किसी 'खास' की जानकारी भेजें। कथा रश्मि वर्मा

उत्‍तराखण्‍ड के नैनीताल जिले का गढ़गाँव आज यहाँ की शिक्षिका रश्‍िम वर्मा के द्वारा स्कूल के लिए किए गए कार्यों के लिए जाना जाता है। बदलाव के इस सफर पर चली तो वो अकेली ही थीं, अब उनके पीछे एक कारवाँ है... प्रस्‍तुत है बिपिन शर्मा का रिपोतार्ज

हम आमतौर पर यही सोचते हैं कि अकेला व्यक्ति चाहकर भी बहुत बदलाव नहीं ला सकता। शिक्षा के क्षेत्र में तो यह विचार बहुत ही स्वाभाविक लगता है। इस तरह के मुहावरे भी हमारे बीच खूब लोकप्रिय हैं। हम जब भी अकेले बढ़ने की सोचते हैं, यह सोचकर रुक जाते हैं कि ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता है’। किन्‍तु इसी समाज में कुछ उदाहरण ऐसे मिल जाते हैं जो हमें अपनी अवधारणा पर बार-बार विचार करने को मजबूर कर देते हैं। वे हमें बताते हैं कि टैगोर ने एकला चलो की बात यों ही नहीं कही थी, उसके बहुत गहरे निहितार्थ हैं। जो व्यक्ति अपने चलने की शुरुआत में अकेला होता है वह अन्‍त तक अकेला नहीं रहता, उसके पीछे पूरा कारवाँ चल रहा होता है। शर्त सिर्फ इतनी-सी है कि उसका रास्ता बहुजन के कल्याण से जुड़ा हो।

हम जब राजकीय प्राथमिक विद्यालय, गढ़गाँव गए तो यही सोचकर गए थे कि वह आम सरकारी स्कूलों से थोड़ा बेहतर कोई स्कूल होगा, किन्‍तु वहाँ जाकर हमारी मान्यता पूरी तरह बदल गई। वहाँ की प्रधानाध्यापिका ने केवल स्कूल में ही नहीं बल्कि पूरे गाँव में बदलाव की लहर पैदा कर दी है। रश्मि वर्मा ने अपने प्रयास से पूरे गाँव को स्कूल के साथ जोड़ लिया है। उन्होंने स्वास्थ्य और सफाई के प्रति भी पूरे गाँव को (न कि सिर्फ अपने विद्याथियों को) जागरूक बनाया है, गाँव के हर सुख-दुख से अपने स्कूल को जोड़ा है और गाँव के पर्व-त्योहार स्कूल के भी पर्व-त्योहार बन गए हैं। यहाँ के बच्चे खूब साफ-सुथरे और चुस्त-दुरुस्त हैं, यहाँ की कक्षाएँ ही नहीं बल्कि पूरा विद्यालय परिसर अपनी सफाई और सुन्‍दरता से सहज ही हमारा ध्यान अपनी ओर खींच लेता है। यहाँ का रसोईघर और शौचालय भी चमकते-दमकते हैं। कक्षा की दीवारें बच्चों के बनाए सुन्‍दर चित्रों, उनकी लिखी कविताओं-कहानियों और शिक्षण प्रक्रिया में सहयोगी कुछ चार्टों से खूब लदी-फंदी दिखती हैं। कक्षा के भीतर बच्चों के बैठने के लिए आधुनिक ढंग के बेंच-डेस्क बने हुए हैं और साफ-सुथरी दरियाँ बिछी हुई हैं। इसके अलावा शिक्षण प्रक्रिया में आधुनिक शिक्षा सुधारों का यहाँ पहले से ही प्रयोग जारी है। कई तरह के लर्निंग टूल्स यहाँ की प्रधानाध्यापिका ने बच्चों के साथ मिलकर बनाए हैं।

एक गाँव की जो छवि सबके मन में होती है, ‘गढ़गाँव’ नैनीताल जिले का वैसा ही एक आम गाँव है। नैनीताल से इसकी दूरी लगभग 50 कि.मी. है। इस गाँव में लगभग 75 परिवार हैं। ग्रामवासी आजीविका के लिए खेती और बगीचे पर निर्भर हैं। यह तो स्वाभाविक ही है कि यहाँ के अधिकांश परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं, अन्यथा कस्बों-शहरों में न जा बसते! तो जैसे यह गाँव एक आम गाँव है वैसे ही यहाँ की प्रधानाध्यापिका रश्मि वर्मा भी एक सामान्य इन्सान और एक सामान्य शिक्षिका हैं। इसी के बीच हमें यह समझना होगा कि वह खास बात क्या है जिसके कारण यह गाँव और यहाँ के स्कूल की शिक्षिका खास महत्व रखती हैं!

