शिक्षा की पतंग की डोर किसके हाथ

 

पुस्तक : शिक्षा के सवाल

लेखक: महेश पुनेठा

वैसे आजकल शिक्षा और विशेषकर सार्वजनिक शिक्षक,शिक्षा और उसके प्रशासनिक ढांचे पर तो लोगों का मजाकिया लहजे में बात करते मिलना सामान्य बात है। ऐसे समय में कुछ चीजें शिक्षा के आंकड़ों के मकड़जाल से दूर सकारात्मकता के साथ डटी हुई हैं। धरातल पर अपने अनुभवों के आधार पर शिक्षा पर बात करना और काम के आंकड़ों को तथ्यों के साथ बड़ी ही सजगता और सरलता से रखना आसान नहीं है। शिक्षा पर लोकतांत्रिक मूल्यों को आधार मान उन पर काम करते हुए, बाल मन को सजाने संवारने का काम विरले लोग ही कर पाते हैं। उन विरले लोगों में उत्तराखण्‍ड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के महेश पुनेठा जो पेशे से अध्यापक होने के साथ, कवि और समीक्षक हैं, का नाम सर्व विदित है। दीवार पत्रिका अभियान को जन-जन तक पहुँचाने का उनका लक्ष्य द्रुत गति से चल रहा है। उस कार्य में उनके अन्य साथी शिक्षक भी उसी भाव से लगे हैं जिस भाव से महेश पुनेठा उसे आगे बढ़ाना चाहते हैं।

महेश जी की शिक्षा पर प्रकाशित पुस्तक ‘शिक्षा के सवाल’ देखी। महेश पुनेठा पुस्तक की भूमिका की शुरुआत में ही लिखते हैं-शिक्षा के सवाल जीवन के सवालों से भिन्न नहीं हैं। वह शिक्षा के सवालों से भागने के वजाय उनसे सामना करने की बात करते हैं। जो शायद आज का शिक्षा का सिस्टम नही कर पा रहा है। वह शिक्षा को जीवन जीने से हटकर देख रहा है। शायद यही बात है जो वास्तविक जीवन और शिक्षा के तौर तरीकों के बीच खाई सी बन गयी है। जिस खाई को सवालों के उत्तरों से ही पाटा जा सकता है। जब तक शिक्षा की नीतियों के निर्माण में शिक्षक की भूमिका का निर्धारण नहीं होगा तब तक यह स्थिति बनी रहेगी। ऐसे ही कुछ ज्वलन्त प्रश्न उठाती है यह पुस्तक। यह पुस्तक केवल प्रश्न नहीं  उठाती उनके सहज और तथ्य परक सरल उपाय भी बताती है। लगभग 29 उन्तीस शीर्षकों या कहा जा सकता है उन्तीस सवालों को एक सवाल बनाती यह पुस्तक पाठक के सामने प्रस्तुत करते हुए आपना काम करने में सफल मानी जा सकती है। लेखक शिक्षा पर अपनी बात कहने में सफल रहे हैं। प्राथमिक से लेकर माध्यमिक तक की शिक्षा व्यवस्था में आ रहे बदलाव पर अच्छी चर्चा है। समान शिक्षा के बहाने सरकारी शिक्षा के वर्तमान परिदृष्य पर बात रखी है। बाउचर प्रणाली के दुष्परिणामो पर,शिक्षा में वैज्ञानिक चेतना के विकास में शिक्षा पर शिक्षक की समझ पर सवालों से भिड़ंत, स्कूलों के भयावह वातावरण,दण्‍ड,स्वतन्त्रता, समानता के बहाने एन.सी.एफ. 2005 के आलोक में अपनी बात रखने में सफल रहे हैं। पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम का बोझिल होना और जीवन और शिक्षा के तरीकों के बीच खाई को पाटने के तरीकों पर अच्छा काम दिखता है। थोड़े से बच्चे और बाकी बच्चे के बहाने वर्तमान सिस्टम के तौर-तरीकों पर अपनी बात सहजता से रख पाए हैं। एक तरफ शिक्षा का ढाँचा दूसरी तरफ रोजगार और नैतिक शिक्षा पर बात की गई है। लेखक यात्राओं को जीवन, शिक्षा और ज्ञानार्जन के लिए महत्वपूर्ण बताते हैं। डायरी लेखन के बहाने लेखन कौशल के विकास पर अच्छी और सारगर्भित बात रखी गई है। शिक्षा की गुणवत्ता,पढ़ने की संस्कृति आदि ज्वलन्त मुद्दों पर यह पुस्तक अपनी बात को कहने में बहुत हद तक सफल रही है। इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह आँकड़ों का जाल नहीं है। यह सहज और सरलता से काम से उपजी एक नदी सी है।

और यह कहीं भी अपने सिद्धान्‍तों को पाठक पर थोपती सी नहीं दिखी। मुझे व्यक्तिगत तौर पर यह लगता है कि हर अभिभावक, शिक्षक को इसे पढ़ना चाहिए।


डॉ.गिरीश पाण्डेय प्रतीक

(डॉ.गिरीश पाण्डेय प्रतीक की टिप्‍पणी का सम्‍पादित अंश। टिप्‍पणी उनके फेसबुक पेज से साभार)

 

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