किसी 'खास' की जानकारी भेजें। आधारशिला : काम केन्द्रित शिक्षा मॉडल

सिद्धार्थ कुमार जैन

मध्यप्रदेश के पश्चिम में महाराष्ट्र की सीमा से लगा ‘सेंधवा’ एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है। काम केन्द्रित शिक्षा मॉडल पर स्थापित आधारशिला लर्निंग सेण्टर आदिवासी समुदाय के बच्चों के शिक्षण का एक अभिनव उदाहरण बन गया है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 में काम और शिक्षा फोकस समूह द्वारा आधारशिला लर्निंग सेण्टर के शैक्षिक कामों को एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यहाँ पेश है इसके काम और शिक्षा का अन्दाज।

सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय अमित एवं जयश्री ने शिक्षा के परिप्रेक्ष्य को बेहतर तरीके से जानने-समझने के बाद स्थानीय आदिवासी समुदाय के बच्चों को उनके परिवेश के अनुरूप शिक्षण देने के उद्देश्य से 1998 में आधारशिला लर्निंग सेण्टर की स्थापना की। जयश्री बताती है कि ‘हमारे लिए बगैर संसाधनों के स्कूल चलाना चुनौतीपूर्ण काम था। स्थानीय समाज से अपेक्षा थी कि वे इस काम के लिए आवश्यक साधन जुटाने में हमारी मदद करेंगे।’ शुरुआत में स्थानीय लोगों की मदद से शिक्षण केन्‍द्र के लिए उपयुक्त स्थान खोजा गया। पहाड़ी पर बंजर जमीन को चुना, जहाँ घास भी नहीं उग सकती थी। गाँव वालों के परिश्रम से जमीन को व्यवस्थित किया गया। वहाँ एक बड़े हॉल का निर्माण किया गया। इसके लिए किसी ने ईंटें दी, तो किसी ने अपना श्रम। करीब 30-32 बच्चों से शिक्षण केन्द्र की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे कारवाँ बढ़ता गया और आज 110 से अधिक बच्चे यहाँ शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

इस शिक्षण केन्द्र के बारे में सुन-पढ़ रखा था। मेरे सामने मुख्य सवाल थे-

  • ग्रामीण अंचल में स्कूल-शिक्षण की प्रक्रिया किस प्रकार चलाई जा रही है?
  • पाठ्यपुस्तकों के साथ उनकी स्थानीय भाषा को किस प्रकार जोड़ा गया है?
  • शिक्षकों का प्रोफाइल क्या है? ये शिक्षक कहाँ से आते हैं और उनका प्रशिक्षण कब और कैसे किया जाता है?
  • उत्पादक कार्य के माध्यम से शिक्षण की प्रक्रिया किस प्रकार चलाई जा रही है? स्कूल के साथ आदिवासी समाज कितना जुड़ा है?

मैंने क्रेन्द्र का भ्रमण किया और लगभग दो दिन रहकर शिक्षण की सारी प्रक्रियाओं को नजदीक से जानने और समझने का प्रयास किया।

सेण्टर की बनावट और पृष्ठभूमि

सेंधवा से निवाली पहुँच मार्ग पर लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर चाटली के पास साकड़ गाँव में यह सेण्टर स्थित है। गाँव की आबादी लगभग दो हजार के आसपास है। यहाँ के लोग खेती-किसानी, पशुपालन व छोटे व्यवसाय से जुड़े हैं। स्कूल में तीन अलग-अलग हिस्सों में चार छोटे-बड़े भवन व कमरे बने हैं। एक कमरे में पुस्तकालय है, एक कमरा कार्यालय-कम-कंप्यूटर कक्ष है। एक हिस्से में रसोईघर बनाया गया है। बाकी कुछ खुले हिस्से का उपयोग खेतीबाड़ी के लिए किया जाता है। पहली से लेकर आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले करीब 110 बच्चे यहाँ रहते हैं, जिसमें 65 लड़के और 45 लड़कियाँ हैं। विभिन्न कक्षाओं को घूमकर देखने पर पता चला कि हर कक्षा में शिक्षक बच्चों के साथ घुलमिल कर उनसे स्थानीय बोली बारेली में चर्चा कर रहे हैं। तीन युवा शिक्षक-शिक्षिकाएँ हैं। एक शिक्षक  अभी बी.एससी. कर रहे हैं, एक शिक्षिका 12वीं पढ़ रही हैं तथा दूसरी शिक्षिका इस स्कूल की पूर्व छात्रा हैं।

