किसी 'खास' की जानकारी भेजें। उम्मीदों का उम्मेदपुरा

चित्तौड़गढ़ से उदयपुर की तरफ सरपट दौड़ रहा हाइवे भूपालसागर नामक जलाशय के पास से गुजरता है। हाइवे छोड़ते ही मिलने वाली संकरी-सी उबड़-खाबड़ सड़क कुछ बहुत ही छोटे गाँवों, ढाणियों और कंटीली झाड़ियों के बीच से गुजरती है। इसी सड़क पर एक लम्बा सफर तय करके हम आ पहुँचे हैं भूपालसागर ब्लाक के एक बहुत ही छोटे-से गाँव गुड़ा उम्मेदपुरा के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में। सड़क किनारे की कटीली झाड़ियों की जगह अब बोंगनवेलिया और गुलाब के लाल फूलों के झुरमुट नजर आ रहे हैं। ये खूबसूरत चारदिवारी का मुख्यद्वार था जो हर आने वाले को ‘वेलकम’ कह रहा था। चारदिवारी पर लगे अलग-अलग रंग के झण्डे देखकर एकबारगी लगा कि स्कूल ने शायद 26 जनवरी की तैयारियाँ कुछ पहले ही शुरू कर दी हैं। बाद में पता चला कि ये झण्डे तो हमेशा यूँ ही फहराते रहते हैं।

फाटक से भीतर दाखिल होते ही दाहिने हाथ पर एक बड़ा नीम का पेड़ है जिसके नीचे मुक्ताकाश्‍ाी कक्षा बनी हुई है। सीमेंट की टेबल,बेंच और ब्लैकबोर्ड, यानी एक पूरी कक्षा के साथ खुले आकाश तले नीम की छाँव में बैठकर पढ़-लिख सकने या और कोई काम कर सकने का पूरा इन्तजाम। मैदान में बना ये अकेला ब्लैकबोर्ड नहीं है। कक्षाओं में घुसने से पहले ही, चारों तरफ कई सारे ब्लैकबोर्ड दिखाई देते हैं। चारदीवारी की भीतरी दीवारें और स्कूल भवन की दीवारों को बहुत ही खूबसूरती से इस्तेमाल किया गया है।  सुन्दर चित्र, व्यवहार में अपनाई जाने वाली बातें, विज्ञान,गणित के सूत्र, जिले का नक्‍शा, शरीर के अंग आदि आपको दिख जाएँगे। जगह-जगह लगे ब्लैकबोर्डों पर कहीं बच्चों की गोदागादी, कहीं नया नया लिखना सीखने वाले के हाथ से बने टेडे़-मेडे़ अक्षर या चित्र, तो कहीं अँग्रेजी के कठिन शब्दों के मायने आपको लिखे मिलेंगे। एक ब्लैकबोर्ड पर आज के अखबार से चुनी हुई खबरें भी लिखी हुई थीं।

स्कूल भवन के बाईं तरफ से जा रही गुलाबी रंग की टाइलों वाली रेम्प पर चलकर हम रसोई के सामने से होते हुए स्कूल के पीछे की तरफ बने शैचालयों की तरफ जा पहुँचे। लड़के और लड़कियों के लिए कुछ फासले पर अलग-अलग शौचालय हैं। शौचालय साफ-सुथरे और व्यवस्थित हैं। लाइन से लगी नल की टोटियाँ देख जिज्ञासा हुई कि इनमें पानी आता भी है या नहीं, एक नल की टाेंटी घुमाई तो पानी की तेज धार बह निकली। शिक्षक साथियों ने बताया कि ऊपर छत पर रखी बड़ी सी पानी की टंकी में हमेशा पानी रहता है। पानी की टंकी सामने मैदान में लगे हैण्डपम्प से जुड़ी है। हैण्डपम्प में वाटर लिफ्टिंग सिस्टम लगा है। जब भी कोई पानी पीने के लिए नल चलाता है तो यह सिस्टम उपयोग न किए जाने वाले पानी को सीधे छत पर रखी टंकी तक पहुँचा देता हैं। यही पानी शौचालय के लिए या फिर पौधों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। हाल ही स्टेट बैंक आफ बीकानेर ने पानी साफ करने की एक मशीन भेंट की है। अब बच्चे इस मशीन से फिल्टर किया हुआ पानी पीते हैं।

