किसी 'खास' की जानकारी भेजें। अनुसुइया देवी जैन : रिश्‍ते बनाना भी कला है

कांकेर से करीब 5 किलोमीटर दूर स्थित मोदी मोटवाड़ा गाँव के प्राथमिक स्कूल में पहुँचे तो हमारा स्वागत माथे पर टीका लगाकर किया गया। उसी समय स्कूल में एक बुजुर्ग का आगमन हुआ। स्कूल कि प्रभारी प्रधान शिक्षिका अनुसुइया देवी जैन ने उनके पैर छूकर अभिवादन किया। उनकी तबीयत के बारे में जानकारी ली। आने का कारण पूछा और हमसे उनका परिचय भी करवाया। उनके जाने के बाद बताया कि, यह गाँव के एक बुजुर्ग हैं और हम इन्हें बड़े बाबा कहकर पुकारते हैं।

1973 में स्थापित इस स्कूल में अनुसुइया देवी 2008 से पदस्थ हैं। यहाँ फिलहाल 42 छात्र-छात्राएँ हैं। 3 शिक्षक हैं। अनुसुइया देवी नियमित हैं जबकि अन्य 2 शिक्षिका शिक्षाकर्मी हैं। दीवार पर गाँव की आबादी के बारे में जानकारी लिखी थी। गाँव की कुल आबादी 464 है। गाँव में कुल 85 घर हैं। इनमें आदिवासियों की तादाद 241, अनुसूचित जाति 33, पिछड़ा वर्ग 164 और अन्य 16 हैं। कुल 235 महिला और 231 पुरुष हैं।

उन्होंने बताया कि, ‘यहाँ ज्‍यादातर ग्रामीण; गरीब किसान, खेतिहर मजदूर और दिहाड़ी मजदूर हैं। जब मैं इस स्कूल में आई तब यहाँ 37 बच्चे आते थे। स्कूल का समुदाय के साथ कोई समन्‍वय नहीं था। गाँव वाले भी स्कूल के मामले में सहयोग नहीं करते थे और हमसे मिलते-जुलते भी नहीं थे। जाहिर है जब पालक ही जागरूक नहीं हैं तब बच्चों की शिक्षा को लेकर वे कितने सजग होंगे। तो मैंने भी ठान लिया कि जब तक गाँव वालों को स्कूल से जोड़ नहीं लूँगी, तब तक चैन से नहीं बैठूँगी।

स्कूल बिल्डिंग और कैम्पस भी ठीक नहीं था। साफ सफाई करवाई, फिर अपना पैसा खर्च करके शाला की  दीवारों में कुछ शैक्षिक चित्र बनवाए और ग्रामीणों और खासकर महिलाओं को स्कूल की ओर आकर्षित किया। पहले महिलाएँ हमारे स्कूल के पास नल में पानी लेने आती थीं, तो वे स्कूल की तरफ देखती भी नहीं थीं। लेकिन पेटिंग ने उनका ध्‍यान खींचा। मैंने मौका देखकर उन्हें स्कूल के अन्‍दर बुलाना शुरू किया। उनकी झिझक तोड़ी और कहा कि यह आपका स्कूल है, ये सब आपके बच्चे हैं आप सबको आना चाहिए।

तब उन महिलाओं ने कहा, ‘मेडम पहले स्कूल अच्छा नई दिखत रिहिस, हमन ल कभु कोई बुलाइस भी नहीं , अब स्कूल बढ़िया दिखथे।’ फिर 26 जनवरी यानि गणतन्त्र दिवस आया। हमने योजना बनाई, इस दिन गाँव के सभी लोगों को स्कूल बुलाएँगे और उन्हें सम्मानित करेंगे। गणतंत्र दिवस में गाँव के सभी ग्रामीणों के घर जाकर आने का न्योता दिया। बहुत सारे लोग आए जिनमें महिलाएँ भी शामिल थीं । हमने उन सबको इस दिवस के महत्व के बारे में बताया और सम्मानित किया। सबके माथे पर टीका लगाया, बड़ों के पैर छुए। छोटों ने हमारे पैर छुए।  इस तरह से एक नए रिश्ते की शुरुआत हुई। दरअसल पैर छूकर अभिवादन करना गाँव की परम्परा है, इसे अपनाने से गाँव वाले बड़ी ही सहजता से जुड़ गए।’  

इस बातचीत के बीच एक युवक ने अनुसुइया जी के पैर छूकर अभिवादन किया। अनुसुइया जी ने हमसे परिचित करवाया। बताया कि ये और इनके साथी गर्मी के छुट्टी के दौरान भी स्कूल के बगीचे में पानी देने आते रहते हैं, यही वजह है कि हमारे स्कूल का बगीचा खिला हुआ है। युवक ने बताया कि,  ‘अनुसुइया दीदी के प्रयास से स्कूल में काफी सुधार आया है। उनके आने के बाद स्‍कूल के बच्चे काफी तेज हो गए हैं। स्कूल का माहौल अच्छा हुआ है और हम लोगों को भी स्कूल आना अच्छा लगता है।’  

हमने पूछा, ‘पढ़ाई-लिखाई का स्‍तर ठीक करने के लिए आपने क्‍या किया? ’  

