किसी 'खास' की जानकारी भेजें। कल्‍याण मनकोटी : चनोली के गिजुभाई

बच्‍चों से परिचय

फरवरी 2014 में जब मैं चनोली के विद्यालय में आया तो बच्चों से पहली मुलाकात में बातचीत के दौरान यह आभास हुआ कि कुछ बच्चे काफी शर्मीले हैं बात करने में घबरा रहे हैं। साथी गुरुजी ने बताया कि ये काफी संकोची स्वभाव के हैं। मैंने साथी गुरुजी से पूछा यहाँ पर बच्चों की क्या-क्या समस्या है? गुरुजी ने बताया मुख्य रूप से बच्चे सफाई की तरफ ध्यान नहीं देते हैं तथा कुछ बच्चे विद्यालय में लगातार अनुपस्थित रहते हैं जिस कारण अध्ययन व अध्यापन में काफी मुश्किल होती है।

कल्‍याणसिंह मनकोटी उत्‍तराखण्‍ड के एक सुदूर गॉंव के युवा अध्‍यापक हैं। अपने विद्यालय में सीमित संसाधनों और समुदाय के सहयोग से वे जो कुछ कर रहे हैं,उसके बारे में जानकर लगता है कि हम गिजुभाई के प्रतिरूप से मिल रहे हैं। वास्‍तव में हमें तो ऐसा कहने में कोई संकोच नहीं है। बाकी आप उनकी यह डायरी पढ़कर खुद ही तय कर सकते हैं। उनके काम के कुछ फोटो से बना एक वीडियो भी यहॉं है। -सम्‍पादक

मैं दूसरे दिन सभी बच्चों के लिए कुछ छोटे-छोटे उपहार ले गया जिन्‍हें बच्चों ने खूब पसन्द किया। मैं बच्चों की गतिविधियों को ध्यान से देखने लगा। मैंने पाया कुछ बच्चे काफी खुश हैं तथा कुछ विद्यालय के कोने में बैठे हुए बाकी बच्चों को देख रहे हैं। वे विद्यालय की गतिविधियों में अपने को शामिल नहीं कर पा रहे हैं। मैं उन बच्चों के पास गया उनसे उनके घर के बारे में बातचीत करनी शुरू की। मैंने देखा शुरू में वे मुझे अपने बारे में बताने में शरमा रहे थे, लेकिन जब मैंने उन्हें अपने घर के बारे में बताया तथा उन्हें यह बताया, मैं उनका टीचर नहीं हूँ बल्कि उनका एक दोस्त या बड़े भाई की तरह हूँ तो सभी बच्चे मुस्कराने लगे। यह पहली बार था जब ये बच्चे मुस्कराए थे फिर धीरे-धीरे उन्होंने भी मुझे अपने बारे में तथा अपने परिवार के बारे में बताना शुरू किया।

मैंने पाया कि ये सारे बच्चे श्रमिक वर्ग के परिवारों से आते हैं तथा घर पर या खेतों पर अपने माता-पिता के काम में हाथ बँटाते हैं या जब उनके माता-पिता खेतों में जाते हैं वे उनकी अनुपस्थिति में घर को सम्हालते हैं।

सवाल साफ-सफाई का

बच्चों के साथ बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा। अब बच्चे काफी घुल मिल गए थे। वे मुझसे बातचीत करने तथा सवाल पूछने लगे थे। मेरे लिए सबसे कठिन था कि मैं बच्चों से ये कैसे कहूँ की तुम्हारे दाँत साफ़ नहीं हैं या तुम्हारा मुँह गन्दा है। मेरे मन में ये सवाल बार-बार कौंध रहा था यदि मुझसे कोई मेरे दोस्तों के बीच में यह कहे कि तुम्हारे दाँत साफ नहीं हैं या तुम्हारा मुँह गन्दा है मुझे कैसा महसूस होगा? मैं अपने को बच्चों के स्थान पर रखकर सोच रहा था। मुझे यह कतई अच्छा नहीं लगेगा कि कोई सार्वजनिक रूप से मेरी व्‍यक्तिगत सफाई के बारे में मुझे कहे, मुझे तो यह एक उपहास लगेगा। मन में सवाल आया, क्या मुझे यह अधिकार है कि मैं प्रार्थना स्थल पर बच्चों को खड़ाकर यह कहूँ कि तुम्हारे हाथ, मुँह, दाँत गन्‍दे हैं? बहुत सोचने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा, शिक्षक या किसी को यह हक नहीं है कि वह किसी भी व्‍यक्ति को सार्वजनिक रूप से इस तरह से उसकी निजता पर सवाल करे। खासकर बच्चों के मामले में यह और भी संवेदनशील है। मुझे कोई तरकीब सूझ नहीं रही थी कि किस तरह से बच्चों में सम्मानपूर्ण तरीके से सफाई की आदत का विकास किया जाए। मैं घर आया और सोचते रहा किस तरह से बच्चों के सामने यह सवाल रखा जाए?

