किसी 'खास' की जानकारी भेजें। असर, कुछ असरदार कोशिशों का

यह राजसमन्द जिले का देवगढ़ ब्लाक है। पथरीली पहाडियों और जंगलों के बीच से अपनी फटफटिया को गुजारते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं। हम इस ब्लाक के अंदरूनी हिस्से में पड़ने वाले एक गाँव में स्थित एक सरकारी स्कूल की तरफ जा रहे हैं। जिस सड़क से अभी हम गुजर रहे हैं उसके पास ही धड़-धड़ करता एक क्रशर खदान से निकले पत्थरों को तोड़ रहा है। यह पूरा इलाका उम्दा गुणवत्ता वाले मार्बल,ग्रेनाइट और अभ्रक की खदानों के लिए जाना जाता है। क्रशर के धड़-धड़ की इस आवाज से कुछ दूर पर ही यह छोटा-सा गाँव है। स्कूल की चारदीवारी पर लगा लोहे का फाटक धकेलकर जैसे ही हम भीतर दाखिल हुए, मैदान पर पड़ी चमकदार शीशे की कतरनों ने हमारी आँखों को चौंधिया दिया। मैने झुककर नीचे पड़ी एक कतरन को उठाकर देखा। यह एक काले पत्थर का हिस्सा थी। जरा-सा कुरेदने पर परत-दर-परत उधड़ गई।

स्कूल के शिक्षक मुरारी जी से आज यह मेरी पहली ही मुलाकात है। लेकिन ऐसा लगता है जैसे वे अपने दिल का सारा दर्द आज ही बयान कर डालना चाह रहे हैं। उन्होंने बताया कि पास की खदान से बेशकीमती पत्थर फेल्सफर और अभ्रक निकलता है। यह पत्थर बहुत मँहगा बिकता है। इसकी छँटाई की प्रक्रिया में जो बेकार पत्थर और कचरा निकलता है वह स्कूल के पीछे के जंगलों में ही गिरा दिया जाता है। गाँव के लोग तथा इस स्कूल के बच्चे भी इस कचरे में एक बार फिर छाँट-बीनकर अच्छे पत्थर खोज लाते हैं। यही खदान मालिक 5 रूपया प्रति किलो के हिसाब से सारे पत्थर खरीद लेता है। फाटक से घुसते ही जिस चमकदार चीज पर हमारी नजर पड़ी थी वह इसी अभ्रक के पत्थरों की ही कतरने थीं।

मुरारी जी ने बताया कि यह गाँव बहुत बड़ा नहीं है। हैसियत वाले परिवार जो थे, वो सब शहरों में ही जा बसे हैं। बाकी जो गरीब लोग हैं वो अहमदाबाद या सूरत चले जाते हैं - मजदूरी करने। थोड़ा-सा बड़ा होते ही बच्चों को भी कुछ काम सीखने के लिए वहीं भेज दिया जाता है। इस इलाके में रहने वाले लोगों के बीच एक जुमला बहुत प्रसिद्ध है - पास हो गए तो जिन्दाबाद, फेल हो गए तो आमदाबाद। कुछ छोटी उम्र के बच्चे जो गाँव में बचे रह जाते हैं वही इस सरकारी स्कूल में पढ़ने आते हैं।

मैंने और मेरे साथी शिक्षकों ने पिछले साल घर-घर घूमकर पचास से ऊपर नए नामांकन कर लिए थे। इस साल कुछ बच्चे और बढ़ते पर सब गड़बड़ हो गई - मुरारी जी ने कहा।

‘क्या गडबड हो गई ?’ मैंने पूछा।

क्या बताऊँ सर जी, एक साल पहले तक इस स्कूल में 150 से अधिक संख्या में बच्चे थे। यहाँ पर मुझे मिलाकर कुल चार शिक्षक थे। इस बार गर्मियों में सी.सी.ई. का प्रशिक्षण लेकर हम लोग छुटिटयाँ बिताने अपने-अपने घर चले गए थे। अभी स्कूलों की छुटिटयाँ खत्म भी नहीं हुई थी कि स्टाफिंग पैटर्न की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। हमारे दो साथी शिक्षकों को सेकेन्डरी सेटअप में ले लिया गया। हम दो ही लोग यहाँ बचे रह गए थे।

न जाने कहाँ से गाँव में अफवाह फैल गई कि अब सरकारी स्कूल में तो एक भी मास्टर नहीं रह गया है। स्कूल खुलने पर जब पहले दिन मैं गाँव पहुँचा तो देखा कि मेरे ही स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे एक बोलेरो की खिडकी से झाँकते हुए मुझे टाटा करते हुए जा रहे थे। मालूम किया तो पता चला कि पास के गाँव में एक बड़ा प्राइवेट स्कूल शुरू हो गया है। वे लोग पहले साल किसी भी गरीब परिवार से कोई फीस नहीं ले रहे हैं। उल्टा बोलेरो और बस में बिठाकर घर से स्कूल और स्कूल से घर तक छोड़ भी देते हैं।

शुरू के दो-चार दिन तो हम स्कूल खोलकर इन्‍तजार ही करते रहे। हमें लगा कि पिछले साल तक यहाँ पढ़ रहे सभी बच्चे नए सत्र में भी आएँगे। लेकिन, बहुत कम बच्चे ही इस स्कूल में आ रहे थे। गाँव में जो कुछ बचे खुचे बच्चे थे उनके माँ-बाप भी उन्हें प्राइवेट स्कूल भेजने की तैयारी कर रहे थे। गाँव के लोगों से ही मुझे पता चला कि सरकारी स्कूल में एक भी शिक्षक न होने की अफवाह भी इन्हीं प्राइवेट स्कूल वालों ने ही फैलाई थी।

