किसी 'खास' की जानकारी भेजें। अज़ीम प्रेमजी स्कूल, टोंक: अनुभव कुछ कहते हैं

अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन न्याय व समतापूर्ण समाज के निमार्ण की जिस मुहिम में जुटा है, उसमें शिक्षा की भूमिका को केन्द्रीय माना जा रहा है। संस्थान का मानना यह है कि शिक्षा ही एक ऐसा उपकरण है जिसके द्वारा सामाजिक बदलाव किया जा सकता है। इसी अवधारणा के तहत वर्ष 2012-13 से देश के चार राज्यों (कर्नाटक, छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड और राजस्थान) में कुल छह स्कूल संचालित किए जा रहे हैं। इनमें से दो राजस्थान के टोंक व सिरोही में हैं।

संस्थान के ये स्कूल उपरोक्त विचार के साथ-साथ अन्य ऐसे सवालों के जवाब ढ़ूँढ़ने में भी मदद करेंगे जो शिक्षा में किए जा रहे काम के दौरान समय-समय पर आते रहते हैं, जैसे -

  • सिद्धान्त को व्यवहार में बदलना व इस प्रक्रिया में मिली सीख को संसाधन की तरह उपयोग करना।
  • खास तरह की पृष्ठभूमि के बच्चों के साथ शिक्षण की गुणवत्ता हासिल करना।
  • प्रति बच्चे पर आ रहे औसत शैक्षिक खर्च की सीमा में ही काम करना।

उपरोक्त मोटे उद्देश्‍यों की परिधि में स्कूल, शिक्षक, कक्षा-कक्ष, बच्चे, समुदाय व अभिभावकों की व्‍यक्तिगत व संयुक्त भूमिका की स्पष्टता भी बनाई गई। साथ ही सहज रूप से उपरोक्त सभी मुख्य घटकों की विकास यात्रा को भी समझा गया। उपरोक्त समझ के साथ अज़ीम प्रेमजी स्कूल टोंक की शुरुआत की गई।

इस शुरुआती एक वर्ष में जिस प्रक्रिया को केन्द्र में रखा गया, उसमें सबसे ऊपर है, जनतांत्रिक ढ़ंग से सभी प्रक्रियात्मक पक्षों पर काम करना। यानी सभी कार्यों को मिल-जुलकर आपसी बातचीत द्वारा समझने व परस्पर सहमति के उपरान्त बनी राय के अनुसार आगे बढ़ने का रास्ता अपनाना। इस एप्रोच के साथ काम करने के दौरान बहुत सारे साथियों को असहजता भी हुई। जैसे - छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर घण्टों बैठ जाना। परन्तु हमें लगता है कि किसी भी संस्थान के विकास में सभी की सहभागिता व उन सभी पक्षों में समझ बनाना जरूरी है। जैसा हमने ऊपर बताया कि मिल-जुलकर व बातचीत के द्वारा निर्णयों तक पहुँचने की एप्रोच ही शिक्षकों, बच्चों व अभिभावकों के साथ ली गई। बच्चों को भी इस तरीके से सम्भालना उतना आसान नहीं है, जितना आमतौर पर बताया जाता है। इसमें भी बच्चों के झगड़ों को निपटाना सबसे बड़ी चुनौती रही है।

परन्तु हमें लगता है कि एक वर्ष उपरान्त अब बच्चों की शिकायतें व झगड़ों की आवृति कम हुई है। अभिभावकों की भी यही समस्या लगातार रही है कि ये आपस में झगड़ते हैं। इन पर थोड़ा तो नियन्त्रण होना ही चाहिए। इनको गृहकार्य दिया करो। काम को जाँचने का कोई सिस्टम नहीं है। हालांकि उनके सभी सवालों का पूरी तरह से समाधान हो गया हो ऐसा तो नहीं है, परन्तु काफी लोगों को ये लगता है कि बच्चों का सीखना संतोषजनक रहा है। बच्चे खुशी-खुशी स्कूल आते हैं। पहले साल के काम पर कुल मिलाकर तीनों ही पक्षों से विश्‍लेषण करें तो ये लगता है कि शिक्षकों व अभिभावकों दोनों के ही मन में स्कूल की शुरुआत में यह आंशका थी कि इस तरह के माहौल में बच्चों का सीखना सम्भव है या नहीं ? बीते एक वर्ष का अनुभव ये बताता है कि बच्चों को सहज ढ़ंग से सीखने की प्रक्रिया में सहभागी बनाया जाए तो उनका सही मायने में सीखना होता है। न कि रट्टा मारकर सूचनाओं को संजोना। इस एक वर्ष का अनुभव लगभग सभी बच्चों को सीखने का सुखद अहसास दे पाया है। साथ ही उनके मन में बनाई गई धारणा को भी तोड़ने में सफल रहा है कि उनमें से कुछेक ही बच्चे सीखने की योग्यता रखते हैं। यहाँ आने वाला हर बच्चा अपने अन्दर ये अहसास लेकर गया है कि मैं भी सभी विषय बेहतर ढ़ंग से सीख सकता हूँ ।

