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धीमी आँच

“हमने पूछा सफलता कहाँ है, उन्‍होंने कहा पक रही है धीमी आँच पर।” – अज्ञात

कहते हैं कि धीमी आँच पर बना पकवान बहुत स्वादिष्ट होता है। हो भी क्यूँ नहीं। उसे बनने में वक्‍त जो लगता है। इसी प्रकार सफलता भी समय तो लेती है पर उसे महसूस करने का मजा अलग ही है। आज मैं एक ऐसे शिक्षक के बारे में बताने जा रही हूँ, जिन्होंने अपने विद्यालय में एक ऐसा माहौल बनाया है जो काफी हद्द तक शिक्षा के उद्देश्य के तरफ बढ़ रहा है। यह सफलता एक दिन की नहीं है, यह असर है शिक्षक के खुद की जिन्‍दगी के संघर्ष का एवं जिस शिक्षक ने उन्हें मदद की उनका।

यह विद्यालय है राजकीय प्राथमिक विद्यालय गाडरियावास जो राजस्थान के राजसमंद जिले के रेलमगरा ब्लॉक में स्थित है। यह विद्यालय बामनिया कलाँ के गाडरियावास गाँव में है। इस गाँव में कुल 40 घर हैं जिसमें 21 बच्चे हैं जो इस विद्यालय में नामांकन के योग्य हैं और सभी 21 बच्चे इस विद्यालय में पढ़ते हैं। इस विद्यालय में दो शिक्षक है एक किशन लाल सलवी एवं दूसरे माधव लाल गाडरी (जो इसी गाँव के हैं)।

आइये पहले इस विद्यालय के उन पहलुओं पर नजर डालते हैं जिन्‍होंने मुझे इस लेख को लिखने के लिए मजबूर कर दिया।

बच्चों की बातें

जब हम पहली बार इस विद्यालय में गए तो बच्चे खेल रहे थे। हमें देखते ही पैर छूने के लिए दौड़े। पर हमने मना कर दिया तो पूछने लगे आप किससे मिलने आए हो? हमने आपने आने का कारण बताया तो हमारे साथ वो स्टाफ रूम तक चले आए। और हम जब तक स्टाफ रूम में बैठते तब तक वो सभी अपने बस्‍ते लेकर वहाँ बाहर बैठ गए। शिक्षक ने हमारा परिचय कराया कि ये वहीं मैडम हैं जिनके बारे में मैंने बताया था की आएँगी और आपको पढ़ाएँगी। बस फिर क्या था, बच्चों ने इतना ही सुना और हमें पढ़ाओ-पढ़ाओ की जिद्द करने लगे। मैं भी जाकर उनके बीच बैठ गई।

इस बीच मैंने ध्‍यान दिया कि बच्चे आसपास लिखे हुए शब्दों को पढ़ रहे थे। वे आपस में अँग्रेजी में बात कर रहे थे। शिक्षक भी उन्हें निर्देश अँग्रेजी में ही दे रहे थे। जैसे take your bag, sit on your place, go there, come here etc. मैं जैसे ही उनकी कक्षा में बैठी, एक छोटी से बच्ची ने जो कक्षा 2 की थी, पूछा “what is your name ?” मैंने अपना नाम बताया, “my name is shanti Priya.” फिर मैंने पूछा “what is your name?” इस पर सभी बच्चे यहाँ तक की pre primary के बच्चों ने भी अपना पूरा नाम “my name is …..” बताया।

फिर मुझसे दूर फाउंडेशन की एक साथी बैठी थीं, उन्हें इंगित करते हुए मैंने पूछा, “what is her name?” तभी एक बच्चे ने शिक्षक का नाम बताया, उसे दूसरे बच्चे ने टोका और कहा मैडम ने her बोला, मतलब लड़की के बारे में पूछा। तो इसका मतलब मैडम वो वाली मैडम के बारे में पूछ रहीं। थोड़ी बातचीत के बाद उन्‍होंने कहा कि वो सभी इंग्लिश poem सुनाएँगे। कुछ बच्चों ने किताब से देखकर और कुछ ने खुद से poem सुनाईं। जो बच्चे किताब से देख कर poem सुना रहे थे उनमें मैंने यह पाया कि जो शब्द वो बोल रहे उनकी उंगली उसी शब्द पर है।

