किसी 'खास' की जानकारी भेजें। एक शेड बने न्‍यारा : सामुदायिक सहभागिता की शुरुआत

राजकीय इंटरमीडियेट कॉलेज कोटधार गमरी उच्च प्राथमिक विद्यालय से उच्चीकृत होता हुआ धीरे-धीरे इण्टरमीडिएट कॉलेज हो गया है। लेकिन विद्यालय के मुख्य भवन के नाम पर दशकों पुरानी बनी जूनियर स्कूल की एक मंजिला तीन बड़े-तीन छोटे कमरों वाली इमारत अभी तक विद्यालयी भौतिक संसाधन संपन्नता की डोर सम्‍भाले हुए है।

कक्षा 6 से 12 तक की 9 कक्षाओं के संचालन के लिए विधायक निधि या अन्य निधियों से बने छोटे-बड़े कमरों को मिलाकर विद्यालय के पास 14 कमरे हैं। इनमें से एक कमरा स्टाफ रूम/परीक्षा रूम, एक कमरा प्रिंसीपल रूम, एक कार्यालय कक्ष, एक कम्प्यूटर रूम, एक स्टोर/कक्षा-12 ब कक्ष,  एक भोजन हेतु लकड़ी/कक्षा 6 कक्ष (कुल 6 कमरे) है। कक्षाओं के संचालन के लिए बचते हैं 8 कमरे। प्रत्येक कक्षा को एक-एक कमरा तो मिलता है परन्तु कक्षा 11 ब सेक्‍शन तथा कक्षा 9-10 को एक ही पीरियड में दो वैकल्पिक विषय जैसे संस्कृत/अँग्रेजी, गणित/गृहविज्ञान, कृषि/पेंटिंग आदि के लिए एक सेक्‍शन को खुले आसमान या बरसात में खुले टपकते बरामदे की शरण में अध्ययन करना होता है। हालाँकि विद्यालय के लिए 4 कमरों का नया भवन विद्यालय से 1 किमी की दूरी पर बना है। लेकिन दूर होने की वजह से उसका उपयोग नहीं हो रहा है। वह बिना उपयोग के ही जर्जर हाल में पहुँच चुका है।

विद्यालय परिसर में दो जर्जर अनुपयोगी शौचालय तथा एक प्याऊ और दो प्रयोग में लाए जा रहे शौचालय हैं। जिनमें पर्याप्‍त पानी की व्यवस्था फिलहाल नहीं है। विद्यालय के पास दो अपर्याप्त त्रिभुजाकार क्रीड़ा मैदान भी हैं। विद्यालय में पुस्तकालय, वाचनालय, प्रयोगशाला, क्रीड़ा कक्ष आदि तो खैर हैं ही नहीं।

मैं मई 2014 में इस विद्यालय में स्‍थानांतरित होकर आया। उसके बाद कई बैठकों में अतिरिक्त कक्षा-कक्ष की नितान्त आवश्‍यकता की ओर अध्यापक-अभिभावकों द्वारा चिन्ता जाहिर की गई। परन्तु इस कक्ष को कहाँ बनाया जाए, कौन बनाए, इस बात पर कभी सहमति नहीं बनी। विद्यालय में अध्ययनरत छात्र/छात्राएँ हमेशा की तरह कक्ष की समस्या से जूझते रहे। ‘सुझाव पेटी’  में कक्षा 12 के बच्चों द्वारा स्टोर रूम हटाने, कक्षा 6 के बच्चों द्वारा लकड़ियाँ कहीं और रखने की माँग तथा कक्षा 11 ब के बच्चों द्वारा की पेड़ की छाँव में बैठने की शिकायत जस की तस बनी रही। 

2016-17 का नया सत्र आरम्भ हुआ। प्रधानाचार्य जी मार्च में रिटायर हो चुके थे। नया सत्र नए प्रभारी प्रधानाचार्य के नौजवान हाथों में आन पड़ा। सभी साथियों के द्वारा पूरे सत्र को और विद्यालय में सुधारात्मक माहौल विकसित करने का प्रण लिया गया। बैठक में अतिरिक्त कक्षा-कक्ष निर्माण की सशक्त आवश्‍यकता को पूरा करने की बात पर मनन हुआ। भवन निर्माण पी.टी.ए. मद या किसी सामाजिक/राजनीतिक निधि से करवाने पर जोर दिया गया। लेकिन जुलाई तक इस योजना पर कोई ठोस कार्यवाही होती नजर नहीं आई।