छोटेलाल तँवर,स्कूल मैनेजमेंट टीम के सदस्य

 

अज़ीम प्रेमजी स्कूल में मेरी नियुक्ति बच्चों के साथ भाषा (हिन्दी) पर काम करने के लिए हुई। इससे पहले मैं कोटा के एक प्राईवेट स्कूल में पढ़ाती थी। प्रारम्भ में हम सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं के साथ अज़ीम प्रेमजी स्कूल की कोर टीम द्वारा स्कूल के विजन को लेकर विमर्श हुआ। इसमें मुख्य रूप से निम्न बिन्दुओं पर सघन चर्चा हुई -

  • आज के सन्दर्भ में बच्चों के साथ पढ़ने-पढ़ाने का काम कैसे किया जा सकता है ?
  • हमें बच्चों के साथ शिक्षण का काम कैसे करना चाहिए ?
  • आज शिक्षा के क्षेत्र में किस तरह की चुनौतियाँ हैं और उन पर काम कैसे किया जाए ?

मेरा अनुभव इससे पहले कोटा शहर के प्राईवेट स्कूल में पढ़ाने का रहा है। बच्चों के साथ काम करना मुझे अच्छा लगता है। बच्चों के साथ भाषा पर काम करने की अपनी ही एक चुनौती होती है। लेकिन अगर बच्चों के साथ प्रारम्भिक काम ठीक से किया जाए तो यह काम आसान और मजेदार भी लगने लगता है। स्कूल प्रारम्भ करने से पहले हम सभी ने बमोर (टोंक) गाँव का सर्वे किया। वहाँ के लोगों से शिक्षा और शिक्षण को लेकर बातचीत की गई। यह अनुभव मेरे लिए बहुत ही नया रहा। इससे पहले मैंने किसी भी स्कूल में काम करने से पहले ऐसा नहीं किया था। इसका फायदा यह हुआ कि हम हमारे स्कूल में आने वाले बच्चों के साथ-साथ उनके अभिभावकों से भी अच्छे से परिचित हो पाए।

स्कूल प्रारम्भ के तीन-चार महीने का समय बच्चों को सहज बनाने में ही बीता। इसका कारण यह भी था कि बच्चे भी विश्‍वास नहीं कर पा रहे थे कि ऐसा भी स्कूल होता है क्या ? धीरे-धीरे कक्षा-कक्ष में शिक्षण की प्रक्रिया अपना असर दिखाने लगी और बच्चों द्वारा विभिन्न गतिविधियों में भागीदारी की जाने लगी। बच्चों को भाषा सिखाने के लिए निम्न गतिविधियों को काम में लिया गया -

  • खेल  
  • कहानी व कविताएँ सुनाना व सुनना
  • चित्र बनाना व चित्रों को देखकर अपने मन से कोई कहानी बनाना
  • एक्सपोजर विजिट (विभिन्न जगहों का भ्रमण करना व अपने अनुभव साझा करना)

स्कूल में मेरा पहला साल बच्चों के साथ लगातार काम करने और अभिभावकों के साथ निरन्तर संवाद करने में बीता। यहाँ पढ़ने-पढ़ाने के काम में हम सभी (बच्चों को भी) को बहुत मजा आया।