रश्मि वर्मा इस विद्यालय में प्रधानाध्यापिका के पद पर दिसम्‍बर 1996 को नियुक्त हुईं। इससे पहले वे इसी क्षेत्र के मौना गाँव में सन 1992-96 तक सहायक शिक्षिका के पद पर कार्यरत थीं। रश्मि कहती हैं कि “यहाँ आने पर एक तरफ जहाँ  प्रोन्नति की प्रसन्नता थी वहीं विद्यालय की स्थिति देखकर मन को बड़ी ठेस पहुँची क्योंकि वहाँ एक विद्यालय का कोई आकर्षण ही न था। विद्याथियों की विद्यालय और पढ़ाई के प्रति अरुचि, सम्पन्न परिवार के बच्चों का पब्लिक स्कूल में पढ़ना तथा उपद्रवी तत्वों द्वारा विद्यालय भवन को क्षति पहुँचाना विशेष निराशा के कारण थे। स्कूल में बहुत कम बच्चे आते थे। विद्यालय में चारदीवारी, शौचालय व पेयजल की कोई सुविधा नहीं थी। ग्रामवासी भी विद्यालय को लेकर पूरी तरह उदासीन थे और आपसी झगड़ों में उलझे रहते थे। एक दुःखद स्थिति यह भी थी कि विद्यालय में कोई सहायक अध्यापक नहीं था, जबकि मैं इस विद्यालय को एक आदर्श विद्यालय बनाने का सपना संजोकर आई थी।”

रश्मि आगे कहती हैं कि “कुछ दिन व्यस्त रहने के बाद धीरे-धीरे मुझमें साहस आता गया और मैंने विद्यालय को एक आदर्श रूप देने का मन में संकल्प लिया। सारी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद मुझे लगा कि ग्राम समुदाय की विद्यालय व शिक्षा के प्रति उदासीनता दूर किए बिना मैं सम्‍भवतः अपने संकल्प को पूरा नहीं कर सकूँगी। इसीलिए मैंने दो स्तरों पर एक साथ काम करने का बीड़ा उठाया। इस योजना के रूप में मैंने बच्चों के साथ आत्मीय सम्‍बन्‍ध बनाने प्रारम्‍भ किए । उनकी व्यक्तिगत स्वच्छता, विद्यालय की सफाई तथा नियमित उपस्थिति के लिए उन्हें लगातार प्रेरित किया। इसके अलावा खेल-कूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम, सुलेख, चित्रकला एवं अन्‍ताक्षरी प्रतियोगिता का आयोजन भी करने लगी जिसके मुझे धीरे-धीरे सकारात्मक परिणाम मिलने लगे। दूसरे स्तर पर ग्रामवासियों को विद्यालय से जोड़ने का काम शुरू कर दिया जिसकी रूपरेखा अपने क्षेत्र के सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी श्री एम.एस. सयाना, बी.आर.सी. समन्वयक श्री एन.डी. पांडे तथा शिक्षा सुधार में रुचि रखने वाले चिराग संस्था के श्री एस.एस. नयाल जी के आगे रखने पर मुझे काफी प्रोत्साहन और पूर्ण सहयोग का आश्वासन मिला।”

