किसी 'खास' की जानकारी भेजें। असफलता बनी जिन्‍दगी की राह |

राजेश बचपन से पढ़ने में अच्छे थे। जन्म के साथ ही माँ-बाप ने उसके सर पर अपनी ख्वाहिशें रख दीं कि बच्चा बड़ा होकर डॉक्टर बनेगा। बिना कुछ सोचे-समझे राजेश डॉक्टर बनने की कोशिश में जुटे रहे। लेकिन सफलता आसपास से होकर गुजरती रही। इस असफलता ने उन्हें आईएएस बनने की ओर मोड़ा। फिलॉसफी और अँग्रेजी में एमए किया और सिविल्स की तैयारी की। चार प्रयास। यहाँ भी सफलता मुँह चिढ़ाकर बगल से निकलती रही। इस बीच कुछ अच्छी कम्‍पनियों में एमआर बनने का मौका मिला। काम अच्छा चल रहा था लेकिन मन खुश नहीं था। आर्थिक संकट तो दूर हो गया था लेकिन कुछ था जो बेचैन किए था।

इसी बीच 2007 में उनका बी.टी.सी. में सलेक्शन हो गया। सरकारी नौकरी से बुलावा आना अब तक समाज में एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर ही देखा जाता है। इतना दबाव था चारों ओर से, घर से, दोस्तों से, समाज से...कि वो इस ट्रेनिंग में बेमन से ही सही लेकिन चले गए।

'जिन्‍दगी ने कभी इतना वक्त ही नहीं दिया कि वो क्या चाहते हैं, यह सोचा जा सके। बस जो सामने आता गया, उसी रास्ते पर चलते गए। ‘मैं यह नहीं कह रहा कि मैं टीचर नहीं बनना चाहता था लेकिन मुझे यह भी नहीं पता था कि मैं टीचर बनना चाहता हूँ।’ सब कुछ जैसे बहुत तकनीकी ढंग से घट रहा था। प्रशिक्षण का माहौल काफी निराशाजनक था। जैसे एक परीक्षा पास करनी है, बस। स्थाई नौकरी का सपना और बेमन से ली और दी जा रही ट्रेनिंग्स। कहीं कोई सामाजिक बदलाव की बात नहीं, बच्चों के प्रति कोई लगाव नहीं, शिक्षा को एक जिम्मेदार शस्त्र के रूप में देखने की बात नहीं। सीलन भरे, उतरते पलस्तर वाले उबाऊ कमरों में होने वाली नीरस सी ट्रेनिंग्स के बाद हम बच्चों को कैसे बेहतर नागरिक बनाने के योग्य बना पाएंगे, मुझे समझ में नहीं आता था। लेकिन मेरे लिए एक बात बहुत अच्छी रही। ज्यादातर ट्रेनिंग्स में होता यह था कि पहले डायट में ट्रेनिंग होती थी, बाद में फील्ड में जाना होता था। लेकिन हमारे साथ उल्टा हुआ। हमें पहले फील्ड में भेजा गया बाद में डायट में।

जब मैं बी.टी.सी.ट्रेनिंग के लिए गया था तो काफी निराश, उदास था। लेकिन बच्चों के बीच जाता तो हर रोज खुद को काफी बेहतर पाता था। मुझे समझ में आ चुका था कि यही था जिसकी तलाश में मन बेचैन था। यह महज एक नौकरी नहीं थी, यहाँ शान्ति मिल रही थी।