अचानक एक दिन ऐसा हुआ कि मन द्रवित हो उठा। हुआ कुछ यूँ कि हमारे विद्यालय के वाहन ड्राइवर का पुत्र पिछले सत्र तक चिन्यालीसौड़ में अध्ययनरत था। उसे टाइफाइड हो गया था और बामुश्‍किल जान बच पाई थी। उसे इस बार हमारे विद्यालय में ही भर्ती किया गया था। वह अभी भी अपनी बीमारी व कमजोरी से पूरी तरह उबर नहीं पाया था। एक दिन बरसात का मौसम था और कक्षा 10 की अँग्रेजी की कक्षा कमरे के अभाव में मैदान में भीमल के पेड़ के नीचे लगी थी।  ड्राइवर साहब हमारे विद्यालय में आए ही थे कि हल्की बूँदा-बाँदी शुरू हो गई। मेरा प्रथम पीरियड खाली होने के कारण मैं भी वहीं पर मौजूद था। उनकी नजरें कक्षा पर पड़ीं। वे बोले कि इन बच्चों को बारिश में क्यों भिगो रहे हो?  अपने काँपते बच्चे को देखकर उनके चेहरे पर करूणा की लकीरें स्पष्‍ट देखी जा सकती थीं। पिता की अपने बच्चे के प्रति चिन्‍ता वाजिब थी। उन्होंने करूणामयी शब्दों में कहा कि गुरुजी मेरी बच्चे को अन्‍दर भिजवा दीजिए। वह बड़ी मुश्किल से ठीक हो रहा है और अभी भी बीमार है। मैंने कहा, क्या करें विद्यालय के पास धनाभाव है, जनप्रतिनिधि निधि नहीं जुटा पा रहे और अभिभावकों से सहयोग हो नहीं पा रहा है।

वो बोले, क्‍यों न गुरुजी हम इस पेड़ के नीचे एक कच्चा छप्पर बना लें, इसके लिए मेरे से जो मदद होगी मैं करूँगा। उनकी बात सुनकर मैं भी भावावेश में बोल गया ,तो ठीक है अगर आप इस हेतु हमें चार-पाँच बल्लियाँ दे पाओ तो ऊपर के लिए जितने प्लास्टिक तिरपाल की आवश्‍यकता होगी मैं ले आऊँगा।

प्रिंसीपल एवं अन्य सहकर्मियों के सामने इस बात को अनौपचारिक रूप से रखा गया। तीसरे दिन ड्राइवर साहब के घर के पास सड़क पर 5-6 बल्लियाँ उपलब्ध मिली। बल्लियाँ विद्यालय तक उन्हीं के वाहन पर रखकर बच्चों की मदद से पहुँचाई  गईं। ऊपर का ढाँचा बनाने और तिरपाल को कसने के लिए बांस की डंडिया लाने का प्रस्ताव भी ड्राइवर साहब द्वारा रखा गया। उनके एकत्रण की जिम्मेदारी भी हम दोनों के द्वारा उठाई गई। एक-दो दिन तक बांस का बंदोबस्त नहीं हो पाया। एक दिन मैंने अपनी कक्षा 10 के समक्ष ये बात रखी। भड़कोट की बच्चियों से उनके आस-पास बांस होने के बारे में पूछा। एक लड़की ने स्वीकार किया कि उसके खेतों के पास बांस है और वो कल आवश्‍यक बांस के टुकड़े सड़क तक पहुँचा देगी। अगली सुबह हमें 5-7 बांस के टुकड़े दो लड़कियों द्वारा सड़क तक पहुँचाए मिले। वो भी विद्यालय में पहुँच गए।

