किसी 'खास' की जानकारी भेजें। करुणेश जोशी : अधिकारी नहीं, शिक्षकों का दोस्त

शिक्षा जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में शैक्षिक-नेतृत्व की परिभाषा तय करना कठिन काम है। यह नेतृत्व हमें उदाहरणों में जरूर दिखाई दे सकता है। करुणेश जोशी इसका एक बेहतर उदाहरण हैं। उनके व्यवहार, कुशलता,  समझ और समर्पण से इसका अनुमान लगाया जा सकता है -

  • उन्हें  ब्लॉक का हर शिक्षक जानता है।
  • उनसे सीआरसी के सभी शिक्षक खुलकर बात करते हैं |
  •  वह अपने सभी स्कूलों की स्थिति मौखिक रूप से बता सकते हैं।
  • लीक से हटकर काम करने में हिचकते नहीं,  नया काम शुरू करने को तैयार रहते हैं।
  • कोई शिक्षक उनके आदेश की अवहेलना नहीं करता, उसे खुशी-खुशी अपनाता है।
  • वह अकादमिक बातों पर शिक्षकों को भाषण नहीं देते, उनके स्कूल में जाकर उन पर काम करते हैं।
  • खुद को अधिकारी नहीं, बल्कि शिक्षक कहते हैं।
  • शिक्षकों को प्रशासनिक कामों के लिए सीआरसी में कम-से-कम बुलाते हैं।
  • जो बातें या निर्देश फोन पर हो सकती हैं,  उनके लिए शिक्षक को स्कूल से बुलाना गलत मानते हैं।
  • विषयों पर उनकी पकड़ है,  उस ज्ञान को साझा भी करते रहते हैं।
  •  खुलकर प्रशासनिक दिक्कतों की आलोचना करते हैं,   उसका समाधान भी निकालते हैं।
  • कार्यालय के स्टाफ की दिक्कतों को भी समझते हैं।

शिक्षकों और मित्रों से उनकी तारीफ सुनकर मन में उनसे मिलने की इच्छा मजबूत होती गई और एक दिन उन्हें फोन किया। उन्होंने ऑफिस के बाद का समय दिया। हमें उनके दफ्तर पहुँचने में थोड़ी देरी हो गई, लेकिन वह हमारा इंतजार कर रहे थे। करुणेश जोशी वर्तमान में सीआरसी सिसौना,  सितारगंज हैं। अल्मोड़ा के बाड़ेछीना में गांव, हल्द्वानी में घर और शिक्षा। शुरुआत से ही उधमसिंह नगर के लों में रहे। अभी 23 सरकारी और तीन प्राईवेट स्कूलों को नेतृत्व दे रहे हैं। उनसे शिक्षा पर बात करते-करते  यही समझ आया कि वह गहरे भी बहुत हैं। मजाक-मजाक में ही बड़े काम कर जाने वाले। उनसे व्यक्तिगत सवाल भी पूछ लो तो वे ‘हम’ यानी ‘टीम’ या ‘विभाग’  की ओर से मुखातिब होते। उनसे समझने-सीखने की प्रक्रिया में जो बातें रिकॉर्ड हो पाईं, उसके चंद टुकड़े-

यही जानने की उत्कंठा है कि आप स्कूलों को कैसे चला रहे हैं ? शिक्षकों को कैसे देखते हैं ?

साफ सा मामला है। 20 प्रतिशत शिक्षक ऐसे हैं, जिन्हें पढ़ाना ही है। यह वे कैसे करते हैं, वे जानें। और इतने ही शिक्षक ऐसे हैं जो मानते हैं कि पढ़ाना उनकी जिम्मेदारी नहीं। वे सब काम कर लेंगे,  लेकिन पढ़ाने का सवाल आएगा तो वे कहेंगे देखिये ये काम वो काम ! बाकी के 60 प्रतिशत हवा का रुख देखते हैं। जिसका पलड़ा भारी, उसके साथ। लेकिन विभाग में मोटिवेशन की बहुत कमी है। आलोचना करना तो आसान है, उसमें पैसे नहीं लगते। जिन्‍दगी भर एक भूमिका में आप होते हैं तो ‘फ्रेश’ रहना आसान नहीं होता। शिक्षकों की ढेरों दिक्कतें हैं, गिनाई नहीं जा सकती इतनी। शिक्षा-प्रशासन भी बड़ा टेढ़ा काम है। मगर मैं समझता हूँ, विभाग में काम करने वाले लोग ही अधिक हैं। उन्हीं से विभाग बनता है।

आप तो शिक्षक रह चुके हैं, तो मोटिवेशनके लिए कुछ करते हैं?