अचानक ख्याल आया क्यों न विद्यालय में एक बड़ा शीशा लगा दिया जाए। बच्चे, शिक्षक सभी उस शीशे में अपने को देखें और वे अपनी सफाई का मूल्यांकन स्वयं करें। दूसरे दिन विद्यालय पहुँचा। प्रधानाध्यापक महोदय को शीशे के विचार से अवगत कराया, वे बहुत खुश हो गए। प्रधानाध्यापक के साथ मिलकर कार्य योजना तैयार की गई। एक बड़ा शीशा, बाल्टी, साबुन, छोटे-छोटे तौलिये विद्यालय में रखे गए। सबसे पहले शिक्षक शीशे के आगे अपनी सफाई का मूल्यांकन करेंगे कमी होने पर अपनी सफाई को तुरन्‍त ठीक करेंगे, फिर बारी-बारी से हर बच्चा अपनी सफाई का मूल्यांकन स्वयं करेगा।

अगले हफ्ते कार्य योजना के अनुसार गुरुजी द्वारा सबसे पहले शीशे में अपनी सफाई का मूल्यांकन किया गया। गुरुजी ने देखा कि उनके हाथ साफ नहीं हैं। वे तुरन्‍त नल के पास गए हाथ धोए। तौलिये से हाथ पौंछकर अपने कक्ष में चले गए।

बच्चे सारी गतिविधियों को ध्यान से देख रहे थे। उनमें बड़ा कौतुहल था एक। दूसरे को दाँत दिखा रहे थे, चिढ़ा रहे थे। जिसके हाथ, मुँह, दाँत गन्‍दे थे वे बारी-बारी से नल के पास जाकर स्वयं सफाई कर रहे थे।

अब शीशे में सवेरे अपनी सफाई का मूल्यांकन करना दैनिक चर्या का भाग बन गया है। एक हफ्ते में बच्चों की सफाई में आमूलचूल परिवर्तन आ गया। अब बच्चे घर से ही साफ व नियमित आने लग गए हैं।

अपनी प्रोफाइल बनाओ

दो माह में बच्चों से अच्छी दोस्ती हो गई। अब बच्चे खुलकर बातें करने लग गए। अपनी घर की दिनचर्या मुझसे साझा करने लग गए। एक बात मेरी समझ में आ गई कि बच्चे अनुपस्थित क्यों रहते हैं? कुछ बच्चे जिनके माता या पिता का असामयिक निधन हो गया है उनके पास विषय की कापी, स्कूल बैग, अन्य अध्ययन सहायक सामग्री का अभाव था जिस कारण वे अक्सर विद्यालय से अनुपस्थित रहते थे, घर पर काम का दबाव भी रहता था।

मैंने बच्चों के साथ मिलकर प्रत्येक बच्चे की प्रोफाइल तैयार की। बच्चों को कैमरे से फोटो लेना सिखाया। फिर उन्हें फोटोग्राफी के लिए कैमरा दे दिया, बच्चे कैमरा देखकर काफी खुश थे। बच्चों ने प्रोफाइल के लिए स्वयं एक-दूसरे की फोटो ली। अब बच्चे अपनी फोटो को जूमकर देख रहे थे एक-दूसरे से मजाक कर रहे थे। मुझे बारी–बारी से अपने बारे में बता रहे थे मैं सारी जानकारी को नोटबुक पर लिख रहा था तथा बच्चों से छोटे-छोटे सवाल कर रहा था जैसे उन्हें क्या अच्छा लगता है? और क्या अच्छा नहीं लगता है? वे क्या सपना देखते है? वे विद्यालय आना क्यों नहीं पसन्‍द करते है? आदि आदि सवाल। इस सारी प्रक्रिया से मुझे हर बच्चे की आवश्यकता, विशिष्ट आवश्यकता की जानकारी प्राप्त हुई।