वो बताते हैं कि 2007 में मैं पहली बार स्कूल में गया था। मोरी के पास प्राथमिक विद्यालय नितोशा में। स्कूल में दो ही बच्चे उपस्थित थे। दो टीचर्स थे और दो बच्चे। लगा ही नहीं कि यह कोई स्कूल है। पता किया तो जानकारी हुई कि 12 बच्चे ही नामांकित हैं जो अक्सर आते नहीं। मुझे समझ में आ चुका था क्या करना है। जो दो बच्चे थे वही मेरे पहले स्कूल के दोस्त बने और मददगार भी। मैंने उनके साथ खूब सारे खेल खेले, गप्पें मारीं और बहुत मस्ती की। उन्हें अपने बचपन के किस्से सुनाए। अगली सुबह में रोशनी की चमक कुछ ज्यादा थी। स्कूल में दो नहीं चार बच्चे थे। मैं बस मुस्कुरा दिया। उन्होंने बच्चों से किसी भी बारे में कोई पूछताछ नहीं की। वो चारों बच्चों के साथ खेलते रहे, मस्ती करते रहे, शैतानी करते रहे और गप्पें मारते रहे। कागज के हवाई जहाज बनाए, नाव बनाई, फूल बनाए... वो बच्चों से उनके खेत-खलिहान, घर-परिवार, पास-पड़ोस की बातें करते थे। बच्चे खूब खुश। बच्चों ने भी अपने नए वाले सर से खूब गप्पें मारीं। धीरे-धीरे नए वाले सर की ख्याति उन बच्चों तक भी पहुँची जिनका एडमिशन तो था लेकिन वो आते नहीं थे। उन्हें जब पता चला कि कोई नए गुरुजी आए हैं जो बच्चों के साथ बहुत मजे कर रहे हैं तो वो भी स्कूल आने को इच्छुक हो उठे। उनके माँ-बाप उन्हें मना भी करते तो बच्चे उन्हें मनाने लगे। इस तरह एक सप्ताह के अन्‍दर स्कूल में बच्चों की उपस्थिति 100 प्रतिशत हो गई। राजेश खुश थे। साथी टीचर्स को समझ में नहीं आ रहा था कि ये कैसा टीचर है जो पढ़ाता-वढ़ाता तो है नहीं लेकिन बच्चे इसके दीवाने हुए जा रहे हैं। धीरे-धीरे स्कूल में बच्चों का नामांकन भी बढ़ने लगा और उपस्थिति भी।

कोई बच्चा बताता कि उसके पापा को बुखार है तो राजेश के पास एमआर होने का अनुभव और दवाइयाँ काम आतीं। उनकी दवाइयाँ उन्हें समुदाय से जोड़ रही थीं। उनके पिता ने उन्हें भले ही डॉक्टर बनते नहीं देखा लेकिन समुदाय के लोगों को ‘डॉक्टर गुरुजी’ मिल गए थे। राजेश बच्चों के घर जाते, बच्चों के माता-पिता से मिलते, हाल-चाल लेते। आसपास के लोगों से भी बातचीत करते। स्कूल आने के बारे में कोई बात नहीं करते थे। उनके खेत-खलिहान की बातचीत, हालचाल बस यही। आसपास काफी सकारात्मक माहौल बनने लगा था। कम्युनिटी के लोगों को राजेश पर बहुत भरोसा हो गया था। उनके लिए स्कूल का अर्थ राजेश गुरुजी ही हो गया था।

राजेश ने बच्चों को, उनके सामाजिक परिवेश को, उनकी उस मनोदशा को जिसमें वो पढ़ने आते हैं समझने का प्रयास किया। उन्हें महसूस हुआ कि बिना एक ताल पे आए सुर लगेगा कैसे। तो पहले वो बच्चों से बातचीत करते। उनके जंगल, उनके जानवर, उनके खेत, उनकी पसन्‍द के खाने के बारे में बात करते और उन बातों को पाठ्यपुस्तकों से जोड़ते। बच्चों को बड़ा मजा आता।

वो बताते हैं कि मुझे अगर बच्चों को पेड़ पौधों के बारे में बताना होता तो मैं उन्हें पेड़ पौधों के पास ले जाता। उनकी पत्तियों को चुनता, पौधों के आसपास बच्चों के साथ खेलता फिर उसके बारे में बातें करता जो कोर्स की किताब में दर्ज सामग्री से मिलती जुलती होतीं। बच्चे जब किताब खोलते तो चहक उठते, ‘गुर जी जु तुमुन बते छो तू ई यख लिखूं च...’