कुछ अलग से नहीं करता। प्रशासनिक आधार पर तो कम ही गुँजाइश रहती है,  लेकिन व्यक्तिगत रूप से करता हूँ। जब उनसे भेंट होती है। उनकी जो तारीफ सुनी होती है,  उन्हें बता देता हूँ। मुझे पता चलता है कोई शिक्षक अच्छा काम करता है तो मैं उसके स्कूल में जाने का प्रयास करता हूँ। निरीक्षण की भावना से नहीं, सहयोग की भावना से। अन्य शिक्षकों को ऐसे स्कूलों को देखने के लिए भी कहता हूँ। यह निरन्‍तर हो रहा है। ‘स्कूल इंटरचेंज’  के तहत भी आपसी साझीदारी कराई जाती है। जो शिक्षक अच्छा कर रहे हैं, उनके पास उसे बताने को कोई मंच न होना बहुत अखरता है। ऐसा कोई अखबार तो दुनिया में होना चाहिए, जो शिक्षकों के अच्छे काम को सामने लाये। प्राथमिक स्कूलों में शिक्षण कोई मामूली काम नहीं। मेरा तो प्रयास यही रहता है कि दोस्ती से काम लूँ। मैंने देखा है ऐसा करने से काम हो जाते हैं। सीआरजी में 14 शिक्षक अपनी इच्छा से आए हैं। इनमें अच्छे और गम्‍भीर मुद्दों पर चर्चा होती है। अधिकतर शिक्षक ऐसे प्रयोग चाहते हैं, लेकिन व्यावहारिक दिक्कतों की वजह से कर नहीं पाते। जिन स्कूलों में अभिलेखीकरण का काम अच्छा है, वहाँ दूसरे स्कूलों के शिक्षक भेजे जाते हैं। सीखने और सिखाने वाले दोनों को लाभ होता है। मैं जोर देकर कहूँगा कागजों से कुछ नहीं होता। ऐसे काम कागज दौड़ाकर नहीं हो सकते। असल प्रभाव तो शिक्षकों की आँखों में दिखता है।

शिक्षकों के लिए जो ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए गए हैं, उसका कक्षाओं में कोई प्रभाव दिखता है ?

मैं जो कह रहा था, पहले वाले 20 प्रतिशत शिक्षक, उन्हें इससे बड़ी मदद मिली है। वे अब और बेहतर काम कर रहे हैं। बच्चों की ‘टेक्स्ट-रीडिंग’ जैसी दिक्कतों से निपटने में मदद मिल रही है। उन्होंने बच्चों को ‘समूह’  में रखकर भी पढ़ाना शुरू किया है और जब ‘इनोवेशन’ की बात शुरू हुई है तो वे नए-नए प्रयोग भी कर रहे हैं। एक बार प्रभाव की तरंगें छूटने लगती हैं तो बाकी 60 प्रतिशत पर भी प्रभाव जाता है। वे भी कुछ न कुछ करने लगते हैं. लेकिन मैं व्यावहारिक पक्ष को बताना नहीं भूलूँगा। ऐसे स्कूल में शिक्षक को डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए, लेकिन यह हमेशा सम्‍भव नहीं होता। सीआरसी के रूप में मेरा प्रयास रहता है कम से कम एकल-शिक्षक विद्यालयों में शिक्षकों को गैर-जरूरी कार्यों से मुक्त रखूँ।

आपका क्षेत्र अनुसूचित जनजाति (थारू-बोक्सा) बहुल है। आपने कभी कोशिश की जानने की इस समुदाय के बच्चों का लर्निंग लेवलसुधर रहा है ?

शिक्षा के प्रति इस समुदाय में जबरदस्त ललक पैदा हुई है। पहले ऐसा नहीं था। यह निश्चित रूप से बड़ा प्रभाव है। अनुसूचित जनजाति में यह दूसरी पीढ़ी है जो शिक्षा ले रही है। नयी पीढ़ी का ‘लर्निंग लेवल’  बढ़ा है। वे और आगे जाएँगे लेकिन अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों की हालत अधिक संतोषजनक नहीं। अनुसूचित जाति के जो बच्चे हमारे स्कूलों में आ रहे हैं,  वे ‘माइग्रेंट’  मजदूर हैं। सितारगंज में सिडकुल (औद्योगिक क्षेत्र) आने से इनकी तादाद बहुत तेजी से बढ़ी है। इनकी पहली जनरेशन ही स्कूलों में आई है।

आप शिक्षा-प्रशासन के सबसे निचले पायदान में हैं, जो इमारत के लिए बुनियादकी तरह काम करता है, अन्‍दर से कभी-कहीं कोई दिक्कत महसूस होती है?