उन्होंने बताया, ‘इसके लिए अतिरिक्त समय दिया। शिक्षा के अधिकार यानी आरटीई के तहत स्कूल में 10 बजे आना तय हुआ है। पर मैं तो शुरू से 10 बजे आती हूँ और 5 बजे जाती हूँ। हमारे साथी शिक्षक भी काफी मेहनत करते हैं। पहले पालकों में शिक्षा के प्रति जागरूकता नहीं थी। हमने पालकों के साथ बैठक की। उनसे कहा कि आप सब यह आदत बनाइये कि अपने बच्चों को एक घण्टा समय जरूर देंगे। पंचायत भवन में नव-प्रभात केन्द्र खोले, जहाँ हर रोज शाम को पालक अपने बच्चों को लेकर आते हैं। वहाँ स्कूल प्रबन्धन कमेटी के सदस्य बच्चों को पढ़ाने में मदद करते हैं। जो पालक बिलकुल पढ़े-लिखे नहीं हैं वह भी अपने बच्चों के साथ आते हैं और बच्चों को पढ़ते हुए देखते हैं। अब पालक भी काफी उत्साहित लगते हैं। उनमें अपने बच्चों के पढ़ाई को लेकर एक जिम्मेदारी की भावना दिखाई देती है। गाँव वालों का कहना था कि उन्हें यह अहसास पहले कभी किसी ने कराया ही नहीं।’ अनुसुइया जी पूरे आत्मविश्वास के साथ कहती हैं,‘ इन बच्चों को 15 साल बाद देखिएगा ये क्या से क्या करके दिखाएँगे ।’ 

उनके इस आत्मविश्वास के पीछे गाँव वालों का भी साथ दिखाई देता है। रामकुमार कुलदीप जो एक कृषि मजदूर हैं, कहते हैं, ‘दीदी के बारे में जितना बोलें उतना कम है। स्कूल के प्रति उनका जो लगाव है वह बहुत है। उन्होंने अपना काफी समय दिया है और देती हैं। हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि हमारे स्कूल में एक ऐसी शिक्षिका आएँगी।’

अभी हमारी बात चल ही रही थी एक महिला आती दिखाई दी। अनुसुइया जी उठकर सामने वाले क्लास रूम गईं और करीब दो साल के एक बच्चे को गोद में लेकर बाहर आईं। महिला पहले अनुसुइया जी को और फिर बच्चे को देखकर मुस्कराई। फिर बच्चे को गोद में लेकर चली गई।

तब मुझे याद आया कि अनुसुइया जी एक क्लास में बच्चों के बीच बैठकर गणित के बारे में कुछ समझा रही थीं। गिनती सिखाने के लिए वे अपने हाथ की चूड़ी के साथ-साथ बच्चों के हाथ की चूड़ियों का उपयोग भी कर रही थीं। बच्चों को भी इसमें काफी मजा आ रहा था। वहाँ लगभग दो साल एक बच्चा भी बैठा था, जिसे वे बीच बीच में दुलारती जा रही थीं। उस समय मेरे मन में सवाल आ रहा था कि यह नन्हा बच्चा यहाँ क्या कर रहा है।  

अनुसुइया जी वापस आईं तो हमने इस बारे में पूछा। उन्‍होंने बताया कि, ‘यह महिला खेतिहर मजदूर है। उसकी बेटी हमारे यहाँ कक्षा दूसरी की छात्रा है और वह उसका छोटा भाई है। जब यह खेतिहर मजदूर माँ पास के गाँव के खेतों में काम करने जाती थी तब छोटे भाई की देखभाल के लिए उसकी बहन भी साथ चली जाती थी या घर में रहकर देखभाल करती थी। तब मैंने इस महिला से बात की और कहा कि आप छोटे बेटे को भी बेटी के साथ ही स्कूल भेज दिया करो, ताकि उसकी पढ़ाई भी जारी रह सके। तब से वे दोनों स्कूल आते हैं। जब वह काम से वापस आती है तो बेटे को लेकर चली जाती है। अगर हम उस छोटे बच्चे को स्कूल आने नहीं देते तो यह छात्रा भी नहीं आती। इस तरह से इन छोटी-छोटी बातों को ध्यान देते हैं ताकि उनकी भावनाओं को ठेस न पहुँचे और उनसे एक परिवार का रिश्ता कायम हो।’

इसी बीच एक बच्चा आया जिसके पैर में काँटा चुभ गया था। वह लंगड़ाकर कर चल रहा था। अनुसुइया जी ने उसके पैर से काँटा निकालने लगीं। काँटा निकल गया तो बच्‍चा मुस्‍कराता हुआ वापस चला गया।   

अनुसुइया जी बार-बार बच्‍चों और गाँव वालों से जिस रिश्ते की बात करती हैं वह रिश्ता साफ नजर भी आता है।

(अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, जिला संस्‍थान,धमतरी,छत्‍तीसगढ़ से पुरुषोत्‍तम ठाकुर द्वारा भेजे गए विवरण का सम्‍पादित रूप। फोटो : पुरुषोत्‍तम ठाकुर) 

 

 

 

 

            

 

 

 

 

 

 

 

 

टिप्पणियाँ

Dr.Prashant kumar Biswas का छायाचित्र

गुड वर्क धन्यबाद यही अपनापन हमें इंसानियत की ओर ले जाता है.

nrawal का छायाचित्र

यह जानकर अच्छा लगा कि छत्तीसगढ़ में भी इतनी लगन , अपनत्व और पूर्ण समर्पण के साथ बच्चों के भविष्य बनाने और आदिवासी , पिछड़ी मानसिकता वाले लोगो का सोच बदलने के लिए भी कोई है.....अनुसुइय्या जी जैसे भारतवासियों पर ही सुनहरे भारत की आस टिकी है . मैं उन्हें नमन करती हूँ.

pramodkumar का छायाचित्र

अपनापन तो हिंसक जानवरों को भी प्‍यारा बना देता है । फिर ये तो बच्‍चें हैं निश्‍छल प्रेम से भरे हुए ।

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