कक्षा 2 की बच्ची ने एक poem सुनाई “brush your teeth everyday….” इसमें एक लाइन थी जिसमें nails को हर रविवार को काटने के लिए कहा गया है। जब मैंने उसे बच्ची से इस poem का अर्थ पूछा था उसने सही सही बता दिया। और साथ ही मुझे टोकते हुए कहा कि इसमें हर रविवार को nails काटने को कहा गया है जो आपने नहीं किया। आपके nails बढ़े हुए हैं, रविवार को काट लेना।

ऐसे ही बच्चे जो भी किताब से पढ़ रहे थे उसका मतलब अपने तरीके से समझा भी रहे थे। ऐसा बिलकुल नहीं लग रहा था की वो रटे हुए हैं।  क्यूँकि एक ही पैराग्राफ का मतलब दो बच्चों ने अपने-अपने तरीके से बताए। उसके बाद बच्चों ने बताया कि वो कबड्डी में इस साल जिला स्तर पर खेलने जा रहे हैं। ब्लॉक स्तर पर जीतने के बाद, और अगली बार राज्य स्तर पर भी जाएँगे ऐसा उन्‍हें विश्वास है। बच्चों ने वहाँ पड़ी कुछ magazines दिखाते हुए कहा की उन्‍हें ये सब पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। जब उन्‍हें किताब पढ़ने का मन नहीं करता तो वो इन किताबों से कहानियाँ पढ़ते हैं।

हमने शिक्षक से बात कि तो पता चला कि शिक्षक कुछ magazines मँगवाते हैं बच्चों के लिए। जैसे बालहंस, जनरल नॉलेज, चम्पक, छोटी कहानियाँ इत्यादि। और ऐसी जगह रखते हैं जहाँ से बच्चों को आराम से मिल सकें। बच्‍चों का जब मन करता है वो इसे पढ़ते हैं, और वो इस बात कि चिन्‍ता नहीं करते कि अगर यह फट जाए तो क्या होगा। क्यूँकि बच्चे इस विद्यालय को और इनकी चीजों को अपना मानते हैं तो जानकर खराब नहीं करते। और उनका कहना है कि बच्चे ही तो हैं अगर फट भी गई तो कोई बात नहीं।

एक बार फिर हम 11 अप्रैल को इस विद्यालय में गए। हमने देखा कुछ बच्चे अँग्रेजी की किताब से “nimboo- paani” chapter पढ़ रहे थे। और दो बच्चियाँ बाहर मैदान में बैठकर कुछ कर रही थीं। जैसे बच्‍चों ने हमें देखा उन्‍होंने तुरन्त नाम लेकर “good afternoon shanti Priya madam” बोला। उसके बाद हम दोनों (मैं और संतोष )वहाँ बैठ गए और बच्चे हमारे चारों तरफ बैठ गए।