प्रशासनिक कामों में, निर्णय प्रक्रिया में अधिक वक्त लग जाता है। कुछ कार्यक्रम बिना भूमिका और बिना तैयारी के नीचे आ जाते हैं। कई बार व्यावहारिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है- जैसे जहाँ अधिक बच्चे हैं, वहाँ अधिक शिक्षक देने का निर्णय। 35 बच्चों वाले स्कूल में और 200 से अधिक विद्यार्थी-संख्या वाले स्कूल में बराबर शिक्षक रहें यह तो न्याय नहीं ? तब निर्णय जरूरी लगता है,  लेकिन अधिकार होते हुए भी आपके हाथ बँधे होते है। ऐसे मौके कई बार आए हैं,  जब मुझे लगता था, मैं सुधार सकता हूँ, लेकिन वास्तविकता में मैं नहीं कर सकता। हाँ, ये जो ‘शिक्षा का अधिकार’ अधिनियम आया है, लागू हुआ है, उसके विपरीत परिणाम भी सामने आ रहे हैं। मुझे 25 प्रतिशत बच्चों को प्राइवेट को देने का मामला समझ नहीं आया। यह एक नई संस्कृति लाया है। प्राइवेट के प्रति अभिभावकों की दीवानगी भी समझ से परे है। एक और जरूरी बात- प्रशासनिक आदेशों की भाषा भी सुधारने की जरूरत महसूस होती है। आप अपराधियों से नहीं शिक्षकों से बात कर रहे होते हैं। सबसे बड़ी चुनौती तो शिक्षकों के प्रोत्साहन की कोई रणनीति न बन पाने की है। अभिभावकों,  समाज और मीडिया का सरकारी शिक्षक के प्रति पूर्वाग्रह, इसका कोई आधार समझ नहीं आता। विभाग को ‘वाकई पढ़ा सकने वाले’  शिक्षकों की खोज करना भी आना चाहिए।

इतने समय से आप शिक्षा विभाग में हैं। सकारात्मक और नकारात्मक सब जानते हैं। दूसरी तरफ प्राइवेट स्कूलों का बढ़ता जाल। सरकारी स्कूलों से लगातार घट रही विद्यार्थी-संख्या। आपको नहीं लगता सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली डगमगा रही है ?

देखिए यह बदलाव भी जल्द समझ में आने लगेगा। मुझे ‘पक्का’  यकीन है, सरकारी स्कूल रहेंगे। ऐसा भी वक्त आएगा जब उन्हें लोग बेहतर कहेंगे (मैं खुद तो मानता ही हूँ वे आज भी बेहतर हैं)। जो अभिभावक ‘स्टेटस सिंबल’ के चक्कर में अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से प्राइवेट में ले जाते हैं, उन्हें जल्द समझ आ जाता है कि गड़बड़ कर दी। प्राइवेट स्कूल का ‘असुरक्षित’ शिक्षक गुणवत्ता दे पायेगा, यह गैर-यकीनी है। वह तो खुद सरकारी शिक्षक बनने की लालसा रखता है। फिर आप आर्थिक पहलू को क्यों भूल जाते हैं? कितने बच्चों को प्राइवेट स्कूल अपनाएँगे ? देश और प्रदेश की अधिकांश आबादी गरीब है। उनके पास  अपना स्कूल कहने के लिए ‘सरकारी’  स्कूल ही है। प्राइवेट स्कूल के आगे अभिभावक अपनी जुबान नहीं खोल सकते, यहाँ वे दिल खोलकर शिकायत कर सकते हैं। यही हमारी सबसे बड़ी मजबूती है। एक उदाहरण देता हूँ- उधमसिंह नगर का कस्तूरबा गाँधी आवासीय विद्यालय। विभाग ने थोड़ा ध्यान दिया, थोड़ी व्यवस्था की। यह चमक गया। यहाँ बच्चों की कमी नहीं। 200 से अधिक बच्चे हैं। बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है। जिले में ऐसा एक भी प्राइवेट स्कूल नहीं, जहाँ बिना शुल्क के ऐसी शिक्षा मिल रही हो। सरकारी का ही उदाहरण केन्द्रीय विद्यालय और जवाहर नवोदय विद्यालय भी हैं। यहाँ  प्रवेश के लिए मारामारी रहती है। तो कमी तो सरकारी शिक्षकों की नहीं है न, सुविधाओं की है। अब इस ओर भी सरकार का ध्यान गया है और आने वाले दिनों में सभी सरकारी स्कूल परिपूर्ण होंगे। हाय-तौबा मचाने की जरूरत नहीं। जो अभी हो सकता है, उसे अभी कर लिया जाए और जो कल होना है उसे कल कर ही लेंगे। कुछ जोड़ते चलेंगे तो बनता ही चला जाएगा।


करुणेश जोशी से भास्कर उप्रेती की बातचीत पर आधारित। अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, देहरादून द्वारा प्रकाशित ‘उम्‍मीद जगाते शिक्षक’ से साभार।

 

टिप्पणियाँ

khem shanker का छायाचित्र

Adhikari ese bhi hote he.yah jankar bahut santosh mila.
Bahut shubhkaamnaye...

vikas.sharma का छायाचित्र

अंधकार मिटाने के लिए सूरज की एक किरण ही काफी होती है ,शुभकामनाए करुनेश जोशी जी को ।

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