ललिता यदुवंशी, शिक्षिका,हिन्दी

अज़ीम प्रेमजी स्कूल के पहले सत्र 2012-13 में मैंने कक्षा एक के बच्चों के साथ काम किया। इसमें मेरे साथ सपना तँवर (शिक्षिका) भी थीं। इस दौरान मुझे कई तरह के शैक्षिक अनुभवों से गुजरना पड़ा। विद्यालय की नीतियाँ एवं खास तरह की शिक्षण विधियों के साथ काम करने का मेरा यह पहला अनुभव था। इससे पहले मैं भी परम्परागत तरीकों से स्कूलों में बच्चों को पढ़ाता आया था। सत्र के प्रारम्भ में सपना ने हिन्दी और अँग्रेजी विषय पर तथा मैंने गणित एवं सह-शैक्षणिक विषयों पर बच्चों के साथ काम किया। बच्चों के साथ काम की शुरुआत कैसे की जाए प्रारम्भ में यह समझ नहीं आ रहा था। स्कूल में सभी कुछ नया-नया लग रहा था। हम उनके लिए अपरिचित थे और वे हमारे लिए। उनके साथ कैसे सम्बन्ध स्थापित किया जाए ? उनकी झिझक कैसे दूर की जाए ? कक्षा को कैसे व्यवस्थित किया जाए ? ऐसे बहुत से सवाल मन में लगातार खड़े हो रहे थे।

कक्षा की शुरुआत 18 बच्चों के साथ हुई। बाद में बच्चों की संख्या ऊपर-नीचे होती रही। शुरू में बच्चे बोलने में झिझकते थे। वे अपनी बात को अभिव्यक्त नहीं कर पाते थे। बोलते थे, तो एक-दो शब्द बोलकर चुप हो जाते थे। कुछ बच्चे पूरी कक्षा को बाधित करते थे। कुछ बच्चों ने पहाड़े रटे हुए थे। मगर 1-20 तक की संख्या की पहचान नहीं थी। वे ठीक से चीजों को गिन नहीं पाते थे। कुछ बच्चों को अँग्रेजी में a ls apple वाला  pattern  z तक याद भी था, मगर किसकी ध्वनि क्या है, वो नहीं जानते थे। एक ही कक्षा में बच्चों के बहुत सारे स्तर थे। बच्चों को काम के साथ जोड़ने के लिए हमने बहुत सी गतिविधियाँ आयोजित की। इनमें हम भी पूरी तरह उनके साथ शामिल रहे। शुरू में हमने eye-hand coordination, hand balance, gross motor skill पर काम किया। बच्चों को खेलों के माध्यम से जोड़कर झिझक दूर करने की कोशिश की गई।

हिन्दी में कहानी और कविताओं के माध्यम से सुनने-बोलने पर काम हुआ। बच्चों को अपनी बात को खुलकर बोलने का मौका देने के लिए छोटी-छोटी कहानियों को माध्‍यम बनाया गया। साथ ही साथ बच्चों को कहानी मंचन से भी जोड़ा गया। गणित पर काम की शुरुआत बच्चों के आसपास के परिवेश से जुड़ी हुई चीजों के साथ की गई। इस दौरान बच्चों को कई स्थानीय खेल भी खिलाए गए। इनमें मुख्यरूप से रूमाल झपट्टा, कौड़ा बादाम, शेर बकरी आदि। बच्चे गतिविधियों के माध्यम से जुड़ने लगे। अब हमें लगने लगा था कि बच्चे हमारी बात सुन सकते हैं और अपनी बात को बिना किसी डर के कह सकते हैं। इसके बाद उनके साथ मिलकर कुछ नियम बनाए गए -

  • हम सबकी बात सुनेंगे
  • अगर आप हमारी बात नहीं सुनेंगे तो हम भी आपकी बात नहीं सुनेंगे।
  • बिना कारण कक्षा से बाहर नहीं जाएँगे।
  • एक साथ नहीं बोलेंगे, सबको बोलने को मौका देंगे।

कुल मिलाकर स्कूल के पहले साल में बच्चों के साथ काम करके एक अलग ही अनुभव की प्राप्ति हुई, जो अभी तक कहीं और पढ़ाकर नहीं हो पाई थी।

अरविन्द शर्मा,शिक्षक, हिन्दी

 

