किसी 'खास' की जानकारी भेजें। कान्ति लाल मीणा : अध्‍यापन में नए तरीकों को आजमाना चाहिए

राजकीय प्राथमिक विद्यालय, आबेला (झाडोली), ब्लॉक पिण्डवाडा, जिला सिरोही मेरा विद्यालय है। यहाँ दो शिक्षक हैं। 3 कक्षाकक्ष, 1 स्टॉफ रूम है। 3.19 बिस्वा का परिसर है। परिसर में हैण्डपम्प, रसोईघर है। बालक-बालिकाओं के अलग शौचालय है। कुल 68 बच्चों का नामांकन था। जिनमें 67 बच्चे अनुसूचित जनजाति गरासिया के थे।

समस्याएँ जो पहचानी

  • विद्यार्थी नियमित विद्यालय नहीं आते थे और आते भी थे तो पढ़ाई में इतनी रूचि नहीं दिखाते थे।
  • गृहकार्य समय पर पूरा नहीं करते थे।
  • विद्यार्थी गरासिया समुदाय के थे वे घरेलू कार्यो में अधिक संलग्न होते। अभिभावकों की भी विद्यालय के प्रति नकारात्मक सोच थी। वे पढ़ाई में कम ध्यान देते थे और घरेलू कार्य करवाना उनकी प्राथमिकता होती थी।
  • हिन्दी भाषा कम समझते थे।

हल करने के लिए किए गए प्रयास

  • विद्यार्थियों को विद्यालय में नियमित भेजने के लिए बार-बार अभिभावकों से सम्पर्क किया गया। उसमें कोई खास सफलता नहीं मिलने पर विद्यालय की प्रबन्धन समिति के जागरूक सदस्यों से इसके बारे में बात की। उन्होंने अनियमित या विद्यार्थियों को स्कूल नहीं भेजने वाले अभिभावकों को उन्‍हें स्कूल भेजने हेतु प्रेरित किया। शिक्षा का महत्व बताया।
  • बाल संसद का गठन कर विद्यार्थियों की टोलियाँ बनाकर घर-घर जाकर विद्यार्थियों को स्कूल लाने का कार्य किया। जिससे उपस्थिति व ठहराव में परिवर्तन आया। कक्षा चार व पाँच के बडे़ व होशियार बच्चों को बाल संसद में शामिल किया गया जिनकी संख्या 20 थी। विद्यार्थियों की आर्थिक स्थिति कमजोर थी इस हेतु प्रकाश जैन, पिण्डवाडा से सम्पर्क कर विद्यार्थियों के गणवेश, कॉपियों, पेनों की व्यवस्था करवाई। इससे भी उपस्थित व ठहराव में काफी सुधार हुआ।
  • विद्यार्थी विद्यालय में आने लगे पर पढ़ने में रूचि कम दिखाते थे क्योंकि शिक्षण में सैद्धान्तिक  पक्ष अधिक था। हमने इसमें कुछ सुधार करने पर कार्य किया। मैंने स्वयं पर्यावरण अध्ययन, गणित में सुधार के साथ शिक्षण करने पर जोर दिया। पर्यावरण अध्ययन को विद्यार्थी के साथ क्रियात्मक/प्रयोगात्मक/प्रत्यक्षीकरण के आधार पर करवाने पर बल दिया। इस हेतु पाठ में शामिल प्रयोगों जैसे - वायु की उपस्थित, वायुदाब, आक्सीजन की सहायता से आग लगना आदि को करके दिखाया। 
  • प्रत्‍यक्षीकरण के तहत् विषय वस्तु की माँग के अनुसार विद्यालय के आसपास मौजूद चीजों का अध्ययन में प्रयोग किया जाने लगा। जैसे- पौधे के भाग आदि को पढ़ाने हेतु सचमुच के पौधे में ही उसके भागों को बताना। घरों के प्रकार पढ़ाने के लिए विद्यालय के आसपास के कच्चे-पक्के घर, झोपडी आदि को दिखाकार, मिट्टी बनने की क्रिया में पत्थरों को आपस में रगड़कर, पेड़ों से मिट्टी का कटाव रुकता है आदि बताना। वाष्पोत्सर्जन का प्रयोग, जमना, पिघलना, संघनन आदि को विस्तार से करके बताया।
  • क्रियात्मक कार्य के अन्तर्गत शैक्षणिक सहायक सामग्री निर्माण में विद्यार्थियों का सहयोग लिया।  विद्यार्थियों के साथ मिलकर धूप घड़ी, सीढ़ीनुमा खेत, मेड़बन्दी,  बीजों, पत्तियों, रेगिस्तानी वृक्षों की छाल आदि का संग्रह विद्यार्थियों की सहायता से किया।
  • गृहकार्य में भी लिखित के अतिरिक्त बीजों, पत्तियों, विभिन्न रेगिस्तानी वृक्षों की छाल को संग्रह करने का काम उन्हें दिया।

