किसी 'खास' की जानकारी भेजें। अजोता के बालू लाल और उनका विद्यालय

चित्तौडगढ़ शहर अपनी सीमेंट फैक्टरियों के लिए जाना जाता है। फैक्टरियों की ऊँची-ऊँची, धुआँ उगलती चिमनियों को बहुत पीछे छोड़ हम ऊँचे-नीचे पहाड़, सागौन और तेंदू के जंगलों को पार करते एक बहुत ही खूबसूरत जगह से गुजरे। सड़क के दोनों ओर दूर-दूर तक सफेद रंग के बहुत ही सुन्‍दर फूल नजर आ रहे हैं। ये अफीम के खेत हैं। ये चित्तौडगढ़ जिले का वह हिस्सा है, जहाँ से थोड़ा आगे जाते ही मध्य प्रदेश का नीमच जिला शुरू हो जाता है। सफेद फूलों की खूबसूरती ने बदहाल सड़क और लम्बे सफर की वजह से महसूस हो रही थकान को कुछ कम कर दिया है। कुछ ही देर में हम निम्बाहेड़ा ब्लाक में अजोता गाँव के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय पहुँच गए।

सन 1996 में बालू लाल धाकड़ जब इस गाँव में शिक्षक के रूप में नियुक्‍त हुए तो यहाँ स्कूल के रूप में उन्हें एक खस्ताहाल कमरा मिला था, जिसकी छत ढह गई थी। यहाँ तक पहुँचने के लिए एक बड़े नाले को पार करना पड़ता था। गाँव के लोगों के सहयोग से उन्होंने एक छप्पर के नीचे  कक्षाएँ लगाना शुरू कीं। रजिस्टर और दूसरे जरूरी समान वे अपने एक थैले में ही रखकर लाते ले जाते थे। कुल 30 नामांकित बच्चों में से तब सिर्फ 5 ही नियमित रूप से स्कूल आते थे। सन 1998 का 15 अगस्त का दिन उन्‍हें याद है। बच्चों को बाँटने के लिए लडडू लेकर जब वे स्कूल पहुँचे तो देखा कि भूपाल सागर डैम से पानी आ जाने के कारण नाला उफान पर था। स्कूल, बच्चे और गाँव वाले इस पार थे और बालू लाल जी उस पार। किसी तरह गाँव के लोग इन्हें इस पार ला सके और झण्डा फहराया जा सका। इस घटना के बाद पंचायत के लोगों ने आगे आकर स्कूल तक आने के रास्ते में मिट्टी की भराई कराई और एक कमरे को ठीक करवाया।

गाँव के लोगों के सहयोग से ही अब काफी बच्‍चे स्कूल आने लग गए थे। बच्चे और शिक्षक मिलकर पौधे लगाते लेकिन बाहर से जाने वाले जानवर उन्हें खा जाते। फिर गाँव के लोगों तथा पंचायत का सहयोग लेकर एक चारदिवारी बनाई गई। जल्द ही यह स्कूल पेड़-पौधों से हरा भरा हो गया। सरकार द्वारा एक और शिक्षक देने का प्रयास होता रहा था, पर जो भी आता वह जल्द ही इस जगह से मुक्ति चाहता था। सन् 2008 में दो और शिक्षक प्रहलाद तथा मुकेश मीणा को यहाँ नियुक्ति मिली। अब ये तीनों अलग-अलग कक्षाओं में बच्चों को बिठाकर पढ़ाई करवा सकते थे। बच्चों का शैक्षणिक स्तर में काफी सुधार आया।

एक योग प्रशिक्षण शिविर में तत्कालीन अतिरिक्त जिला परियोजना समन्वयक सुभाष शर्मा योग प्रशिक्षक के रूप में आए थे। बालू लाल जी ने उन्हें अपने स्कूल के बारे में बताया तथा अवलोकन के लिए आमंत्रित किया। आज वे जिला शिक्षा अधिकारी हैं, लेकिन तब से लेकर आज तक उनका इस स्कूल में आना-जाना लगा रहता है। इस काम में सर्व शिक्षा अभियान के सहायक अभियंता ओम प्रकाश तथा अन्य अधिकारियों का भी सहयोग मिलने से कक्षाओं के कमरे, शौचालय, पीने का पानी, बगीचा आदि से लेकर तमाम किस्म के विकास कार्यों से यह स्कूल आगे बढ़ता रहा है। शिक्षकों की सक्रिय भूमिका के चलते यहाँ का शैक्षणिक स्तर भी काफी अच्छा है। छोटे से गाँव के सभी 62 बच्चे अब नियमित रूप से स्कूल आते हैं। कुछ बच्चे तो पास के गाँव से भी यहाँ पढ़ने आते हैं।

बगीचे में लगा पपीते का पेड़ फलों से लदा है। छोटी-छोटी बनी क्यारियों में गुजराती केले के पौधे लगे हैं जिनमें फल आना शुरू हो गया है। पीपल का पेड़ अब काफी बड़ा हो चुका है। बच्चों ने चिडि़यों को पानी पिलाने के लिए एक बर्तन टांग दिया है। वे रोज इसमें पानी डालते हैं। गुलाब की कलम तैयार करके और भी पौधे तैयार किए जा रहे हैं। बालू लाल जी बताते हैं कि इन सब कामों में बच्चे और शिक्षक मिलकर योगदान देते हैं। आसपास के सात-आठ स्कूलों के शिक्षक यहाँ से ही पौध ले जाकर अपने स्कूलों में लगाते हैं। 

सांस्कृतिक कार्यक्रमों का बड़ा उत्साह है इस गाँव में। बच्चों के लिए तरह तरह की रंगीन पोशाकों,चुनरी, लंहगा आदि से एक पूरी अलमारी भरी है। ढोलक, हारमोनियम, माइक,टेपरिकार्डर आदि सब कुछ उपलब्ध है। ज्यादातर सामान गाँव के लोगों से प्राप्त चन्‍दे से खरीदा गया है। आसपास के पाँच स्कूलों के बच्चों का सामूहिक कार्यक्रम इसी स्कूल में होता है। गाँव की तरफ से ही सभी बच्चों को भोजन भी कराया जाता है।

कक्षाओं में विज्ञान तथा गणित पढ़ाने के लिए शिक्षकों ने अपने हाथ से कुछ माडल तैयार किए हैं। मैदान के एक हिस्से में गणित पार्क तैयार किया जा रहा है। यहाँ पर ठोस गणितीय आकृतियों को सीमेंट से बनाकर प्रदर्शित किया गया है। दीवारों पर बहुत ही सुन्‍दर चित्र तथा नक्‍शे बने हैं। चित्तौड़ जिले में अजोता गाँव कहाँ है, इसे भी दीवार पर बने एक नक्‍शे  में दिखाया गया है।


मोहम्मद उमर,अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन, जिला संस्‍थान, चित्‍तौड़गढ़, राजस्‍थान 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

मन बहुत खुश होता है ऐसे शिक्षकों के कार्य–व्यवहार को सुन–पढकर। ऐसे समय में जब सरकारी विद्‍यालयों की सक्षमता के प्रति एक प्रश्नचिह्न खडा किया जा रहा हो यह आशा जगाता है । कह सकते हैं कि बाबूलाल जी उम्मीदों के रखवाले हैं।

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