किसी 'खास' की जानकारी भेजें। अमिता वर्मा की ‘बुलावा टोली’

अपने सहयोगी साथी के साथ शिक्षा की वर्तमान दशा पर चर्चा करते हुए हमारी गाड़ी सरपट दौड़ती हुई नौबस्ता कला गाँव की ओर जा रही थी। चर्चा का विषय था कि क्या हमारी सरकार वास्तविकता में शिक्षा के महत्व को समझ रही है, क्या वास्तव में उस तबके को शिक्षित करना चाहती है जो आज तक शिक्षा से वंचित थे। चर्चा के साथ ही साथ हम अपनी मंजिल के करीब पहुंचते जा रहे थे। ड्राईवर शहर में नया था इस कारण उसे सही रास्ते का पता नहीं था। बीच-बीच में गाँव का नाम पूछता जा रहा था। अब लगता है कि हम सही रास्ते पर हैं, सड़क के दोनों तरफ खेतों में हरियाली, खेतों में लगे सरसों के फूल ऐसे लग रहे थे मानों दूर तक किसी ने पीली चादर बिछाई हो। इन्हीं सुंदर रास्ते से गुजरते हुए हम प्राथमिक विद्यालय नौबस्ता कला, लखनऊ पहुँच गए। स्कूल के सामने गाड़ी रुकी, हम स्कूल के गेट पर जाकर खड़े हुए मगर कोई भी गेट खोलने नही आया। गेट के अन्‍दर नज़र गई तो देखा बच्चे अपने खेल में मशगूल थे शिक्षक भी उन्हीं के साथ व्यस्त थे। बच्चों के पकड़ो-पकड़ो और हँसी की आवाज सहज रूप से कानों को सुकून दे रही थी। इसी बीच एक शिक्षक की नजर हम पर पड़ी और एक बच्चे ने शिक्षक के इशारे पर गेट खोला और हमें अन्‍दर आने के लिए कहा।

गेट के अन्‍दर आते ही मैं प्रधानाध्यापक कक्ष की ओर बढ़ने लगी तभी शिक्षक ने एक कक्षा की तरफ इशारा किया। मैं उस कक्ष की ओर बढ़ गई। बच्चों की उम्र से मैंने अन्‍दाजा लगाया कि यह पहली और दूसरी कक्षा के विद्यार्थी हैं। शिक्षिका ने जैसे ही हमें देखा एक सुन्‍दर सी मुस्कान के साथ हमारा स्वागत किया। डॉ. अमिता वर्मा प्राथमिक विद्यालय नौबस्ता कला में प्रधानाध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं। सोशल वर्क में पी.एच.डी अमिता पिछले 10 वर्षो से शिक्षिका के रूप में कार्य कर रही हैं। वर्तमान स्कूल में 5 वर्षो से कार्यरत हैं ।  

मैं अमिता से पिछले 1 वर्ष में चेंजमेकर नेटवर्क मीटिंग्स में कई बार मिल चुकी हूँ लेकिन कभी भी इनके स्कूल आने का मौका नही मिला। इनके व्यक्तित्व में जो सादगी,बातों में जो ईमानदारी और आँखों में जो सच्चाई दिखती थी वही सब इनके स्कूल में भी देखने को मिली। बातों-बातों में जानने को मिला इस वर्ष अमिता ने अपनी एक भी सी.एल. (कैजुअल लीव) नहीं ली। मेरे साथी आशुतोष को इनके नवाचार के बारे में जानने की इच्छा थी सो उन्होंने अमिता से उनके नवाचार के बारे में पूछा।  

इनके नवाचार का नाम “बुलावा टोली“ है। हर सरकारी स्कूल में बच्चों की उपस्थिति और नियमितता एक बड़ी समस्या है। कुछ वर्षों पहले अमिता के स्कूल में भी यही समस्या थी। इसके समाधान के लिए इस शिक्षिका ने किसी अधिकारी की तरफ नहीं देखा न ही इन बच्चों के माता-पिता को दोषी ठहराया। अमिता ने हर कक्षा के 2 या 3 बच्चों को जो नियमित आते थे उन्हें एक टोली के रूप में देखा। उन्‍हें ‘बुलावा टोली’ का नाम दिया। उन्‍हें यह जिम्मेदारी दी कि सुबह असेंबली और उपस्थिति के बाद यह पता लगने पर कि कौन बच्चा स्कूल नहीं आया है, बुलावा टोली उसके घर जाए और उन्हें बुला कर लाए। टोली जाती और बच्‍चे को लेकर आती थी। जिस बच्चे को स्‍कूल आने में वास्तव में कोई समस्या होती थी, तो टोली इसकी जानकारी भी शिक्षिका को देती थी। हर सप्ताह बुलावा टोली के बच्चे बदल दिए जाते थे जिससे 2 या 3 बच्चों पर ही ये जिम्मेदारी न हो। बुलावा टोली के ये बच्चे, अनुपस्थिति बच्चों के अभिभावकों को भी स्कूल आने के लाभ के बारे में भी समझाते थे। धीरे-धीरे अमिता के इस प्रयास से बच्चों की उपस्थिति और नियमितता बढ़ने लगी। आज स्कूल में 148 बच्चे नामांकित हैं इनमें से 142 बच्चे नियमित रूप से उपस्थित रहते हैं ।