प्रयास के दौरान आई बाधाएँ

पढा़ने के तरीके (पर्यावरण विषय) में परिवर्तन से समय अधिक लगता था। प्रयोगात्मक, क्रियात्मक होने के कारण पाठ्यक्रम समय पर पूरा नहीं होता था। इस हेतु मुझे विद्यालय में इन विषयों को पढ़ाने के लिए अतिरिक्त समय देना पड़ता था। कभी-कभी अवकाश व रविवार को भी स्कूल जाना पड़ता था।

प्रयासों से आए परिवर्तन

  • विद्यार्थी पढ़ने में रुचि लेने लगे।
  • विद्यार्थियों की उपस्थित एवं ठहराव में वृद्धि हुई।
  • नियमित गृहकार्य जाँच करने पर पाया कि विद्यार्थी समय पर गृहकार्य पूरा करने लगे।
  • समुदाय का विद्यार्थियों को विद्यालय भेजने के नजरिये में परिवर्तन हुआ। वे विद्यार्थियों को नियमित विद्यालय भेजने लगे। समुदाय विद्यालय के कार्यों में भाग लेने लगा। अभिभावकों के सहयोग से विद्यालय मैदान की सफाई की गई व बाड़ बनाई।
  • सत्र 2007-2008 में शिक्षा गारण्टी कार्यक्रम में विद्यालय राज्य में तीसरे व जिले में प्रथम स्थान पर आया।
  • कक्षा पाँच के तीन बच्चों में 4 बालिकाओं व 3 बालकों का नवोदय में चयन हुआ। विद्यार्थी राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में विद्या भवन, उदयुपर में चयन हुआ।
  • क्वालिटी एश्योरेंस में सत्र 2007-2008 में बी ग्रेड मिला।

मेरा मानना है कि, 'अध्‍यापन में नए तरीकों को आजमाना चाहिए और उनकी सफलता को आँकते हुए उन्‍हें अपने पढ़ाने के तरीकों में शामिल कर एक और नए तरीके की खोज मे जुट जाना चहिए।'

कान्ति लाल मीणा

  • बी.एड.,एम.ए. (इतिहास),
  • राजकीय प्राथमिक विद्यालय, आबेला (झाडोली), पिण्‍डवाड़ा, जिला सिरोही, राजस्‍थान  
  • 2005 से शिक्षक हैं 
  • रुचियाँ अध्ययन, अध्यापन/क्रिकेट खेलना

     

वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2010 तथा 2011 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। कान्ति लाल मीणा वर्ष 2010-11 में ' शिक्षण अधिगम और कक्षा प्रबन्‍धन’ श्रेणी में चुने गए हैं। यह लेख पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया टीम ने उनसे उनके काम तथा शिक्षा के विभिन्‍न मुद्दों पर बातचीत की। हम कान्ति लाल मीणा,राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, सिरोही के आभारी हैं। 


 

टिप्पणियाँ

manohar chamoli 'manu' का छायाचित्र

प्रयासों से आए परिवर्तनों को पढ़कर अच्छा लगा। दरअसल लीक से हटकर छात्र हित में जो कुछ भी होगा उसके सकारात्मक परिणाम तो आएंगे ही। इसमें कोई दो राय हो ही नहीं सकती। बधाई। ऐसे शिक्षक को नमन। -मनोहर चमोली 'मनु' .mobil.09412158688ण

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