इसके बाद हमने विद्यालय प्रबंधन समिति की बैठक बुलाई उस बैठक की फोटोग्राफी बच्चों द्वारा की गई। अभिभावकों से बच्चों के बारे में जानकारी ली गई तथा अभिभावकों को आर.टी.ई. की जानकारी दी गई तथा विद्यालय विकास योजना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में उन्हें बताया।

अपनी कार्यशाला

विद्यालय के पास एक नवनिर्मित कक्ष बना हुआ था जो विभागीय भुगतान न हो पाने के कारण बन्‍द पड़ा हुआ था। उसमें प्रधान जी का ताला लगा हुआ था। मैंने साथी अध्यापक से पूछा यदि प्रधान जी से बात की जाए शायद वो इस कमरे को बच्चों की कार्यशाला के लिए खोल दें। साथी अध्यापक के समुदाय के साथ काफी अच्छे सम्बन्ध हैं। उन्होंने प्रधान जी से अनुरोध किया कि बच्चों को कार्यशाला हेतु कमरे की आवश्यकता है। प्रधान जी ने तुरन्‍त बच्चों के लिए कक्ष को खोल दिया, जिसे बच्चों की कार्यशाला का नाम दिया गया। बच्चे अपना कक्ष पाकर काफी खुश नजर आ रहे थे।

शाला प्रबन्‍धन समिति की बैठक व बच्चों के मूल्यांकन के पश्चात नए शिक्षा सत्र के अप्रैल और मई माह के लिए कार्य योजना तैयार की गई। पहले दिन बच्चों से अपने पालतू पशु के बारे में लिख लाने को कहा गया। सारे बच्चे गाय पर लिखकर लाए और एक जैसा लिख कर लाए। बच्चों से जब पूछा गया की क्या गाँव में एक ही गाय है? बच्चों ने जवाब दिया, जी नहीं। फिर पूछा गया तो सबका लेख एक जैसा कैसे हो गया? बच्चों ने जवाब दिया, किताब तो सबकी एक जैसी है सबकी किताब में एक जैसा ही लिखा है। फिर बच्चों को बताया गया कि यह लेख किताब की गाय पर नहीं बल्कि अपनी गाय जिसका तुम दूध पीते हो जो तुम्हारे साथ रहती है उसके बारे में लिखना है। दूसरे दिन बच्चों ने अपनी गाय की दिन चर्या अपने शब्दों में लिखना शुरू किया। इस तरह बच्चों ने मौलिक लेखन शुरू करने का अभ्यास किया।

फिर कार्य योजना के अनुसार बच्चों के छोटे-छोटे समूह बनाए। उन्हें चनोली गाँव के परिवेश की जैव विविधता व सामाजिक तीज-त्योहारों के बारे में अध्ययन कर सूचीबद्द करने का काम दिया गया। सभी बच्चों को अपने कार्यानुभव लिखने को कहा गया। बच्चों ने अलग-अलग समूहों में अलग-अलग विषय पर कार्य करना शुरू किया। अपने अनुभवों को भी लिखना शुरू कर दिया। बच्चों ने गाँव में जाकर विभिन्न जानकारियाँ  जुटाईं। कुछ जानकारियाँ मेरे लिए भी एकदम नई थीं। जैसे गाँव के 105 वर्ष के वृद्ध व्‍यक्ति प्रेम सिंह ने बताया कि पहले उनके गाँव में चिण की खेती होती थी अब परम्‍परागत खेती कम हो गई है। इस तरह से बच्‍चे  गाँव की चिड़िया, अनाज, कीड़े-मकोड़े, फूल, फल, पेड़-पौधे, सब्जी, तीज-त्यौहार, जंगली तथा पालतू जानवरों तथा गाँव की जनसँख्या का विवरण चार्ट में तालिका बनाकर लिख रहे थे। बच्चे पुराने समय से वर्तमान समय में हो रहे बदलाव को समझ रहे थे और देख रहे थे। मैंने बच्चों की जुटाई गई जानकारी को सूचीबद्ध करने में मदद की।

