किसी 'खास' की जानकारी भेजें। उमंग और उल्‍लास की हवा : अनुराग बेहार

ऐसे रंग की स्‍कूली इमारत मैंने पहले नहीं देखी थी। पीले चटक रंग में पुता ये स्‍कूल, गाँव की बस्‍ती से दूर तीखी ढलान की शुरुआत पर था। चारों तरफ कुमाऊँ की पहाडि़यों से घिरा सतयून गाँव, इलाके की सबसे ऊँची पहाडि़यों में से एक पर बसा है। इस ऊँचाई से करीबन 30 किलोमीटर दूर स्थित अल्‍मोड़ा शहर भी साफ दिखाई दे रहा था। करीबन एक हजार की आबादी वाले गाँव में, किनारे पर बनी, चमकीले पीले रंग की स्‍कूल की इमारत, किसी लाइट-हाउस की तरह बहुत दूर से ही दिखाई दे रही थी।

उस स्‍कूल के भवन का रंग एक मात्र असाधारण चीज थी जो उस हफ्ते उत्‍तराखण्‍ड के कुमाऊँ क्षेत्र में मैंने देखी या सुनी हो। गाँवों और छोटे कस्‍बों में बिताया गया वह एक साधारण सप्‍ताह था। तीन दिनों के दौरान हुई पाँच बैठकों में करीबन एक सौ पचास शिक्षकों और सरकारी अधिकारियों से मिलना हुआ। इन बैठकों में उपस्थित सभी लोग अपने स्‍कूलों को बेहतर बनाने के तरीकों पर चर्चा करने के लिए स्‍वेच्‍छा से शामिल हुए थे। चर्चा में उठे कुछ मुख्‍य बिन्‍दु मैं आपसे साझा कर रहा हूँ।

‘‘दूर-दराज के विद्यालयों में पर्याप्‍त शिक्षकों की कमी है। हर शिक्षक को एक से अधिक कक्षाएँ सम्‍भालनी पड़ती हैं जो कि बेहद मुश्किल काम है। ऐसे गाँवों में स्‍कूल खोल देने के बाद सरकार की ये प्राथमिक जिम्‍मेदारी बन जाती है कि वहाँ पर्याप्‍त शिक्षकों का इंतजाम किया जाए। कई स्‍कूलों में तो बच्‍चों की संख्‍या दस से भी कम है। जरूरत है कि ऐसे स्‍कूलों को नजदीकी स्‍कूलों के साथ मिला दिया जाए, हालाँकि विद्यालयों को बन्‍द करना एक बड़ा राजनैतिक मुद्दा होगा। ‘बस्‍ती में एक किलोमीटर पर एक स्‍कूल’ योजना को सरकार के द्वारा बिना सोचे-समझे लागू किया गया है, खास तौर पर पहाड़ी इलाकों में, जहाँ एक किलोमीटर की अवधारणा बहुत अलग है।’’

‘‘सरकारी स्‍कूलों के ज्‍यादातर बच्‍चे बेहद पिछड़े घरों से आते हैं। इन बच्‍चों के माँ-बाप अपनी रोजी-रोटी की भाग-दौड़ में इतने उलझे हैं कि वे अपने बच्‍चों और उनकी पढ़ाई पर ध्‍यान देने में असमर्थ हैं। ऐसी परिस्थितियाँ शिक्षण को सरकारी विद्यालयों में प्राइवेट स्‍कूलों की अपेक्षा अधिक मुश्किल बना देती हैं। हालाँकि प्राइवेट स्‍कूल भी सिर्फ अँग्रेजी पाठ्यक्रम, अच्‍छी पोशाकें और पर्याप्‍त शिक्षकों के वादे से ज्‍यादा कुछ देने में असमर्थ हैं। चूँकि सरकारी शिक्षकों के बच्‍चे भी प्राइवेट स्‍कूलों में ही पढ़ते हैं इसलिए वे इस बात को मानते हैं कि प्राइवेट स्‍कूलों में तो शिक्षा का स्‍तर सरकारी स्‍कूलों से भी नीचे है।’’

‘‘शिक्षकों के लिए अविलम्‍ब गुणवत्‍तापूर्ण प्रशिक्षण और मेंटरशिप की आवश्‍यकता है। शिक्षक पाठ्यक्रम में नए बदलावों को लेकर असमंजस में हैं और आत्‍मविश्‍वास की कमी से जूझ रहे हैं। सही प्रशिक्षणों की कमी के कारण आरटीई में वर्णित ‘सतत व व्‍यापक मूल्‍यांकन’ की अवधारणा व कार्यान्‍वयन को समझने में भी असमर्थ हैं।’’

ये वे आवाजें हैं जो हमारे देश में इस तरह की बैठकों में हर जगह सुनाई देती हैं। ये वे वाजिब मुद्दे हैं जिनका निवारण इन बैठकों में उपस्थित किसी शिक्षक या अधिकारियों के द्वारा नहीं बल्कि सिस्‍टम द्वारा ही सम्भव है। यहाँ यह याद रखना आवश्‍यक है कि ये उन लोगों के कथन हैं जो व्‍यवस्‍थाओं में बेहतरी के लिए गम्‍भीर हैं।