ऐसा करते-करते जुलाई बीतने पर आया। विद्यालय के पी.टी.ए तथा एस.एम.सी. अध्यक्षों को मैंने फोन पर इस योजना के बारे में बताया। उनसे यथासम्‍भव श्रम, लकड़ी, कील आदि की मदद कर एक अस्थायी शेड तैयार करने में हमारी मदद करने के लिए आग्रह किया। मैंने प्रधानाचार्य को भी कहा सर जितनी जल्दी हो सके हमें ये कार्य कर देना चाहिए। क्योंकि यदा-कदा बारिश भी हो ही रही है और जो बच्चे या अभिभावक हमारी मदद करना चाह रहे हैं उनका भी उत्साह बना रहेगा। उनके द्वारा भी कुछ विभागीय बैठक का हवाला देकर शीघ्र ही एक पी.टी.ए. बैठक  आयोजित करने की बात कही गई। 15 अगस्त से पहले एक बैठक बुलाई गई। बैठक  में इस कक्षा-कक्ष को अस्थायी टिन शेड का रूप देने पर सर्वसम्मति बनी। इस हेतु वार्षिक उत्‍सव में जुटाई गई लगभग 20 हजार की धनराशि को पी.टी.ए. समिति को हस्तांतरित कर दिया गया।

सितम्बर आते-आते इस अस्थायी शेड हेतु नई बल्लियाँ कटवाई गईं तथा 20 टिन की चद्दरें तत्परता के साथ प्रधानाचार्य एवं पी.टी.ए. अध्यक्ष द्वारा पहुँचाई गईं । एक माह से अधिक का समय गुजरा किन्तु स्थानीय मिस्त्री नहीं मिल पाने के कारण ये सब सामग्री निर्माण की बाट जोहती रही। अंततः प्रधानाचार्य द्वारा बाहरी मिस्त्री बुलवाकर ढाई दिन में इस शेड का बाहरी खाका खड़ा कर दिया गया है। अपनी आँखों के सामने बनता यह अस्थायी शेड किसी खूबसूरत महल से कम नहीं लग रहा था। सभी सहभागी अध्यापकों की आँखों में उत्साह एवं बच्चों में हर्ष था।

लेकिन अब भी जरूरत है इसे कक्षा के बैठने लायक बनाने के लिए पीछे की दीवार पर मिट्टी का पलस्तर करने तथा नीचे की जमीन को सपाट करने की।

यह शायद इस विद्यालय में पहला सामुदायिक सहकार्य है जिसमें कोई ठेकेदार, मजदूर, अध्यापक निजी स्वार्थ के लिए नहीं जुड़ा। पूरी तरह से सामुदायिक-शिक्षक सहभागिता से बना ये 15 गुणा 15 का यह शेड अपने आप में एक मिसाल है। भविष्‍य में विद्यालयी संसाधनों के अभावों को इसी प्रकार हल करने की दिशा में यह एक उदाहरण साबित होगा, ऐसी आशा तो कर ही सकते हैं। 


प्रस्‍तुति : सुन्दर नौटियाल, राजकीय इंटरमीडियेट कॉलेज कोटधार गमरी, उत्‍तराखण्‍ड

 

टिप्पणियाँ

AVNEESH का छायाचित्र

ये एक मिशाल से कम नहीं है जिसमें शिक्षक ने खुद, अन्य शिक्षकों, समुदाय की मदद से बच्चों के प्रति अपनी कृतज्ञता को मूर्त रूप दिया| इस प्रकार के शिक्षक एक नयी उम्मीद से कम नहीं हैं जो शिक्षा और समाज को एक नयी दिशा दे रहे हैं|

Sunder2013 का छायाचित्र

इस साधारण से दिखने वाले टिन शेड को हमारे nss सेवियों द्वारा तथा अद्यापकों ने मिलकर समतलीकरण किया गया । आज इस कक्ष का अतिरिक्त कक्ष के रूप में भरपूर उपयोग किया जा रहा है । मेरा उपचारात्मक शिक्षण के बच्चों के लिए तो ये कक्ष किसी ईमारत के सुन्दर कक्ष से कम नही है । वे हर दिन अपने कार्यों से इसमें प्राण फूंक रहे हैं ।

pramodkumar का छायाचित्र

यह सामुदायिक सहयोग का एक अच्छा उदाहरण है। और यह तभी सम्भव है जब Teachers बच्चों के प्रति समर्पण एवं अपनेपन के भाव से काम करते हैं। इस का जरा सा नुकसान उन्हें बेचैन करेगा क्योंकि इसे उन्होंने मिलकर बनाया है। प्रेरक

17372 registered users
6658 resources