किसी 'खास' की जानकारी भेजें। एक कारीगर जो तराश रहा है भविष्‍य

सार्वजनिक सेवा के दौरान सेवाकर्मी जैसे ही सेवाकाल के आखिरी दौर में प्रदेश करता है, कई बार उसमें थकान के साथ-साथ निराशा के भाव भी पैदा होने लगते हैं। हो भी क्यों न? इतने लम्‍बे समय तक एक जैसी ऊर्जा बनाए रखना, खुद को अपडेट रखना कोई आसान काम तो है नहीं और न ही हरेक के बस की बात है। तिस पर लगातार हो रहे बदलावों के साथ खुद को बनाए रखना और भी मुश्किल है। आखिरी के चार-पाँच सालों में तो व्यक्ति सोचता है कि अब मेरे लिए करने जैसा कुछ रहा नहीं। अब क्‍या करूँ, बहुत कुछ कर लिया मैंने। खासकर जब विद्यालयों के सन्‍दर्भ में बात हो तो बहुत से लोग विद्यालय मैदान के कोने में कुर्सी लगाकर पहले से ही ये भाव लेकर बैठ जाते हैं जैसे कि उनका इस विद्यालय से अब कोई सरोकार रह ही न गया हो। लेकिन इनमें कुछ ऐसे भी शख्‍स होते हैं जो हर एक दिन को उसी ऊर्जा के साथ जीते हैं जैसी ऊर्जा लेकर वे शुरुआती दौर में आते हैं। न उम्र उनके आड़े आती है न निर्धारित समय। ऐसी ही एक शख्सियत हैं सत्यपाल जी।

1 जुलाई सन् 1955 को मिर्जापुर, जिला सहारनपुर, उत्‍तर प्रदेश में श्री राम सिंह जी के घर जन्‍मे सत्यपाल जी अब शिक्षक के रूप में अपने सार्वजनिक सेवाकाल के अन्तिम दौर में हैं। इण्‍टर की पढाई पूरी करने के बाद, बी.एससी. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण किया। इसके बाद बी.टी.सी. करके एक शिक्षक के तौर पर इन्होंने अपने जीवन की नई यात्रा की शुरुआत की।

जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान रुड़की से सन् 1976 में बी.टी.सी. करने के बाद सत्यपाल जी ने सन् 1977 से 1982 तक सहारनपुर के एक प्रतिष्ठित निजी विद्यालय में शिक्षक के तौर अपना काम करते हुए, कर्मठता से उक्त विद्यालय को ऊँचाईयों पर पहुँचाया। इसी बीच सरकारी विद्यालयों में नियुक्तियाँ आरम्‍भ हुईं और इन्होंने 18 मार्च 1982 में डुण्डा ब्लॉक के जूनियर हाई स्कूल बॉन में विज्ञान विषय के शिक्षक के तौर पर नियुक्ति पाई। सत्यपाल जी बताते हैं, "इसके पहले मैं कभी पहाड़ों में नहीं आया था। पहाड़ों को लेकर मन में पहले से ही कौतूहल था। इनके बारे में किताबों में पढ़ता या टेलीविजन में देखता तो रोमांचित होता और बहुत से सवाल मन में पैदा होते। यहाँ के लोगों के बारे में मैंने सुना था कि वे बहुत ही ईमानदार होते हैं। मैंने यहाँ आकर ऐसा ही पाया।’’  बॉन विद्यालय में इन्होंने अपने जीवन के बहुत ही महत्वपूर्ण, सुखद 8 काल बिताए।

उनके अनुसार, "यहाँ के शिक्षक साथियों का साथ बहुत ही अच्छा रहा। यहाँ हमने अपनी कार्यशैली से लोगों का मन जीता। लोगों ने हमें पाँच कमरों का एक भवन दिया था और रात को सभी विद्यार्थी एवं शिक्षक वहाँ पर रहकर पढ़ाई किया करते थे। तब माँ-बाप के मन में शिक्षकों के प्रति बहुत सम्मान था।"

एक तरह से उन्होंने अपने बच्चों को शिक्षकों को सौंप दिया था। इतना ही नहीं बल्कि वहाँ अभिभावक भी अपने बच्चों के साथ रोज आते थे और वहाँ बैठकर बच्चों के साथ पूरा समय बिताते थे। सत्यपाल जी मानते हैं कि बॉन के लोगों में शिक्षा की भूख थी। जब बॉन से इनका तबादला हुआ तो गाँव वाले नहीं चाहते थे कि सत्यपाल जी यहाँ से जाएँ। पर सरकारी व्यवस्था के हिसाब से इन्हें वहाँ से जाना ही था। इसी बीच इन्होंने गढ़वाल विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई भी पूरी कर ली।

साथियों की राय ..

