किसी 'खास' की जानकारी भेजें। कस्तूरबा गाँधी बालिका आवासीय विद्यालय, विजयपुर, चित्तौड़गढ़, राजस्थान

मोहम्मद उमर

सागौन और तेंदू के जंगलों के बीच गुजरती ऊँची नीची सड़क पर लगातार दो घण्टे का सफर तय करके हम चित्तौड़गढ़ शहर से बहुत दूर आ निकले हैं। अभी हम विजयपुर नाम के एक कस्बे से गुजर रहे हैं। सामने एक उबड़-खाबड़ मैदान में पीछे की तरफ एक पुराना मन्दिर है। इसके ठीक बगल में बनी नीले रंग की दो मंजिला इमारत हमारा ध्यान अपनी ओर खींच रही है। हम उस तरफ बढ़ चलते हैं। बहुत-सी लड़कियाँ अपनी स्कूली पोशाक में कुछ अभ्यास कर रही हैं। उन सबके हाथों में थमी लेजिम की छन-छन करती आवाज दूर से ही सुनाई पड़ रही है। एक और टुकड़ी है जो दूसरी तरफ लैफ्ट-राइट-लैफ्ट कर रही है। ये कस्तूरबा गाँधी आवासीय विद्यालय है।

हरे भरे बगीचे और फूलदार पौधों के बीच से गुजरकर हम मुख्यद्वार पर पहुँच चुके हैं। प्रधान अध्यापिका शकुन्तला जी तथा अँग्रेजी की शिक्षिका मीनाक्षी जी से परिचय करने और मुख्यद्वार पर रखे आगन्तुक रजिस्टर में अपना नाम पता दर्ज कर देने के बाद हमें भीतर प्रवेश मिलता है। बगीचे की सुन्‍दरता का जिक्र करने पर हमें बताया गया कि सभी शिक्षिकाएँ और बालिकाएँ मिलकर इस हरियाली को बनाए रखने और साफ-सुथरा रखने का प्रयास करती हैं। इस काम में उनके वरिष्ठ अधिकारियों का भी सदैव सहयोग रहता है। यहाँ नियुक्त चौकीदार रघुवीर जी इन पौधों की बहुत अच्छी देखभाल करते हैं।

पाँच सात बहुत छोटी-छोटी लड़कियाँ कुछ बड़ी लड़कियों के आगे पीछे मँडरा रही थीं। ये आरती तथा उसकी सहेलियाँ हैं जो कस्बे की प्राथमिक शाला में पढ़ती हैं, लेकिन आजकल रोज यहाँ आ रही हैं। वे यहाँ डांस सीखने आती हैं। कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय की आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली सुगना और निर्मला दीदी इनको डांस सिखाती हैं। आसपास के और भी दूसरे स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियाँ भी यहाँ आती हैं। उन्हें रंगोली बनाने, नाटक करने, नृत्य करने आदि में यहाँ से बहुत मदद मिलती है। सब आपस में दोस्त बन चुकी हैं।

कक्षाओं से गुजरते हुए हमने देखा कि सभी के बैठने के लिए तरतीब से टेबल-कुर्सी रखी है। पीछे की बड़ी अलमारियों में सभी अपने बस्ते रख सकती हैं। इसी कमरे का इस्तेमाल शाम को पढ़ने के लिए भी किया जाता है। अगले बड़े हाल में दो-तीन कम्प्‍यूटर रखे हुए हैं। यहाँ पर सभी बालिकाओं को कम्प्यूटर सिखाने का प्रयास किया जा रहा है। कुछ लड़कियाँ बेहतर ढंग से कम्प्यूटर का प्रयोग करना सीख गई हैं और अब अपनी दूसरी सहेलियों को भी सिखा रही हैं।

अभी कुछ महीने पहले ही जिला शिक्षा अधिकारी जी ने एक टेबल टेनिस भेजा है। जिस पर बालिकाएँ टेबल टेनिस खेलती हैं। एक कमरे में बड़ा रंगीन टी.वी. है। आप लोग क्या देखते हो ? इस सवाल के जवाब में कई लड़कियों ने एक साथ कहा - जय हनुमान। प्रधानअध्यापिका जी ने बताया कि फुर्सत के समय सब अपनी-अपनी रुचि का खेल खेलते हैं या टी.वी. देखते हैं।

उन्होंने बताया कि यहाँ पर ऐसी लड़कियाँ आती हैं जो या तो कभी स्कूल ही नहीं गई हैं या फिर पढ़ाई छोड़कर घर बैठ गई हैं। ऐसे में इनको आवासीय विद्यालय में रख पाना ही बड़ी चुनौती होती है। हम सभी लोग प्रयास करते हैं कि उन्हें किसी किस्म की तकलीफ न हो और साथ ही यहाँ अच्छा भी लगे। कुछ दिन रह लेने के बाद जब इन सबकी आपस में दोस्ती हो जाती है तब इनका मन लगने लगता है। फिर तो छुटिटयों में घर जाने पर भी इनके फोन आते रहते हैं कि मैडम कब वापिस आ जाएँ। कक्षाओं की दीवारों पर हाथों से बने हुए बहुत से चित्र लगे हैं। मोना ने बहुत ही खुबसूरत सा ताजमहल बनाकर लगाया है।

