किसी 'खास' की जानकारी भेजें। उमा शर्मा एक समर्पित शिक्षिका

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के दक्षिण में धमतरी जिले के देमार संकुल की शासकीय प्राथमिक शाला पीपरछेड़ी विद्यालय की शिक्षिका श्रीमती उमा शर्मा के काम करने का तरीका अपने आप में एक सुकून देता है। पीपरछेड़ी गाँव में विभिन्‍न जातियों के लोग निवास करते हैं। गाँव की जनसंख्या लगभग 2083 है। जिनमें महिला 1068 व 1015 पुरुष हैं। इस विद्यालय में कुल 153 बच्चे (84 बालक और 69 बालिकाएँ) अध्ययन कर रहे हैं। उमा शर्मा पहली बार शिक्षक के तौर पर दन्‍तेवाड़ा के कटेकल्याण ब्लॉक की शासकीय प्राथमिक शाला लखारास नीचेपारा में फरवरी 2003 में नियुक्‍त हुई थीं।     

अपनी पहली पोस्टिंग में उमा शर्मा को विद्यालय,बच्चे और बच्चों की सीखने की प्रवृति को बहुत गहराई के साथ समझने का अवसर मिला। इसी का परिणाम है कि आज पीपरछेड़ी के कक्षा पहली के 22 बच्चों मे से 19 बच्चे मजे से अखबार पढ़ने में अपनी काबिलियत दिखाने में आगे आ चुके हैं। उमा शर्मा का कहना है कि अक्तूबर 2007 में वे शासकीय प्राथमिक शाला पीपरछेड़ी में आईं, तब यहाँ 237 बच्चे थे जिनमें 48 बच्चे ही कक्षा पहली में थे जिनके साथ मिलकर काम करना भी एक चुनौती भरा काम रहा। धमतरी जिले का यह उत्तरी मैदानी क्षेत्र जनजातीय विहीन है और कुछ हद तक शिक्षा का प्रतिशत ऊँचा ही है, परन्‍तु बच्चों के स्तर काफी अलग हैं।

उमा शर्मा कहती हैं जब पीपरछेड़ी में आई तब मुझे लगा कि गाँव में ही रहकर बच्चों और उनके पालकों से सीधे मुलाकात कर कुछ अलग करना चाहिए। पालकों से नियमित मिलने-जुलने और पारिवारिक वातावरण को जानने-समझने का सिलसिला आरम्‍भ करने का यह असर दिखा कि बच्चे खुलकर अपनी बातें मुझसे कहने लगे।

बच्चों के सीखने में जो बड़ी समस्या मैंने अनुभव की वह यह कि बच्चों को भाषायी कौशलों को सीखने में दिक्कत है - वर्णों की पहचान ,पहचाने गए वर्णों का सहसम्‍बन्‍ध न बना पाना, अपने परिवेश की चिरपरिचित वस्तुओं के माध्यम से भाषायी क्षमता में अभिवृति को बढ़ावा देने वाले शब्दों को बोल न पाना। कुछ स्तर पर पहचानने की कोशिश करने की शुरुआत की और इसका व्यापक प्रभाव और लाभ दिखने लगा। मुझे इस विद्यालय में काम करते हुये 6 साल हो रहे हैं और हर बार मुझे कक्षा पहली के साथ काम करने में एक अलग ही अनुभूति होती है। भाषा ,पर्यावरण और गणित जैसे प्रमुख विषयों को समग्रता के सीखने–सिखाने की अपनी अलग ही चुनौती है।

रिसर्च मड़ई में अपने बेहतर प्रयास की प्रस्तुति –

उमा शर्मा ने भाषा शिक्षण के लिए अपने विद्यालय मे जो प्रयास किए हैं उन्हें अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन और डाइट के संयुक्त आयोजन ‘रिसर्च मड़ई’ में साझा किया है। उन्होंने अपनी प्रस्तुति में निम्न बातें कहीं-