राजेश को बच्चों के साथ खेलते हुए, पढ़ाते हुए बहुत मजा आने लगा था। वो रोज कुछ नया करने की फिराक में रहने लगे। कभी वो बच्चों के बीच में जाकर बैठ जाते और क्लास का कोई बच्चा या बच्ची टीचर बन जाता। तब राजेश हाथ उठाकर सवाल भी पूछते। कुछ बच्चे जो ज्यादा शर्मीले या संकोची होते उनके साथ वो ज्यादा वक्त बिताते, कुछ बच्चों के घर का माहौल बहुत सकारात्मक नहीं होता है तो उन बच्चों के साथ घर के लोगों की भूमिका को भी निभाना होता। बच्चों को भावनात्मक रूप से स्कूल से अपने आप से जोड़ने को राजेश ने पढ़ने-पढ़ाने से ज्यादा ध्यान दिया। वो कहते हैं कि मैंने महसूस किया कि बच्चों के साथ बैठकर जब खाना खाता था तो बच्चे शुरू में बड़ी हैरत से देखते थे...लेकिन सच कहूँ किसी का दिल जीतने के लिए छोटी-छोटी बातें ही महत्व की होती हैं। बच्चों की निश्छल, मासूम मुस्कान ने तो मेरा दिल जीत ही लिया था, अब मुझे उनका दिल जीतना था।

राजेश बेहद भावुक होकर एक अनुभव साझा करते हैं। एक बार एक बच्चा मेरे करीब आया। उसने कभी पेंसिल भी नहीं पकड़ी थी और उसे सीखने की बहुत जल्दी थी। वो बोलता कम था बस आकर कॉपी पेंसिल लेकर खड़ा हो जाता था। मेरी बाँह पकड़कर खड़ा हो जाता था। मैंने उसकी कॉपी में गोले बनाकर दिए और कहा कि ऐसे बनाकर लाओ। दो मिनट में वो फिर आ गया। गोले बनाकर...फिर मैंने तिकोने बनाकर दिए...वो झट बना लाया...उसके सीखने की गति और उत्साह दोनों ने मुझे अचम्‍भित किया। राजेश बताते हैं कि ये वही बच्चा था जो पहले स्कूल ही आने को तैयार नहीं था।

एक शिक्षक का काम सिर्फ पढ़ने-पढ़ाने का नहीं बल्कि सम्‍पूर्ण व्यक्तित्व के निर्माण का होता है। सामाजिक भेद, जाति, वर्ग, लिंग, ऊँच-नीच की दीवारों को गिराने का पहला काम स्कूल में ही होता है। राजेश कहते हैं, बच्चों में कोई भेदभाव नहीं होता। भेदभाव की दीवारें तो माँ-बाप और समाज खड़ी करता है। बच्चे जब स्कूल आते हैं तो उन्हें ध्यान होता है कि कौन ऊँची जाति का है, कौन नीची जाति का...लेकिन जैसे ही वो फुटबॉल, क्रिकेट, कैरम या खो-खो वगैरह खेल रहे होते हैं तो वो सब भूल जाते हैं। बच्चों के भीतर के सारे भेद स्कूल में टूट जाने चाहिए...इस कदर टूट जाने चाहिए कि दोबारा उन पर समाज का दबाव भी असर न कर सके। लेकिन इसके लिए एक शिक्षक का भी पक्षपात रहित व्यवहार जरूरी है। राजेश पूरी कोशिश करते हैं कि बच्चों को स्वस्थ व्यक्तित्व बना सकें।

यह अनुभव उन पाँच महीनों के हैं जो राजेश को बी.टी.सी. ट्रेनिंग के दौरान हुए। जिनके चलते उन्हें पहले फील्ड में जाना था, बाद में डायट में। हँसते-खेलते, मुस्कुराते बच्चों को अपना बनाते हुए राजेश इस कदर खुश और तल्लीन हो गए थे कि उन्हें ख्याल ही नहीं रहा कि इन खुशियों को एक रोज थमना होगा। हालाँकि एक बैच पास हो चुका था...फिर भी बच्चों से बिछड़ने का दुःख तो था ही। जिन बच्चों को पास होने के बाद स्कूल छोड़ना था वो राजेश के पास आए और बोले, ‘गुरूजी हम फिर से इसी