बच्चे अपनी खोज से काफी उत्साहित हो रहे थे तथा रोज नई-नई जानकारी गाँव के बूढ़े सयाने लोगों से पूछकर ला रहे थे। आपस में चर्चा कर सारी जानकारी को एक चार्ट में उतारकर कार्यशाला कक्ष की दीवार में चिपका रहे थे। बच्चों के बीच में एक अलग सा उत्साह दिख रहा था एक समूह दूसरे समूह से अपने चार्ट को अधिक आकर्षक बनाने का प्रयास कर रहा था। सारे बच्चे मिलकर काम कर रहे थे एक-दूसरे से जानकारी साझा कर रहे थे। बच्चों ने कार्यशाला कक्ष में लिखा ‘चनोली के बच्चों की दुनिया में आपका स्वागत है’। बच्चों ने गाँव के जंगल की वनस्पति की पत्तियों को इकठ्ठा कर चार्ट में चिपकाकर टाँग दिया। अनाज के बीजों को छोटी-छोटी प्लास्टिक के थैलियों में रखकर चार्ट पर चिपकाकर हर बीज व वनस्पति के आगे उसका नाम स्थानीय भाषा, हिन्‍दी व अँग्रेजी में लिखने का प्रयास किया। मैंने मदद की। बच्चे जो-जो जानकारी जुटा रहे थे उसे अपनी कापी में लिखकर ला रहे थे विद्यालय में आकर अपने समूह के साथ चर्चाकर अपने चार्ट में उसे अंकित कर रहे थे।

अब बच्चों के पास गाँव की चिड़िया, कीड़े-मकोड़े, वनस्पति, अनाज, जंगली व पालतू जानवरों, बर्तनों, पकवानों, गाँव के प्रमुख भवनों, स्थलों,  जनसँख्या, तीज-त्यौहारों, मंदिर, नदी, धारे, नालों की पूरी एक सूची थी। बच्चों ने गाँव की लगभग सारी जानकारी अपनी कार्यशाला में चार्ट में प्रदर्शित कर दी। सच में इतनी सारी जानकारी इतनी जैव विविधता तथा इनके आपसी सम्बन्ध को मैं भी इतनी गहराई से पहली बार समझ रहा था। कुछ कीड़ों के नाम तो मैंने भी पहली बार सुने। बच्चे आपस में चर्चा कर रहे हैं अरे हमारे गाँव में तो इतने सारे कीड़े, चिड़िया, वनस्पति आदि हैं।

अब बच्चे अपनी-अपनी जानकारी को एक-दूसरे के साथ साझा कर रहे हैं। यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके आस-पास के समस्त जैविक-अजैविक घटकों का उनके जीवन से क्या सम्बन्ध है?

मदद के लिए बढ़े हाथ  

अब मैं बच्चों की पारवारिक पृष्ठभूमि से अच्छी तरह वाकिफ हो गया था। जो बच्चे अति गरीब थे तथा जो अध्ययन सहायक सामाग्री के अभाव में विद्यालय से अनुपस्थित रहते थे उन सबके लिए हमने विषय की कापी, स्कूल बैग तथा विद्यालय सम्बन्धी अति आवश्यकीय सामाग्री विद्यालय में उपलब्ध करा दी। कुछ बच्चों को इसकी जिम्मेदारी दे दी गई जिस बच्चे को जो आवश्यकता होती है वह साथी विद्यार्थी से आवश्यकतानुसार सामान लेकर पंजिका में अंकित करवा लेता है। इस प्रयोग से एक बात बिलकुल स्पष्ट हुई कि बच्चों ने कभी भी आवश्यकता से अधिक सामान नहीं लिया और बच्चों में कहीं पर भी लालच की प्रवृति नहीं दिखाई दी।

साथी अध्यापक विद्यालय में नई गतिविधियों को देखकर काफी खुश हो रहे थे तथा मेरा मनोबल लगातार बढ़ा रहे थे। उन्होंने स्थानीय बैंक की शाखा में सम्पर्क किया तथा विद्यालय की गतिविधियों से प्रबन्‍धक महोदय को अवगत कराया तथा विद्यालय में आने का निमंत्रण दिया। प्रबन्‍धक महोदय बच्चों के परिवेशीय अध्ययन से काफी प्रभावित हुए, उन्होंने विद्यालय को बैंक की तरफ से एक नया कंप्यूटर दे दिया। अब बच्चों के पास एक अपना कंप्यूटर और कक्ष हो गया। बच्चे फोटो खीचते कंप्यूटर में अपलोड करते तथा फाइल बनाकर उसे सेव कर लेते हैं।

इस पूरी काम को करने में लगभग 25 दिन लग गए। अब बच्चों ने अपने परिवेश को ठीक से अध्ययन कर लिया था।

वास्‍तविक अध्‍ययन

बच्चे अपने परिवेशीय अध्ययन से काफी खुश थे। मैंने उनसे एक सवाल किया, हमारा परिवेश कैसा हो? इस पर अपने विचार लिखो। सारे बच्चों ने लगभग एक जैसा लिखा हमारा परिवेश साफ-सुथरा हो। फिर मैंने बच्चों से कहा की चलो देखते है कि हमारा परिवेश कैसा है?