एक कमरे में सिलाई मशीनें नजर आईं। यहाँ पर पढ़ाई के साथ कुछ हुनर जैसे सिलाई और ब्यूटी पार्लर का काम सिखाने का प्रयास भी जारी है। कछा 6 में पढ़  रही कुछ लड़कियों ने बताया कि उनकी स्कूल की पोशाक-सलवार कमीज, जो उन्होंने पहन रखी है- को कक्षा 8 में पढ़ने वाली लड़कियों ने ही सिला है। प्रधानअध्यापिका जी ने बताया कि यहाँ से पढ़कर निकली हुई कुछ लड़कियाँ अपने गाँव में आगे की पढ़ाई जारी रखने के साथ ही सिलाई भी कर रही हैं। छठवीं तथा सातवीं कक्षा की बालिकाओं का एक बडा समूह ब्युटी पार्लर के कोर्स में ज्यादा रूचि रखता है। कौन सिलाई करना चाहता है और कौन ब्यूटी पार्लर कोर्स सीखना चाहता है ?  जाहिर है ब्यूटी पार्लर का काम सीखने वालों की संख्या ज्यादा थी। पूजा बड़ी होकर पुलिस बनना चाहती है जबकि उसकी दूसरी बहुत-सी सहेलियाँ शिक्षिका बनना चाहती हैं, अपनी शिक्षिकाओं की तरह ही। ये अच्छी बात है। देश को बहुत सारे अच्छे शिक्षक और शिक्षिकाओं की जरूरत है।

रेणुका मैडम सांस्कृतिक कार्यक्रम की तैयारी करवा रही हैं। वे बताती हैं कि प्रत्येक वर्ष पंचायत से लेकर जिला स्तर तक के कार्यक्रमों में इस विद्यालय की बच्चियों की धाक रहती है। आफिस की एक पूरी अलमारी स्मृति चिन्ह तथा पुरस्कारों से भरी हुई है। खो खो, कबड्डी और दौड जैसे खेलों के साथ ही नृत्य और गीत-संगीत में भी इस विद्यालय की बालिकाओं ने पंचायत से लेकर जिला स्तर तक अपने झण्डे फहराए हैं। शायद इसीलिए पास के प्राथमिक तथा माध्यमिक विद्यालय की बहुत सी बालिकाएँ हर 26 जनवरी तथा 15 अगस्त की तैयारी करने यहाँ ही आती हैं।

दो शिक्षिकाएँ, मीनाक्षी तथा मनीषा यहाँ पर बालिकाओं के साथ ही रहती हैं। भीतर ही उनका कमरा है। रोज शाम को सब लोग आपस में मिलकर खेल खेलते हैं,गीत गाते हैं। उन्होंने बताया कि ज्यादातर लड़कियों को हिन्दी पढ़ना-लिखना आता है, कुछ ही ऐसी हैं जो अटक-अटककर पढ़ पाती हैं। अँग्रेजी में जरूर कई लड़कियों को ज्यादा परेशानी आती है। इस दिशा में भी वे प्रयास कर रही हैं। इंग्लैंड की रहने वाली जूड हालिडे जी हर साल तीन-चार महीने पास के गाँव में बिताती हैं। इस दौरान रोज कुछ घण्टे बालिकाओं को अँग्रेजी पढ़ाने वे इस विद्यालय में आती हैं। उनके इस सहयोग से कई बालिकाएँ तेजी से अँग्रेजी सीख रही हैं।

रघुवीर जी ने बताया कि बस्ती के बहुत से परिवार चाहते हैं कि उनके घर की बच्चियों को यहाँ दाखिला मिल जाए, लेकिन यहाँ पर तो नियम अनुसार ही प्रवेश मिलता है। रघुवीर जी यहाँ पर तब से ही चौकीदार के रूप में नियुक्त हैं,जब से इस विद्यालय की स्थापना हुई थी। यहाँ की व्यवस्था और सुरक्षा को दुरूस्त रखने में इनकी सराहनीय भूमिका है। इसी गाँव के रहने वाले हैं, इसलिए जानते हैं कि कौन, कैसा है। शाम होने के बाद वे किसी को भी विद्यालय परिसर के आसपास फटकने नहीं देते हैं। उनका मानना है कि पौधों को पानी देने तथा बच्चों को स्नेह देने से बहुत पुण्‍य मिलता है।


मोहम्मद उमर,अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन ,चित्‍तौड़गढ़,राजस्‍थान

 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

पढ कर मजा आ गया सच्‍ची में ।

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