या एक व्यक्ति जो शिक्षण के पेशे में बस यूँ ही आ गया हो,एक धुनी, उत्कृष्‍ट शिक्षक बन सकता है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका शायद कोई तय उत्‍तर नहीं दिया जा सकता।

पर कुसुम नेगी ‘बस यूँ ही’ बनी शिक्षक से उत्कृष्‍ट शिक्षक बनने की एक बेहतरीन मिसाल हैं।

‘मैं शिक्षण-कार्य को नौकरी मात्र नहीं मानती.... यह मेरा शौक है और मैं प्रत्येक जन्म में शिक्षक ही बनना चाहूँगी।’ यह कहना है प्राथमिक विद्यालय की शिक्षक कुसुम नेगी का। वे लगभग डेढ़ दशक से भी अधिक समय से शिक्षण कर रही हैं।

कुसुम बेबाकी से स्वीकारती हैं कि उन्होंने जब लगभग 14 वर्ष पहले शिक्षक के रूप में काम करना शुरु किया था, तब अपने काम के प्रति उनमें वह जज़्बा नहीं था जो अब है। यह तो संयोग ही था कि वे सरकार द्वारा पारित एक विधेयक की वजह से शिक्षक बन गईं। उस समय राज्य सरकार ने एक विधेयक पास किया था कि अगर किसी के पास बी.एड. की डिग्री है तो वह व्‍यक्ति प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक के पद पर नियुक्ति पा सकता है। कुसुम शर्त को पूरा करती थीं, इसीलिए नौकरी कर ली।  नज़रिया यह भी था कि इससे जीवन में कुछ सुरक्षा मिल जाएगी। लेकिन कुछ ही दिनों में उन्हें अहसास हुआ कि प्राइमरी के बच्चों को पढ़ाना कोई खेल नहीं है। उन्‍हें लगा वे इस काम के लिए नहीं बनी हैं।

लेकिन इस बीच ऐसा कुछ घटा जिसने उन्‍हें एक राह दिखा दी। शिक्षक के तौर पर अपने शुरू के दिनों में ही उन्हें अपनी कक्षा में एक ऐसा बच्चा मिला जो पढ़ने-लिखने में सक्षम नहीं था। वह छोटी-छोटी वे क्रियाएँ-संक्रियाएँ भी नहीं कर पाता था जिन्हें उसी की उम्र के अन्य बच्चे आसानी से कर लेते थे। कुसुम ने बच्चे की कमजोरी को समझने की कोशिश की और उससे जूझने की ठानी। उन्होंने इसे एक चुनौती की तरह लिया और पूरी मेहनत की। वे बच्चे पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देने लगीं। कुछ ही वर्षों में उनकी यह मेहनत रंग लाई और वह बच्चा अपनी कक्षा के अन्य बच्चों की ही गति से सीखने लगा। प्रसन्नचित्त चेहरे से वे बताती हैं कि वह अब विद्यालय की पढ़ाई पूरी कर चुका है।

यह हमें एक छोटी-सी घटना लग सकती है, लेकिन उनके जीवन में यह एक मील के पत्थर की तरह थी - क्योंकि इस अनुभव ने शिक्षण के प्रति उनका पूरा नजरिया ही बदल दिया। उन्हें अहसास हुआ कि इस काम के साथ कितनी बड़ी जिम्मेदारी जुड़ी हुई है। शुरुआती दिनों में महसूस होने वाली बोरियत और असन्तुष्टि जाती रही, धीरे-धीरे वे एक बहुत ही विचारशील और उत्कृष्‍ट शिक्षक के रूप में परिवर्तित होती गईं।

एक बानगी देखें। पर्यावरण विज्ञान में बच्चों द्वारा हासिल किए गए ज्ञान का आकलन करने के लिए कुसुम ने पाठ्यपुस्‍तक के बाहर कुछ नवाचारी प्रश्न बनाए। उन्हीं में से कुछ यहाँ प्रस्तुत हैं:

  • कहा जाता है कि बहते पानी में ऊर्जा होती है। इस सिद्धान्‍त का प्रयोग करते हुए इन्सान ने मशीनें बनाई हैं। किन्हीं दो ऐसी मशीनों के नाम बताएँ जो इस सिद्धान्‍त पर चलती हैं।
  • यदि वैज्ञानिक ऐसी मशीनें बना दें जो पेट्रोल पर चलती हों और आपके घर के अन्दर, बाहर, खेत के सब काम कर दें तो ऐसी मशीनों के क्या लाभ और क्या खतरे होंगे?
  • यदि किसी इन्सान के शरीर में लोहे की कमी है, तो आप उसके लिए किस धातु के बने बर्तन में भोजन पकाएँगे – लोहे, एल्युमिनियम या फिर स्टील के बर्तन में?
  • बस के अगले हिस्से में किस प्रकार का शीशा लगाया जाता है – पारदर्शी, अर्धपारदर्शी या फिर अपारदर्शी?
  • सांस लेना जीवों के लिए एक मूल आवश्यकता है।  क्या आप बता पाएँगे कि मछली, मेंढक, भीमल पेड़ और इन्सान श्वास लेने के लिए किन अंगों का प्रयोग करते हैं?
  • एक खेत के सब टिड्डे नष्ट हो जाएँ तो वहाँ के पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
  • फफूंद के पौधे सफेद रंग के होते हैं। उनमें क्लोरोफिल नहीं होता, इसलिए वे अपना भोजन नहीं बना पाते। ऐसे में वे जिन्दा कैसे रहते हैं?

कुसुम बताती हैं कि इस प्रकार के प्रश्नों ने विद्यार्थियों की रुचि को जगाया है। धीरे-धीरे उनकी कक्षा के विद्यार्थी प्रश्नों के उत्तर अपने ही शब्दों में  देने की ओर बढ़ रहे हैं और उन्होंने ‘अलग ढंग से सोचना’ भी सीख लिया है। वे एक उदाहरण देती हैं। जब एक बच्चे से पूछा गया कि शीशे को कम पारदर्शी कैसे बनाया जा सकता है, तो उसने उत्तर दिया – ‘भाप का प्रयोग करके।’ यह तो तय है कि यह जवाब आपको किसी पाठ्यपुस्तक में नहीं मिलेगा। कुसुम की नजरों में यह जवाब न केवल यह दिखाता है कि यह बच्चा पारदर्शी  और अर्धपारदर्शी  के बीच के अन्तर के बारे में जानता है, बल्कि इससे यह भी प्रदर्शित होता है कि बच्चे में अवलोकन की बहुत तीक्ष्ण क्षमता है।

कुसुम का मानना है कि अधिक से अधिक शिक्षकों में इस प्रकार के प्रश्न रच पाने की क्षमता का विकास किया जाना चाहिए। उन्हें भी रटन्त पर आधारित सीखने-सिखाने की पद्धति से हटना चाहिए – उसी प्रकार जैसे वे स्वयं हटी हैं।

कुसुम जैसे शिक्षक हों तो निश्चित तौर पर खुशी-खुशी सीखना-सिखाना एक हासिल होने लायक लक्ष्य बन ही जाएगा।


मूल आलेख : डॉ. नीरजा राघवन, शैक्षिक सलाहकार, अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय, विश्‍वविद्यालय स्रोत केन्‍द्र, बंगलौर

अँग्रेजी से अनुवाद : रमणीक मोहन       सम्‍पादन: राजेश उत्‍साही

17383 registered users
6658 resources