मैं बच्चों के साथ विद्यालय से थोड़ी दूरी पर स्थित पंचायत घर की तरफ चल पड़ा। पंचायत घर पहुँचने पर हमने देखा कि पूरे पंचायत घर की छत पर कूड़े का ढेर लगा हुआ है चारों तरफ गन्दगी का अम्बार लगा हुआ है।

मैंने बच्चों से पूछा कि बच्चों हमारा परिवेश कैसा हो? बच्चों ने एक साथ कहा साफ-सुथरा हो। दूसरा सवाल किया हमारा परिवेश कैसा है? बहुत गन्दा, गन्दा, ख़राब इस तरह के मिले-जुले उत्तर सुनने को मिले। अब अगला सवाल किया हमारी किताब में ‘हमारा परिवेश’ में लिखा है कि परिवेश साफ-सुथरा होना चाहिए तथा आपने भी अपनी डायरी में लिखा है परिवेश साफ-सुथरा हो, लेकिन परिवेश तो गन्दा है। ये साफ- सुथरा कैसे हो सकता है? सारे बच्चों ने एक साथ कहा हम अपने परिवेश को साफ-सुथरा करेंगे।

सफाई के लिए अगला दिन निश्चित किया गया। पंचायत घर की छत काफी ऊँची थी। बच्चे गाँव से एक लम्बी सीढ़ी, झाडू, दराती, फावड़ा आदि सफाई के औजार लेकर बड़ी उत्सुकता के साथ पंचायत घर पहुँच गए। पंचायत घर की सफाई की कार्ययोजना बनाई गई। दो समूहों में बच्चों को बाँटा गया। बड़े बच्चों को छत की सफाई का कार्य सौंपा गया।     सबसे पहले मैं पंचायत घर की छत पर सीढ़ी के सहारे चढ़ा। धीरे-धीरे कुछ बच्चे भी पंचायत घर की छत पर चढ़ गए। कुछ ही समय में हमने पंचायत घर को चारों तरफ से साफ-सुथरा कर दिया।

इस सबको गाँव के लोग बड़े ही कौतुहल व उत्सुकता से देख रहे थे। कुछ लोग पगडण्डी पर खड़े होकर बच्चों का उत्साहवर्धन करने लगे तथा आपस में चर्चा करने लगे। यार ये तो शरम की बात है पंचायत घर की सफाई का काम बच्चों व गुरुजी को करना पड़ रहा है। लोग आ-जा रहे थे। बच्चे जनगीत गाते हुए तन्‍मयता से सफाई के काम में लगे हुए थे। कुछ लोग बोले मासाब ये तो आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। मैं लोगों के पास गया उनसे कहा, मैं कोई विशेष कार्य नहीं कर रहा हूँ। मैं तो सिर्फ किताब का पाठ हमारा परिवेश जो हमारे पाठ्यक्रम में है उसे पढ़ा रहा हूँ। किताब में लिखा है कि हमारा परिवेश साफ-सुथरा होना चाहिए। बच्चों ने भी अपनी अभ्यास पुस्तिका में यही लिखा है कि हमारा परिवेश साफ-सुथरा हो इसलिए परिवेश को साफ कर रहे है।

मैंने प्रश्न पूछने के अन्‍दाज में उनसे कहा, यदि यह अच्छा काम होता तो इसे तो आप ही लोग कर लेते! एक व्‍यक्ति बोले, गुरुजी हमारे पास तो समय ही नहीं है। मैंने पूछा, यदि आपके घर में इतनी गन्‍दगी व आपकी छत पर इतने पत्थर पड़े होते तो क्या आपको समय हो जाता? इस पर वो बोले तब तो हो जाता। फिर मैंने संवाद को आगे बढ़ाया उनसे कहा कि जिस काम के लिए हमारी प्राथमिकता होती है उसे हम कर लेते हैं। ऐसी शिक्षा किस काम की जो मुझे समाज व सामाजिक सरोकारों से अलग करती है।