जुलाई के पूरे महीने मुझे बहुत परेशानी हुई। हम दो शिक्षक ही रह गए थे। पुराने शिक्षक चले गए थे, और अभी तक किसी नए शिक्षक की नियुक्ति नहीं हो पाई थी। लोगों को भी यकीन हो चला था कि इस स्कूल में अब शिक्षक नहीं रह गए हैं। हम लोगों ने गाँव में घूम-घूमकर बच्चों के माँ-बाप से मुलाकात की, उन्हें समझाया बुझाया, तब कहीं जाकर दस-बारह बच्चों ने दोबारा स्कूल आना शुरू किया। ये सब बच्चे गाँव के सबसे गरीब परिवारों से हैं। ज्यादातर दलित और पिछड़ी जातियों के बच्चे ही अब सरकारी स्कूल में आ रहे हैं।

मुरारी जी स्टाफिंग पैटर्न की इस प्रक्रिया से खुश नहीं थे। कहने लगे, ‘सर जी, सरकार को इतनी जल्दी-जल्दी नए-नए प्रयोग नहीं करना चाहिए। सत्र के शुरू में ही स्टाफिंग पैटर्न कर दिया। बहुत से स्कूलों में कई तरह की समस्याएँ पैदा हो गई हैं। कहीं पर तो शिक्षक ही नहीं बचे हैं और कहीं-कहीं पर एक विषय के दो-दो शिक्षक हो गए हैं।

‘तो अभी क्या आप दो लोग ही सारा स्कूल सम्‍भाल रहे हैं’, मैंने पूछा।

नहीं सर, हमने बी.ई.ओ. सर को इस सब हालात के बारे में बताया था। वो एक संवेदनशील अधिकारी हैं। उन्होंने ही दो और शिक्षकों को यहाँ लगाया है। इसी सप्ताह दोनों नए शिक्षकों ने इस स्कूल में ज्वाइन किया है। अब हम फिर से चार लोग हो गए हैं। अब शायद गाँव वालों का भरोसा धीरे-धीरे लौटेगा। हम चारों लोग मिलकर बच्चों को बहुत अच्छा पढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। अन्य विषयों के साथ ही अँग्रेजी की कक्षाओं पर हम लोग खास ध्यान दे रहे हैं। जरूरत पड़ती है तो अतिरिक्त कक्षाएँ  लेकर कोर्स पूरा कराते हैं। मध्याहन भोजन की गुणवत्ता को भी और बेहतर किया है। बच्चों के खेलकूद के लिए नया सामान भी ले आए हैं। इस साल यदि हमारे बच्चों का लेवल अच्छा रहा तो कोई भी बाहर नहीं जाएगा। इस साल हम सभी शिक्षक मिलकर बच्चों के साथ काफी मेहनत कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि इस साल जो बच्चे यहाँ से चले गए हैं उनके माँ-बाप भी अगले साल उनको वापिस यहीं ले आएँगे।

मुरारी जी की आँखों में इस उम्मीद की चमक साफ नजर आ रही थी। ठीक अभ्रक की कतरनों से उठती चमक की तरह ही। मुरारी जी के हाथों में स्कूल के बच्चों के पढ़ने के लिए सचित्र कहानियों की एक पत्रिका ‘चकमक’ की दो प्रतियाँ भेंट देकर हमने उनसे विदा ली।

लौटते समय खदान से उठती क्रशर की कर्कश आवाज एक बार फिर कानों में पड़ रही थी। कुछ लोग पहली दफा की छँटाई के बाद निकले पत्थरों के ढेर पर चढ़कर कुछ खोज रहे थे। वे अभ्रक वाले पत्थरों की खोज में मशगूल थे। अपने पाँच रूपयों के बन्दोबस्त के लिए। ठीक वैसे ही जैसे यह प्राइवेट स्कूल समाज के सबसे वंचित तबके के बच्चों में से भी एक बार फिर से छँटाई करके अपने मुनाफे का रास्ता खोज रहा है। राइट टू एज्यूकेशन एक्ट आ जाने से यह अब और भी आसान हो गया है। इस नए कानून के तहत अब सभी निजी स्कूलों को कुल नए प्रवेश का पच्चीस फीसदी गरीब बच्चों को दाखिला देना होगा। इन सभी बच्चों की शिक्षा पर हुए कुल सालाना खर्च की भरपाई सरकार करेगी। दूर-दराज के इलाकों में चलने वाले निजी स्कूलों की नजर से सोंचे तो ये उनके लिए बहुत अच्छी बात साबित हो सकती है। बोलेरो यूँ ही मुफ्त में थोड़े ही आती-जाती है। इस गाँव के लोगों को अभी ये गणित समझ पाने में शायद वक्त लगेगा।

साल 2016 के सर्वे पर आधारित ‘असर’ की रिपोर्ट यह दावा कर रही है कि राजस्थान में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 6 से 14 साल की उम्र के बच्चों नामांकन बढ़ा है। यही रिपोर्ट यह दावा भी कर रही है कि साल 2014 की तुलना में निजी स्कूलों में जाने वाले बच्चों की संख्या कम हुई है। इन दावों में अगर सच्चाई है तो इसका श्रेय सरकारी प्रयासों को तो जाता ही है, लेकिन इन प्रयासों को जमीन पर लागू करने वाले मुरारी जी और उनके साथियों जैसे हजारों शिक्षकों को भी जाता है। जो अपने स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को मुफ्त की बोलरो में बैठकर निजी स्कूलों की तरफ जाने से रोकने के लिए अपनी ओर से अतिरिक्त प्रयास कर रहे हैं।


प्रस्‍तुति : मोहम्मद उमर,अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन, राजसमन्द, राजस्थान

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