किसी 'खास' की जानकारी भेजें। कमल चन्‍द माली : निर्धारित उद्देश्‍य, बेहतर प्रयास

मेरा मानना है कि ‘‘बेहतर प्रयासों से शिक्षक निर्धारित शैक्षिक उद्देश्‍यों को सरलता से प्राप्त कर सकता है।’’ मैंने विद्यालय के विद्यार्थियों के शैक्षिक कार्य को रुचिपूर्ण और सरल बनाने के लिए एल.जी.पी. तथा स्वैच्छिक शैक्षिक मंच की मासिक कार्यशाला में बताए सीखने-सिखाने के बेहतर तरीकों को अपनाया।

शब्दों से वर्ण शिक्षण कराना, पहचानना और बोलना सिखाया। कार्ड का उपयोग कर सिखाने के तरीकों को बेहतर बनाने का प्रयास किया। गणित विषय में खेल, कविता और कार्ड के माध्यम से अंक पहचान, अंक बोलने का अभ्यास, लिखे अंकों का स्थानीयमान, सरल तरीकों से बताने का प्रयास किया है। अँग्रेजी में वर्णमाला पहचान, बोलना, अँग्रेजी शब्दों के चार्ट के माध्यम से दोहरान कर सिखाया। विद्यार्थी इन तरीकों से बताई गई बातों को रूचि से सीखते हैं। इससे मेरे विद्यालय के विद्यार्थियों के शैक्षिक स्तर में सुधार हुआ है। पुस्तक को पढ़ने लगे हैं। गणित के अंकों को पहचानने लगे हैं। विद्यार्थियों में आगे से आगे जानने की जिज्ञासा पैदा हुई है। यह सीखने, सिखाने के बेहतर प्रयासों का ही परिणाम है।

विद्यालय की पृष्ठभूमि

राजकीय प्राथमिक विद्यालय दामोदरपुरा (डिग्गी) तहसील मालपुरा जिला - टोंक (राज.) मालपुरा बाइपास रोड पर तीन किलोमीटर दूर गाँव में सड़क के पास बना हुआ है। इस विद्यालय की स्थापना सन् 1999 में राजीव गाँधी स्वर्ण जयन्‍ती विद्यालय के रूप में हुई थी और वर्ष 2006 में इस विद्यालय को क्रमोन्नत कर राजकीय प्राथमिक विद्यालय कर दिया गया है। विद्यालय के बाहर हेण्डपम्प पर फ्लोराइड प्लांट लगा हुआ है। मेनगेट से विद्यालय परिसर एवं भवन स्पष्ट दिखाई देता है। विद्यालय में दो बडे़ कमरे हैं और एक कार्यालय कक्ष बना हुआ है। विद्यार्थियों के लिए विद्यालय परिसर में शौचालय एवं मूत्रालय बना हुआ है।

हम तीन अध्यापक कार्यरत हैं। एच.एम. श्री किशन गोपाल धाबाई एवं सहायक अध्यापक श्री राधेश्‍याम चौधरी और मैं कमल चन्द माली। विद्यालय में वर्तमान समय में कक्षा एक से पाँच तक कक्षाओं के कुल 44 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं।

विद्यालय में मेरी भूमिका

सफल शिक्षक सदैव अपने व्यवसाय के प्रति निष्ठावान होता है और वह शिक्षण सामग्री के साथ-साथ शिक्षण कार्य को सहज और सरल बनाने के लिए हमेशा नवीन शिक्षण विधियों के बारे में जानकारी लेकर आवश्‍यकतानुसार टी. एल. एम. बनाकर अध्ययन कराता रहता है।

मैं विद्यालय में समय पर आता-जाता हूँ। विद्यार्थियों के नामांकन एवं ठहराव को सुनिश्चित करने के लिए हमेशा प्रयासरत रहता हूँ। विद्यालय में छात्रों को शिक्षण कार्य कराते समय हमेशा छात्रों से मित्रवत् व्यवहार रखकर नवीन तरीकों, कविता, गीत, खेल आदि के माध्यम से शिक्षण कार्य कराते हुए अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमेशा प्रयासरत रहता हूँ। मैं कक्षा में हमेशा विद्यार्थियों की इच्छा को सर्वोपरि रखकर शिक्षण कार्य कराता हूँ। जिससे वह सहज भाव से बताए गए बिन्दुओं को समझकर उपयोग कर सकें। साथ ही विद्यार्थियों का शिक्षण एवं विद्यालयों से जुड़ाव बना रह सके इसके लिए कविताएँ, गीत, कहानियाँ, खेल आदि करवाकर मैंने विद्यालय में विद्यार्थियों का ठहराव निश्चित किया है। शिक्षण में रुचि उत्पन्न हो सके इसके लिए हमेशा नई-नई शिक्षण विधियों का उपयोग कर शिक्षण बिन्दु के लक्ष्य तक विद्यार्थियों को ले जाकर उनके ज्ञान को स्थाई करने के लिए प्रयासरत रहता हूँ। विद्यार्थियों में सामान्य ज्ञान की जानकारी है। सभी विषयों में इनके लिए प्रतिदिन प्रार्थना सभा में उनको जानकारी देता हूँ।

