किसी 'खास' की जानकारी भेजें। किशोर कुमार माली : प्रयोग में विश्‍वास

प्रत्येक विद्यार्थी की सीखने की गति विशिष्‍ट होती है। सिखाने का प्रत्येक तरीका प्रत्येक विद्यार्थी के लिए उपयुक्त हो यह आवश्‍यक नहीं है। सामान्यतया ऐसी शिक्षण तकनीकें व शिक्षण अधिगम सामग्री काम में ली जाती है जिससे सीखने वालों का बड़ा वर्ग सीख जाए। लेकिन कई बार ऐसा नहीं भी होता। अतः विविध तरीकों से शिक्षण कराने की आवश्‍यकता सदैव रहती है। मैंने भी कक्षा शिक्षण दौरान इन बातों का ध्यान  रखा। सीखने सिखाने की परिस्थितियों सहित कई कारक उपलब्धि स्तर को प्रभावित करते हैं।

स्कूल का परिचय

प्राथमिक विद्यालय, लीलावा सन् 1999 में (भवन रहित विद्यालय) खुला था। प्राथमिक सुविधाओं से रहित यह विद्यालय एक प्रबोधक के अथक प्रयासों, समुदाय की गतिशीलता कि फलस्वरुप सन् 2003 में एक कमरे व 20 छात्र-छात्राओं वाला विद्यालय हो गया। सन् 2006 में क्रमोन्नति पाकर राजकीय प्राथमिक विद्यालय हो गया। वर्तमान में डी.पी.ई.पी. व सर्वशिक्षा अभियान की योजनान्तर्गत दो कमरे व पानी के टंकी का निर्माण किया गया है। बच्चों के मनोरंजन के लिए झूले-फिसलपट्टी, शौचालय-मूत्रालय, छायादार पेड़ों सहित चार दिवारी है। फिर भी पीने के पानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। यह विद्यालय दूर दराज में स्थित है। विद्यालय तक आने जाने के लिए पगडण्डी बनी है। वर्तमान में एक पूर्णकालिक पैराटीचर व एक अध्यापक नियुक्त है। विद्यालय में 1 से 5 तक 42 विद्यार्थी-बालिका अध्ययनरत हैं।

यहाँ के लोगों का प्रमुख रोजगार कृषि व कृषि आधारित कार्य है। इनका जीवन स्तर निम्नवर्गीय है।

समस्याएँ जो मैंने पहचानीं

मैंने पाया कि अधिकांश विद्यार्थी-बालिका उच्चारण व वर्तनी सम्बन्धी दोषों के कारण हिन्दी की पुस्तक ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं। मौलिक अभिव्यक्ति -मौखिक व लिखित- ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। मैंने पाया कि कक्षा 1 व 2 के अलावा 3,4 व 5 के विद्यार्थी भी वैसी ही समस्याओं से जूझ रहे हैं। मेरे लिए चुनौती थी - कक्षा 1 से 5 के विद्यार्थियों को हिन्दी पुस्तक ठीक से पढ़ना- सिखाना। उनकी मौखिक व लिखित अभिव्यक्ति का स्तरानुरुप परिमार्जन करना। मैंने एक जाँच पत्र -वर्गीकरण के मानक का निर्माण किया। जिसमें मैं यह जान पाऊँ की प्रत्येक विद्यार्थी का भाषा स्तर क्या है।

वर्गीकरण के मानक 

इस वर्गीकरण में कक्षा 2,3,4 व 5 के विद्यार्थियों को सम्मिलित किया। कुल विद्यार्थियों की संख्‍या 40 थी।

इसमें कौशल जाँच के लिए अक्षर ज्ञान(पढ़ना-लिखना),मात्रा ज्ञान(पढ़ना-लिखना), शब्‍द पठन ज्ञान (मात्रा के साथ और मात्रा के बिना) तथा पढ़ने की गति को आधार बनाया गया। जाँच के परिणामों के आधार पर मैंने पाँच समूह बनाए।

  • (अ) ऐसा समूह जिनकी पढ़ना-लिखना कौशलों पर अच्छी पकड़ है। इन्हें प्रोत्‍साहन की आवश्‍यकता है।(1 विद्यार्थी)
  • (ब) पढ़ना-लिखना कौशलों पर अच्छी पकड़ है। लेकिन पठन गति मध्यम है, जिसे बढ़ाने की आवश्‍यकता है। पठन अभ्यास की आवश्‍यकता है। (2 विद्यार्थी)
  • (स) पढ़ना-लिखना कौशलों पर अच्छी पकड़ है। पठन गति धीमी है, रुक-रुक के पढ़‍ते हैं। लिपि की शुद्धता हेतु सुधार की आवश्‍यकता है। (9 विद्यार्थी)
  • (द) वर्णो व मात्राओं का ज्ञान है। कुछ-कुछ पढ़ लेते हैं। किन्तु लिखने में दिक्कत है। (18 विद्यार्थी)
  • (ई) अक्षरों/मात्राओं के पठन/लेखन का आंशिक ज्ञान/अभ्यास है। इन्हें नए सिरे सिखाने की जरुरत है। इनकी आयु कक्षा के बालकों से अधिक है। अतः ये जल्दी सीख सकते हैं। इस वर्ग के साथ कक्षा 1 के विद्यार्थिंयों को जोड़ा जा सकता है। (10 विद्यार्थी)

