साझेदार

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सम्‍पादन भागीदार

टीचर प्लस:
पोर्टल के अंग्रेजी सेक्‍शन के सम्‍पादन की मुख्‍य जिम्‍मेदारी टीचर प्‍लस पत्रिका उठा रही है। टीचर प्‍लस हैदराबाद से अँग्रेजी में प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका है। 1989 से नियमित रूप से प्रकाशित यह पत्रिका मूलत: स्कूली शिक्षकों को ध्यान में रखते हुए सामग्री देती है। पत्रिका में शिक्षक अपनी चिन्ता के विषयों पर चर्चा करते हैं, अपने ज्ञान को साझा करते हैं, उसे और अधिक समृद्ध करते हैं। पत्रिका भारतीय कक्षा की परिस्थितियों के सन्दर्भ में शिक्षकों की स्थितियों की सीमाओं को समझते हुए, सोचने-करने के वैकल्पिक तौर-तरीकों को चर्चा में लाती है। साथ ही इसका प्रयास शिक्षकों में सामुदायिक भावना को बढ़ावा देते हुए इस अहसास और चेतना को जगाने का भी है कि वे एक महत्वपूर्ण परिवर्तनकारी समूह का हिस्सा हैं।

पत्रिका में लिखने वालों में देश भर से, विस्तृत अनुभव वाले लोग शामिल हैं जो शिक्षा के विभिन्न मसलों को पत्रिका के मंच पर लाते हैं, जिनमें प्राइमरी शिक्षा से लेकर बोर्ड परीक्षाओं से जूझने तक के विषय शामिल हैं; और ज्ञानार्जन में कला एवं शिल्प का स्थान, बाल विकास तथा कक्षा-कक्ष प्रबन्धन जैसे मुद्दे भी। प्रत्येक माह पाठक के लिए विचारोत्तेजक विषय तथा कक्षा में की जा सकने वाली व्यावहारिक गतिविधियाँ इस पत्रिका के माध्यम से शिक्षकों तक पहुँचती हैं।

टीचर प्लस केवल बौद्धिक जुगाली की पत्रिका नहीं है। यह पत्रिका शिक्षा में मौजूदा रूझानों के बारे में जागरूक रहने की चाहत रखने वाले, अपनी कक्षा को नए विचारों और दृष्टिकोणों से जीवन्त बनाए रखने के इच्छुक व्‍यक्तियों और कार्यरत शिक्षकों के लिए है।

पत्रिका में प्रकाशित उपयोगी सामग्री पोर्टल के माध्‍यम से पोर्टल के पाठकों तक भी पहुँच रही है।

http://www.teacherplus.org/

सामग्री साझेदार

ऋषि वैली शिक्षक-शिक्षा संस्थान, कृष्णमूर्ति फ़ाउण्डेशन, भारत:

ऋषि वैली शिक्षा-केन्द्र नवम्बर 2006 से शिक्षक-विकास के लिए प्रयत्‍नशील है। उसका यह सरोकार भी है कि शिक्षक समग्र शिक्षा के दर्शन और उससे जुड़े आयामों से जूझने में सक्षम बन पाएँ। साथ ही इस विचार को मजबूती देने वाली शिक्षा पद्धति की परिपाटियों से सम्बन्ध स्थापित कर पाएँ।

संस्थान ऋषि वैली स्कूल में कार्यरत शिक्षकों के लिए पाठ्यचर्या विकास और कार्य करते हुए सीखने के कार्यक्रमों को सहारा देता है। आगे की योजना में ऐसे कार्यक्रम और सुविधाएँ विकसित करने की बात भी है जिनके माध्यम से संस्‍थान अन्य स्कूलों, शिक्षकों और भावी शिक्षकों के एक व्यापक दायरे तक पहुँच पाए।

वर्तमान में संस्थान में कार्यरत शिक्षक निम्‍न गतिविधियों में लगे हुए हैं -

1. निम्नलिखित के लिए पाठ्यचर्या एवं सामग्री का विकास करने की परियोजनाएँ:         

  • कक्षा 1 से 5 के लिए दूसरी भाषा के तौर पर हिन्दी।
  • अँग्रेजी और तेलगू में कक्षा 6 और 7 के लिए विज्ञान।