विद्यालय के कक्षा-कक्ष में शिक्षण सम्बन्धित वातावरण बनाने के लिए आवश्‍यकतानुसार विद्यार्थियों के स्तर को ध्यान में रखकर चार्ट निर्माण कर लगाए हैं। जिससे विद्यार्थी उनको हमेशा देखते रहें और सीखते रहें। बच्चों में परस्पर प्रेम बढे़ इसके लिए पोषाहार समय में एक साथ बैठाकर विद्यार्थियों से भोजन वितरण कराने का कार्य करता हूँ। खेल खिलाता हूँ। जिम्मेदारी का अहसास हो इसके लिए विद्यार्थियों को अलग-अलग कार्य वितरित करके विद्यालय के दैनिक कार्यो को सम्पन्न करवाता हूँ। जैसे प्रार्थना के लिए व्यवस्था करना, पोषाहार के बर्तनों को एक जगह रखना कक्षा कक्षों की सफाई कराना, आदि।

विद्यालय की स्थिति के बारे में

जब मेरा इस विद्यालय में सर्वप्रथम पद स्थापन हुआ उस समय मैंने विद्यालय में देखा कि यहाँ पर 18 विद्यार्थियों का नामांकन था। उनमें से 5 विद्यार्थी उपस्थित थे। कक्षा में विद्यार्थियों से पता चला कि विद्यालय में अधिकतर तीन या पाँच विद्यार्थी ही आते हैं। मैंने विद्यार्थियों का शैक्षणिक स्तर जाँचने के लिए विषयवार लिखित व मौखिक गतिविधियाँ करवाईं। हिन्दी में कक्षा 4 के विद्यार्थी से मैंने श्यामपट्ट पर ‘‘ क म ल ’’ लिखकर उनसे वर्णों को बोलने को कहा तो वो ‘ क ’ को क नहीं  बोलकर कबूतर बोल रहे थे। वे इन वर्णों को नहीं पहचान पाए। गणित विषय में 1 से 100 तक गिनती के अंकों को कक्षा 2 के विद्यार्थी न तो बोल पाए और न ही पहचान सके। अँग्रेजी विषय में कक्षा 3 की छात्रा से अँग्रेजी वर्णमाला बोलने को कहा तो वह भी नहीं बोल पाई, और पहचान भी नहीं पाई। मैंने विद्यालय में नामांकन वृद्धि हेतु जनसम्पर्क किया तो लोग अपने बच्चों को इस विद्यालय में भेजने को तैयार नहीं थे। लोगों ने कहा कि विद्यालय में पढ़ाई होना तो दूर की बात है विद्यालय समय पर खुलता भी नहीं है। जो बच्चे स्कूल आ रहे थे उनके अभिभावकों का भी यही कहना था कि हम भी अपने बच्चों को अगले सत्र से इस विद्यालय में नहीं भेजेंगे।

चिन्हित समस्या के बारे में

मुझे यह कारण समझ आया कि विद्यार्थियों को शिक्षण कार्य पुराने तरीके से कराया जाता है। जिससे विद्यार्थी शैक्षणिक कार्य में रुचि नहीं ले पा रहे हैं। कक्षा में विद्यार्थी की इच्छानुकुल वातावरण बनाकर शैक्षिक कार्य नहीं हो पा रहा है। विद्यार्थी कविता बोलने में रुचि लेते हैं, कहानी सुनने में रुचि लेते हैं। खेल-खेल के माध्यम से शिक्षण करने में रुचि लेते हैं। लेकिन यह सब क्रियाएँ विद्यार्थियों के साथ कक्षा में नहीं हो पा रही थीं, जिससे विद्यार्थी मन से अध्यापक के साथ शैक्षिक कार्य में सहभागी होते नजर नहीं आ रहे थे।

साथ ही असमान स्तर के विद्यार्थियों को एक साथ ही शैक्षणिक कार्य कराया जा रहा था। जिससे जो स्तर के अनुरूप थे वे विद्यार्थी समझ पा रहे थे लेकिन जो पिछड़ गए थे वे और भी शैक्षिक कार्य में पिछड़ते जा रहे थे।

