शिक्षा विमर्श के प्रकाशन की शुरुआत मार्च 1998 में हुई थी और अभी इसे 15 साल से अधिक हो चुके हैं। बीसवीं सदी का अन्तिम दशक भारत में शिक्षा के लिए महत्‍वपूर्ण रहा है। इस दशक में आरभ्भिक शिक्षा के सार्वजनीकरण के लिए अनेक सरकारी एवं गैर-सरकारी योजनाएँ देशभर में व्यापक स्तर पर आरम्भ की गई थीं और सरकारी एवं गैर-सरकारी परियोजनाओं में शिक्षा में काम आरम्भ करने वाले लोगों का एक बड़ा समूह उभर रहा था। इनके लिए शिक्षा पर समझ विकसित करने के लिए अनेक तरह के प्रशिक्षणों एवं उन्मुखीकरण कार्यक्रमों की रूपरेखाएँ तैयार हुईं। शैक्षिक बदलाव की दिशा में कार्यरत संस्थाओं और समूहों को शिक्षा पर सम्यक समझ विकसित करने के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा साहित्य की जरूरत महसूस हुई। इस दौर में और इसी विचार के साथ शिक्षा विमर्श का प्रकाशन आरम्भ करने की योजना बनी। शिक्षा विमर्श के इस अंक में समा‍जविज्ञानी अमन मदान अपनी एक केस स्‍टडी की चर्चा करते हुए इस बात पर विचार कर रहे हैं कि क्‍या शिक्षा वास्‍तव में समाज को बदलती है? शिक्षा विमर्श इस अंक से शिक्षा के इतिहास से जुड़े विभिन्‍न आयामों से जुड़ी सामग्री देने की शुरुआत कर रही है। इस क्रम में अम्‍बेडकर विश्‍वविद्यालय दिल्‍ली के प्राध्‍यापक मनीष जैन शिक्षा के इतिहास पर एक नजर डाल रहे हैं। जामिया मिलिया इस्‍लामिया के शिक्षाविभाग में प्रोफेसर और दिल्‍ली एजूकेशन सोसायटी से संबद्ध फ़राह फ़ारूक़ी एक शृंखला के तहत एक स्‍कूल मैनेजर के अनुभवों को बाँट रही हैं। इस अंक में इसकी सातवीं कड़ी प्रकाशित हुई है।

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