किसी 'खास' की जानकारी भेजें। एच.एस. परमेश

 

श्री परमेश, बैंगळूरू के पास के एक छोटे से गाँव की सरकारी उच्च प्राथमिक शाला के लिए प्रेरणास्रोत बन गए हैं। उन्होंने इस शाला को सच्चे अर्थों में शाला बनाने के लिए अथाह प्रयास किए हैं। इसके फलस्वरूप उन्हें कई सारे पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।

बंजारुपल्या - बैंगळूरू से लगभग 35 किमी दूर बसा एक छोटा-सा मनमोहक हरियाला गाँव है। यहाँ के लोग बहुत ही मेहनती हैं और उज्ज्वल भविष्य की आकांक्षाओं के साथ काम कर रहे हैं। गाँव के बाहरी इलाके में एक सरकारी उच्च प्राथमिक शाला है। शाला में एक छोटा-सा खेल का मैदान भी है। श्री एम. एस. परमेश, यहाँ पर शिक्षक हैं। वे पिछले 16 वर्षों से यहाँ काम कर रहे हैं।

उनका यह दृढ़ विश्वास है कि बच्चे किसी भी सामाजिक, आर्थिक या सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के हों, वे जीवन के उल्लास से भरे होते हैं । उनमें प्रकृति व उससे जुड़ी नई बातें जानने की न बुझनेवाली प्यास होती है। उनका यह भी मानना है कि बच्चे शाला में बहुत कुछ जानना चाहते हैं, सभी बच्चों को सीखने का पर्याप्त अवसर मिले, ऐसा माहौल बनाना शिक्षक का दायित्व है।

उनकी शाला में 175 बच्चे और 5 शिक्षक हैं। इसलिए एक शिक्षक को एक समय में कम से कम दो कक्षाओं का संचालन करना पड़ता है। यह काम मुश्किल नहीं है क्योंकि शिक्षकों को इस सम्बंध में प्रशिक्षित किया जाता है। परमेश “बहुमुखी” तालीम मोड्यूल विकसित करने वाले दल के सदस्य रह चुके हैं। इस स्थिति में कैसे काम किया जाता है इस विषय पर वे अन्य अध्यापकों को मार्गदर्शन देते हैं।

यह शाला 1990 में 1 से 4 तक की कक्षाओं के लिए दो कमरों के साथ शुरू की गई थी। बाद में शाला के पास की जमीन सार्वजनिक योगदान से खरीदी गई। उसमें नए कमरों का निर्माण करके शाला को उन्नत किया गया।

इस शाला में पढ़ने के लिए गाँव के अलावा आसपास के शहरी क्षेत्रों से भी बच्चे आते हैं। यह इस शाला एवं शिक्षकों के प्रयत्नों का ही परिणाम है। परमेश बताते हैं कि, ‘शुरू में मैंने देखा कि बच्चे दोपहर में भूखे रहने की वजह से पढ़ने में ध्यान नहीं लगा पाते हैं। मैंने अपने निजी पैसे से 30 बच्चों के लिए केले और बन्स (Sweet cake) लाना शुरू किया। इस बारे में जब मेरे मित्रों को पता चला तो वे भी इस खर्च में हाथ बँटाने लगे। अब तो स्वयं सरकार शाला में दोपहर का भोजन (Midday meal) देती है।’
इसी वजह से परमेश समुदाय और अभिभावकों के बीच अत्यंत आदरणीय और लोकप्रिय हैं।

शाला की बाहरी दीवार पर जापानी वर्णमाला में कुछ लिखा हुआ है। आप सोच रहे होंगे कि क्या इस शाला के बच्चे जापानी भाषा सीख रहे हैं ? नहीं। दरअसल इस शाला की डिजाइन तैयार करने और कक्षा निर्माण में जापानी स्वयंसेवकों ने सहयोग किया था। उन्होंने ही जापानी भाषा में कुछ संदेश लिखा है।

एक बार UGN (United Games Of Nation)  के वारेनर ग्रेसिस  ने स्कूल का दौरा किया। वे परमेश के उत्साह और बच्चों के प्रति उनके दृष्टिकोण से बहुत प्रभावित हुए। परिणामस्वरुप शाला की कक्षाओं को हवादार बनाने के लिए UGN ने भौतिक और आर्थिक रूप से सहयोग किया है। इससे शाला में अच्छी खिड़कियाँ और ब्लैकबोर्ड का निर्माण सम्भव हुआ।
      
उनके और समुदाय के बीच सौहार्दपूर्ण सम्बंध हैं। छुट्टियों के दौरान भी बच्चे शाला आते हैं। परमेश भी आते हैं। परमेश के शाला में होने से माता-पिता अपने बच्चों के बारे में चिन्‍तित नहीं होते।