2. भिन्न-भिन्न स्कूलों से शिक्षकों के लिए कार्यशालाएँ और संक्षिप्त कोर्स।

3. अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के साथ मिलकर कार्यरत शिक्षकों के लिए बी.एड.स्तर का दो वर्षीय शिक्षक-शिक्षा कार्यक्रम विकसित करना।

http://www.rishivalley.org

एकलव्य एक लाभ-निरपेक्ष गैर-सरकारी संस्था है। यह नवाचार पर आधारित शैक्षिक कार्यक्रमों का विकास और फील्ड में उनकी जाँच का काम करती है। साथ ही इन कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए स्रोत व्यक्तियों को प्रशिक्षित करती है।

एकलव्य ने औपचारिक तथा अनौपचारिक, दोनों तरह की शिक्षा की विषयवस्तु एवं शिक्षाशास्त्र का सम्बन्ध सामाजिक परिवर्तन और शिक्षार्थी के चौतरफा विकास के साथ स्थापित करने का प्रयास किया है। यह कार्य लगभग तीन दशकों से भी अधिक समय से होता आ रहा है।

एकलव्य शिक्षार्थी-केन्द्रित कार्यपद्धतियों का विकास करता है। बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के लिए एकलव्‍य लगातार प्रयासरत रहा है। बच्‍चों को अपने सामाजिक और प्राकृतिक वातावरण के बारे में सवाल पूछ्ने के लिए प्रेरित किया जाता है। यह दृष्टिकोण बच्चों को जीवनपर्यन्त शिक्षार्थी बनने में मदद करता है। ‘ होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम’ के नाम से मशहूर नवाचारी प्रयोग की अकादमिक जिम्‍मेदारी को लगभग बीस साल तक एकलव्‍य ने ही उठाया है।

नवाचार के प्रति एकलव्य का नजरिया समग्रता का है। एकलव्‍य का मानना है कि कक्षा में प्रचलित परिपाटियों में सुधार के साथ-साथ परीक्षा प्रणाली में भी सुधार होना चाहिए, शिक्षक-प्रशिक्षण के तौर-तरीकों और स्कूलों के प्रबन्धन के तरीकों को भी ध्यान में रखना होगा। इसका अर्थ यह भी है कि सीखना-सिखाना स्कूल तक ही सीमित न रहकर समुदाय तक भी फैले।

एकलव्य के प्रकाशनों की एक विस्तृत शृंखला है जिसमें शिक्षा सम्बन्धी साहित्य, बाल साहित्य, पत्रिकाएँ, पाठ्यपुस्तकें तथा शैक्षणिक सहायक सामग्री शामिल है।

http://www.eklavya.in

एड इण्डिया:
एड इण्डिया की स्थापना 1996 में तमिलनाडू में शिक्षा, स्वास्थ्य तथा आजीविका के क्षेत्रों में बेहतरी लाने के उद्देश्य से की गई थी। तमिलनाडू में 1000 गाँवों तक फैल जाने के बाद अब इस संस्था का ध्यान शिक्षा के क्षेत्र पर है। प्रत्येक बच्चे के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एड इण्डिया अब प्रत्येक गाँव के प्रत्येक बच्चे को सबसे उत्तम सम्भव शिक्षा प्रदान करने के काम में लगी है। एड इण्डिया अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अन्य गैर-सरकारी संगठनों, सरकार और समुदाय के साथ मिलकर भी काम करती है। इस संस्था द्वारा पठन सम्बन्धी दक्षताओं, विज्ञान शिक्षा तथा गाँवों में पुस्तकालयों की स्थापना के लिए किए गए प्रयासों को विभिन्न पुरस्कारों एवं सम्मानों के माध्यम से पहचान मिली है।

http://www.eurekachild.org

कृष्णमूर्ति स्कूल जर्नल (पत्रिका):
कृष्णमूर्ति स्कूल जर्नल 1995 से प्रकाशित हो रहा है। इसकी शुरुआत एक ऐसे मंच के रूप में हुई थी जिसका प्रयोग दुनिया भर के कृष्णमूर्ति स्कूलों के शिक्षकों द्वारा अपने शैक्षिक अनुभव साझा करने के लिए किया जा सके। इस मूल उद्देश्‍य को बरकरार रखते हुए पिछले कई सालों में इस पत्रिका का फैलाव पाठकों तथा इसमें योगदान करने वाले लेखकों, दोनों ही के सन्दर्भ में हुआ है। अध्यापकों द्वारा स्कूली शिक्षा पर लिखे जाने की जरूरत की प्रतिक्रिया में यह पत्रिका एक अनोखा ही प्रयास है।