अज़ीम प्रेमजी विद्यालय में कक्षा शिक्षण की शुरुआत जुलाई 2012 में हुईं। यह मेरे लिए एकदम नया अनुभव था। मैं पहली बार प्राथमिक कक्षाओं को पढ़ाने जा रहा था। कक्षा शिक्षण की शुरूआत में प्रत्येक कक्षा में 2 अध्यापक जाते थे। प्रारम्भ में हमने बच्चों के पूर्वज्ञान को जाँचने का कार्य किया। स्कूल का उद्देश्य था कि बच्चों से ज्यादा-से-ज्यादा चर्चा हो तथा उनके अनुभव को जानें। किन्तु प्रारम्भ में बच्चे चर्चा में शामिल नहीं होते थे। अतः हमने सबसे पहले बच्चों की झिझक को दूर किया तथा कक्षा में एक अच्छा माहौल बनाया जिससे कि बच्चे बिना किसी झिझक के अपनी बात कह सकें। धीरे-धीरे वो कक्षा में सामान्य होने लगे और चर्चा में शामिल होकर चर्चा को आगे बढ़ाने लगे।

मैंने कक्षा तीन में सामाजिक अध्ययन विषय पढ़ाया। मेरे साथ महेश मौर्य थे। हम दोनों ने विभिन्न गतिविधि के द्वारा बच्चों के पूर्वज्ञान को कक्षा-कक्ष शिक्षण से जोड़कर शिक्षण कार्य किया। बच्चे मौखिक अभिव्यक्ति तो करने लगे किन्तु लिखित अभिव्यक्ति के लिए और कार्य करने की जरूरत थी। इसलिये हमने वर्कशीट के द्वारा उनकी लिखित अभिव्यक्ति पर कार्य किया। वर्कशीट रोचक व पाठयोजना के अनुरूप हो इसके लिए, एनसीईआरटी, एससीईआरटी, दिगन्तर, एकलव्य व अन्य पुस्तकों का प्रयोग किया। हमने बच्चों के अनुभव आधारित शिक्षण पर जोर दिया। कक्षा-कक्ष शिक्षण में खेल विधि, कहानी विधि, चित्र प्रर्दशनी आदि का प्रयोग करते हुए कक्षा-कक्ष शिक्षण कराया गया जो कि काफी महत्वपूर्ण व प्रभावी रहा।

कुलदीप शर्मा,शिक्षक,सामाजिक विज्ञान

सत्र 2012-13 में पर्यावरण अध्ययन में कक्षा चार व पाँच में मेरे द्वारा कार्य किया गया। इस दौरान कई तरह के शिक्षण व अधिगम अनुभवों से गुजरना हुआ। विद्यालय की नीतियों एवं एक खास तरह की शिक्षण विधियों एवं उन पर काम करना मेरे लिए पहला अनुभव था। शुरू में हम दो अध्यापक कक्षा में एक साथ जाया करते थे, पर कुछ समय बाद पूरी कक्षा को अकेले ही शिक्षण कार्य करवाना पड़ा। दोनों तरह के स्थितियों में जिम्मेदारी एवं अनुभव भी अलग-अलग थे।

हमारे पास विद्यार्थियों को स्तर के अनुसार पहचानना एवं उन पर कार्य करने हेतु कोई विशेष प्रकार की तैयार हल नहीं थे। बस जो कुछ भी किया वह बंगलौर में एक महीने के इन्‍डक्‍शन के दौरान जो कुछ सीखने को मिला उसके अनुसार कार्य किया। सबसे पहले 15 दिन तक बडे़ समूह में आयु के अनुसार विद्यार्थियों के दल  बनाकर, उनकी बेसलाइन क्या है उसको समझने हेतु कार्य किया। तत्पश्चात विद्यार्थियों के परिणामों को ध्यान में रखते हुए, कक्षावार समूह 1 से 5 तक बनाए। पर्यावरण अध्ययन में क्या पढ़ाएँ व कैसे पढ़ाएँ, इसको लेकर मेरे अन्दर बहुत ज्यादा विश्वास नहीं था। मैंने साथियों की मदद से पढ़ाना शुरू किया। इस दौरान यह भी बड़ा चुनौतीपूर्ण रहा कि स्टेट बोर्ड या एनसीईआरटी दोनों में से क्या व कौन-सी किताब, सामग्री ली जाए। मैंने दोनों में से सरल, बच्चों के स्‍तर के अनुसार सामग्री को चुना और अपनी एक महीने की यूनिट प्लान तैयार की। लेकिन वरिष्ठ साथियों ने उसकी समीक्षा की और उसे फिर से बनाने को कहा। मैंने उनके सुझावों को ध्यान में रखकर दूसरी योजना बनाई  और उसके अनुसार कार्य शुरू कर दिया। विद्यालय वातावरण एवं आसपास की समझ के अनुसार विद्यार्थियों से संवाद, चर्चा उनके अनुभव को साझा करना मेरे लिए प्राथमिक कार्य था।