उसके बाद हमने उनसे चर्चा की, की वो क्या पढ़ रहे हैं, “what is lemon?”, “when do you drink nimboo- paani” etc. बच्‍चों ने बखूबी जवाब दिया। उसके बाद हमने बच्चों के साथ एक खेल खेला जिसमें उन्‍हें कान  में धीरे एक शब्द English में हम बोलते थे और उन्‍हें उसका चित्र बनाना होता था। और उस चित्र को देखकर बाकी बच्चे उस चित्र का अँग्रेजी शब्द बोलते थे। इसमें बच्चों ने छोटे-छोटे सभी शब्दों के चित्र को बहुत खूबसूरती से बनाया और बाकी बच्चों ने सही guess किया। जब हम बच्चों से बात कर ही रहे थे कि एक बच्ची मेरे पास आई। उसने तीन छोटे-छोटे गुलदस्ते बनाए थे वह दिखाए। (ये वही बच्ची थी जो जब हम विद्यालय में आए थे तो उसे मैदान में बैठे देखा था। बच्ची मैदान में बैठकर स्‍केच पेन के ढक्कन में झाड़ू की सीक डालकर उसमें छोटे-छोटे फूल लगाकर गुलदस्ता बना रही थी।), मैंने जब उससे पूछा की वो पढ़ाई नहीं कर रही थी, तो किशन जी ने कहा कि इसे पढ़ने का मन नहीं था तो जबर्दस्ती कक्षा में बैठाकर रखने का क्या फायदा। कुछ तो कर ही रही है, जब इसका मन होगा आकर पढ़ लेगी। बच्चों ने बताया कि जब उनका पढ़ने का मन नहीं होता तो शिक्षक उन्‍हें खेल खिलाते हैं और उन्‍हें फिल्‍म भी दिखाते हैं। 

इसके बाद बच्चों का मध्यान भोजन का समय हो गया और वो खाने के लिए बैठ गए। जब वो खाना खा रहे थे उस समय हमने शिक्षकों द्वारा बनाए गए TLM देखे, शिक्षकों ने Arvind Gupta के videos देखकर कुछ TLM बनाए थे। जैसे ही बच्चे खाना खाकर आए उन्‍होंने देखा कि  हम उनकी गणित की “देखो चकरी का खेल” देख रहे थे। इसे देख बच्चे हमारे पास आए और हमें बताने लगे कि वो कैसे खेलते हैं। उस चकरी को घुमाने पर जो संख्या दिखती है वो उसे पढ़कर सुनाते हैं, इसमें संख्या क्रम में नहीं होती है, इसका इस्तेमाल बच्चों को संख्या ज्ञान है या नहीं यह देखने के लिए होता है। इस खेल को बच्चे खेलने लगे।  तभी मैंने देखा कि बच्चे एक संख्या को लेकर confuse हो रहे हैं, वो संख्या थी “9” इसे कुछ बच्चे “1” भी पढ़ रहे थे, मैं कारण पूछा तो उन्‍होंने  कक्षा कक्ष में लगे एक चार्ट को दिखाते हुए कहा की वहाँ हिन्दी में “1” को “१” लिखा था जो “9” जैसा दिखा रहा था। तभी उनमें से ही एक बच्चे ने कहा कि सब संख्या एक जैसी हैं तो क्या एक संख्या अलग लिखेंगे, सोचना चाहिए न। जो बच्चे confuse हो रहे थे उन्‍होंने भी इस तर्क को सही माना।

उसके बाद हम बच्चों के साथ विद्यालय में बने राजस्थान के नक्शे के सामने गए और बच्चों से नक्शे को लेकर चर्चा की। उस पर बच्चों ने सवाल करने शुरू कर दिए। जैसे कुछ जिले बड़े क्यूँ हैं? कुछ छोटे क्यूँ  हैं? तभी एक बच्चे ने चित्तौड़गढ़ को देखकर पूछा कि सब parts में नाम लिखा है तो इस पर क्यूँ नहीं (चित्तौड़ का ही थोड़ा सा अंश side में था जिसमें color same था पर कुछ लिखा नही था)। तभी दूसरे बच्चे ने कहा कि वो साइड में जो लिखा है उसी का अंश है। क्‍यूँकि कलर एक-सा है।

उसके बाद हमने बच्चों से कहा कि आपके दिमाग में जो सवाल आता है वो पूछो चाहे जैसे भी सवाल हो। उसके बाद बच्चों ने सवालों की बौछार कर दी। उन्‍होंने जो सवाल पूछे वो इस प्रकार के थे : चाँद-सूरज नीचे क्यूँ नहीं गिरते। जबकि जब हम कोई चीज ऊपर फेंकते हैं तो वो नीचे गिर जाती है। इस सवाल को पत्थर और धागे के माध्यम से संतोष ने समझाया। बच्चों ने अगला सवाल किया कि अगर बल (gravity) काम करता है तो आकाश नीचे क्यूँ नहीं गिर जाता। बादल छोटे-छोटे टुकड़े में क्यूँ दिखते हैं? चाँद अगर gravity के वजह से नहीं गिरता तो वो एक ही दूरी पर क्‍यूँ घूमता है, आगे-पीछे भी हो सकता है क्या?