पत्रिका के लेख मोटे तौर पर दर्शन तथा व्यवहार के दायरों में रहते हैं। इनमें से कई लेखक जीवन और शिक्षा से जुड़े उन सवालों से गहरे तौर पर प्रभावित हैं जो दार्शनिक जे.कृष्णमूर्ति द्वारा उठाए गए हैं, और इन सवालों पर इन लेखकों का चिन्तन उनके लेखों में भी झलकता है। पत्रिका का यह पक्ष उसकी प्रासंगिकता और दायरे को और अधिक फैलाव देता है, उसे कक्षा से बाहर, ज्ञानार्जन और जीवन के केन्द्रीय मसलों तक ले जाता है।

इस पत्रिका के कुछ अंक उसकी वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। 

http://www.journal.kfionline.org

खान अकादमी: 
खान अकादमी 2008 में स्थापित एक अलाभकारी संगठन है। खान अकादमी का उद्देश्‍य है  ‘बेहतरी के लिए निशुल्‍क विश्‍वस्‍तरीय शिक्षा उपलब्‍ध कराना,कहीं भी, किसी के लिए भी।’ खान अकादमी की वेबसाइट लायब्रेरी में गणित, वित्त, खगोल विज्ञान और इतिहास से लेकर विभिन्‍न विषयों पर 3300 से अधिक वीडियो उपलब्‍ध हैं। इनमें से बहुत सारी सामग्री यूटयूब पर भी मौजूद है।

टीचर्स ऑफ इण्डिया ने खान अकादमी की अनुमति और सौजन्‍य से प्रारम्भिक गणित विषय से सम्‍बन्धित कुछ वीडियो को हिन्‍दी,‍तमिल तथा कन्‍नड़ में पोर्टल पर उपलब्ध कराने का काम हाथ में लिया है।

 

जोड़ो ज्ञान कक्षा में पढ़ने-पढ़ाने के तौर-तरीकों से सम्बन्धित समस्याओं के कारगर हल निकालने में कार्यरत संगठन है। 1998 से यह संस्था विद्यार्थियों, शिक्षकों, शिक्षक-शिक्षकों और अभिभावकों के साथ अन्तरंग तौर पर काम करती आ रही है। जोड़ो ज्ञान विशेष तौर से गणित और विज्ञान-शिक्षा में नवाचार लाने की कोशिश में है ताकि बच्चे जो भी सीखें, समझकर और आनन्द से सीखें। इसी परिप्रेक्ष्य के साथ प्रशिक्षु-शिक्षकों तथा कार्यरत शिक्षकों के लिए कार्यशालाएँ, कम खर्च की सहायक शिक्षण सामग्री का निर्माण, उसे हासिल करना और उसका वितरण संस्था के कार्य का एक हिस्सा है। उन्होंने कई स्कूलों में गणित तथा विज्ञान-खोज की प्रयोगशालाएँ स्थापित की हैं। हाल में वे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के चार प्रगतिशील स्कूलों में डिज़ाइन एण्ड डवलपमेन्ट ऑफ इनोवेटिव करिकुलम फ़ॉर प्राइमरी मैथमैटिक्स (प्राथमिक गणित के लिए नवाचारी पाठ्यचर्या का निर्माण एवं विकास) नाम का कार्यक्रम चला रहे हैं। इसमें पाठ्यचर्या निर्माण, मॉड्यूल निर्माण, कक्षा में आदान-प्रदान के मॉडल तैयार करना, मूल्यांकन एवं आकलन शामिल हैं।

संस्था दिल्ली में शकरपुर में स्थित है और वहीं पूर्व-प्राथमिक एवं प्राथमिक स्तर के प्रथम-पीढ़ी विद्यार्थियों के लिए एक प्रायोगिक स्कूल भी चला रही है। यह स्कूल कक्षा-आधारित शिक्षण को अपनाने की बजाए एक अखण्ड, एकीकृत प्रोजेक्ट आधारित दृष्टिकोण से कक्षा-रहित शिक्षण की बात करता है, साथ ही गणित में नवाचारी तौर-तरीकों को लागू करने का काम भी होता है। जोड़ो ज्ञान बिना किसी वित्तीय लाभ की अपेक्षा के, और बिना वित्तीय सहायता चलने वाला सामाजिक उद्यम है। अपने काम को आगे ले जाने में उनका इरादा है कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने में लगे सब व्यक्तियों और संस्थाओं से सम्बन्ध स्थापित किया जाए ताकि बच्चों को जिज्ञासापूर्ण ज्ञानार्जन के पथ पर चलने में समर्थ बनाया जा सके।