  • ‘आज की बात’ गतिविधि कक्षा पहली के बच्चों के लिए सीखने-सिखाने के लिए प्रतिदिन अपने कक्षा के श्यामपट में इस्तेमाल करती हैं।
  • नाम चार्ट का उपयोग – तीन स्तर पर किया जा सकता है, बच्चों के नाम के साथ कोई विशेष चित्र बनाते हुए, बिना चित्र के बच्चे का नाम + दोस्तों के नाम, अपना नाम,माता–पिता के नाम। नाम चार्ट की यह गतिविधि वर्ण पहचान के लिए आधार बनी है। इसके माध्‍यम से वे   21 वर्ण और 8 मात्राओं की पहचान कर पाए, पढ़ना एवं लिखना कर पाए। पहचाने गए वर्णों से सार्थक – निरर्थक शब्दों को बना पाने में सक्षम हो पाए।
  • इसके अलावा कुछ और गतिविधियाँ जो इनमें मददगार है – पासा,रेल का खेल,अभिनय,अभिनय गीत, बालगीत, शब्‍द और चित्र वाले चार्ट।
  • आसपास की वस्तुएँ बातचीत में सिखाने में मदद करती हैं। जैसे नल, नल का चित्र, नल का शब्द कार्ड,न का वर्ण, चित्र के साथ छोटा सा वाक्य, उसका उपयोग,दुरुपयोग,साफ-सफाई पर बातचीत।  

इन गतिविधियों का व्यापक प्रभाव विद्यालय के बच्चों मे दिखाई देता है। वे पुस्तकालय का उपयोग भी करती हैं। पुस्‍तकालय बच्चों को सुनने,बोलने,पढ़ने और लिखने में मददगार है। वे क्षेत्र भ्रमण भी करवाती हैं। भाषा शिक्षण में चित्रकारी का उपयोग भी करती हैं।

उमा शर्मा कहती हैं कि अभी भी मुझे पूरी तरह से सफलता नहीं मिली है। उनका मानना है कि -

  • बच्चे पहले से काफी कुछ जानते हैं, शिक्षक की भूमिका मार्गदर्शक की होती है।
  • बच्चों के स्तर को समझते हुए उचित सहायक सामग्री का निर्माण व इस्तेमाल करना चाहिए।
  • वास्तविक वस्तु और चित्र काफी मदद करते हैं सीखने वाले बच्चे को। यह शायद हर वर्ग के लिए उपयोगी हो सकता है।
  • हमें काफी धैर्य चाहिए तब जाकर बच्चे सीखते हैं। इस दिशा में TLM काफी हद तक मददगार होते हैं।
  • शिक्षकों को भी सीखते रहना जरूरी है, वे पढ़ेंगे नहीं तो बढ़ेंगे कैसे  

उमा शर्मा की कार्यशैली की कुछ विशेषताएँ –

  • बिना किसी खर्चे के आसपास की अनुपयोगी वस्तुओं को सहायक शिक्षण सामग्री के रूप में इस्तेमाल करना।
  • नित्य बालगीतों के माध्यम से कक्षा की शुरुआत।
  • समुदाय के लोगों के साथ नियमित सम्‍पर्क।
  • कक्षा की दीवारों का शैक्षिक वातावरण के रूप में उपयोग करना।
  • बच्चों के नाम व मनपसन्‍द चित्रों के माध्यम से कक्षा शिक्षण को बेहतर बनाने में उपयोग।
  • लगातार विभिन्न शैक्षिक मुद्दों पर आधारित किताबों का अध्‍ययन।
  • पूर्णतः बाल केन्द्रित कक्षा ।
  • बच्चों को पत्र लिखकर लेखन के प्रति रुचि जागृत करना और बच्चों द्वारा अपने शब्दों मे जवाब देना काफी रोचक गतिविधियों में से एक है।   
  • बच्चों को स्वतंत्रता देना।                                                       

प्रस्‍तुति : नरेन्द्र ‘नन्द’,अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन,जिला संस्थान,धमतरी (छत्तीसगढ़)

17598 registered users
6696 resources