विद्यार्थियों को वर्ण पहचान हो यह लक्ष्य निर्धारित कर मैंने शब्द शिक्षण  से वर्ण पहचान कराने का अभ्यास कराया। स्वैच्छिक शिक्षक मंच में एल.जी.पी. के दक्ष प्रशिक्षकों द्वारा मासिक बैठक में हमें जो नए-नए तरीके बताए गए उनके माध्यम से विद्यार्थियों को वर्ण, शब्द शिक्षण  और गणित के अंकों को पहचानने का लक्ष्य प्राप्त करने हेतु बताए तरीकों से शिक्षण कार्य कराना शुरू किया। कुछ प्रयास इस तरह के किए गए -

  • कार्ड, कविताएँ, चार्ट आदि का निमार्ण कर कक्षा में उपयोग कर शैक्षणिक कार्य का निर्धारित लक्ष्य प्राप्ति हेतु कार्य शुरू किया।
  • बच्चों की झिझक दूर करने हेतु सामूहिक कविताओं का वाचन विद्यार्थियों से लय और हाव-भाव तरीके से कराना शुरू किया।
  • कक्षा में सभी विद्यार्थियों का स्तर समान हो सके यह लक्ष्य निर्धारित कर विद्यार्थियों का विषयवार स्तर जाँचकर ग्रुप बनाकर ग्रुप शिक्षण शुरू किया।
  • विद्यार्थियों को मौखिक अँग्रेजी मीनिंग (रंग, पक्षी, जानवरी, फल), गिनती आदि का अभ्यास कराना शुरू किया।

गणित में सैकड़ा तक प्रत्येक अंकों के स्थान का मान बताना

गणित में अंकों की पहचान के लिए कुछ खेल गतिविधियों का सहारा लिया गया। अंकों के स्थानीय मान समझाने के लिए एक टी.एल.एम. का निमार्ण किया।

मोटे गत्ते के नौ कार्ड समान आकार के बनाकर रंग से 1 से 9 तक गणित के अंक लिखे। फिर नौ कार्ड पहले बनाए गए कार्ड से लम्बाई में दोगुने आकार के बनाए उन पर 10 से 90 तक गणित की संख्याएँ लिखीं। नौ कार्ड पहले बनाए कार्ड की लम्बाई से तीन गुना बड़े आकार के बनाए उन पर 100 से 900 तक की संख्याएँ लिखीं। इस तरह 27 कार्ड गणित के टी.एल.एम. के रूप में तैयार हो गए।       

बच्चों को गोल घेरे में बैठाकर सभी 27 कार्डों को बीच में तीन जगह रख दिया। 1 से 9 तक, 10 से 90 और 100 से 900 तक। बोर्ड पर 125 संख्या लिखी और बच्चों से पहचानने को कहा। कक्षा पाँच की छात्रा ने खडे़ होकर कहा यह 125 है। जब मैंने बीच में पड़े कार्डों से 125 बनाने को कहा तो उसने 1, 2, और 5 लिखे कार्ड उठाकर 125 बना दिया। जब मैंने संख्या में लिखे 1 का मान पूछा तो एक बताया, दो का मान 2 बताया। अन्य विद्यार्थियों ने भी यही जवाब दिया जो गलत था।

मैंने कार्ड के माध्यम से समझाया। 1 सैकड़ा के स्थान पर है इसलिए 1 का मान 100 है। 2 दहाई है इसलिए दो का मान 20 है और 5 इकाई है इसलिए 5 का मान 5 है। 1 के स्थान पर 100 का 2 के स्थान पर 20 का और 5 के स्थान पर 5 का कार्ड लगाकर उनको संख्या का स्थानीय मान समझाया। इस तरह बार-बार क्रिया कराने से विद्यार्थी 900 तक की संख्या में प्रत्येक अंक का स्थानीयमान कार्डो के माध्यम पहचानकर बता सकते हैं।

गणित में सम-विषम की संख्या की पहचान करवाने के लिए एक खेल का सहारा लिया। काफी सारे इमली के बीज या फिर कंकड़ लिए। इन बीजों की सहायता से बच्चों को सम और विषम के बारे में समझा सकते हैं। किसी बच्चे से मुट्ठी में कुछ बीज या कंकड़ भर लेने को कहते हैं और उन्हे गिनने को बोलते हैं। इसके बाद उनसे कहते हैं कि उनकी मुट्ठी में जो कंकड़ या बीज हैं उन्हें दो-दो करके अलग रखते जाएँ। अगर आखिर में एक भी कंकड़ नहीं बचेगा तो संख्या सम होगी। लेकिन आखिर में एक कंकड़ बचेगा तो वह विषम संख्या होगी।