http://www.jodogyan.org

यह पश्चिम बंगाल के 12 जिलों और अन्य राज्यों में विकास के क्षेत्र में काम करने वाला एक गैर सरकारी संगठन है। इसके कार्य का मुख्य सरोकार ग्रामीण इलाकों के ग़रीब तबकों के लिए खाद्य एवं जीवन सुरक्षा है। ऐसा वे प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ प्रबन्धन और पर्यावरण संवेदी, आर्थिक दृष्टि से उचित, सामाजिक तौर पर न्यायपूर्ण तथा परस्पर सहयोग से विकसित सिद्धान्‍तों एवं व्यवहार के आधार पर करने की कोशिश करते हैं।

संस्था की स्थापना 1982 में हुई थी। शुरुआत में यह विभिन्न प्रकार के सामाजिक-आर्थिक मुद्दों से सम्बन्धित सूचनाएँ एकत्र करने, उनके मिलान तथा प्रसार का कार्य करती रही। एक संसाधन केन्द्र के रूप में भी इसने काम किया। सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए भिन्न-भिन्न गैर-सरकारी तथा सामुदायिक संस्थाओं एवं व्यक्तियों के संघर्षॉ पर ध्‍यान केन्द्रित करते हुए काम किया गया। यह कार्य विशेष तौर से अनौपचारिक क्षेत्र में काम कर रहे कार्यकर्ताओं, देशीय समुदायों तथा भूमिहीन मज़दूरों और हाशिये पर पड़े किसानों के लिए होता था। 1992 के बाद से इस केन्द्र ने ग्रामीण इलाकों के गरीब तबकों के लिए खाद्य एवं जीवन सुरक्षा हेतु टिकाऊ खेती तथा प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्धन पर ध्यान केन्द्रित किया। नौजवानों के साथ काम करने की आवश्यकता भी महसूस की गई। जीवन एवं आजीविका उन्मुख, क्रिया-शोध (एक्शन् रिसर्च) आधारित शिक्षा का कार्य शुरु किया गया। इस कार्य के तहत स्कूलों तथा गाँव आधारित समूहों में ज्ञानार्जन के हथियार के तौर पर प्रकृति पर ध्यान केन्द्रित किया गया। इस संस्था ने बच्चों तथा शिक्षकों के लिए पाठ-योजनाओं, पुस्तकों, विचारों तथा सामग्री के विकास के कार्य में भी सहायक का काम किया है। इस संसाधन केन्द्र ने धीरे-धीरे स्थानीय गैर-सरकारी संस्थाओं तथा विकास में सहयोग करने वाले समूहों के नेट्वर्क के माध्यम से अपनी सेवाओं का विस्तार किया है। 

http://www.drcsc.org
तमिलनाडू साइंस फोरम (TNSF):

इस मंच की शुरुआत 1980 में मद्रास विश्वविद्यालय में शोध-कार्य में लगे कुछ विद्वानों के समूह द्वारा विज्ञान के लोकप्रियकरण के लिए की गई थी। 1980 के दशक के अन्त तक आते-आते तमिलनाडू साइंस फोरम ने देश के जन-विज्ञान आन्दोलन के साथ स्वयं को जोड़ लिया था। उस ने पर्यावरण के मुद्दों, तमिल में विज्ञान की सामग्री तैयार करने, तथा विज्ञान-शिक्षा का सम्बन्ध दिन-प्रतिदिन के जीवन के साथ जोड़ने पर काम करते हुए अपने अस्तित्व को फिर से परिभाषित किया।

1990 के दशक में इसने स्वयं को तमिलनाडू के पूर्ण साक्षरता अभियान, अरिवली इयक्कम, के साथ सम्बद्ध कर लिया। धीरे-धीरे यह स्कूली शिक्षा के विभिन्न पहलुओं तथा ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य पर कार्य करने के रूप में परिवर्तित हो गया। इस सन्दर्भ में जिन पहलुओं पर कार्य किया गया, उनमें शिक्षा का सार्वभौमीकरण, शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर समुदाय की भागीदारी, पाठ्यचर्या और शिक्षापद्धति, तथा महिलाओं के स्वास्थ्य की प्रजनन सम्बन्धी समस्याएँ शामिल थे।