पर कुछ दूसरी तरह की आवाजें भी मौजूद हैं।

सतयून के उस पीले स्‍कूल की प्रधानाध्‍यापिका नीता पन्‍त  और इस कलस्‍टर के रिसोर्स परसन संजय जोशी से मुझे बात करने का मौका मिला। हमारी बातचीत के दौरान कई बच्‍चे दौड़ते हुए आए, नीता जी के पैर छुए और दौड़ते हुए ही स्‍कूल से चले गए। ये बच्‍चे इस स्‍कूल के पुराने विद्यार्थी थे जो अब नजदीकी माध्‍यमिक स्‍कूल में पढ़ते हैं। अपने पुराने स्‍कूल व प्रधानाध्‍यापिका के प्रति उनका लगाव कुछ ऐसा है कि लगभग हर रोज वे स्‍कूल जाने से पहले नीता जी से मिलने आते हैं। विद्यालय में बहने वाली उमंग और उल्‍लास से भरी हवा यह समझने में मदद करती है कि बच्‍चों और शिक्षक के बीच ये प्रेम का पौधा कैसे पनपा है।

ज्‍यादातर प्राथमिक विद्यालयों की ही तरह यहाँ भी दो कक्षों का भवन है, जिसमें एक छोटा कमरा शिक्षकों के लिए, एक बरामदा सामने की तरफ, बगल में एक रसोईघर और सामने एक बड़ा सा मैदान है। यह स्‍कूल अपनी आठ पृष्‍ठीय पत्रिका भी प्रकाशित करता है जिसमें बच्‍चों और स्‍कूल से जुड़े लोगों द्वारा लिखी गई सामग्री छपती है। शिक्षकों के साथ बच्‍चे भी इस प्रक्रिया में गहराई से जुड़े हुए हैं। नीता जी और संजय जी के दिमाग में आने वाले सत्र में अकादमिक सुधार करने के लिए कुछ योजनाएँ हैं। वे विद्यालय में अँग्रेजी शिक्षण भी शुरू करने की सोच रहे हैं। जब मैंने उनसे स्‍कूल के रंग के बारे में पूछा तो वे बोले,  ‘हमारा ऐसा करने का मन था,हमने कर दिया और न ही किसी ने हमें रोका।’

ये इनकी सामान्‍य प्रवृति है, ‘‘जो करना आवश्‍यक है, जो हमें लगता है कि ठीक है, वो हम करते हैं। हम पूरी व्‍यवस्‍था बदलने का इंतजार नहीं कर सकते।’’ उन पाँच बैठकों में जब-जब पहले सिस्‍टम को बदलने की बात उठी तब तकरीबन पन्द्रह बार अलग-अलग लोगों द्वारा यह वाक्‍य दोहराया गया।  

यह सच है कि सिस्‍टम को बदलने की आवश्‍यकता है : सांस्‍कृतिक रूप से, संस्‍थागत रूप से और कई अन्‍य आधारभूत तरीकों से भी। जमीनी स्‍तर पर किए गए व्‍यक्तिगत प्रयास पूरी व्‍यवस्‍था को बदलने के लिए पर्याप्‍त नहीं हैं, पर वे फिर भी नितांत आवश्‍यक हैं-आगे बढ़ने के लिए, अपने नियंत्रण की चीजों को बदलने के लिए और आशा की किरण को जलाए रखने के लिए। और इस देश में ऐसे आशावान लोगों की कोई कमी नहीं। पिछले सप्‍ताह मैं ऐसे कुछ लोगों से मिला जो व्‍यवस्‍था बदलने का इंतजार करने की जगह उसे बदलने के प्रयासों में जुटे हैं।

हाँ, कहने को यह एक साधारण सा सप्‍ताह ही तो था।

                                                                                            0 अनुराग बेहार  

(लेखक अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन के सीईओ तथा अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय के वॉइस चांसलर हैं।)


(अँग्रेजी अखबार मिंट में  प्रकाशित लेख का हिन्‍दी अनुवाद। अनुवाद अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन जिला संस्‍थान,टोंक,राजस्‍थान के पल्‍लव तिवारी ने किया है।)  

टिप्पणियाँ

khem shanker का छायाचित्र

सिस्टम को बदलने की आवश्यकता है मगर इसमें समय लगता है...शायद हमारे छोटे छोटे प्रयासों से ही इसे सही दिशा मिलेगी ...इसलिए अपने नियंत्रण की चीजों को तो बदलना शुरू करें ....‘जो करना आवश्‍यक है, जो हमें लगता है कि ठीक है, वो हमें जरुर करना चाहिए .
................आओ शुरुआत करें

rakeshcarpenter का छायाचित्र

खेम शंकर जी इस तरह की साकारात्म सोच रखने वाले आप जैसे कुछ शिक्षक साथी इस तरह के कार्यो में लगे भी हुए है | ऐसे शिक्षक साथियों के होंसले और मेहनत को सलाम!!!!!!

usha panwar का छायाचित्र

Half of the teachers among the govt teachers are giving the best they can. They arperforming their tasks ln very adverse conditions.Specially the teachers in Uttarakhand are the best example of the hard working govt employees.I also belong to block lamgara of district almora and I am very much familiar with the geographical coonditions most of teachers among us are facing but still the results are satiisfactory.I belong to the upgraded junior high school where teaching staff is in high school is about nil.there is single teacher of L T section to perform all the functions of the academics and responcibilities and formalities for uttarakhand board for class tenth but the teachers of my junior high school supported him as far as possible and result is that sixty percent of students passed high school.this all is hard work of four junior high school teachers and one L T teacher.I want to mention that my junior high school is 9 kilometres from road and this takes full two hours to walk without any break

pramodkumar का छायाचित्र

बधाई

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