पर्यावरण अध्ययन के कौशल को ध्यान में रखते हुए, विद्यार्थियों की अवलोकन क्षमता, विश्लेषण क्षमता एवं एक-दूसरी चीजों से सम्बन्ध जोड़ना, जैसे कौशल के द्वारा कार्य किया गया। ज्यादातर विद्यार्थियों को शिक्षण कार्य करवाना संतोषजनक रहा। उन विद्यार्थियों के लिए जिनकी मौखिक एवं लिखित अभिव्यक्ति दोनों ही कमजोर थी उनके साथ काम करने के लिए कुछ सरल एवं रोचक क्रियाकलापों का सहारा लिया जैसे खेल, गाना, चित्रकला आदि। साथ ही अन्य रचनात्मक प्रकार के कार्यो के द्वारा उनका ध्यान आकृष्ट किया एवं कक्षा-कक्ष के साथ सामंजस्य बिठाया। गृहकार्य को आकलन के साथ जोड़कर काम करवाया गया। गृह कार्य के दौरान ऐसे प्रश्नों को रखा गया जो बच्चों की खोजबीन, सर्वे, पूछताछ, जाँच पड़ताल एवं तर्क-वितर्क को बढ़ावा दे सकें। स्वतंत्र एवं सामूहिक गतिविधियों को भी लक्ष्य अनुरूप कक्षा-कक्ष एवं बाहर दोनों जगह रखा गया।

उक्त प्रकार के कार्यो के दौरान खुद को तैयार करना बड़ा मुश्किल कार्य था। क्योंकि कई बार योजना अनुसार कार्य नहीं हो पाता है तो भी उसे कैसे अर्थपूर्ण बनाया जाए यह चुनौती रही। मेरी कोशिश यह रही कि बच्चे अपने सवाल रख पाएँ, वे अपनी सोच से कार्य कर सकें। कई बार विद्यार्थियों के ऐसे सवाल भी आते हैं (जब हम स्वतंत्र रूप से सामूहिक चर्चा करते हैं) जिनका जवाब मेरे पास नहीं होता है (केले में अगर बीज नहीं हैं तो यह पैदा कैसे हुआ या डायनासौर खत्म क्यों हो गए।) या मैं उनका जवाब दूँ तो, कैसे दूँ? या नहीं दूँ, इन सभी प्रकार के चिन्तन का निचोड़ मेरे लिए यह होता कि मैं उनकी जिज्ञासा को यदि शान्त न कर सकूँ तो नष्ट भी न करूँ। बल्कि एक नए विचार के साथ उनकी जिज्ञासा और बढ़े, यह जरूरी था।

नेमाराम चौधरी, शिक्षक,विज्ञान

गणित हमारे आसपास के परिवेश में मौजूद है तथा इसका सम्बन्ध दूसरे विषयों से भी है। अतः हम गणित को सिर्फ एक विषय के तौर पर ही नहीं देख सकते, इसका उपयोग हमारे जीवन में व्यापक है।

शुरुआत में जब हमने बच्चों के साथ काम करने का सोचा तब हमें कुछ अलग तरह का अनुभव हुआ। यद्यपि मुझे बच्चों के साथ काम करने का काफी अनुभव था फिर भी शुरुआत में चुनौतियाँ आई थीं, जिनका हल धीरे-धीरे निकलता गया। शुरू में जैसे ही हम कक्षा-कक्ष में गणित विषय के अध्यापक के रूप में गए तो हमने देखा कि कुछ बच्चे तो हमारी बात सुन रहे हैं परन्तु कुछ बच्चे सुन नहीं रहे थे, कुछ बच्चे अपनी ही धुन में मस्त थे। हमने बच्चों से गणित में कुछ सामान्य बातें की। तो यह अनुभव हुआ कि बच्चों में अलग-अलग स्तर हैं। हमारे सामने यह सवाल था कि एक ही कक्षा में अलग-अलग स्तर के बच्चों के साथ काम कैसे किया जाए। एक ही तरह से सभी बच्चों को पढ़ना हमें ठीक नहीं लगा, क्योंकि इससे सभी बच्चे जुड़ नहीं पाते।