तमिलनाडू साइंस फोरम के 12,000 सदस्य हैं जिनमें वैज्ञानिक तथा महाविद्यालयों और विद्यालयों के शिक्षक ही नहीं बल्कि किसान तथा स्वयं-सहायता समूहों की महिलाएँ और समाज के लगभग हर तबके के लोग शामिल हैं। इसके कार्यक्रमों में विज्ञान का लोकप्रियकरण, विज्ञान सम्बन्धी सामग्री का प्रकाशन, प्रौढ़ शिक्षा तथा निरन्तर शिक्षा अभियान, प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में हस्तक्षेप, तथा विकास से जुड़े क्षेत्र (जैसे स्वास्थ्य, ग्रामीण महिलाओं का विकास तथा आय उत्पादन) शामिल हैं।

यह मंच पत्रिकाओं आदि के मध्यम से भी शिक्षा के क्षेत्र में योगदान कर रहा है। पत्रिकाओं में थुलिर (मासिक बाल विज्ञान पत्रिका), विज़्हुथु (स्कूली शिक्षकों के लिए त्रैमासिक पत्रिका), सिरगु (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा विकास से जुड़े मुद्दों पर नीति सम्बन्धी मासिक चर्चा) तथा अरिवु थेन्रल (नवसाक्षरों के लिए अखबार) शामिल हैं। किशोरों के लिए द्वि-मासिक विज्ञान पत्रिका जन्तर-मन्तर है। तमिलनाडू साइंस फोरम ने अब तक 250 शीर्षकों का प्रकाशन किया है, जिनमें से अधिकतर लोकप्रिय विज्ञान पर हैं।

http://www.tnsf.in/

दिगन्तर:
दिगन्तर शिक्षा एवं खेलकूद समिति जयपुर में स्थित संस्था है जो समाज के हाशिए पर खड़े अल्पसंख्यक समुदायों के लिए वैकल्पिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के क्षेत्र में 1978 से काम कर रही है। इस संस्था को स्‍थापित करने का श्रेय दो शिक्षकों को जाता है,  जिन्होंने कर्नाटक के नीलबाग में श्री डेविड हॉर्स्ब्रा से प्रशिक्षण प्राप्त किया था।

दिगन्तर की नजर में शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को आत्मप्रेरित और स्वतन्त्र, समालोचनात्मक ढंग से सोच पाने वाले शिक्षार्थी बनाना है। दिगन्तर इसी विचार के आधार पर बच्चों के लिए शिक्षा के मौके विकसित करने में प्रयासरत है।

दिगन्तर जयपुर के बाहरी इलाकों में 4 परियोजनाएँ चला रहा है – दिगन्तर विद्यालय, अकादमिक संसाधन युनिट् (द अकैड्मिक रिसोर्स युनिट – तरु), संसाधन सहायक युनिट् (द रिसोर्स सपोर्ट युनिट्) तथा फागी में चल रही शिक्षा समर्थन परियोजना।

http://www.digantar.org

प्रथम बुक्स:

बच्चों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में प्रयासरत ‘प्रथम बुक्स’ की स्थापना भारत में 2004 राष्ट्रव्यापी रीड इण्डिया अभियान के त‍हत की गई थी। इस अभियान का मकसद बच्चों में पढ़ने की आदत को बढ़ावा देना है। ‘प्रथम बुक्स’ एक गैर-लाभकारी संस्था है। इसका उद्देश्‍य है-

  • सस्ते दामों पर उपलब्ध उच्च गुणवत्ता की पुस्तकों के माध्यम से भारत के सब बच्चों तक पहुँच बनाई जाए।
  • पुस्‍तकें विभिन्‍न भारतीय भाषाओं में छापी जाएँ ताकि भारत के कोने-कोने में वे बच्चों की पहुँच में आएँ। 