इस सवाल के बाद हमने उनसे और सवाल करने को कहा। उसके बाद बच्चों ने पूछा कि हमारा शरीर कैसे बनता है? हम सबके चेहरे अलग क्‍यूँ हैं? कोयला कैसे बनता है? पहली बार फैक्‍टरी किसने बनाई होगी? अंतरिक्ष यान नीचे क्‍यूँ नही गिरता? दुनिया कैसे बनी? पानी कैसे बना? छोटे कीड़े- मकोड़े के हड्डी क्‍यूँ नहीं होती ?

एक बच्ची ने पूछा, “मैडम जब हम lipstick और nail polish लगाते हैं और खाना खाते हैं तो वो हमारे मुँह में चला जाता है न जिससे बीमारी हो जाती है न?” इस पर मैंने उन्‍हें बताया कि कुछ lipstick fruits से बनती है जिससे नुकसान नहीं होता।

इस पर तुरन्‍त उसने कहा कि nail polish तो फ्रूट से नहीं बनता। मैंने कहा, “हाँ सही बात है nail polish से नुकसान तो होता है।” इस पर उसने तुरन्‍त कहा, “तो आपने तो लगाया है, आपको बीमारी हो सकती है”। उसके बाद मैंने अपना right hand दिखाते हुए कहा कि देखो इसमें nail polish नहीं लगाई है न।” तभी एक बच्ची ने कहा कि, “ हाँ आपने nails भी काटें हैं, जैसा हमने आपको last time बोला था।”

इन सब सवालों पर हमने चर्चा कि और उनसे कहा कि आप और सवाल बनाकर रखना। हम अगली बार आएँगे तो फिर बात करेंगे। उसके बाद हमने बच्चों के साथ कहानी बनाने का खेल खेला, जिसमें चार बच्चे कोई भी एक–एक शब्द बोलते थे। और सभी बच्चे मिलकर उन चारों शब्दों से कहानी बनाते थे। बच्चों ने बहुत अच्छी कहानी बनाई जिसमें दोस्ती, मानवता, प्यार, लड़ाई सब थी। संतोष ने बच्चों से पूछा कि वो क्या बनना चाहते हैं। कुछ बच्चों ने कहा कि टीचर बनना चाहते हैं। पर एक बच्चे ने कहा कि अभी कुछ सोचा नही हैं, वो पढ़ेगा फिर सोचेगा। हालांकि सबका सुनकर वो बाद में बोला कि scientist बनना चाहता है।  

उसके बाद जब हम चलने लगे तो एक बच्चे ने मुझसे कहा, “ मैडम हमें प्लास्टिक के बॉटल में पानी नहीं पीनी चाहिए न।” मैंने कहा, “हाँ हमें bottled water नहीं पीना चाहिए।” (हमने कुछ दिन पहले ही एक VTF में किशन जी शिक्षक से bottled water और TDS पर चर्चा की थी, जो उन्‍होंने आते ही बच्चों के साथ साझा की थी।) उस बच्चे ने फिर मुझसे कहा, “मैडम हमें plastic के bottle में पानी नहीं पीनी चाहिए, प्लास्टिक के कण पानी में मिल जाते हैं और हमें बीमार कर देते हैं।” मुझे सुनकर अच्छा लगा और मैंने कहा, “हाँ सही बात है तभी तो तुम्हारे स्कूल में मिट्टी का मटका रखा है और steel के glass से तुमलोग पानी पीते हो।” वो कभी मुझे देखते कभी मेरे bag को, मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या कहना चाह रहे हैं। तभी संतोष ने मुझे बताया कि आपके bag में plastic का bottle है वो उसके तरफ इशारा कर रहे। तब मुझे लगा कि ये बच्चे कितनी बारीकियों से चीजों को देखते हैं और समझते हैं।