आधारशिला दर्शन

सेण्टर शिक्षाशास्त्री पाउलो फ्रेरे के विचारों से प्रभावित है। स्कूल प्रबन्धन से जुड़े साथियों का मानना है कि सामाजिक बदलाव लाने के लिए स्कूल एक अच्छा माध्यम है। लेकिन बदलाव के लिए सिर्फ स्कूलों के भरोसे नहीं रहा जा सकता। दूसरा, केवल किताबें पढ़ लेने से भी परिवर्तन नहीं हो सकता। इसलिए स्कूल ज्ञान प्राप्ति का ऐसा केन्द्र बने जो बच्चों को अपनी सामाजिक परम्परा से विमुख न करते हुए सामाजिक बदलाव के लिए शक्ति का एक स्रोत बन सके। इसके अलावा बच्चों में मूल्यों का विकास करने के लिए सामूहिक श्रम व सामाजिक सक्रियता के माध्यम से उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने का मौका देना इसका प्रमुख लक्ष्य है।

प्रकृति के परिवेश में शिक्षण

स्कूल में न तो कोई गणवेश है और न ही भारी भरकम बस्तों का बोझ। देखने में आया कि बच्चे स्व-अनुशासित ढंग से कक्षाओं में शामिल होते हैं। किसी तरह का हो-हल्ला नहीं सुनाई देता।

छह एकड़ में फैला शिक्षण परिसर प्राकृतिक रूप से समृद्ध है। परिसर में तमाम किस्म के पेड़-पौधों और वनस्पतियाँ हैं। 15 वर्षों में ये बंजर जमीन आज उत्पादक जमीन के रूप में विकसित हो गई है। ये कमाल बच्चों ने अपनी पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ किया। अमित बताते हैं कि, ‘यहाँ करीब 100 विभिन्न प्रजातियों के पेड़-पौधे हैं। कुछ आयुर्वेदिक पौधे भी हैं। साथ ही तरह-तरह के पक्षी एवं तितलियाँ यहाँ की खूबसूरती में चार चाँद लगाते हैं। कुल मिलाकर बच्चों की पाठशाला प्रकृति की गोद में रची-बसी है। इसके सान्निध्य में रहकर बच्चों द्वारा सीखने-समझने की कोशिश की जा रही है।’ शिक्षा का वर्तमान परिदृश्य देखते हैं, तो हम पाते हैं कि आज की शिक्षा प्रकृति से दूर हो गई है। कक्षाएँ भी चारदीवारों से घिरी हैं, वहीं पाठ्यक्रम की सीमाओं में बंधकर शिक्षण की प्रक्रिया चलाई जा रही है। इसके उलट, यहाँ इन बेड़ियों को तोड़कर नवाचारी ढंग से शिक्षण-पद्धतियों को अपनाया गया है। एक ढर्रे की शिक्षा से आजाद होकर, एक खुले वातावरण में बच्चों के साथ सामंजस्य बिठाकर शैक्षिक नवाचार का अध्याय लिखा जा रहा है।

मातृभाषा में शिक्षा

यहाँ शिक्षण की खासियत है कि स्कूली शिक्षा पूर्णतः मातृभाषा में दी जा रही है। बच्चों को ‘बारेली भाषा’ में पठन-पाठन कराया जा रहा है। अपनी घरेलू भाषा की वजह से बच्चे बड़े उत्साह से शिक्षा-प्रक्रियाओं में शामिल होते हैं। मातृभाषा में शिक्षण बच्चे के लिए एक आनन्ददायी अनुभव होता है। जीवन की सच्ची शिक्षा आधारशिला जीवन की सच्ची शिक्षा का एक केन्द्र बना हुआ है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि, ‘बच्चों में समझ विकसित हो, वे स्वयं जानकारी हासिल करें, वे तरीके जानें जिनसे जानकारी प्राप्त की जा सकती है। अनुभव से प्राप्त जानकारी एवं संकलित तथ्यों का विश्लेषण कर सकें और स्वयं निष्कर्ष निकाल सकें। इससे उनकी अवलोकन करने की क्षमता का विकास होगा और उनकी सोचने समझने की क्षमता बढ़ेगी। उनमें मौलिक सोच और स्वयं निर्णय लेने की क्षमता विकसित होगी।’ आधारशिला में एनसीएफ की भावना के अनुरूप बच्चों के शिक्षण का कार्य जीवंत रूप में देखा जा सकता है। यहाँ बच्चों को सीखने और सृजनात्मक अभिव्यक्ति के पूरे अवसर हैं। बच्चों को उनके परिवेश और उनकी घरेलू भाषा में शैक्षिक कार्य मौज-मस्ती और पूर्ण स्वायत्ता के साथ कराया जा रहा है, जिससे उनकी सीखने की दक्षता का स्वतः ही विकास हो रहा है।