प्रथम बुक्‍स् चाहता है कि “प्रत्येक बच्चे के हाथ में किताब” हो और पढ़ने का आनन्द सबको हासिल हो। पिछले सात सालों में 11 भाषाओं में 235 शीर्षक छापे गए हैं और इस प्रकार लाखों बच्चों में पढ़ने के आनन्द का फैलाव हुआ है। विषयवस्तु के सन्दर्भ में इस संस्था की नीति समावेशी है। 50 किताबें क्रिएटिव कॉमन्स ढाँचे के तहत कई भाषाओं में प्रकाशित की गई हैं। असमिया, फ़्रेंच, स्पैनिश और जर्मन जैसी भाषाओं में पुस्तकों का अनुवाद किया गया है और इन किताबों के आधार पर सौ से अधिक परिवर्द्वित संस्‍करण (जैसे बिल्कुल नए रूप में किताबें और ऑडियो किताबें) तैयार किए गए हैं।

http://prathambooks.org/

विक्रमशिला एजुकेशन रिसोर्स सोसायटी - ‘विक्रमशिला एजुकेशन रिसोर्स सोसायटी’ कोलकता (पश्चिमी बंगाल) की एक संस्था है। 1989 से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही यह संस्था विशेष तौर से शिक्षकों, बच्चों, समुदायों और सरकारी तन्त्र के साथ मिल कर बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को एक वास्तविकता बनाने में प्रयासरत है।

‘विक्रमशिला’ समाज के वंचित और अल्प संसाधन वाले तबकों के जीवन के लिए शिक्षा को अर्थपूर्ण और प्रासंगिक बनाने में संलग्न है। पिछले करीब 20 सालों से इस संस्था ने देश भर में क्रियात्मक शोध की पहलकदमियाँ और शिक्षक-विकास के कई कार्यक्रम किए हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से वे ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली 200 संस्थाओं, 25,000 शिक्षकों और 14,00,000 बच्चों तक पहुँचे हैं।

‘विक्रमशिला’ शिक्षक-विकास कार्यक्रमों के अलावा बच्चों के लिए ज्ञानार्जन में सहायक कार्यक्रम भी चलाती है। क्रियात्मक शोध की विभिन्न पहलकदमियों के माध्यम से यह अपने केन्द्रों में नागरिक-शिक्षा के कार्यक्रमों के लिए भी प्रयासरत है। साथ ही मदरसों में बेहतर गुणवत्ता पर  काम कर रही है और औपचारिक स्कूल-प्रणाली के भीतर ही शिक्षा को रोज़गार के साथ जोड़ने की भी कोशिश कर रही है।

इस सब के अलावा यह संस्था शिक्षा पर बच्चों के अधिकार, समता, और सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को मज़बूती देने के लिए सक्रिय परामर्श में भी शामिल रहती है। ‘विक्रमशिला’ राज्य के सरकारी तन्त्र के साथ सक्रिय तौर पर काम करती है और कई राज्य संसाधन समूहों की सदस्य भी है।

http://www.vikramshila.org

विद्या भवन की शुरुआत 1931 में एक छोटे से माध्यमिक स्कूल के तौर पर हुई थी। उद्देश्य था कि शिक्षा में चरित्र-निर्माण पर बल दिया जाए न कि पुस्तक से सीखने पर। विद्यार्थियों का शारीरिक, सौन्दर्यशास्त्रीय तथा नैतिक विकास विद्या भवन के शैक्षणिक कार्यक्रम का एक अभिन्न अंग है।

आज विद्या भवन उदयपुर और उसके आस-पास स्थित 14 संस्थाओं का एक बड़ा समूह है। उसकी गतिविधियों में स्कूली शिक्षा से सम्बद्ध कार्य, व्यावसायिक तथा तकनीकी शिक्षा, शिक्षक-प्रशिक्षण, शैक्षणिक अनुसंधान, कृषि एवं कृषक-सहायता अनुसंधान, निम्न मध्य वर्ग के लोगों के लिए दक्षता एवं तकनीकी प्रशिक्षण, हस्त-निर्मित कागज बनाना, पंचायती राज कार्यकर्ताओं तथा आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का दिशा-निर्देशन शामिल है।

वह राजस्थान के कई कस्बों और गाँवों के बच्चों के लिए एक मददगार संस्था है और इसके संगठन राज्य की कई संस्थाओं को सहायता प्रदान करते हैं। विद्या भवन राज्य सरकारों के लिए भी शिक्षा से सम्बद्ध पैकेज विकसित करने में शामिल है। इस सन्दर्भ में शिक्षक-प्रशिक्षण मॉड्यूल एवं पाठ्यपुस्तकें विकसित करना तथा राष्ट्र एवं राज्य स्तरीय कार्यशालाओं और शिक्षक-प्रशिक्षण कैम्पों का आयोजन शामिल है।