क्लास में पढ़ेंगे लेकिन आपको छोड़कर नहीं जाएँगे...’ उन्होंने भारी मन से स्कूल छोड़ा इस उम्मीद के साथ कि ट्रेनिंग के बाद वापस यहीं फिर से यहीं आएँगे। हालाँकि उन्हें बाद में यह स्कूल नहीं मिला। लेकिन वो बच्चों से मिलने के लिए बीच-बीच में स्कूल जाते रहे।

इसके बाद उनकी बची हुई औपचारिक ट्रेनिंग जो डायट में होनी थी वो भी पूरी हो गई हालाँकि जो बच्चों के साथ सीखा राजेश उसे ही अपनी असल ट्रेनिंग मानते हैं।

2 फरवरी 2009 को राजेश की पहली पोस्टिंग प्राथमिक विद्यालय उडरी ब्लॉक डुंडा के स्कूल में हुई। यह जगह उत्तरकाशी से 45 किमी की दूरी पर है। स्कूल तक जाने के लिए 4 किमी की खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। इसे पार करने में करीब एक घण्‍टे का समय लगता है। जब उन्होंने यहाँ ज्वॉइन किया था, तो यहाँ 152 बच्चे थे। प्रधानाध्यापक खुशपाल जी, सहायक अध्यापक कन्हैया प्रसाद सेमवाल। और तीन भोजनमाताएँ।

राजेश बताते हैं कि यह स्कूल मेरे जीवन की रणभूमि है। अपनी ट्रेनिंग के दौरान प्राथमिक विद्यालय नितोशा के बच्चों से जो सीखा था, वो सीख और उत्साह लिए मैं स्कूल में दाखिल हुआ। वो दिन है और आज का दिन है। चार किमी की चढ़ाई मेरी आदत बन चुकी है। कब पूरी होती है पता भी नहीं चलता।

पहली चुनौती होती है बच्चों का व्यवहार, बोलने का तरीका। जिस माहौल से ये बच्चे आते हैं उसको अगर ध्यान से देखें तो उनका स्कूल तक आना ही बहुत बड़ी बात है। ऐसे में उनसे किसी तरह की अपेक्षा रखना उनके प्रति असंवेदनशील होने जैसा ही लगता है। उपेक्षाओं के वो आदी होते हैं। लेकिन जब बच्चों को सम्मान और गरिमा के साथ देखा जाता है तो वे अन्‍दर से अच्छा महसूस करते हैं। सामाजिक भेदभाव की पर्तें अपने आप गिरने लगती हैं। सब बच्चों को बराबर के मौके देना, जो बच्चे थोड़ा धीरे सीखते हैं, उन्हें ज्यादा वक्त देना और उनमें आत्मविश्वास भरना। कम अच्छा काम या खराब काम के लिए टोकने की बजाय उनकी अच्छाइयों पर बात करने की तकनीक राजेश को ज्यादा जँची।

वो बच्चों से उनकी भाषा में बात करते थे, वो कहते हैं कि ‘जब मैं उनसे गढ़वाली में बात करता तो वे बहुत खुश होते। संकोच, भय और असफल होने का डर मन से निकालना पहली चुनौती थी। जब तक मेरा एक भी बच्चा चिहुँककर हँसने से वंचित है मेरा उस स्कूल में होना सफल नहीं था। मैं स्कूल से घर जाता तो भी सोचता रहता कि क्या दिक्कत होगी उस बच्चे के साथ। उसके घर जाता। आसपास के माहौल को समझने की कोशिश करता।’