सहजता से जानते इतिहास की बारीकियाँ                                               

यहाँ शिक्षण और काम की प्रक्रियाओं को इस तरह गूँथा गया है कि बच्चे खेल, नाटकों, लोकगीतों व लोकनृत्य के माध्यम से स्थानीय इतिहास को अपनी नजर से जानने के साथ समझने की कोशिश करते हैं। स्कूल से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर चाटली और साकड़ गाँव हैं, जहाँ से ये बच्चे आते हैं। कक्षा 6 से 8 वीं तक के बच्चों को हर साल कुछ न कुछ नए प्रोजेक्ट दिए जाते हैं। कुछ बच्चों को ‘स्कूल की जमीन का इतिहास’ जानने का प्रोजेक्ट दिया गया। बच्चे इन कामों को खुशी-खुशी करते हैं। बच्चों ने अपने स्कूल की जमीन का इतिहास खोजते-खोजते अपने पूरे गाँव के इतिहास को समझ लिया। कितने साल पुराना गाँव है? कितने लोग रहते थे? किस प्रकार के पेड़ थे? जैसे कई सवालों से बच्चों ने इतिहास विषय को आसानी से समझने का प्रयास किया और अपनी नजर से पूरे गाँव का इतिहास लिख दिया। बाद में इसे एक पुस्तिका का स्वरूप दिया गया। इसी प्रकार, अन्य बच्चों के समूह ने साकड़ गाँव के नदी-नालों का इतिहास लिखा, तो किसी ने सेंधवा  तालाब के इतिहास को लिखने का प्रयास किया। बच्चों ने बीजों का इतिहास, लोक कथाओं का संकलन जैसी गतिविधियों को अपनी शिक्षण प्रक्रियाओं के हिस्से के रूप में सम्पादित किया, जो कि शिक्षण केन्द्र की विशिष्टता को प्रदर्शित करता है। श्रम कार्य जिसमें नियमित रूप से सफाई, बागवानी, खेती-बाड़ी, रसोई के काम आदि बच्चों द्वारा किए जाना, श्रम की महत्ता को परिभाषित करते हैं।

साहित्य सृजन के अवसर

बच्चों को शिक्षण के दौरान साहित्य सृजन की गतिविधियों से भी जुड़ने का मौका मिलता है। बच्चे स्थानीय लोगों से मिलकर वहाँ की प्रचलित लोककथाओं, लोकगीतों, लोकोक्तियों का संकलन करते हैं। बच्चे सृजनात्मक लेखन, कविताओं, गीतों का संकलन कर भित्ति अखबार, पोस्टर आदि के रूप में इस सामग्री को प्रस्तुत करते हैं। तैयार की गई इस सामग्री का अन्य कक्षाओं के शिक्षण में उपयोग किया जाता है, जिसके द्वारा बच्चे सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश से परिचित होते हैं। गौरतलब है कि बच्चे स्वयं पुस्तकालय का संचालन करते हैं। पुस्तकालय में बैठकर अखबार, पत्रिकाओं एवं किताबों से सामग्री इकट्ठा करते हैं और शिक्षक साथियों के मार्गदर्शन में शीट तैयार करते हैं। पुस्तकालय का कोई वक्त निर्धारित नहीं है। बच्चे अपनी इच्छा से किताबें निकालते और पढ़ते हैं। एकलव्‍य ने हाल ही में केन्‍द्र के बच्‍चों द्वारा अकाल पर रचित कविताओं की एक पुस्‍तिका प्रकाशित की है।

बारेली-हिन्दी शब्दकोष का निर्माण

स्कूल में स्थानीय बारेली बोली और हिन्दी के कुछ शब्दों को शामिल कर एक ‘शब्दकोष’ तैयार करने का प्रयास किया गया है। हिन्दी के हर वर्ण अक्षर के आधार पर इस शब्दकोष को बनाया गया है। ‘‘बारेली-हिन्दी शब्दकोष’’ में आमतौर पर प्रयुक्त किए जाने वाले शब्दों को सम्मिलित किया गया है। लगभग 50-60 पेज की हस्तलिखित बारेली-हिन्दी शब्दकोष में प्रतिवर्ष नए शब्दों को जोड़ कर उसे बढ़ाया जा रहा है।