विद्या भवन चार स्कूल संचालित करता है। इन स्‍कूलों में समाज के सब तबकों के बच्चों के लिए लोकतान्त्रिक, धर्म-निरपेक्ष और सामाजिक रूप से सार्थक, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अनुभव प्रदान करना शामिल है, ताकि वे समाज के जिम्मेदार और सक्षम नागरिक बन सकें।

विद्या भवन का शिक्षा संसाधन केन्द्र राजस्थान, छतीसगढ़, बिहार, आन्ध्र प्रदेश तथा गुजरात की सरकारों के साथ शिक्षा के विभिन्न पक्षों पर काम कर रहा है । 

http://www.vidyabhavansociety-seminar.org/default.htm

अप्रैल 2005 में स्थापित कोलकता की यह संस्था माध्यमिक स्कूली शिक्षा के लिए एक प्रायोगिक स्कूल तथा संसाधन केन्द्र का काम करती रही है। स्कूल तो शिक्षा को मजेदार, प्रभावी, और कम बोझिल बनाने के प्रयोग करता है; संसाधन केन्द्र की आकांक्षा इस प्रयोग के परिणामों को अधिक से अधिक विद्यार्थियों और शिक्षकों तक पहुँचाने की है। स्कूल का एक सांयकालीन खण्ड भी था जो मुख्यत: व्यवसाय-सम्बन्धी शिक्षा से सम्बद्ध था, और स्थानीय लोगों के वंचित तबकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखता था। 2010 में स्कूल तथा उसका सांयकालीन खण्ड बन्द हो गए। शिक्षा संसाधन केन्द्र जारी है।

शिक्षामित्र का शिक्षा संसाधन केन्द्र कई प्रकार के शिक्षण संसाधनों से लैस है और शिक्षकों, पर्यवेक्षकों (सुपरवाइज़र), शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों, मीडिया के लोगों, सरकार के नीति निर्माताओं, ग़ैर सरकारी संस्थाओं और विद्वानों के बीच नेट्वर्किंग के लिए सेवाएँ प्रदान करता है। केन्द्र में पुस्तकों, गीतों और फिल्मों, सीखने-सिखाने की शिक्षण सामग्री, रपटों आदि से लैस एक अच्छा पुस्तकालय है।

शिक्षामित्र की ओर से नियमित तौर पर विद्यार्थियों/शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण कार्यशालाएँ होती हैं जिनका जोर भाषा की दक्षताओं और शिक्षण के नवाचारी तौर-तरीकों के विकास पर रहता है। शिक्षा संसाधन केन्द्र अन्य नवाचारी शिक्षकों, स्कूलों, गैर सरकारी शिक्षण-संस्थाओं के लिए भी सम्पर्क मुहैया करवाता है। वह शिक्षक संघों तथा राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर अनुसंधान से जुड़ी संस्थाओं के साथ भी सम्पर्क बनाने की आशा रखता है।

http://www.shikshamitra-bengal.org

संधान 1983 में स्थापित, वित्तीय लाभ रहित गैर-सरकारी धर्म-निरपेक्ष संस्था है। यह संस्था इस सोच और दर्शन को व्यवहार में लाती है कि लोगों के पास स्वयं को खोजने-समझने की छूट होनी चाहिए। संधान की गतिविधियाँ विविधता को महत्व देती हैं, आमजन के ज्ञान का आदर करती हैं। आमजन की सीखने की क्षमता में विश्वास इस सोच और दर्शन का एक अभिन्न अंग है।

सामाजिक-आर्थिक ताकतों, तथा जाति, वर्ग और लिंग के संकुचित नजरिए पर आधारित सोच ने समाज के महत्वपूर्ण तबकों को हाशिए पर धकेल दिया है। संधान ने इन तबकों के वापिस समाज की मुख्य धारा में आने के लिए मदद की भी जिम्मेदारी ली। उसकी कल्पना में किशोरों और बच्चों की अखण्ड, एकीकृत, सम्पूर्ण शिक्षा के लिए एक राष्ट्रीय संसाधन केन्द्र के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का काम शामिल है और स्वास्थ्य, जीवन की दक्षताओं तथा आजीविका के सवालों को अकादमिक उद्यम के नजदीक लाने का काम भी। संधान को सबसे बेहतर ढंग से परिभाषित करना हो तो शायद हम कह सकते हैं कि सहभागिता और खोज के माध्यम से शांति और विकास इसकी पहचान हैं।