इस सारे काम को गाँव के एक सयाने व्‍यक्ति बड़े गौर से देख रहे थे। वे पंचायत घर आए। उन्होंने बच्चों का उत्साहवर्धन किया तथा सारे बच्चों को इस कार्य के लिए जलपान कराया। बच्चे काफी खुश हो गए।

बच्चों के द्वारा पंचायत घर की सफाई एक सामाजिक बहस का मुद्दा बन गया। गाँव के सयाने लोगों द्वारा निर्णय लिया गया कि गाँव की चौपाल व पंचायत घर को गाँव की पंचायत व गाँव के लोग स्वयं साफ़ करेंगे। इस बात का इतना प्रभाव रहा कि तुरन्‍त से पंचायत घर का सौंदर्यीकरण पंचायत द्वारा कराया गया।

भ्रमण के बहाने

बच्चों के द्वारा किए गए इन शोधों व जुटाई गई जानकारी से मुझे अपने विद्यालय की बस्ती की सारी जानकारियाँ प्राप्त हो चुकी थीं। अब मुझे बच्चों के साथ गाँव का भ्रमण करना था तथा गाँव को करीब से समझना था तथा समुदाय के साथ बातचीत कर विद्यालय और समुदाय के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना था। मैंने बच्चों से पूछा कि अब हम सभी सप्ताह के अन्तिम दिन गाँव के भ्रमण पर जाएँगे। तुम लोगों को मुझे अपना गाँव घुमाना है, बच्चे यह सुनकर काफी खुश हो गए। आपस में बातचीत करने लगे सर को हम गाँव के तालाब, लुहार की भट्टी, खेत-खलिहान, जंगल आमा-बूबू, चाचा-चाची सबसे मिलाएँगे बच्चों का यह उत्साह देखने लायक था। बच्चे शनिवार तक का इन्तजार नहीं कर पाए। बच्चे बोले सर हमें आपको गाँव घुमाना है हम तय करेंगे गाँव किस दिन घूमना है। मैंने बच्चों से कहा ठीक है आप ही लोग तय कर लो। बच्चों ने दूसरे दिन ही गाँव भ्रमण का कार्यक्रम बना दिया। बच्चे आपस में चर्चा कर रहे थे सर को यहाँ से ले जाएँगे, सर को वहाँ से ले जाएँगे तथा कुछ बच्चे तो इस बात पर लड़ रहे थे कि पहले सर को क्या दिखाएँगे।

दूसरे दिन बच्चों के साथ गाँव भ्रमण किया। गाँव के लोगों से बातचीत की लोग बहुत खुश थे। बच्चों ने गाँव में जनगीत गाए। गाँव के लोगों में विद्यालय के प्रति एक नए उत्साह का सृजन होते हुए दिख रहा था। मैंने लोगों से अनुरोध किया कि आप अपने बच्चों को हमारे विद्यालय में नामांकन कराएँ हम उन्हें बेहतर शिक्षा देने का प्रयास करेंगे। इस विद्यालय को समुदाय के साथ मिलकर एक बेहतर विद्यालय बनाने का प्रयास करेंगे। लोगों ने भ्रमण के कार्यक्रम को बहुत सराहा तथा लोगों ने कहा गुरुजी आप समुदाय से या हमसे विद्यालय के लिए जो भी मदद मागेंगे हम जरूर करेंगे।

हमारे भ्रमण की चर्चा समुदाय में व गाँव के पड़ावों में होने लगी। बच्चों के परिवेशीय अध्ययन व ग्रामीण भ्रमण की जानकारी जब उस बस्ती में काम कर रही संस्था ‘उत्तराखण्ड सेवा निधि’ के कार्यकर्ताओं को मिली वे हमारे विद्यालय में आए। उन्होंने बच्चों की कार्यशाला को देखा उन्हें यकीन नहीं हो पा रहा था कि इतने कम समय में ये बच्चे इस तरह से परिवेशीय अध्ययन कर सकते है। कमल जोशी इतने प्रभावित हुए कि  उन्होंने चनोली के विद्यालय पर एक लेख लिख डाला ‘एक स्कूल बिलकुल सपनों जैसा’ जो कई समाचार पत्रों में छपा।