बच्चों ने बातों-बातों में अपने से जुड़ी कई चीजें साझा कीं। जैसे उन्‍होंने बताया कि उनके घर पर जब टोंटी से पानी ज्यादा आता है तो घर वाले उसे ढोल देते थे। तो उन्‍होंने उस नल से एक पतली से नाली बनाई जो उनके पौधों तक जाती है। अब वो पानी यूँही बर्बाद नहीं करते बल्कि उनसे वो पौधों को अच्छे से रखने में इस्तेमाल करते हैं। उन्‍होंने बताया की शिक्षक के साथ वो छुट्टी में विद्यालय आते हैं और पौधों को पानी देते हैं।

बच्चों में जो आत्मविश्वास था वह देखने लायक था। जब मैंने उनसे पूछा कि आपको डर नहीं लगा कि कौन आया है आज। तो उन्‍होंने कहा की हमें डर नहीं लगता क्‍यूँकि हम गलत नहीं करते। इस पर मैंने उनसे पूछा की अगर मुख्‍यमंत्री (उनका प्लान था कुछ दिन पहले आने का पर नहीं आ पाईं) आती तो क्या आप उनसे भी ऐसी ही बात करते या डर लगता। (इससे पहले मैं पूछ चुकी थी की क्या वो वसुंधरा को जानते हैं तो उन्‍होंने बताया था कि हाँ वो राजस्थान की मुख्यमंत्री हैं।) बच्चों ने कहा कि वो भी तो इंसान हैं। हम क्‍यूँ डरें उनसे।

बच्चों से बातचीत के दौरान उन्‍होंने बताया कि उन्‍हें स्कूल आना बहुत पसन्द है और वो फिल्‍म भी देखते हैं।  उन्‍होंने दंगल, I am kalam की कहानी भी हमसे साझा की। बच्चों से हमने कुछ चित्र बनवाए जिसे बहुत ही अच्छे तरीके से उन्‍होंने बनाया, उनकी पोर्टफोलियो भी काफी अच्छी है। यहाँ के बच्चे हर साल debate और essay writing competition में भाग लेते हैं और पुरस्कार भी पाते हैं।

शिक्षक

यह सब एक दिन की मेहनत से नहीं हुआ है और न ही यह दिखावा है। यहाँ दोनों शिक्षक मिल-जुलकर काम करते हैं, यह सफलता एक लम्बे समय से अपने काम के प्रति समर्पण का नतीजा है।

आइये अब शिक्षक के बारे में भी थोड़ा विस्तार से जानते हैं, शिक्षक रेलमगरा के कुरज पंचायत के रहने वाले हैं, और उनके माता-पिता दिहाड़ी मजदूर थे। शिक्षक ने सरकारी विद्यालय से 12वीं तक पढ़ाई की। उसके बाद नौकरी के लिए अहमदाबाद पहुँच गए। वहाँ इन्होंने आइसक्रीम का ठेला चलाया। वहाँ किसी ने सलाह दी कि अभी छोटे हो और पढ़ाई कर लो, ये सब मत करो। तो उसके बाद ये कुरज वापस आए और दूरस्थ पढ़ाई के माध्यम से स्‍नातक की डिग्री ली। साथ ही कुछ समय बस में कंडक्‍टर के रूप में भी काम किया। उसके बाद शिक्षक के ही एक मित्र ने उन्‍हें अपने विद्यालय में अतिथि अध्यापक के रूप में नौकरी लगवा दिया। जहाँ उन्‍होंने दो साल बच्चों को पढ़ाया। इस विद्यालय में शिक्षक को कहानी वाले मार्टसाहब के नाम से जाना जाता था। उन्‍होंने 365 कहानियों को याद कर रखा था, हर दिन की एक कहानी के हिसाब से। उसके बाद एक दोस्त के साथ मिलकर प्राइवेट स्‍कूल खोला, जहाँ दो साल तक पढ़ाया, इस विद्यालय में पढ़ाने के साथ साथ B.Ed किया। RPSC की दो बार परीक्षा दी और सफल हो गए। इस सफलता के बाद 2007 के सितम्बर माह में शिक्षक ने इस विद्यालय को join किया और अभी तक इसमें काम कर रहे हैं।