राजेश के लिए पहली पीढ़ी के बच्चों को स्कूल लाना और उन्हें स्कूल से जोड़े रखना आसान नहीं था। कई बार निराशा उन्हें घेरती लेकिन जल्दी ही बच्चों की मुस्कुराहटें उन्हें निराशा से बाहर खींच लेती। राजेश को बच्चों का ही नहीं, समुदाय का भी भरपूर प्यार, सहयोग मिला। गुरुजी पर सबको बेहद स्नेह है। कोई प्यार से उनके लिए मट्ठा लेकर आता कोई खास तरह की चटनी बनाकर लाता। राजेश बच्चों के साथ ही बैठकर खाना खाते हैं। वो बच्चों के सबसे अच्छे दोस्त हैं। एक दिन भी वो स्कूल न आएँ तो बच्चे परेशान हो जाते हैं और राजेश का भी अपने बच्चों के बिना मन नहीं लगता।

उनकी पत्नी मंजू बताती हैं कि, ‘वो कहीं बाहर काम से जाते हैं तो भी कभी कोई खिलौना, कोई मिठाई स्कूल के बच्चों के लिए जरूर खरीदते हैं। कई बार मैं उनसे कहती हूँ कि तुम तो अपने बच्चों से भी ज्यादा स्कूल के बच्चों को प्यार करते हो, तो वो हँसकर जवाब देते हैं कि मेरे दो बच्चों श्रेयस और वेदान्‍त के पास तो तुम हो ख्याल रखने को, लेकिन उन बच्चों के पास तो मैं ही हूँ। वो तो कभी उड़ने वाले जहाज, स्पाइडरमैन या रोबोट जैसे खिलौने नहीं देख पाएँगे।’

राजेश के पास हमेशा कुछ टॉफियाँ, कुछ स्टिकर, कुछ खिलौने होते हैं। वो बच्चों की कॉपियों में सुन्दर स्टिकर लगाकर उन्हें शाबासी देते हैं। टॉफियाँ उनके टास्क का ईनाम होती हैं। साथ ही वो इस बात का भी ख्याल रखते हैं कि यह सब बच्चों का उत्साह तो बढ़े लेकिन उनमें प्रतिस्पर्धा न पनपे। उन्होंने इस बात की शिकायत नहीं की कि बच्चे घर से पढ़कर नहीं आते। वो जानते हैं कि जिन हालात से बच्चे निकलकर आ रहे हैं, उनमें उनका स्कूल तक आना ही बहुत है। वो बच्चों को अपने घर के हालात बदलने के लिए तैयार करते हैं। वो कहते हैं कि ‘मैं बच्चों को इतना सक्षम बनाना चाहता हूँ कि वे अपने घर का माहौल खुद बदल सकें।’

राजेश ने स्कूल में तीन हाउस बना रखे हैं। हरा, केसरिया और सफेद। हर हाउस के बच्चे अपने हाउस के रंग के रिबन लगाते हैं। लड़कियाँ बालों में लगाती हैं तो लड़के हाथ में बाँधते हैं। जब सारे हाउस इकट्ठे होते हैं तो बहुत सुन्‍दर नजारा होता है। एक हाउस दूसरे हाउस के बारे में जानकारी इकट्ठा करता है। बच्चे ही दूसरे बच्चों का काम देखते हैं। एक बच्चा अग्रणी भूमिका में आता है यह देखने को सारे हाउस ठीक से काम कर रहे हैं या नहीं। जिम्मेदारियों का ठीक से बँटवारा और उन्हें पूरा करने की होड़ बच्चों को अपने कामों के प्रति उत्तरदायित्व से भरती है।

कूदने वाली रस्सी, बैडमिंटन, फुटबॉल, शतरंज, लूडो जैसे खिलौने राजेश ने स्कूल में जमा किए हैं। स्पोर्ट्स क्लब बना रखा है। बच्चे खुद इसकी जिम्मेदारी लेते हैं।