सत्‍यपाल जी के लिए से कर्मठ शब्द का प्रयोग करना चाहूँगा। इनको अपना काम करना है चाहे इनकी कोई प्रशंसा करे या आलोचना। जितना मैं  इनको जान पाया हूँ ये जो भी काम हाथ में लेते हैं उसको पूरा करके ही दम लेते हैं। यदि कोई काम नहीं आता है तो उसको सीखते हैं। इसका एक प्रत्‍यक्ष उदाहरण है कम्‍प्‍यूटर सम्‍बन्‍धी दक्षता और अँग्रेजी पढ़ाना।

विद्यालय में संसाधनों को जुटाने में इनकी बड़ी भूमिका रही है। आज हमारे विद्यालय के सभी कमरों में बिजली की व्‍यवस्‍था है, 3 प्रिंटर हैं, इनवर्टर है, बड़ा स्‍टैबलाईजर है। ये सभी सत्‍यपाल जी ने विद्यालय के लिए जुटाए हैं। और इसके खर्च का एक बहुत बड़ा हिस्‍सा इन्‍होंने खुद वहन किया है।

शुरू में जब मैं इस विद्यालय में आया था,मुझे कई लोगों ने बताया कि सत्‍यपाल जी के साथ काम करना आसान नहीं है। इनके साथ कोई टिक नहीं पाता है। पर मुझे आज लगता है कि जो काम नहीं करना चाहते वे इनके साथ टिक नहीं पाएँगे। ये किसी को कुछ बोलते ही नहीं हैं। खुद के काम से दूसरे को दिशा देने का काम करते हैं।

                                                                                                                                                 0 चन्‍द्रभूषण बिजल्‍वाण, सहायक अध्‍यापक

संसाधनों की खरीद रख-रखाव एवं उपयोग सम्‍बन्‍धी गोपनीयता इन्‍होंने कभी नहीं रखी। जितने भी अभिलेख हैं साथी लोग ही उनको देखते हैं और उसका लेखा-जोखा रखते हैं। हमारे स्‍टाफ में तालमेल का एक बड़ा कारण यह है कि इन्‍होंने कभी किसी को निर्देशित नहीं किया, इसलिए सभी खुद को जिम्‍मेदार मानते हैं और स्‍वप्रेरणा से काम भी करते हैं। कभी किसी सहयोगी साथी के बारे में नकारात्‍मक बातें नहीं करते।

                                                                                                                                                      0 भजनसिंह रावत,सहायक अध्‍यापक

 

सत्यपाल जी बताते हैं कि उनके गुरु श्री यदुनाथ जी और श्री रामशरण जी का उन पर काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ा। ये अपने साथियों के बारे में बात करते हैं, "मैं बहुत ही सौभाग्यशाली हूँ कि मेरे साथ हमेशा ही शिक्षकों का भरपूर सहयोग रहा। मेरा मानना है कि सभी लोग अच्छे होते हैं। कोई भी गलत नहीँ करना चाहता। उनके गलत होने के पीछे कुछ न कुछ कहानी होती है, जिसको समझना जरूरी है। फिर वे आपके लिए मददगार होते हैं।"

बॉन विद्यालय से आने के बाद ये ढाई साल जूनियर हाई स्कूल बर्नीगाड, उत्‍तरकाशी में रहे। यहाँ का सफर भी काफी अच्छा रहा। यहाँ भी बॉन विद्यालय के अनुभवों को आगे बढ़ाया। सभी शिक्षक साथी शाम का भोजन करने के बाद बच्चों के साथ विद्यालय में जाते थे और वहाँ पढ़ाई करते थे। यहाँ सभी शिक्षक बारी-बारी से बच्चों के साथ रात्रि को रहते थे इसका परिणाम यह रहा कि विद्यालय के 80 से 85 प्रतिशत बच्चों के स्तर में सुधार आया जिसे अभिभावकों ने भी महसूस किया।

बर्नी गाड से स्थानांतरण के बाद सत्यपाल जी राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय करड़ा पुरोला में पदोन्नत होकर आए और यहाँ दस साल तक सेवा दी। इसके बाद सन 2002 से अनवरत राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय सुनाली में सेवारत हैं।