इसके बाद रश्मि वर्मा ने सबसे पहले ग्राम शिक्षा समिति के पुनर्गठन का निर्णय लिया क्योंकि उसमें कई सदस्य ऐसे थे जिनके बच्चे पब्लिक स्कूल में या अन्यत्र पढ़ते थे। इसके लिए उन्होंने घर-घर जाकर ग्रामवासियों से सम्‍पर्क किया और उनकी सुविधा के अनुसार स्कूल में एक बैठक आयोजित की। इसकी तैयारी के लिए उन्होंने अपने विद्यार्थियों के सहयोग से विद्यालय भवन और उसके परिसर की खूब अच्छी तरह सफाई की और उसे आकर्षक बनाने के अन्य प्रयास भी किए। स्कूल की सफाई में प्रधानाध्यापिका और कुछ बच्चों को धूल में सने देखकर गाँव  के कुछ उत्साहित नवयुवक भी हाथ बँटाने के लिए आगे आ गए जिसे रश्मि जी अपनी योजना की पहली सफलता मानती हैं। बैठक के दिन अधिकांश ग्रामवासी विद्यालय पहुँचे और प्रधानाध्यापिका रश्मि वर्मा के अनुरोध पर नई ग्राम शिक्षा समिति का गठन किया गया। इसके अलावा सभी ग्रामवासियों ने आपसी मतभेद भुलाकर विद्यालय के विकास के लिए हर तरह से सहयोग करने का भी आश्वासन दिया।

सभी ग्रामवासियों ने प्रधानाध्यापिका के कुछ अन्य आग्रह भी सहर्ष स्वीकार किए, जैसे उन्होंने स्वीकार किया कि ग्राम सभा की बैठक प्रत्येक महीने होगी, सभी अभिभावक अपने बच्चों की हर तरह की सफाई का ध्यान रखेंगे, बच्चों को आवश्यक शैक्षिक सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी, बच्चों की नियमित उपस्थिति पर वे विशेष ध्यान रखेंगे, विद्यालय में उपद्रवी तत्वों को आने से रोका जाएगा आदि। इसके अलावा रश्मि वर्मा ने एक प्रधानाध्यापिका के तौर पर यह भी आग्रह किया कि उन्हें महीने में एक दिन पूरे गाँव में सफाई अभियान चलाने का अवसर दिया जाए जिसके तहत वे घर-घर जाकर प्रत्येक घर और उसके परिसर की सफाई में योगदान दे सकें। कूड़ा-करकट के निस्तारण के लिए छोटे-छोटे गड्ढे बनाने तथा रास्तों की सफाई के प्रति भी उनका आग्रह प्रबल था, जिसमें स्वेच्छा से गाँव के लोग भी सहयोग कर सकते थे।

रश्मि वर्मा का प्रयास प्रारम्‍भ से ही पूरे गाँव से जुड़ने और पूरे गाँव को सजाने-संवारने का रहा। उन्होंने कभी भी सिर्फ स्कूल तक अपने को केन्द्रित नहीं किया और यही खास बात उन्हें महत्वपूर्ण बनाती है। यही कारण था कि पहली बैठक के अगले दिन से ही उन्हें अपेक्षित परिणाम मिलने लगे। अगले दिन से ही बच्चे खूब साफ-सुथरे बनकर स्कूल आने लगे और उनकी उपस्थिति में भी पर्याप्त सुधार दिखने लगा। इसके अलावा कुछ ही दिनों में सभी बच्चों के पास आवश्यक शैक्षिक सामग्री भी आ गई। सफाई अभियान के बारे में रश्मि बताती हैं कि “पहली बार में तो सभी ग्रामवासी (पुरुष और स्त्रियाँ) हमें कौतूहल से देखते रहे किन्‍तु बाद के महीनों में वे हमारे सहयोगी बनने लगे। उनके इस अभियान की वजह से उनका विद्यालय ही नहीं बल्कि पूरा गाँव स्वच्छता का आदर्श बन गया है। इसके अलावा उन्होंने गाँव  के लोगों के सुख-दुख में भी बढ़-चढ़कर हाथ बँटाया जिसका परिणाम यह हुआ कि वे पूरे गाँव की हो गईं और पूरा गाँव उनका तथा विद्यालय का हो गया।