उन्होंने स्कूल में बच्चों की बाल सरकार भी बनाई है। इस सरकार में प्रधानमंत्री से लेकर, स्वास्थ्य मंत्री, सांस्कृतिक मंत्री, व्यवस्था मंत्री, तक सब होते हैं। प्रधानमंत्री स्कूल की सारी गतिविधियों पर नजर रखता है। स्वास्थ्य मंत्री बच्चों के नाखून कटे हैं कि नहीं, ड्रेस साफ है या नहीं, बाल ठीक से बने हैं कि नहीं, बच्चे नहा के आए कि नहीं इन बातों का ध्यान रखता है। सांस्कृतिक मंत्री प्रार्थना सभा का ध्यान रखता है। इसके अलावा भोजन मंत्र, गीत वगैरह करावाना भी उसका काम है। व्यवस्था मंत्री बच्चों के छूटे हुए सामान, खोए हुए सामान को देखता है। स्कूल में एक रैपिड एक्शन फोर्स भी है जो दरी बिछाना, दरी उठाना, फटे हुए कागज को, फैले हुए सामान को व्यवस्थित करता है। किसी भी बच्चे को कोई दिक्कत होती है तो रैपिड एक्शन फोर्स उसकी मदद करता है। धीरे-धीरे स्कूल के हर काम की जिम्मेदारी बच्चों ने ले ली है। राजेश बच्चों के दोस्त बन चुके हैं। वो दूर से सारे कामों को होते हुए देखते हैं और मुस्कुराते हैं।

राजेश कहते हैं कि शिक्षक बच्चों को सिर्फ सिखाने के लिए नहीं होता बल्कि सीखने के लिए भी होता है। बच्चों के खजाने में बहुत सारी जानकारियाँ होती हैं। वो हमें बहुत कुछ सिखाते हैं। राजेश ने बच्चों को चिट्ठी और डायरी लिखना सिखाया है। वो कहते हैं चिट्ठी और डायरी लिखने के चलते मैंने समझा कि बच्चों की वो हिचक टूटती है। वो बेहिचक होकर गलतियाँ करते हैं। गलती को माफ करना तो अलग बात है मैं अपने बच्चों को गलती करने की भी आजादी देता हूँ। बल्कि उन्हें उत्साहित करता हूँ कि गलती करो इससे उनके मन से गलत हो जाने का, गलत बोल जाने का भय जाता रहता है। उसी के बाद सही की शुरुआत होती है।’

बच्चों के साथ इस प्यार भरे सफर की शुरुआत राजेश के लिए बहुत आसान नहीं थी। बहुत आलोचनाएँ सुननी पड़ती थीं। ‘ये दुनिया बदलने आए हैं।’ ‘अब तो सब बदलकर ही मानेंगे जैसे ताने सुनने पड़ते थे।’ घर पर भी सवाल होते थे कि सारी दुनिया को बदलने का ठेका क्या तुमने ही ले रखा है। और मैं यही जवाब देता हूँ कि मैंने कब कहा कि मैं दुनिया बदलने आया हूँ। यह दुनिया तो पहले से ही खूबसूरत है। मैं तो खुद इस दुनिया से अपने लिए कुछ खुशियों के पल, कुछ सुकून लेने आया हूँ।

इसी अच्छा लगने को जीने के लिए राजेश उठकर चल देते हैं। थोड़ी ही देर में उनके क्लास से बच्चों की सामूहिक आवाज राजेश गुरुजी की कविताओं में डूबने-उतराने लगती है। वो कविताएँ जिन्हें राजेश ने कक्षा में बच्चों के साथ मिलकर लिखा है...

चाचा चाचा रामभरोसे,

मुझे खिलाओ गरम समोसे

ठण्‍डी चाय नहीं पियूँगा,

न खाऊँगा इडली डोसे..


(राजेश जोशी से प्रतिभा कटियार की बातचीत पर आधारित : अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन,देहरादून द्वारा प्रकाशित ‘उम्‍मीद जगाते शिक्षक’ से साभार।

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pramodkumar का छायाचित्र

राजेश उम्मीद जगाते हैं उस व्यवस्था के प्रति जिससे लोग लगभग निराश हो चुके हैं । यह भी विश्वास दिलाते हैं कि बचे हुए को सहेजा जाये तो बात बन सकती है । एक खास बात ‚ बच्चों के प्रति अपनापन उन्हे न केवल बच्चों से जोडता है बल्कि समुदाय के करीब भी लाता है ।कह सकता हूँ कि राजेश जी शिैक्षिक पहरूआ हैं ।  

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