वे कहते हैं, ‘‘आज तो सरकार की ओर से कपड़े एवं पुस्तकें मुफ्त में दी जा रही हैं, साथ ही भोजन भी दिया जा रहा है। लेकिन मैं जिस भी विद्यालय में रहा, वहाँ कुछ ऐसे बच्चों को गोद लिया जिनकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब रही। उनकी शिक्षा-दीक्षा में आने वाले खर्च को मैंने खुद वहन किया। उनके लिए पुस्तकों की व्यवस्था, पढ़ाई के लिए अन्य सामान की व्यवस्था भी की, साथ ही उनके व्यक्तिगत खर्च की व्यवस्था भी। प्राथमिक विद्यालय सुनाली में तो हम सभी शिक्षकों ने बच्चों को गोद लिया था। उनके लिए कपड़ों की व्यवस्था, पुस्तकों की व्यवस्था हम ही करते थे।’’

वे कहते हैं कि, "मैंने नौकरी को नैतिक कर्त्तव्य के हिसाब से लिया है। हमेशा अपनी अन्तरात्मा से सोचा कि मुझे और बेहतर करना चाहिए। मैं उसके लिए प्रयासरत रहा हूँ। मैंने खुद को कभी समय में नहीं बाँधा। मेरे लिए विद्यालय सिर्फ 9 बजे से 5 बजे तक नहीं है। मैंने अपने पूरे सेवाकाल में हरदम या कोशिश की कि मैं अपना अधिक से अधिक समय विद्यालय को दूँ। जितना समय मिलता है कोशिश यही रहती है कि हम बच्चों के लिए कुछ अतिरिक्त प्रयास कर सकें। सिर्फ समय की पाबंदी बेहतर काम करने के लिए काफी नहीं।’’

जब पूछा गया कि क्‍या रात्रि की कक्षाओं का विचार सुनाली में नहीं आया तो सत्यपाल जी ने बताया, ‘‘मेरे मन में यह विचार आया था कि मैं रात को सुनाली में रहूँ और यहाँ भी और विद्यालयों की तर्ज पर रात्रि के समय में बच्चों को पढ़ाऊँ। कई बार इस बारे में सोचा। लेकिन आज परिस्थितियों काफी बदल गई हैं बच्चों में भी बहुत परिवर्तन आए हैं। समाज में भी कई बदलाव आए हैं सो अब हम ऐसा करने में खुद को सहज नहीं समझते। इसकी पूर्ति के लिए हम अपने विद्यालय में हर साल लगभग पाँच माह अतिरिक्त कक्षाएँ चलाते हैं इसमें हमारे सभी साथी सहयोग करते हैं। गाँव के लोग हमें बहुत उत्साहित करते हैं। अधिकारी भी इस बात से अवगत हैं।’’ 

"बदलती परिस्थितियों में खुद को अपडेट रखना बहुत जरूरी है। मैं नया सीखने को हमेशा तैयार रहता हूँ क्योंकि पहले बच्चा पूर्णतया विद्यालय पर निर्भर था। उसकी जानकारी का स्रोत सिर्फ विद्यालय था। आज ऐसा नहीं है। सूचना क्रांति की वजह से बच्चे बहुत कुशाग्र बुद्धि के हैं वे बहुत-सी चीजें बाहर की दुनिया जैसे अखबार, टीवी, इन्टरनेट आदि से भी सीखते हैं। इसलिए शिक्षकों पर ज्यादा दबाव आ गया है कि वे खुद की जानकारी को पुख्ता करें और नई-नई जानकारियों के सम्‍पर्क में रहें। आज के बच्चों का आत्मविश्‍वास पहले के बच्चों से कहीं अधिक है हालाँकि वे  व्यवहारिकता में कमजोर पड़ते हैं। जब उनके आमने कोई परिस्थिति आ जाती है तो वे उसका मुकाबला ठीक से नहीं कर पाते हैं।’’

"पढ़ाते वक्त हम अक्सर मशीन की तरह हो जाते हैं। पढ़ाना इनपुट और आउटपुट का मामला नहीं है। मतलब इधर बच्चों को कुछ बताया उधर दो-चार सवालों के जवाब के आधार पर उसको जाँचा। मुझे लगता है जो भी हम पढ़ा रहे हैं, उस पर प्रश्‍न खड़ा करने की आवश्यकता है- मैं जो पढ़ा रहा हूँ वह बच्चे की कितनी समझ में आ रहा है,क्‍या वह उसके जीवन से जुड़ पा रहा है, कौन-सी बातें इसमें और जोड़ने की जरूरत है। अन्यथा हम सार्थक शिक्षा नहीं दे पाएँगे। न ही हम बच्चे को जिज्ञासु बना पाएँगे। कोई भी विषय तभी रुचिकर होगा जब हम बच्चों के मन ने उसके प्रति जिझासा पैदा करें। जिज्ञासा तभी पैदा होगी जब हमारे जीवन में उसकी उपयोगिता महसूस होगी।"