इन पाँचों वर्गो हेतु अलग-अलग कार्य योजना बनाया जाना आवश्‍यक था।

किए गए प्रयास

समूह ब व ई के विद्यार्थियों का वर्णो से परिचय कराने के लिए निम्‍न चरणों में प्रक्रिया की गई-

  • वर्णो का ज्ञान कराने हेतु तरीका – नार, ध्यापक, चार। ‘अ’ वर्ण का ज्ञान (श्यामपट्ट पर लिखा व उच्चारण इस प्रकार किया की अ की ध्वनि को अलग से पहचानी जा सके)।
  • फ्लैश कार्ड द्वारा ‘अ’ वर्ण प्रदर्शित किया व उच्चारण अभ्यास करवाया गया।
  • ‘अ’ के प्रयोग करने से बने वर्ण श्यामपट्ट पर लिखे गए। विद्यार्थियों से उन पर गोला बनाने के लिए कहा गया, जहाँ ‘अ’ वर्ण था। अन्त में खण्ड विधि द्वारा वर्णो को लिखने का अभ्यास दिया गया।
  • इसी प्रकार शेष वर्णो का ज्ञान कराया गया।
  • अ से ज्ञ तक के वर्णो के योग से निर्मित दो अक्षरी, तीन अक्षरी, चार या अधिक अक्षरों के मेल से बने शब्दों से निर्मित कहानी पढ़ने हेतु दी गई।
  • एक टोकरी में अ से ज्ञ तक वर्णों के फ्लैश कार्ड रखे गए। विद्यार्थियों को गोल घेरे में बिठाया गया। एक-एक विद्यार्थी को शिक्षक द्वारा उच्चारित वर्ण के संगत कार्ड टोकरी से उठाने हेतु कहा गया। ऐसा आपस में बदल-बदल कर भी किया गया।
  • कक्षा 1 व 2 कि लिए आनन्‍द पोथी, कक्षा 1 व 2 का अवसरानुकूल प्रयोग किया गया।

मात्रा ज्ञान हेतु विभिन्‍न प्रयास किए गए  

  • जैसे आ की मात्रा सिखाने के लिए (आ की मात्रा यानि । जोडना) यानी जब डण्‍डे से से  मारते हैं तो आवाज आती है। क के डण्डा लगा तो का आ.......आ.....!
  • इसी प्रकार ख के डण्डा लगा तो खा विद्यार्थी स्वतः ही बोल पडे। इसी क्रम में समस्त वर्णो के साथ आ की मात्रा का अभ्यास कराया गया। श्यामपट्ट पर वर्णमाला का आ की मात्रा से बना रूप लिखकर उनका अभ्‍यास करवाया गया।
  • वर्णमाला से आ की मात्रा लगे वर्णो से शब्द निर्माण कराया गया। दो अक्षर वाले शब्द काका, चाचा, माला, चारा इत्यादि। इसके पश्‍चात लिखित अभ्यास कराया गया।
  • आ की मात्रा युक्त सरल कहानी को विद्यार्थिंयों पढ़ने हेतु दी गई। अभ्यास तब तक जारी रखा गया जब तक की विद्यार्थी ने कक्षा स्तरानुसार गति  प्राप्त नहीं कर ली।
  • इसी प्रकार शेष मात्राओं का ज्ञान कराया गया।

पठन गति बढाने हेतु अभ्यास

  • परकोटे की दीवार के ऊपरी पट्टी जिसकी ऊँचाई लगभग 3-4 फीट के आसपास है, उस पर ऑयलपेन्ट से पुताई करके वर्ण, शब्द, वाक्य, कहानी पट्टी बनाई गई। उदाहरण - चित्र व वर्ण, केवल वर्ण, बिना मात्रा वाले शब्द, मात्रा वाले शब्द (आ, ई, ऐ, ए, औ), सरल कहानी (शब्द सीमा 500 से 700)
  • समय सीमा का निर्धारण - शब्द वाक्य पट्टी पर अंगुली की सहायता से पढ़ने का आदर्श समय (कक्षा स्तरानुकुल) तय किया गया। कक्षा 1 व 2 के लिए 15 मिनट। कक्षा 3 व 4 के लिए 12 मिनट । कक्षा 5 के‍ लिए 10 मिनट।
  • पढ़ने में कठिनाई महसूस करने वाले विद्यार्थियों के साथ अ व ब वर्ग को जोड़ा गया।

