किसी 'खास' की जानकारी भेजें। एक आदिवासी स्‍कूल की दशा और दिशा

मैं लखनलाल सोनी यहाँ से 11 किलोमीटर दूर अमलीडिही का निवासी हूँ और इस प्राथमिक शाला, जलकुंभी में प्रधान पाठक हूँ। यह छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के मगरलोड ब्‍लाक का गांव है। मैं यहाँ 24 दिसम्बर 1998 से हूँ। इस स्कूल की स्थापना 6 जून 1997 में शिक्षा गारन्टी स्कीम के तहत हुई थी। इस योजना के तहत उन जगहों पर स्कूल खोले गए थे, जहाँ एक किलोमीटर के दायरे में स्कूल ना हो। अगर इलाका आदिवासी हो तो उसी समुदाय के कम से कम आठवीं पास व्‍यक्ति को उसी स्कूल में शिक्षक की नौकरी मिल सकती है। पर यहाँ उस समय कोई ऐसा नहीं था। स्कूल बिल्डिंग नहीं थी। वन विभाग के सामुदायिक भवन में स्कूल चल रहा था। पहली और दूसरी कक्षा से स्कूल शुरू हुआ था। उस समय एक ही शिक्षक नकुलराम नाग थे, पर जब उनका शिक्षा कर्मी में चयन हो गया तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया और स्कूल ठप्प हो गया। फिर मैं आया और तब से पढ़ा रहा हूँ।

स्कूल में फिलहाल 20 बच्चे हैं और मेरे अलावा एक शिक्षक रमन कुमार सिन्हा हैं । स्कूल में फिलहाल 2 कमरे हैं और एक बरामदा है। स्कूल में बाउंड्री वाल नहीं, खेल के मैदान का अभाव है। पास की जमीन जंगल विभाग की है। जमीन अगर मिल जाए तो खेल का मैदान बन सकता है ।

यहाँ आने-जाने के लिए के लिए बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। मैं पहले साइकल से आता-जाता था, अब वह मोटर साइकल से आता हूँ । रास्ते में जो नाला है वहाँ बरसात में पानी भर जाता है। कई बार तैरकर आना पड़ता है। जंगली इलाका होने की वजह से जंगली जानवरों का खतरा भी बना रहता है । बारिश के दिनों में साँप-बिच्‍छु तो आम हैं।

इस गाँव में तकरीबन 40 घर है और तकरीबन 200 से भी कुछ कम की आबादी है। मुश्किल से करीब 12 परिवार हैं। जंगल और खेती-किसानी से गुजारा करते हैं  पर वन विभाग की बेगारी भी कभी-कभी करनी पड़ती है। यह वन ग्राम है इसलिए यहाँ वन विभाग का ही राज है और कुछ हद तक अभी भी बरकरार है। गाँव चारों ओर से जंगल से घिरा हुआ है। अभी भी उन्हें वन विभाग के कहने के अनुसार करना पड़ता है। अब उन्हें काम के बदले पैसे मिलते हैं लेकिन जब भी वन विभाग बुलाता है तो इन्हें जाना पड़ता है।

पहले हतबंध में भी स्कूल नहीं था, तो लोग धान देकर पढ़ाई करते थे। जैसे धान देकर किसान लोगों से काम करवाते हैं वैसे ही, शिक्षकों को धान देकर गाँव बुलवाते थे और बच्चों की पढ़ाई करवाते थे। यहाँ के भी कुछ बच्चों ने भी ऐसे ही हतबंध जाकर पढ़ाई की और पाँचवीं पास की। फिर वह पांडुका गए और सातवीं तक पढ़ाई की।

97-98 में जब स्कूल शुरू हुआ तो बच्चों को यहाँ लाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता था। उनके हिसाब चलना पड़ता था। बच्चे स्कूल आना ही नहीं चाहते थे। बार-बार पालकों से सम्पर्क करना पड़ता था, गाँव में मीटिंग करना पड़ता था। कभी-कभी जोर जबर्दस्ती भी लाना पड़ता था। यहाँ तक कि हाथ पैर बाँधकर भी लाना पड़ता था। कुछ बच्चे तीरकमान मारने की बात करते थे। जैसे एक बच्चे ने मुझे देखते ही अपने पिता से कहा कि धनुष तीर लाओ और इसे मारो। एक ने तो कुल्हाड़ी ही उठा ली थी। कई बार यहाँ आने का मन भी नहीं किया। कई बार सोचा कि कहीं और ट्रान्सफर करवा लूँ । फिर बच्चों के बारे में सोच कर रह गया। अब सोचता हूँ की अब तो प्रमोशन के बाद ही जाऊँगा।

भुंजिया आदिवासी लड़कियों के साथ भी कई परेशानियाँ हैं। उन्हें स्कूल नहीं भेजा जाता था और उनके परंपरा के अनुसार वे चप्पल नहीं पहनती थीं। भुंजिया समुदाय के मुखिया से बात हुई। वे एक शर्त पर तैयार हुए कि अगर मध्यान्ह भोजन उनके ही समुदाय का व्यक्ति कोई पकायेगा तो ये लोग खाना खाएँगे और तभी आएंगे।

अभी भी पालक बच्चों के पढ़ाई को लेकर उदासीन हैं और खासकर के लड़कियों की। इसके प्रमुख वजह आर्थिक भी है। किताबें आदि स्कूल फण्‍ड से देते हैं। बच्चे तभी नियमित तौर पर आते हैं जब उन्हें कभी-कभी कहीं घुमाने ले जाते हैं। मैं उन्हें बीच-बीच मड़ई मेला वगैरह ले जाता हूँ। ज़्यादातर समय हतबंध ले जाता हूँ कुछ खिलाने-पिलाने के लिए जो यहाँ नहीं मिलता। इनमें चाट-गुपचुप से लेकर कुछ लीची, चीकू और अंगूर जैसे फल भी शामिल हैं। इस तरह से आसपास के जगहों पर ले जाते हैं जहां आर्थिक रूप से और सुविधानुसार लाना ले जाना सम्भव होता है।

इन सबके माध्यम से मैं बच्चों को स्कूल की ओर आकर्षित करने तथा बाँधे रखने की कोशिश कर रहा हूं। यहाँ अभी भी ज्‍यादातर लोग जंगल के पर ही निर्भर करते हैं। उनके परिवार में स्कूल कभी गए हों ऐसे कम ही लोग हैं इसलिए शिक्षा के प्रति लगाव या जागरूकता की भी कमी है जिसके चलते इस तरह के प्रयास  बहुत ज़रूरी हैं।

हालॉंकि हम शिक्षक अपनी ओर से कोशिश जारी रखे हुए हैं और कुछ हद तक कामयाब भी हुए हैं। हम सबको उम्मीद करनी चाहिए कि सभी पक्ष जिनमें सरकार, पालक,समुदाय आदि सब शामिल हैं और अधिक प्रयास करें यह स्कूल शिक्षा का परचम लहराए !


पुरुषोत्‍तम ठाकुर, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन,धमतरी,छत्‍तीसगढ़ की रपट पर आधारित।

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

  • अभी भी भारत में शिक्षा की पहुंच सभी बच्‍चों तक नहीं हो पाई ।
  • धान देकर पढाई करना, आश्‍चर्य लगता है । बहुत काम करना होगा  ।
  • अभी कुछ लोग कह रहे हें कि अच्‍दे दिन आने वाले हैं , क्‍या सच में ।
  • हम बच्‍चों को उनका हक दे पायेंगे क्‍या ।
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