स्कूल के पीछे की तरफ एक और बगीचा तैयार हो रहा है। यहीं पर कचरा डालने के लिए कचरा पात्र बनाया गया है, जिसमें बनने वाली खाद बगीचे के पौधों मे डाली जाती है। बगीचे में नीम,पपीता से लेकर बादाम तक के पेड़ लगे हैं। मैदान के एक हिस्से में बच्चों ने बहुत-सी गुलाब की कलमें लगा रखी हैं। दूसरी तरफ कुछ पौधों के किनारे बनाई गई ईंटों की मेढ़ को आयत,वर्ग,त्रिभुज, वृत्त आदि का आकार देकर ज्यामिति को जीवंत करने का प्रयास किया गया है।  गेंदा और गुलाब के फूलों ने माहौल की खूबसूरती को और बढ़ा दिया है। पेड़ पर लदे हरे-हरे पपीतों की तरफ इशारा करते हुए शिक्षकों ने बताया कि,इनके पक जाने पर इन्हें काटकर बच्चों को ही खिला दिया जाता है।

   
गाँव के शिक्षक पालक संघ के उपाध्यक्ष बद्रीलाल जी पेशे से किसान हैं। आज से 32 साल पहले वे भी इसी स्कूल में पढ़ते थे। तब यहाँ सिर्फ एक मास्टर जी पाँचवी तक की कक्षा पढ़ाया करते थे। उन्हाेंने बताया कि सन 1972 में गाँव के लोगों ने ही आपस में चन्दा करके यह स्कूल शुरू किया था। इतने सालों में आज यह स्कूल आठवीं कक्षा तक हो गया है, और अब यहाँ सात शिक्षक नियुक्त हैं। बद्रीलाल जी की बेटी भी इसी स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ रही है।

स्कूल की चर्चा आसपास के कई गाँव तक है। कुछ बच्चे तो सात-आठ किलोमीटर दूर से रोज साईकिल चलाकर इस स्कूल में पढ़ने आते हैं। 15 अगस्त तथा 26 जनवरी को गाँव के लोगों की तरफ से बच्चों के लिए भोज का आयोजन किया जाता है। मुझे बताया गया कि आगामी चार पाँच सालों तक किए जाने वाले आयोजनों में सामूहिक भोज आयोजित करने के लिए लोगों ने एडवांस में जिम्मेदारी ले रखी है।

बाबूलाल जी इस विद्यालय के सबसे पुराने शिक्षक हैं। उन्होंने बताया कि पहले चारदिवारी न होने से ये आम रास्ता हुआ करता था। जानवरों और लोगों के आने-जाने से एक भी पौधा बचा पाना सम्भव नहीं था। उस समय अतिरिक्त जिला परियोजना समन्वयक के पद पर कार्यरत सुभाष शर्मा जी तथा संकुल में सन्दर्भ सदस्य के रूप में पदस्थ मदनलाल  विजयवर्गीय जी ने स्कूल को बेहतर बनाने के लिए न सिर्फ उत्साहित किया बल्कि सभी प्रकार से अपेक्षित सहयोग भी किया। गाँव के लोगों ने भी इस काम में बहुत योगदान दिया। पंचायत समिति ने अपने खर्च से सामने के बड़े गढ्ढे में मिट्टी की भराई कराई जिससे बच्चों के खेलने के लिए बड़ा मैदान तैयार हो सका। इन चार पाँच सालों के दौरान जो कायापलट हुई है उसका श्रेय यहाँ के शिक्षकों, समुदाय के लोगों और सदैव सहयोग करने वाले उनके अधिकारियों को जाता हैं। विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री गोटूलाल जी तथा अन्य षिक्षकों के काम को पंचायत से लेकर जिला स्तर तक सराहा जा चुका है। सभी लोग उत्साहित हैं और विद्यालय को और बेहतर बनाना चाहते हैं।
 


मोहम्मद उमर, अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन, जिला संस्थान, चित्तौड़गढ़,राजस्थान
 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

यह विद्‍यालय वास्तव में उम्मीदों भरा है। सबसे खास बात बच्चे यहां जीवन की शिक्षा ले रहे हैं जो उनके लिए उपयोगी होगी। जब समुदाय साथ आ जुटता है तो ऐसे परिणाम मिलना स्वभाविक है। शिक्षको का श्रम और हर बच्चे के प्रति अपनापन दिखायी पडता है । यह एक प्रेरक काम है।
मजा आ गया भाई ।

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