प्रयास के फलस्वरूप  परिवर्तन आया

आज विद्यालय में 44 बच्चों का नामांकन हो गया है और प्रतिदिन 37 से 40 बच्चे उपस्थित हो रहे हैं। पहले विद्यालय की छवि लोगों की नजरों में अच्छी नहीं थी। पर लोग अब विद्यालय के बारे में सकारात्मक सोच रखकर चर्चा करते हैं समय-समय पर विद्यालय में आकर अवलोकन करते हैं तथा अपनी उम्मीदों के अनुकूल शिक्षण कार्य देखकर अपने बच्चों को निजी विद्यालय में न भेजकर हमारे विद्यालय में भेज रहे हैं।

विद्यालय के कक्षा 1 से 4 तक के विद्यार्थियों को वर्ण की ठीक से पहचान नहीं थी। अब विद्यालय के कक्षा 1 से 5 तक के विद्यार्थी हिन्दी की पुस्तक पढ़कर पाठ के उद्देश्‍य को समझने लगे हैं। कविताओं का लयबद्ध वाचन करने लगे हैं।

गणित विषय में विद्यार्थियों को गतिविधियों व अन्य तरीकों से शिक्षण  कार्य कराने से आज गणित विषय में कक्षा 2 से 5 तक के विद्यार्थी गणित के अंकों की पहचान कर सकते हैं। विद्यार्थियों को इकाई, दहाई का ज्ञान हो गया है तथा खेल-खेल के माध्यम से अंकों के स्थानीय मान को समझकर बताने लगे हैं तथा गणित की सभी मूलभूत संक्रियाओं को आसानी से करके सीखने लगे हैं।

इन सीखने-सिखाने के बेहतर प्रयासों के माध्यम से शिक्षण कार्य कराने से आज विद्यालय के विद्यार्थी अँग्रेजी शब्द जैसे फल, पक्षी, जानवर, सब्जी, रंग, सप्ताह, अँग्रेजी महिनों व अन्य सामान्य शब्दों का उच्चारण सही तरीके से करने लगे हैं। यहाँ तक कि कक्षा 3 से 5 तक के सभी विद्यार्थी अँग्रेजी में 20 तक गिनती लिखते और बोलते हैं।         

विद्यालय के विद्यार्थी नियमित विद्यालय आ रहे हैं एवं विद्यालय को व्यवस्थित चलाने में सहयोग करते हैं जैसे सफाई कराना, प्रार्थना का आयोजन करवाना, पोषाहार वितरण में अपना योगदान देना, स्वतः कविताएँ बोलना और छोटे विद्यार्थियों को पुस्तक व चार्ट में लगी कविताओं का लयबद्ध तरीके से सिखाने में अपना पूर्ण योगदान देते हैं।

कमल चन्द माली

  • राजकीय प्राथमिक विद्यालय दामोदरपुरा ब्लॉक मालपुरा जिला-टोंक (राज.) 
  • बी.ए. (एस.टी.सी.)
  • कहानियाँ पढ़ने और बच्चों के साथ खेल खेलने में रुचि है।

वर्ष 2009 में राजस्‍थान में अपने शैक्षिक काम के प्रति गम्भीर शिक्षकों को प्रोत्‍साहित करने के लिए ‘बेहतर शैक्षणिक प्रयासों की पहचान’ शीर्षक से राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संयुक्‍त रूप से एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। 2010 तथा 2011 में इसके तहत सिरोही तथा टोंक जिलों के लगभग 50 शिक्षकों की पहचान की गई। इसके लिए एक सुगठित प्रक्रिया अपनाई गई थी। कमल चन्‍द माली वर्ष 2009-10 में विद्यालय प्रबन्‍धन एवं नेतृत्‍व के लिए चुने गए हैं। यह टिप्‍पणी पहचान प्रक्रिया में उनके द्वारा दिए गए विवरण का सम्‍पादित रूप है। लेख में आए विवरण उसी अवधि के हैं। टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल टीम ने कमल चन्‍द माली से उनके काम तथा शिक्षा से सम्‍बन्धित मुद्दों पर बातचीत की। वीडियो इस बातचीत का सम्‍पादित अंश हैं। हम कमल चन्‍द माली, राजस्‍थान प्रारम्भिक शिक्षा परिषद तथा अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक के आभारी हैं। 


 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

कमल चन्‍द माली जी का गणित और भाषा शिक्षण के प्रयास सीखने - सिखाने की प्रक्रिया को न केवल सहज बनाते हैं बल्कि बालकेंद्रित धरातल भी प्रदान करते हैं । इसमें कक्षा सक्रिय रहती है और बच्‍चे स्‍वयं करके सीखते हैं । अर्जित ज्ञान स्‍थायी होता है । मेरी बधाई ।

sanjayedn का छायाचित्र

बहुत अच्छा प्रयास है

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