गाँव की महिलाएँ भी अब विद्यालय के कामों में निस्संकोच हाथ बँटाने लगीं। इसी बीच इस विद्यालय में एक सहायक शिक्षिका की भी नियुक्ति हो गई जिनकी वजह से शैक्षिक और शिक्षणेतर कार्यों में अधिक तत्परता के साथ कुछ सार्थक काम कर पाना सम्‍भव होने लगा। सत्र के अन्‍त में उन्होंने विद्यालय में पहली बार वार्षिकोत्सव का आयोजन किया और इसमें उन्हें समुदाय का सहयोग मिला। इस उत्सव के लिए दरियों, शामियानों तथा कनात आदि की पूरी व्यवस्था समुदाय के लोगों ने ही की और इसका समस्त व्यय भी उन्होंने ही वहन किया। इस उत्सव की सफलता से उत्साहित होकर ग्राम शिक्षा समिति की अगली बैठक को आम बैठक के रूप में आयोजित किया गया और इसमें ग्रामवासियों द्वारा यह प्रस्ताव रखा गया कि विद्यालय में एक जन सहयोग खाता खोला जाए जिसमें प्रत्येक अभिभावक 5 रुपये प्रति माह जमा करें तथा इस खाते का संचालन ग्राम शिक्षा समिति के अध्यक्ष तथा प्रधानाध्यापिका द्वारा संयुक्त रूप से किया जाए। इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। निर्णय लिया गया कि इस जमा धन राशि से विद्यालय के लिए आवश्यक उपकरण और अन्य सामग्री जुटायी जा सकेगी।

इसी क्रम में रश्मि वर्मा तथा विद्यालय की सहायक शिक्षिका ने भी 50 रुपये प्रति माह इस खाते में जमा करना शुरू कर दिया। इस संकलित धन राशि से दो वर्ष के उपरान्‍त बच्चों के बैठने के लिए बेंच और स्टूलों का निर्माण किया जा सका है। इसके  अलावा विद्यार्थियों के लिए संचयिका के रूप में अलग से प्रत्येक महीने 5 रुपए अभिभावकों द्वारा जमा किए जाते हैं और यह राशि उन बच्चों को पाँचवीं कक्षा के बाद विद्यालय छोड़ते समय एकमुश्त दे दी जाती है। हर एक साल पाँचवीं कक्षा के बाद विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों को एक समारोह आयोजित करके विदाई दी जाती है जिसमें उन्हें स्मृति के तौर पर कुछ भेंट भी दी जाती है। इसके अलावा स्वतंत्रता दिवस और शिक्षक दिवस पर भी स्कूल के सभी बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए पुरस्कार दिए जाते हैं। इस विद्यालय में मिलने वाले सम्मान के कारण बच्चे स्कूल से निकलने के बाद भी स्कूल से आत्मीय रिश्ता बनाए रखते हैं और स्कूल के समारोहों में सम्मिलित होते हैं। रश्मि वर्मा बताती हैं कि “वर्षों पहले प्रारम्‍भ किया गया यह जन सहयोग खाता आज भी सुचारू रूप से चल रहा है जिसमें फिलहाल 1500 रुपए जमा हैं। विद्यालय में राष्ट्रीय पर्वों तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ग्रामवासियों की उपस्थिति और सहभागिता लगातार बढ़ती गई है तथा इन क्रियाकलापों के फलस्वरूप विद्यालय के पठन-पाठन के कार्यों में अपेक्षित सुधार  होता गया है। विद्यालय में शत-प्रतिशत नामांकन तथा उपस्थिति के साथ ही इस क्षेत्र के पब्लिक स्कूलों तथा अन्यत्र पढ़ने वाले बच्चों ने भी हमारे विद्यालय में प्रवेश ले लिया है। इसके अलावा निकटवर्ती गाँव के बच्चे भी इसी स्कूल में आने लगे हैं।”

बच्चों में सीखने-समझने की ललक पैदा करने तथा उनके शैक्षिक स्तर को ऊपर उठाने के लिए रश्मि ने शुरू में काफी मेहनत की है। उन दिनों विद्यालय प्रारम्‍भ होने का वक्त 10  बजे का था। रश्मि सुबह 8 बजे ही विद्यालय आ जाती थीं और 9.30 बजे तक कक्षा 4 और 5 के बच्चों को पढ़ाती थीं, इसके बाद 10 बजे से स्कूल में कक्षा 1 से 5 तक के बच्चों को पढ़ाती थीं। स्कूल खत्म होने के बाद फिर से 4 और 5 तक के बच्चों को पढ़ाने में जुट जाती थीं। इस अथक मेहनत में बच्चों ने भी अपनी प्रधानाध्यापिका का पूरा मान रखा और 4-5 महीने में ही इस अभियान के परिणाम सामने आए। इसके बाद कक्षा 1-2 के बच्चों के साथ भी इसी तरह से मेहनत की गई। अपने काम में सहयोग के लिए उन्होंने सहायक अध्यापिका के आने से पहले एक सहयोगी संस्था के साथ मिलकर एक बाल शिक्षक रखवाया।