समुदाय का सहयोग

कमल जोशी तथा उनके साथी विनोद ने मुझे बताया कि इस विद्यालय की बस्ती में उनकी संस्था एक छोटा-सा पुस्तकालय चलाती है। उन्हें लगता है कि यदि वह पुस्तकालय विद्यालय में आ जाए तो उसका बेहतर उपयोग हो सकता है। मैं उनके इस प्रस्ताव से काफी खुश हुआ मैंने तुरन्‍त साथी अध्यापक को यह खुशखबरी दी वे भी बहुत खुश हो गए, बच्चे तो ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे। मैंने बच्चों से कहा यह पुस्तकालय बच्चों का पुस्तकालय होगा, तुम्हीं लोगों को इस की देख-रेख करनी होगी। पुस्तकों का विवरण तथा वितरण भी तुम्हीं लोगों को करना होगा। बच्चों ने एक स्वर में कहा सर हम करेंगे बच्चों का यह उत्साह देखते ही बन रहा था। फिर क्या था दूसरे ही दिन सारे बच्चे गाँव में गए और पुस्तकालय की सारी सामग्री विद्यालय में ले आए। मैंने भी अपने मित्रों से बातचीत कर कुछ कहानी की किताबें पुस्तकालय के लिए माँग ली। बच्चे अपने पुस्तकालय का प्रबन्‍धन खुद करते हैं। मैंने सिर्फ उन्हें पुस्तकों का विवरण कैसे रखते हैं तथा वितरण कैसे करते हैं यह बताया। अब गाँव के भी कुछ युवक-युवतियाँ बाल पुस्तकालय से पुस्तकों को ले जाते हैं।

कुछ बच्चे जो पढ़ने में बहुत कमजोर थे उन सभी बच्चों का एक समूह बनाकर कहानी किताबों के माध्यम से उन्हें किताब पढ़ना सिखा रहे हैं। बच्चों का कहानी की दुनिया में जाना तथा छोटी-छोटी कविताएँ लिखना एक सुखद अनुभूति है।

अब विद्यालय का समुदाय के साथ काफी घनिष्ठता बन गई है। समुदाय के लोग विद्यालय के सभी कार्यो के प्रति काफी रूचि ले रहे हैं। बरसात के समय समुदाय के साथ मिलकर पौधारोपण की एक कार्य योजना बनाई। जिसमें यह तय किया गया कि गाँव के गलियों में और विद्यालय में छायादार पौधों का वृक्षारोपण किया जाएगा। मैंने और मेरे साथी अध्यापक ने कई जगह से फूल व छायादार पौधे इकट्ठे किए। कुछ पौधे हमने समुदाय के सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर गाँव के पड़ाव कुराचौन में रोपित किए तथा पूरे पड़ाव को विद्यालय के बच्चों ने मिलकर साफ किया। समुदाय के लोगों ने रोपित पौंधों को पानी खाद देने का जिम्मा उठाया। स्थानीय दुकानदारों ने पौधों के चारों तरफ सुरक्षा बाड़ लगा दी ताकि पौधों को जानवर न खा सकें।

सड़क से विद्यालय का रास्ता बहुत खराब था, इस बीच ग्रामप्रधान से तथा विद्यालय प्रबन्‍धन समिति के अध्यक्ष को इस समस्या से अवगत कराया। ग्राम प्रधान ने कहा गुरूजी वैसे तो पंचायत के पास अभी कोई बजट नहीं है लेकिन हम मनरेगा के तहत सड़क से विद्यालय तक 4 फीट चौड़ा मार्ग निर्माण कल से शुरू करवा देते हैं। दूसरे दिन ही विद्यालय के रास्ते का काम शुरू हो गया।

इन क्रियाकलापों से विद्यालय के साथ समुदाय के विशिष्ट सम्बन्ध स्थापित हो रहे हैं। समुदाय के लोग विद्यालय की गतिविधियों के बारे में जानकारी ले रहे हैं। विद्यालय को हर सम्‍भव मदद करने को तैयार हैं।


कल्‍याणसिंह मनकोटी, सहायक अध्‍यापक, राजकीय जूनियर हाईस्‍कूल, चनोली,विकासखण्‍ड भैसियाछाना,उत्‍तराखण्‍ड  

                       

 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

nice

pramodkumar का छायाचित्र

yah kam karne ka shi tarika hai .

pramodkumar का छायाचित्र

yah kam karne ka shi tarika hai .

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