परमेश ने बहुत सारी नवीनतम शिक्षण अधिगम सामग्री (Teaching learning Material) बनाई हैं। यह सामग्री सभी शिक्षकों और बच्चों के लिए किसी भी समय उपयोग करने के लिए शाला में उपलब्ध है। इस TLM को किफायती बनाने के लिए उन्होंने दियासलाई की खाली डिबिया ( Match box ) जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया है। उनकी इस उपलब्धि के लिए उन्हें राज्य सरकार द्वारा सम्मानित किया गया है। परमेश ने अपने निजी खर्च से कक्षा 1 से 7 तक की पाठ्यपुस्तकों की सभी कन्नड़ कविताओं का ऑडियो टेप बनाया है। कविताओं की पृष्ठभूमि में संगीत भी डाला है। इस सबकी कुल लागत 40,000 रुपए आई है।

इस विद्यालय में बच्चों में सीखने की उपलब्धि का स्तर काफी संतोषजनक रहा है। यद्यपि शाला में कोई शारीरिक शिक्षा अध्यापक नहीं है, फिर भी बच्चों ने ब्लाक स्तर पर खो-खो और अन्य खेलों मे पुरस्कार जीते हैं। बच्चे नाटक, नृत्य और संगीत भी सीखते हैं। बच्चों को ब्लाक स्तर की  “प्रतिभाकरंजी” प्रतियोगिताओं में पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह सब परमेश की व्यक्तिगत रुचि से ही सम्भव हुआ है।

परमेश नियमित रूप से बच्चों के माता-पिता से उनके घर या कार्यस्थल पर जाकर मिलते हैं। जो बच्चे शैक्षिक पाठ्यक्रम की माँग के अनुसार नहीं सीख पाते हैं या जो बच्चे शाला में बार-बार अनुपस्थित रहते हैं उन बच्चों पर विशेष ध्यान देना, परमेश की विशेष पहल है। शाला के अन्य शिक्षक भी परमेश के इस दृष्टिकोण से प्रेरित हुए हैं।

परमेश कहते हैं, ‘वर्ष की शुरुआत में जो छह सप्ताह का ब्रिज कोर्स होता है वह पर्याप्त है। इसके लिए कोई अलग से उपचारात्मक शिक्षण देने की आवश्यकता नहीं है‍। इस कार्यक्रम में शिक्षकों से असंख्य प्रपत्र और तालिकाओं को भरवाना निश्चित रूप से उन पर अतिरिक्‍त बोझ डालना है। इस कार्यक्रम के प्रति एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना चाहिए।’ 
नाम :   एच.एस.परमेश
उम्र :    43 वर्ष
अनुभव :  22 वर्ष
वर्तमान विद्यालय में अनुभव : 19 वर्ष
शैक्षिक योग्यता : बीए हिन्दी रत्न - TCH
मोबाइल नम्‍बर : 09448524671

 विशेषज्ञ के रूप में :

  • दृश्य और श्रव्‍य सामग्री के निर्माण में लेखन कार्य
  • “ चैतन्य” -  एक शिक्षक प्रशिक्षण मॉड्यूल
  • “ चैतन्य तरणी”- TLM बनाने एवं उपयोग विषयक मार्गदर्शिका
  • राज्य विस्तृत गणित - प्रशिक्षण
  • “ बहुमुखी”  बहुकक्षा शिक्षण के लिए शिक्षक प्रशिक्षण मॉड्यूल
  • TLM के उपयोग विषय पर टेलीकॉन्फरेन्स के पैनल मेम्बर

पुरस्कार :

  • सर्वश्रेष्ठ अध्यापक पुरस्कार - ब्‍लॉक स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक
  • किफायती TLM (बिना लागत के दियासलाई की डिबिया जैसी सामग्री का इस्तेमाल करके ) के निर्माण के लिए - राज्य पुरस्कार
  • हार्वर्ड विश्वविद्यालय और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों द्वारा साक्षात्कार
  • एक साक्षात्कार राष्ट्रीय डीडी चेनल पर प्रसारित किया गया है।

टिप्पणियाँ

cmcbed का छायाचित्र

sir parnam
i have read about u on this site and really feel proud that teachers like u are doing such work in the field of education im running a teachers training colleges in hanumangarh named Ch Mani Ram College Of B.Ed i want to use ur experiences for enhancing the capacity of my institute students if ur planning to visit rajasthan i will be most pleased to welcome u
vivek siag 09413535352

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