अपने पढ़ाने के तरीकों के बारे में रश्मि बताती हैं कि वे बच्चों को पहले मौखिक रूप से बोलना और बातें करना सिखाती हैं, फिर लिखना और पढ़ना साथ-साथ सिखाती हैं। अक्षर ज्ञान कराने के लिए तरह-तरह के कार्ड बनाकर रखे गए हैं। कविताएँ और कहानियाँ तो रोज ही सुनाती हैं, इसके अलावा कुछ कविताओं के जरिये गिनती या अन्य बातें भी सिखाती हैं। बच्चों को गणित सिखाने के लिए आड़ू-खुबानी की गुठलियों का पयोग किया जाता है। इस विद्यालय में कक्षा एक से ही बच्चों को जोड़, घटाव, गुणा और भाग करना सिखाया जाता है। यहाँ के लगभग सभी बच्‍चों की लिखावट आश्चर्यजनक रूप से साफ और बहुत सुंदर है। शिक्षण विधि को रुचिकर तथा अधिक उपयोगी बनाने के लिए स्थानीय परिवेश पर आधारित शिक्षण सहायक सामग्री विकसित की गई जिससे बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि और अधिक प्रगाढ़ हुई है। बाल अखबार तथा बाल पुस्तकालय को संकलित कर तथा स्थानीय तीज-त्योहारों को आधार मानकर शिक्षण कार्य को नवीनता प्रदान की गई। ‘सर्व शिक्षा’ परियोजना के अन्‍तर्गत विद्यालय में शिक्षिकाओं, बच्चों तथा समुदाय के कुछ उत्साही व्यक्तियों द्वारा मिलकर अपने परिवेश से बालोपयोगी और पाठ सहयोगी सामग्री तैयार की गई।

शिक्षा में नवाचार के कुछ अन्य प्रयोगों को भी योजनाबद्ध तरीके से प्रारम्‍भ किया गया, जैसे पीने का पानी, शारीरिक स्वच्छता, नर्सरी निर्माण आदि। (यही कारण है कि स्कूल के सभी बच्चे प्रतिदिन अपने पीने के लिए उबालकर ठण्‍डा किया हुआ पानी लाते हैं।) बच्चों को सामान्य ज्ञान की जानकारी देने के लिए बॉक्स फाइल की तर्ज पर अखबारों-पत्रिकाओं से तरह-तरह की कतरनें जुटाकर उन्हें एक रजिस्टर में करीने से चिपका दिया जाता है ताकि सभी जानकारियाँ व्यवस्थित तरीके से संकलित की जा सकें। इस कार्य में बच्चों को भी सहभागी बनाया जाता है। फूलों की देख-रेख करने के लिए भी बच्चों के छोटे-छोटे समूह बनाकर उनके बीच अलग-अलग क्यारियाँ बाँट दी गई हैं। बच्चों का समूह अपनी-अपनी क्यारियों की देख-रेख में बिना कहे ही काफी तत्पर रहता है।

इसी तरह से अन्य कई काम भी बच्चों में बाँट दिए गए हैं और साल के अन्‍त में सभी समूहों के कार्यों का मूल्यांकन किया जाता है। प्रधानाध्यापिका रश्मि वर्मा गर्व से बताती हैं कि ‘वर्ष 1998 में क्षेत्रीय तथा जिला प्रशिक्षण संस्थान की जनपदीय प्रतियोगिता में भाग लेकर इस विद्यालय ने नैनीताल तथा उधमसिंह नगर में प्रथम स्थान प्राप्त किया जो हमारे विद्यालय की उपलब्धि थी।’ जबकि उस समय तक रश्मि को उस विद्यालय में गए हुए केवल दो-ढाई साल ही हुए थे! यह पूछे जाने पर कि इतना काम करने के बाद उन्हें अनेक तरह के रजिस्टरों को भरने का वक्त कैसे मिलता है, रश्मि जी बताती हैं कि अब तो सहयोग करने के लिए एक सहायक अध्यापिका और एक बाल शिक्षिका भी है। पहले तो यह काम सुबह-शाम या घर पर करती थीं। रजिस्टरों को एक बार व्यवस्थित कर लेने के बाद इस काम में बहुत ज्यादा समय नहीं लगता है।