संधान एक ऐसे न्यायसंगत और समतावादी समाज की कल्पना से उत्प्रेरित है जिसमें लोग सामंजस्य और मान-सम्मान के साथ रह सकते हों। सुव्यवस्थित तरीके से शिक्षा और शिक्षण के माध्यम का प्रयोग करते हुए लोगों को हाशिए पर धकेले जाने की प्रक्रियाओं से जूझना, यही संधान का उद्देश्य है।

http://www.sandhan.org/

सिद्ध (SIDH):
सिद्ध यानी सोसायटी फ़ॉर् इन्टेग्रेटिड् डेवलप्मेन्ट ऑफ हिमालयाज़ मसूरी से 12 किलोमीटर बाहर केन्द्रीय हिमालय के पहाड़ों के बीच केम्प्टी में स्थित है। उत्तराखण्ड के टिहरी गढ़वाल जिले के जौनपुर खण्ड में कार्यरत सिद्ध स्थानीय बच्चों एवं युवाओं के लिए सार्थक, प्रासंगिक तथा समझ की सम्पूर्णता से लैस शिक्षा देने को प्रतिबद्ध है। सिद्ध का मौलिक उद्देश्य और कार्य शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन के एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का है, एक अधिक सार्थक खोज और वार्तालाप को प्रेरित करने का है – न केवल सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्रों में बल्कि व्यक्तियों के भीतर सोच-विचार के तौर-तरीकों के सन्दर्भ में भी। इस समय सिद्ध 11 स्कूल चला रहा है। ये स्कूल पूर्व प्राथमिक से ले कर उच्च स्कूली शिक्षा के स्तर तक के हैं। इनमें जौनपुर की अग्लर घाटी के 40 गाँवों से लगभग 500 बच्चे आते हैं। सिद्ध ने अपना फैलाव करते हुए युवक-युवतियों के लिए कोर्स, शैक्षिक अनुसंधान, परामर्श, तथा प्रकाशन के क्षेत्रों में भी काम किया है, और इस प्रकार वह शिक्षा में गुणवत्ता के मुद्दे के प्रति संवेदनशील सब लोगों तक अपनी पहुँच बना रहा है।

सिद्ध टीम में अधिकतर लोग नौजवान, स्थानीय और प्रतिबद्ध हैं तथा समुदाय उन्हें नेतृत्वकारी भूमिका में देखता है। सिद्ध की टीम जवानों और महिला-समूहों को शिक्षा, खेती, महिला-स्वास्थ्य तथा ग्राम-अर्थव्यवस्थाओं से सम्बद्ध मसलों से सम्बोधित होने के लिए प्रेरित कर पाने में कामयाब रही है।

http://www.sidhsri.info

स्कूल्‍स वाटर पोर्टल शिक्षकों, विद्यार्थियों, स्कूल प्रबन्धन से जुड़े लोगों एवं अभिभावकों के लिए जल से सम्बन्धित संसाधन और सामग्री साझा करने का वेब आधारित खुला मंच है। अन्य व्यक्ति भी जल सम्बन्धी मूल मुद्दों के बारे में इस पोर्टल से जानकारी हासिल कर सकते हैं या ‘जल ज्ञान’ साझा कर सकते हैं।

स्कूल्‍स वाटर पोर्टल इण्डिया वाटर पोर्टल का एक हिस्सा है। इस समावेशी पोर्टल के माध्‍यम से जल-प्रबन्धन के क्षेत्र में सक्रिय लोगों और सार्वजनिक जनता के बीच सम्बन्धित ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया जाता है। इस स्वयंसेवी प्रयास का समन्वय सुश्री रोहिणी निलेकनी द्वारा प्रदान की गई धन-निधि से चलाए जा रहे ग़ैर-लाभकारी ट्रस्ट अर्घ्यम द्वारा किया जा रहा है। यह ट्रस्ट जल एवं स्वच्छता के क्षेत्र में काम कर रहा है।

https://washresources.wordpress.com/tag/sch2ools-water-portal/