भाषा बोली अंक 1 : रूम टू रीड के पुस्‍तकालय कार्यक्रम की पत्रिका

'रूम टू रीड' भारत सहित एशिया और अफ्रीका के दस देशों में लगभग पिछले डेढ़ दशक से इस बात के लिए प्रयासरत है कि बच्चे स्कूल में पढ़ना-लिखना सीख सकें और शिक्षा में लड़कियों की समुचित भागीदारी हो।

संस्था का विश्वास है कि बच्चे अपने स्कूली जीवन के आरम्भिक वर्षों में पढ़ने-लिखने की काबिलियत हासिल करके सीखने में स्वावलम्बी हो सकते हैं। सीखने में स्वावलम्बी होना जीवन-पर्यंत सीखने की पूर्व शर्त है। सीखने में स्वावलम्बी और स्वाध्यायी व्यक्ति ही आधुनिक लोकतांत्रिक और आर्थिक प्रक्रियाओं में सक्रिय और सार्थक भागीदारी कर सकेगा] क्योंकि वह जीवन के किसी भी मोड़ पर आवश्यकतानुसार नया ज्ञान अर्जित कर पाने में सक्षम होगा।

स्कूल में पढ़ने-लिखने को बढ़ावा देने के लिए अनेक प्रयासों की आवश्यकता है। इस दिशा में 'रूम टू रीड' कई राज्यों के सरकारी प्राथमिक स्कूलों में पुस्तकालयों की स्थापना करके एक साक्षर परिवेश के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है। कारगर तरीके से साक्षर होने की शर्त है कि व्यक्ति पढ़ने-लिखने में सक्षम हो और उसमें पढ़कर कुछ जानने और सीखने का ज़ज्बा भी हो। पढ़ने की काबिलियत हो, तभी पढ़ने की आदत भी विकसित होगी। दूसरी तरफ, अगर पढ़ने के आनन्द से विद्यार्थी सर्वथा अनजान हो तो पढ़ने की काबिलियत भी ठीक से विकसित नहीं होगी, क्योंकि वह अलग-अलग प्रकार की सामग्री पढ़ेगा ही नहीं। साक्षरता के इस व्यापक उद्देश्य की पूर्ति के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में बेहतर ढंग से संचालित एक पुस्तकालय हो।

'रूम टू रीड' के पुस्तकालय कार्यक्रम के तहत प्रकाशित अनियमितकालीन पत्रिका 'भाषा बोली' के इस अंक में सार्वजनिक पुस्तकालय की आधुनिक परिकल्पना को समझने की कोशिश की गई है। विशेषरूप से आधुनिक भारत के निर्माताओं ने पढ़ने-लिखने की संस्कृति के विकास के लिए पुस्तकालय नाम की संस्था को  आजादी के पहले और बाद के दौर में कितनी तवज्जो दी, यह जानना इस ऐतिहासिक घड़ी में उपयोगी हो सकता है।

इस अंक में आप निम्नलिखित लेख पढ़ सकते हैं :  

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य:

सार्वजनिक पुस्तकालयों का विकास - योगेन्द्र दत्त

शिक्षा नीति:

स्कूल में पुस्तकालय का विचार, अनुशंसाएँ, नीतिगत संकल्प और कानूनी प्रावधान

सांस्कृतिक पहल:

केरल का पुस्तकालय आन्दोलन और नागरिक शिक्षा - एम.पी. परमेश्वरन

आत्मकथ्य :

 पढ़ने-गुनने की जगह - राजेश उत्साही

सामाजिक जीवन को आकार देती किताबें - मणीश कुमार ठाकुर

विचार:

 गली वही मोहल्ला वहीः पर कहानी कहीं नहीं - चन्द्र प्रकाश

 बच्चों के लिए साहित्य या पाठ्यपुस्तक - चंदन यादव

 बाल पुस्तकालय के लिए अच्छी किताबों का चयन - कमलेशचन्द्र जोशी

कविता:

स्कूल की कविता - कुलदीप गर्ग

 

डाउनलोड करें: bhasa_boli__issue_1_2013.pdf

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

बच्चों को स्कूली किताबों के अलावा भी अन्य किताबें पढ़ने -देखने का अवसर मिलना चाहिए .उन्हें अपनी बात कहने का मौका भी मिलना चाहिए . लगता है अब कुछ हलचल होगी .

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