पर्यावरण अध्ययन

स्कूली पर्यावरणीय अध्ययन के अन्तर्गत स्कूली बच्चों को स्थानीय परिवेश से जोड़ते हुए मौजूदा वनस्पतियों, प्रमुख उपज, बीज, पशु-पक्षियों, मिट्टी, जल संसाधनों आदि की जानकारियाँ प्रोजेक्ट के द्वारा एकत्रित कराई जाती है। बच्चे समूह में जानकारियाँ एकत्रित करते हैं और आपसी ज्ञान को एक-दूसरे के साथ बाँटते हैं। वे अपने परिवेश से रूबरू हो कर अपनी समझ को पुख्ता करते हैं। वे गाँव में घूमकर अलग-अलग प्रकार के बीजों को इकट्ठा करते हैं, उन्हें एक शीट पर चार्ट के रूप में प्रदर्शित करते हैं। बीज की प्रजातियाँ कैसे लुप्त हो रही हैं इस बारे में जानकारियाँ एकत्रित करते हैं।

श्रम आधारित ज्ञानार्जन की प्रक्रिया

बुनियादी कामों की शिक्षा में शारीरिक श्रम ही नहीं अपितु श्रम की हर एक क्रिया में से ज्ञान का निर्माण हो सकता है। इस सिद्धान्त को मानते हुए यहाँ पाठ्यक्रम से हटकर, बच्चों में ज्ञान उड़ेलने के बजाए काम आधारित शिक्षा पर जोर दिया गया है। काम आधारित शिक्षा में निम्नलिखित कामों को शामिल किया गया है-

  • समूह आधारित खेती का काम
  • रसोई बनाना और भोजनशाला की व्यवस्थाएँ
  • नर्सरी और बागवानी
  • गोशाला में गायों की देखरेख और रखरखाव
  • मुर्गीपालन
  • पर्स निर्माण
  • जैविक खेती के साथ जैविक कीटनाशक का निर्माण
  • उन्नत चूल्हों का निर्माण
  • बायो गैस संयंत्र का संचालन और रखरखाव
  • सोलर ऊर्जा के पैनल और सयंत्रों की देखरेख

ग्रामीण परिवेश से जुड़े कामों को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने से यहाँ शिक्षा का जुड़ाव जीवन की शिक्षा के रूप में देखने को मिलता है जिसकी झलक बच्चों के काम के तरीकों और व्यवहार में साफतौर पर देखी जा सकती।


सिद्धार्थ कुमार जैन  (अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन के मध्‍यप्रदेश केन्‍द्र में कार्यरत हैं) का यह लेख ‘शिक्षा की बुनियाद’ जनवरी, 2014 से लिया गया है। यह उसका सम्‍पादित रूप है। लेख के साथ उपयोग किए गए फोटो आधारशिला के फेसबुक पेज तथा शिक्षा की बुनियाद से लिए गए हैं।  

 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

आधारशिला लर्निग सेंटर शिक्षा की जमीनी हकीकत से रूबरू कराता है । शिक्षण की पूरी प्रक्रिया /गतिविधियां बच्‍चों को केन्‍द्र में रख कर रची गई हैं । यहां बच्‍चो को एक अपरिचित भाषा में पढने या यह कहें कि जूझने के कष्‍ट से गुजरना नहीं है , बल्कि यहां उनकी अपनी 'बारेली ' बोली में अभिव्‍यक्ति के अवसर हैं ।इसलिए सीखना बहुत सरल है क्‍योंकि उनका रोना- गाना, रूठना-मनाना,प्रेम- क्रोध ,खेलना-हंसना ,फूल-पत्‍ती,तितली- मेंढक, ताल-नदी, और बहुत कुछ उनकी अपनी बोली में है जिसके साथ उनका सम्‍बन्‍ध हैं । यहां आनन्‍द है,कोमल कल्‍पनायें हैं और माटी की महक भी । यहा मिठास है ,रचने के अवसर है ,यहां लोक बोलता है ।

यहां अर्जित ज्ञान उनका अपना है । उसके साथ उनका अनुभव है ,जुडाव है ,कौतूहल है और खटटी -मीठी यादें भी । कोई बन्‍धन नहीं , बस प्रक्रति की गोद है । मुझे आधारशिला अपनी ओर खींच रहा है ।

santoshsharma169 का छायाचित्र

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