अमिता हमें बुलावा टोली के बारे में समझा रही थीं। इसी बीच दो बच्चे आसिफ और सलमान बिना किसी डर और झिझक के अमिता के पास आकर बोले कि मैम हमें घर जाना है, क्यूंकि हमारे माता-पिता जंगल में लकड़ी लेने जाएँगे, तो हमें अपने छोटे भाई बहनों को देखना पड़ेगा। अमिता ने उन्हें प्यार से समझा कर मना कर दिया। लेकिन अमिता के चेहरे से पता चल रहा था कि वे खुश नहीं हैं। चेहरे पर  उदासी साफ दिख रही थी। पूछने पर उन्होंने बताया कि उनके विद्यालय के बहुत से बच्चे चाहते हुए भी पढ़ नहीं पा रहे हैं। वो प्रतिदिन विद्यालय आना चाहते हैं लेकिन घर की रोजी-रोटी के लिए उन्हें अपने माता-पिता का हाथ बटाना पड़ता है।

अमिता ने बताया कि कई बच्चों के माता-पिता गाँव में लगने वाले बाजार में सब्जी बेचते हैं, अधिकतर बच्चे भी अपने अभिभावकों के साथ जाते थे जिससे वो स्कूल नहीं आ सकते थे। बच्चे शर्म और झिझक के कारण अपनी शिक्षिका से अपनी ये समस्या नहीं बता पाते थे। एक दिन अमिता को यह बात पता चली वो स्वयं उसी बाजार में सब्जी लेने गईं, जहाँ उनके स्कूल के बहुत से बच्चे थे। अमिता ने मुस्कुरा कर बच्चों से बात की और उनके माता-पिता को समझाया कि स्कूल के समय इन्हें स्कूल भेजें उसके बाद ये आप लोगों का हाथ बटाएँ, इस पर कोई एतराज नही है। लेकिन इन्हें स्कूल जरूर भेजें। धीरे-धीरे स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। अमिता के अनुसार कई लड़कियाँ जो सब्जी बेचा करती थीं आज इस स्कूल से निकलकर आगे की पढ़ाई कर रही हैं।  

बातों ही बातों में मेरी नजर ब्लैकबोर्ड पर बने दो इस्माइली (हँसते हुए चेहरे) पर पड़ी। मैंने जिज्ञासा के साथ पूछा ये क्या है, अमिता ने बताया कि वो कक्षा शुरू करने से पहले बोर्ड पर दो हँसते चेहरे बनाती हैं और कहती है हम सब भी यूँ ही हँसते रहेंगे। लेकिन किसी ने भी यदि कोई बदमाशी की और पढ़ने पर ध्यान नहीं दिया तो एक हँसता हुआ चेहरा रोता हुआ कर दिया जाएगा। अब बच्चे दोनों चेहरे हँसते हुए रखने के लिए पूरा मन पढ़ाई में लगाते हैं।

इतनी बातें सुनने के बाद बच्चों से मिलने की मेरी उत्‍सुकता बढ़ती जा रही थी। सबसे पहले मैंने पाँचवी कक्षा उसके बाद चौथी, तीसरी और अन्‍त में पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों से बातचीत की। जहाँ बच्चों ने मेरे द्वारा पूछे कई सवालों के जवाब दिए और साथ ही ढेर सारी कहानी और कविताएँ भी सुनाईं। बच्चों से बातचीत के दौरान ये भी पता चला की बच्चों का सीखने का स्तर भी काफी अच्छा है।

अमिता के आत्मविश्वास और प्रयासों ने मुझे यह दिलासा दिया कि ऐसे शिक्षक ही वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ ही हड्डी हैं। इनके प्रयासों से ही उस तबके के बच्चे भी शिक्षित होंगे जो आज तक शिक्षा से वंचित थे।

टिप्पणियाँ

aditya-abhinavi का छायाचित्र

सराहनीय प्रयास ।

raniarchana का छायाचित्र

आपका प्रयास बहुत ही सराहनीय हैं

hansraj3805 का छायाचित्र

very great achievement.

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