शिक्षक से जब हमने उनके पढ़ने के तरीकों के बारे में चर्चा की तो शिक्षक ने बताया कि वो बच्चों को मारते या डराते नहीं हैं। जब बच्चों का मन नहीं होता है पढ़ने का तब उन्‍हें कम्प्युटर से कोई मूवी दिखाते हैं और उससे जुड़ी बातें करते हैं। अगर मूवी कोई न हो तो कुछ खेल खिलाते हैं, ताकि उनका मन अच्छा हो जाए और फिर पढ़ाई करें। बच्चों को लेकर सख्त नहीं हैं। अगर कोई uniform नहीं भी पहन कर आया तो मारते या घर नहीं भेजते, सिर्फ उन्‍हें समझा देते हैं। सभी बच्चों के लिए टाई और बेल्‍ट का इंतजाम किया है। जिन बच्चों के अभिभावक देने में सक्षम थे तो उन्‍होंने खुद से खरीद दिए। जिनके सक्षम नहीं थे उन्‍हें शिक्षक ने गाँव वालों की सहायता से दिए। शिक्षक ने बच्चों के लिए कम्प्युटर सीखा और बच्चों को भी सिखाते हैं।

शिक्षक अँग्रेजी और पर्यावरण पढ़ाते हैं, जिसमें अँग्रेजी में वो बाराखड़ी से पढ़ाने के खिलाफ है उनका कहना है कि बाराखड़ी से बच्चों को स्पेलिंग याद करने में दिक्कत आती है, इसलिए वो rhyme word एवं बोलचाल के शब्दों के माध्यम से अँग्रेजी सिखाते हैं। कभी जब अकेले होते हैं तो बच्चों को कुछ बनाने को कहते हैं जैसे कभी मिट्टी के खिलौने बनाने को कह दिया और उसके बाद वो उनसे अँग्रेजी में उस पर बातचीत करते हैं। फिर बच्चों को वो बोलते हैं कि आप लोग जो भी किए हो उसे अँग्रेजी में लिखने की कोशिश करो। इसमें बच्चे कुछ नए शब्द भी सीखते हैं, जैसे वो जब लिखने की कोशिश करते हैं तब वो कुछ शब्दों को कैसे लिखें, इस पर अटक जाते हैं तो फिर शिक्षकों से उसका अँग्रेजी पूछ कर वो लिखते हैं, इससे उन्‍हें वो शब्द याद हो जाते हैं।

अभिभावक

इन बच्चों के अभिभावक ज्‍यादातर खेती, पशुपालन एवं दिहाड़ी मजदूरी कर अपना भरण पोषण करते हैं। परन्तु इस विद्यालय में जिस तरीके से पढ़ाया जाता है उससे काफी खुश हैं। इसलिए जब भी इस विद्यालय के शिक्षक कुछ नया करना चाहते हैं बच्चों के लिए तो ऐसे में अभिभावक पूरा सहयोग करते हैं। जैसे बच्चों के लिए टाई और बेल्‍ट खरीदना, विद्यालय परिसर में टयूब लगवाकर पानी की व्यवस्था करना, कम्प्युटर खरीदने में मदद करना इत्यादि। जिन अभिभावकों से हमने बात की उन्‍होंने बताया कि उन्‍हें अच्छा लगता है जब उनके बच्चे उनसे अँग्रेजी में बात करते हैं।

वाकई यह विद्यालय एक उदाहरण है की शिक्षक अगर ठान ले तो सफलता जरूर मिलती है।


शान्ति प्रिया, स्रोत व्‍यक्ति, पाली, राजस्‍थान

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