किसी 'खास' की जानकारी भेजें। अक्षय दीक्षित

 

दिल्‍ली से सटे छतरपुर कस्‍बे के पास एक बसाहट राजपुर गाँव में सड़क से करीब 3-4 किलोमीटर अन्‍दर स्थित है स्कूल। स्‍कूल के भीतर जाते ही एमसीडी यानी नगर निगम दिल्‍ली के स्कूलों के बारे मे स्थापित बहुत-सी धारणाएँ टूटती हैं। स्कूल का मैदान बहुत बड़ा है। बहुत पुराने बड़े–बड़े पेड़ हैं। बाउंड्रीवाल के साथ-साथ ही एक छोटा बगीचा भी दिखता है,जो मुझे आश्चर्य में डालता है। पूरा परिसर बहुत साफ है। दिल्ली की सर्दी है। कक्षाएँ बाहर लगी हुई हैं।

तय हुआ था कि अक्षय दीक्षित अपने पूर्व छात्रों से मुझे मिलवाएँगे। बच्चे इकट्ठे थे और अक्षय दीक्षित उनसे गपशप कर रहे थे। मैं भी अभिवादन के बाद उस गपशप में शामिल हो गई। बातें बहुत-सी थीं। ये बच्‍चे अब इस स्‍कूल में नहीं पढ़ रहे थे। वे आगे की पढ़ाई के लिए अन्‍य स्‍कूलों में चले गए थे। पर इस स्‍कूल में बिताए समय में ऐसा कुछ था, जो उन्‍हें फिर से यहाँ खींच लाया था। इस स्कूल की यादें, उनका आपस में लड़ना-झगड़ना, नए स्कूल की बातें। बातों ही बातों में उस बगीचे का जिक्र भी निकल आया जिसे देखकर मैं आश्चर्य में थी। बच्चे बताने लगे यहाँ टूटे हुए शेड थे। बहुत-सा कचरा था। उस समय हम सब बच्चे कक्षा चौथी में थे।

अक्षय सर ने हमारी कक्षा में आकर पूछा कि हम इस कचरे को कैसे साफ कर सकते हैं। कक्षा में बहस छिड़ गई। तरह-तरह के सुझाव आए। किसी ने कहा नगर निगम से कहते हैं वे कचरा उठाकर ले जाएँगे। किसी ने कहा बाहर फिंकवा देते हैं। किसी ने पूछा कचरा हटाकर क्‍या करेंगे। उस पर भी तरह-तरह के सुझाव आए। रोहित ने सुझाव दिया, अगर कचरा हट जाए तो हम वहाँ पौधे लगा सकते हैं। सबको यह सुझाव अच्छा लगा। अगले दिन कचरे की सफाई का कार्यक्रम शुरू हुआ।

अक्षय बताने लगे, 'कचरा बहुत ज्यादा था और बच्चे छोटे। तो सफाई तो हम बड़ों यानी स्‍कूल के अन्‍य सा‍थियों ने मिलकर की। मिट्टी की कुढ़ाई और क्‍यारी बनाने का काम बच्चों ने खुद किया। फिर हर बच्चे को एक-एक क्‍यारी की देखभाल की जवाबदारी सौंपी गई । पौधों के लिए बीज मैं खुद लेकर आया। बच्चों ने अपनी-अपनी क्‍यारियों में बीज़ बोये। रोज पानी डाला। रोज एक ही सवाल, पौधे कब निकलेंगे। जिस दिन पहला अंकुर फूटा, उस दिन मानिए उत्सव का माहौल था। बच्चे रोज पानी डालते और पौधों को बढ़ता हुआ देखते। थोड़े दिनों में सारी पौध बड़ी हो गई।'

अब बताने की बारी बच्‍चों की थी। बच्चे बताने लगे, 'सर मैंने धनिया लगाया था,मैंने टमाटर, मैंने.......।' 

अन्‍तिमा बोल पड़ी, 'सर मैं अपनी बहन को रोज अपने टमाटर के पौधे मे पानी डालने के लिये कहती हूँ।' अन्तिमा की छोटी बहन अभी इसी स्‍कूल में है।

रोहित ने शिकायती लहजे में कहा, 'सर आपने सारा धनिया और पुदीना लड़कियों को दे दिया था।' 

अक्षय  ने हँसकर कहा,'पर सारे टमाटर तो मैंने लड़कों को दे दिए थे।' बच्चे भी हँसने लगे।

सभी बच्चे अक्षय को बता रहे थे कि वह कब-कब और कैसे-कैसे एक दूसरे से मिलते हैं। एक..... दो..... तीन.... चार.... सभी बच्चे अचानक ही बोलने लगे, 'सर भारती ने दूर के स्कूल में प्रवेश ले लिया है,इसलिए हम इससे नहीं मिल पाते हैं ।' भारती ने थोड़ी दूर के प्रतिभा स्कूल में प्रवेश ले लिया है। सबकी बातें सुन कर भारती रोने लगी। उसे रोते देख कर बाकी सारे बच्चे उदास हो गए और उनकी आँखों में भी आँसू आ गए।

कक्षा में उदासी घिर गई। स्थिति को संभालते हुए अक्षय ने बच्चों से कहा, 'मैं बहुत जल्दी ही तुम लोगों के स्कूल में पढ़ाने आने वाला हूँ।' इतना सुनते ही बच्चों का शोर शुरू हो गया, सर मेरे स्कूल में.... मेरे स्कूल में...।

बच्चों के पास अपने इस प्राथमिक स्कूल की बहुत सी यादें हैं,अनुभव हैं और यह आशा भी है कि अक्षय सर जल्द ही उनके स्कूल में पढ़ाने आएँगे।

अब आप यह अन्‍दाजा लगा ही सकते हैं यह अक्षय दीक्षित का कक्षा के बाहर का एक पहलू है। वे अपनी शिक्षण विधियों में भी इसी तरह नवाचारी रहते हैं, तभी तो हर बच्‍चा चाहता है कि उसे अक्षय सर ही पढ़ाएँ।


अज़ीमप्रेमजी इंस्‍टीट्यूट फॉर असेस्मेन्ट एण्‍ड अक्रेडटैशन (Institute for Assessment and Accreditation)दिल्‍ली में कार्यरत रंजना अपने काम के सिलसिले में इस स्‍कूल में गईं थीं। वहाँ उनकी मुलाकात अक्षय दीक्षित से हुई। उन्‍हें लगा कि अक्षय जी के इस प्रयास की जानकारी और शिक्षक साथियों तक भी पहुँचनी चाहिए। यह रंजना द्वारा भेजे गए आलेख का सम्‍पादित रूप है। सम्‍पादन राजेश उत्‍साही । फोटो अक्षय के मोबाइल फोन से खींचे गए हैं। 

17316 registered users
6657 resources