प्रधानाध्यापिका की लगन को देखकर गाँव के लोगों ने भी सहयोग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पहले ही साल में ग्राम शिक्षा समिति में रश्मि की प्रेरणा से कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए जिनमें से प्रमुख हैं- समुदाय के सहयोग से विद्यालय में शौचालय का निर्माण, पेयजल की व्यवस्था, पब्लिक स्कूलों की तरह बच्चों के लिए आकर्षक गणवेश का निर्धारण तथा निर्माण, विद्यालय परिसर के चारों ओर लोहे की जालियों सहित चारदीवारी का निर्माण तथा सत्र के अन्‍त में वार्षिकोत्सव को प्रत्येक साल धूम-धाम से मनाना आदि। ग्राम शिक्षा समिति के ये निर्णय पूरी तरह सफल हुए। विद्यालय में शौचालय का निर्माण बिना किसी सरकारी अथवा विभागीय सहायता के ग्रामवासियों के सहयोग एवं श्रमदान के द्वारा किया गया जिसमें महिलाओं की सहभागिता विशेष रूप से उल्लेखनीय और अनुकरणीय थी। निर्धन राजमिस्त्री ने भी केवल आधी मजदूरी लेकर इस शौचालय निर्माण का कार्य किया जो सम्‍पूर्ण विकास खण्‍ड के लिए एक उदाहरण था।

इसी तरह ग्राम विकास समिति के प्रयास से ‘सर्व शिक्षा’ परियोजना द्वारा विद्यालय में पेयजल उपलब्ध कराया गया। सामूहिक रूप से कपड़े खरीदकर स्थानीय दर्जियों के द्वारा बच्चों के लिए यूनिफॉर्म तैयार किए गए। पूरे जिले में तब यह पहला और एकमात्र सरकारी स्कूल था जहाँ के बच्चे यूनिफॉर्म में स्कूल आते हैं। इसके अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए भी बच्चों के तरह-तरह के ड्रेस बनवाये गए  हैं। आगे चलकर मिड-डे मील के बर्तन भी इसी पैसे से खरीदे गए। बच्चे किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए कहीं बाहर जाते हैं तो उसका खर्च भी इसी फण्‍ड से किया जाता है। ग्राम शिक्षा समिति एवं ग्राम पंचायत के आपसी सामंजस्य से गाँव  के लिए प्राप्त जवाहर रोजगार योजना के आंशिक कोष से विद्यालय परिसर में दीवार तथा लोहे की जालियों द्वारा मजबूत चारदीवारी का निर्माण किया गया। विद्यालय परिसर की खाली जगह में रश्मि ने बच्चों के साथ मिलकर खूब मेहनत की और बंजर जमीन को उर्वर बना लिया तथा उसमें रंग-बिरंगे फूलों के अलावा राजमा, धनिया और कई तरह की सब्जियाँ भी उपजाने लगीं जिससे बच्चों को खाने में तरह-तरह की सब्जियाँ मिलने लगीं। समय-समय पर विद्यालय के बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण आयुर्वेदिक चिकित्सालय नथुवाखान के सहयोग से स्वयंसेवी संस्था द्वारा किया जाना प्रारम्‍भ हुआ।