हमने बच्चों की बेसलाइन का पता लगाया। जैसी की मान्यता है कि हर बच्चा अपने साथ कुछ समझ लेकर आता है। हमने कक्षा में चार सबग्रुप बनाए और उसके अनुसार ही अपनी पाठ योजना बनाते थे। हम हर सबग्रुप की अलग गतिविधि रखते। इससे बच्चों में रुचि भी पैदा होने लगी, वो बातें सुनने भी लगे और गणित से जुड़ने लगे। कुछ बच्चे गतिविधि या समूह में कम रुचि लेते थे। इसके लिए खेल विधि तथा उनकी रुचि की गतिविधियों से जोड़ा गया। इस प्रयोग से पता लगा कि ये बच्चे एक ही जैसी गतिविधियों में ज्यादा समय तक जुड़ते नहीं थे, तो इनके लिए अलग-अलग तरह की रुचिकर गतिविधियाँ बनाई। ऐसा करने से ये बच्चे कक्षा में बैठने लगे, अपने समूह से जुड़ने लगे। अब हम समझ गए हैं कि रुचिकर गतिविधियाँ व उन पर व्यक्तिगत रूप ध्यान देने से ही इनकी बेसलाइन जान सकते हैं और धीरे-धीरे इनको आगे बढ़ा सकते है। अतः हमारी एप्रोच थी कि बच्चों को समझ कर, साथ काम कर, आगे बढ़ने के लिए गाइड करना।

अरविन्द नीमावत, शिक्षक, गणित

मैं अज़ीम प्रेमजी विद्यालय में सत्र 2012-13 के दौरान अँग्रेजी शिक्षण से जुड़ा रहा हूँ। विद्यालय या शिक्षण अधिगम विधियों के अनुसार पढ़ाने का मेरा पहला अनुभव था। सत्र की शुरुआत में हम दो अध्यापक कक्षा में जाते थे। लेकिन कुछ समय बाद मुझे अकेले ही शिक्षण कार्य करवाना पड़ा। प्रारम्भ में हमारे पास बच्चों के विभिन्न स्तरों को पहचानने के कोई विशेष साधन नहीं थे। हमारे पास जो था वह था बंगलौर में 15 दिन का इन्डक्शन और सत्र की शुरुआत से पहले दिगन्तर में एक महीने की कार्यशाला।

चूँकि बमोर गाँव के सर्वेक्षण के दौरान समुदाय और बच्चों के बारे में कुछ समझ बन चुकी थी, अतः सत्र के प्रारम्भ से ही मैंने और साथी शिक्षक ने कहानियों और कविताओं के माध्यम से बच्चों को अँग्रेजी भाषा से परिचित करवाने का प्रयास किया। हमारा यह प्रयास रंग लाया और बच्चे धीरे-धीरे अँग्रेजी के प्रति जिज्ञासु होने लगे। छोटी और सरल कहानियों और कविताओं के माध्यम से सुनने-बोलने पर काम किया गया। परिणाम स्वरूप बच्चे कविताओं को लयबद्ध तरीके से गाने लगे। कहानियों और कविताओं के माध्यम से ही लिखने और पढ़ने पर काम हुआ, जिसके परिणाम स्वरूप बच्चे कुछ सरल शब्दों और वाक्यों को स्वतंत्र रूप से लिखने और पढ़ने लगे।

अविनाश, शिक्षक, अँग्रेजी

 


अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन, जिला संस्थान टोंक की सी. एण्ड ई. टीम के सदस्यों द्वारा अज़ीम प्रेमजी स्कूल टोंक टीम के सदस्यों से की गई बातचीत पर आधारित।

संकलन : ललिता यदुवंशी, अरविन्‍द शर्मा प्रस्‍तुति : लोहित जोशी 

 

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

अनुभव अच्‍छे आये हैं   इनमें और नये नये अनुभ जुडेंगे ।

SHASHI_K का छायाचित्र

a milestone for great India by great Indians  :)

mahavir.yadav@azimpremjifoundation.org का छायाचित्र

स्कूल की इस यात्रा से और शिक्षक साथियों के अनुभवों को पढ़कर लग रहा है कि जिस उद्देश्य के तहत इन स्कूलों का निर्माण किया गया है उस दिशा में हम सही तरीके से आगे बढ़ रहें हैं |

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