मौखिक/लिखित अभिव्यक्ति संवर्द्धन हेतु प्रयास

  • विद्यार्थियों को गोल घेरे में बिठाकर कहानी सुनाई जाती थी। विद्यार्थियों को घटना मोड़ प्रधान प्रश्‍न बीच-बीच में पूछे जाते थे। अन्त में विद्यार्थियों को कहानी अपने शब्दों में लिखने हेतु कहा जाता था। विद्यार्थियों की अभ्यास पुस्तिकाओं का अवलोकन कर अपेषित सुधार हेतु सुझाव दिए जाते थे।
  • परिवेश के किसी प्रकरण, घटना, वस्तु पर विद्यार्थियों के साथ चर्चा की जाती थी। व्यक्तिगत व सामूहिक दोनों प्रकार की चर्चा की जाती थी।
  • इलेक्ट्रोनिक मीडिया के प्रयोग से विद्यार्थियों की रुचि की सरल कहानियाँ सुनाई जाती थीं। फिर इस पर विद्यार्थियों के साथ चर्चा की जाती थी। जैसे रेडियो पर प्रसारित होने वाले संवाद,बालगीत,बातचीत,कहानियॉं,समाचार,ऑडियो-वीडियो डिवाइस व कम्‍प्‍यूटर की सहायता से विभिन्‍न कहानियाँ,मेले के दृश्‍य दिखाना व उस पर चर्चा आदि। कहानी को विद्यार्थियों को कहने व लिखने हेतु भी कहा जाता था।
  • वर्तनी सुधार हेतु प्रत्येक शनिवार या अतिरिक्त समय में कठिन शब्दों छाँटकर खण्डविधि द्वारा अभ्यास कराया। पूर्व में घटित घटना,दृश्‍य,संसमरण,कहानी, सन्‍दर्भ पर चर्चा करने के बाद उन्‍हें अपने शब्‍दों में लिखने के लिए कहा जाता था। लिखित अभिव्‍यक्ति को देखकर सुझाव दिए जाते थे।

प्रयास के दौरान आई बाधाएँ

  • सबसे बड़ी चुनौती रही समय विभाग चक्र में कालांश की। प्रारम्‍भ में साथी अध्यापकों द्वारा आंशिक सहयोग मिला। वे नवीन चीज को अपनाने में हिचकिचाते थे, उदासीनतापूर्ण व्यवहार करते थे। मैंने उनसे कहा कि प्रयास करने में क्‍या हर्ज है। विद्यार्थी के शैक्षिक स्‍तर में सुधार करना हमारा काम है। इतने वर्षों से हम सब पढ़ा रहे हैं,किन्‍तु परिणाम संतोषजनक नहीं हैं। अत: कुछ नया तो प्रयोग करना ही होगा। मेरी इस बात ने साथियों को आश्‍वस्‍त किया और वे भी सहयोग करने को तैयार हो गए।
  • साथ ही समय पर पाठ्यक्रम पूर्ण करवाना।

प्रयासों से आए परिवर्तन

विद्यार्थियों के साथ निरन्तर 50 दिवस कार्य करने पर निम्नवत् परिवर्तन दर्ज किए गए-

  • समूह (अ) में 1 से 6 विद्यार्थी, (ब) में 2 से 14 विद्यार्थी, (स) में 9 से 4 विद्यार्थी, (द)  में18 से 2 तथा(ई) में 10 से 4 विद्यार्थी हो गए ।
  • इस प्रयास के बाद 10 विद्यार्थी इस स्‍तर पर पहुँचे, जिन्‍हें अपनी कक्षा के स्‍तर के अनुसार साधारणत: अब कोई समस्‍या नहीं है।

किशोर कुमार माली

  • एम.ए. (अंग्रेजी, संस्कृत, राजनीतिविज्ञान), बीएड
  • राजकीय प्राथमिक विद्यालय लीलावा, कैलाशनगर, शिवगंज, जिला, सिरोही
  • प्राथमिक व उच्च प्राथमिक कक्षाओं के साथ 10 वर्ष का शिक्षण अनुभव,
  • सन्‍दर्भ व्यक्ति के रुप में समय-समय पर कार्य किया।
  • रुचियाँ : अभिनव प्रयोग करना,पढ़ना

 

 

 


वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2009 तथा 2010 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। किशोर कुमार माली वर्ष 2009 में ' शिक्षण अधिगम और कक्षा प्रबन्‍धन’ श्रेणी में चुने गए हैं। यह लेख पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। हम किशोर कुमार माली,राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, सिरोही के आभारी हैं।


 

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