वार्षिकोत्सव के सन्‍दर्भ में रश्मि बताती हैं कि “समुदाय से मिले सुझावों के अनुसार विद्यालय के दूसरे साल के  वार्षिकोत्सव को बड़े स्तर पर से मनाया जाना तय हुआ जिसकी आगे चलकर एक परम्‍परा ही विकसित हो गई। इस वार्षिकोत्सव में जनपदीय एवं डायट के शिक्षा अधिकारियों, क्षेत्रीय प्रगतिशील जनप्रतिनिधियों तथा सभी निकटवर्ती विद्यालयों को आमंत्रित किया जाता है। समारोह में हमारे विद्यालय के साथ-साथ निकटवर्ती विद्यालयों द्वारा भी लोकनृत्य, लोकगीत, नाटक, कला, सुलेख, निबन्‍ध, अन्‍ताक्षरी आदि कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं तथा सम्मिलित बच्चों को पुरस्कृत भी किया जाता है। समारोह में विद्यालय की साल भर की गतिविधियों एवं आय-व्यय का विवरण प्रस्तुत किया जाता है। समारोह की व्यवस्था हेतु सभी आवश्यक सामग्री, आमंत्रित लोगों के लिए जलपान की व्यवस्था तथा पुरस्कार सामग्री की व्यवस्था समुदाय के द्वारा की जाती है। समारोह की सफलता के लिए लगभग एक सप्ताह पहले से ही गाँव वासी लगातार व्यस्त रहते हैं। इस कार्य में हमें पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं का भी बराबर का सहयोग मिलता रहा है। महिलाओं की रुचि एवं उनकी सहमति के आधार पर हम समय-समय पर विद्यालय में अन्य समयानुकूल कार्यक्रम भी आयोजित करते रहते हैं। जैसे होली के अवसर पर होली गायन, दीवाली तथा नवरात्रि के अवसर पर भजन-कीर्तन आदि।” इस सन्‍दर्भ में समाज या अपने विद्यार्थियों से भावनात्मक रिश्ते की बात खासतौर पर उल्लेखनीय है।

रश्मि वर्मा ने बातचीत के दौरान बताया कि एक बार दीवाली के बाद उन्होंने एक छात्र से पूछा कि तुमने दीवाली किस तरह मनाई तो वह बहुत उदास हो गया और बताया कि किसी भी तरह से नहीं मनाया। रश्मि वर्मा जी को अपने प्रश्न पूछने पर बहुत कोफ्त हुई। वे समझ गईं कि गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति त्योहार मनाने की नहीं होती। तब से लेकर आज तक वे सभी महत्वपूर्ण त्योहार अपने स्कूल में विद्यार्थियों के साथ ही मनाती हैं जिसमें पुराने विद्यार्थियों और गाँव के लोग भी बहुत उत्साह से भाग लेते है। इसमें जो भी खर्च होता है उसे रश्मि और सहायक अध्यापिका सुनीता मिलकर उठाती हैं। इन बातों के अलावा उन्होंने एक और कमाल की बात बताई कि रामगढ़ के अन्‍तर्गत विद्यालय का एम.टी.ए. (मदर टीचर एसोसिएशन) भी गठित किया गया है जिससे आशा की जाती है कि विद्यालय के कार्यों में महिलाओं की अधिक भागीदारी हो सके।

प्रधानाध्यापिका रश्मि वर्मा स्कूल या गाँव की सीमाओं से काफी आगे निकलकर लोगों को प्रेरित कर रही हैं। उनकी सक्रियता और सफलता को देखकर एहसास होता है कि व्यक्ति में अगर हौसला हो तो वह अकेले भी समुदाय को प्रेरित कर सकता है और उसके सहयोग से इस समाज और देश में गुणात्मक बदलाव ला सकता है।


अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन,देहरादून द्वारा प्रकाशित 'उम्‍मीद जगाते शिक्षक' से साभार।

टिप्पणियाँ

ramkishor का छायाचित्र

good

vijayprakashbadola का छायाचित्र

रश्मि बर्माजी को इस तरह के शानदार कार्य के लिये जितनी भी प्रशंसा की जाय कम ही होगी,यह प्रयास जारी रखना

Adiprakash का छायाचित्र

रश्मि वर्माजी का कार्य सराहनीय एवं शिक्षकों के लिये प्रेरणादयी है.बधाई !

AJAIYADAV का छायाचित्र

rashmi didi ji ke karye ke liye koti-koti subhkamnayain.....

BMB का छायाचित्र

रश्मि दीदी, नमस्कार ।
मै एक छात्रअध्यापक हूँ। आपके द्वारा किए कार्यो से मुझे बहुत प्रेरणा मिली है। मै भी आपकी तरह शिक्षा मे अपना योगदान देना चाहता हूँ। भगवान आपको सभी कार्यो मे सफलता दें , यही प्रार्थना ।
बबलू बिन्द
इलाहाबाद

jaswant singh bisht का छायाचित्र

Rashmi. Mam. Inspire me and my school staff .

17587 registered users
6689 resources