"बच्चों को सुनना और समझना बहुत जरूरी है। विद्यालय में 'मन की बात’ पेटिका एक ऐसा सशक्त माध्यम है कि इससे हम बच्चों के और करीब आ सकते हैं- एक विद्यार्थी ने इसके माध्यम से हम तक बात पहुँचाई कि अँग्रेजी फलाँ शिक्षक को पढ़ाना चाहिए। बच्चों की बात का सम्मान करते हुए हमने इसको बदला और कुछ अन्य कोशिशें भी परवान चढ़ीं। बच्चों में इससे विश्वास जागा और उनको लगा कि हमारी बात का भी महत्‍व है।"

"कई बार ऐसी भी परिस्थितियों आती हैं- बच्चों को पढ़ना तो आता नहीं तो क्‍या करें? मुझे यह समझ में आया कि यदि उनको पढ़ना नहीं आता तो समझ में तो आता है, वे किसी अवधारणा को सुनकर समझ तो पाते ही हैं। वह भी तो समय रहा जब हमारे पास लिखित अभिव्यक्ति की सम्‍भावनाएँ नहीं थीं तो हम सुनकर,समझकर जीवन में उसका उपयोग करते थे। सो बच्चों के साथ इसका प्रयोग करके बहुत-सी अवधारणाओं को समझाया जा सकता है। नई-नई बातें समझाई जा सकती हैं। इसलिए मेरी यह धारणा बदली कि बच्चे को यदि किताब पढ़ना नहीं आता हो तो उनको जानकारी नहीं दी जा सकती है उसको समझाया तो जा ही सकता है।"

बच्‍चों की नजर से...

उनकी पढ़ाई और समझाई हुई बातें हमको समझ में आ जाती हैं और याद हो जाती हैं। वे डाँटते कतई नहीं हैं।जब तक बच्‍चों को समझ में नहीं आ जाता तब तक वे समझाने की कोशिश करते हैं। एक बार हमको समझ में नहीं आ रहा था तो सर ने कहा कि हम सभी लोग सुबह एक घण्‍टा पहले आएँगे,क्‍योंकि दिन में तो कई विषय पढ़ने होते हैं और 35 मिनट में उतना कवर नहीं होता। इसलिए सर लोग हमको एक घण्‍टा रोज सुबह एक्‍सट्रा पढ़ाते हैं।

सर ने हमको पढ़ाने के लिए कम्‍प्‍यूटर पर अभ्‍यास बनाए। पहले हमको कम्‍प्‍यूटर से डर लगता था। पर जब हमसे अभ्‍यास करवाते रहे तो हमको समझ में आ गया।

 

"हम अध्यापक हैं हमारा दायित्व है कि हम बच्चे को समझें और बच्चे को अपना सर्वस्व दें, क्योंकि जिन अभिभावकों के बच्चे हमारे पास आते हैं, उन्हें बहुत-सी चीजें मालूम नहीं। यदि हम आज अच्छा नहीं करेंगे तो आने वाली पीढियाँ हमको कोसेंगी। हमारे बच्चे समाज में पिछड़ न जाएँ इसलिए हमें अपने विद्यालय में बच्चों को समाज बदलावों के साथ चलने के लिए तैयार करना है।"

‘‘मुझे इस बात का संतोष है कि मैंने अपना श्रेष्ठतम प्रयास करने की कोशिश की। एक व्यक्ति के रूप में हो सकता है कि मैं कई जगह कमजोर रहा हूँ पर मैंने आधे-अधूरे मन से कोई प्रयास नहीं किया। आज भी जब पुराने विद्यार्थी मिलने आते हैं तो पहले की ही तरह वे बहुत प्यार से सब्जी-दाल आदि लेकर भी आते हैं और अपने जीवन के अनुभव साझा करते हैं। मुझे लगता है कि यही मेरी कमाई है।’’


सत्‍यपाल जी से संजय सिंह रावत की बातचीत पर आधारित। अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन,देहरादून द्वारा प्रकाशित ‘उत्‍तराखण्‍ड : उम्‍मीद जगाते शिक्षक-2 से साभार

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