सीखने के प्रतिफल(Learning Outcomes)

By Madhav Patel | दिसम्बर 27, 2018

विद्यालयों में अध्यनरत छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर कई नए प्रयास किये जाते है इन सबका उद्देश्य विद्यालयी छात्रों में शैक्षिक गुणवत्ता का विकास और अच्छी उपलब्धि स्तर को हासिल करना होता है जिससे छात्रों के समग्र मूल्यांकन के माध्यम से विकास की एक निश्चित योजना बनाकर उनका उन्नयन किया जा सके किन्तु अवलोकन के द्वारा अधिकांशतः सोच के उलट तस्वीर देखने को मिलती है प्रायः ये देखने मे आता है कि शिक्षकों को जो प्रशिक्षण के दौरान बताया व सिखाया जाता है उसका वह 25% भी अपने विद्यालयों में सांझा नही करते हैं तथा परंपरागत शिक्षण शैली अपनाते है उन्हें ये समझ नही आता कि शिक्षण की विभिन्न पद्धतियो से शिक्षण गुणवत्ता व उसके विकास की गति को बल मिलने के साथ साथ सुनियोजित तरीके से अकादमिक प्रक्रियाओं द्वारा छात्रों को भयमुक्त एवं आनंददायी वातावरण में सीखने के अवसर अधिक मिलेंगे सीखना वास्तव में एक सतत व व्यापक जीवनपर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है वुडवर्थ के अनुसार"सीखना विकास की प्रक्रिया है"विगत तीन दशकों में सभी के लिए शिक्षा (इ.एफ.ए.) पर साहित्य ने शिक्षा की गुणवत्ता पर ज़ोर दिया है। इस पर नामांकन, ठहराव और उपलब्धि की दृष्टि से विचार किया गया। इसके अतिरिक्‍त शिक्षार्थियों की वांछनीय विशेषताओ, सीखने की प्रक्रिया, शैक्षिक सुविधाओं सीखने सिखाने सामग्री, विषय सामग्री, प्रशासन एवं प्रबंधन तथा सीखने के प्रतिफलों को भी सम्मिलित किया गया । सर्वशिक्षा अभियान तथा निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के 
लिए सतत रूप से ध्यान केंद्रित किया गया। राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनसुंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा विकसित सभी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखाओ तथा अन्य महत्वपूर्ण सरकारी पहलुओ में गुणवत्ता को प्रमुख लक्ष्य के रूप में शामिल किया गया है। इनमें विचार किया गया है कि सभी बच्चों को सीखने के मूलभूत अवसर उपलब्ध हों, साथ ही वैश्‍विक नागरिक बनने के लिए आवश्यक सभी हस्तांतरणीय कौशल अर्जित करने के अवसर मिलें। यह उन लक्ष्यों को नियत करने की माँग करता है जो स्पष्ट तथा मापने योग्य हों। अत: शैक्षिक प्रणाली के भीतर राष्ट्रीय एवं राज्य शैक्षिक निकायों को सूचित करना आवश्यक है कि प्रशासकों, योजनाकारों और नीति-निर्माताओ द्वारा लिए गए निर्णयों पर व्यवस्था कितने सचुारू रूप से कार्य कर रही है। राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर किए गए विभिन्न शैक्षिक सर्वेक्षण इसी दिशा में की गई पहल है। इसके अतिरिक्‍त, शाला एवं सामुदायिक स्तर के विभिन्न साझेदार भी शिक्षा में गुणवत्ता सुधार की दिशा में 
महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हाल ही की ग्लोबल माॅनिटरिंग रिपोर्ट (जी.एम.आर.-2015) के अनुसार भारत सहित अन्य विकासशील देशों में ‘शिक्षा तक पहुचँ ’ में प्रभावी सुधार हुआ है। हालाँकि गुणवत्ता अभी भी चिंता का कारण है। भारत में किए गए विभिन्न उपलब्धि सर्वेक्षण जैसे ‘असर’ (ASER) ने विभिन्न राज्यों में विद्यार्थियों के बुनीयादी कौशलों की उपलब्धि में व्यापक असमानताओं की जानकारी दी है। कक्षा-3 के राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (एम.एच.आर.डी./2014) ने भी इसकी पुष्टि की है। सर्वशिक्षा अभियान की, विगत कुछ वर्षाे में आयोजित जॉइंट  रिव्यू मिशन (जे. आर. एम) की रिपोर्टें भी इस बात का उल्लेख करती हैं कि राज्यों और संघ शासित प्रदेशों द्वारा शिक्षकों की नियुक्‍ति, समय पर शैक्षिक संसाधनों की आपूर्ति और नियमित माॅनिटरिंग के बावजूद भी बच्चों के सीखने के स्तर और अपेक्षित स्तर में फ़ासला रहा है। इस प्रतिवेदन में बच्चों के पठन स्तर और गणितीय कौशलों में गिरावट दर्ज़ की गई है, जो कि वर्तमान चिंता का प्रमुख विषय है। इस चिंता के मद्देनज़र जिस तरह से गुणवत्ता को ‘सीखने के प्रतिफल’ के रूप में परिभाषित किया गया है (जिन्‍हें सभी के द्वारा प्राप्‍त किया जाना है), खासकर पठन, गणितीय योग्यता और बुनियादी जीवन कौशल अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण है। बारहवीं पंचवर्षीय योजना में प्राथमिक शिक्षा के एक मख्यु लक्ष्य के रूप में बनिु यादी अधिगम (सीखना) और साथ ही गुणवत्ता के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सीखने के नियमित आकलन पर ज़ोर दिया गया है। यह सतत विकास के लक्ष्य तथा जी.एम.आर.-2015 की सिफ़ारिशों के भी अनुरूप है। इस प्रकार से क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीखने के प्रतिफलों के मूल्यांकन के माध्‍यम से गुणवत्ता पर नज़र बनाए रखना आवश्यक है। इसके साथ ही, आवश्यक है कि ज़मीनी स्तर पर शमिल साझेदार जैसे अभिभावक और सामुदाय के लोग सतर्क रहें। साझेदारों से प्राप्त प्रतिक्रिया से व्यवस्था अवगत होती है और साझेदारों के प्रति उत्तरदायी बनती है। इसके आधार पर व्यवस्था में सधुार के लिए उचित कदम लिए जा सकते हैंअकसर शिक्षकों में इस बात की स्‍पष्‍टता नहीं होती कि किस प्रकार का सीखना आवश्यक है तथा वे कौन से मापदड हैं  जिनसे इसे मापा जा सकता है। वे पाठ्यपुस्तक को संपूर्ण पाठ्यक्रम मानकर पाठों के अत में दिए गए प्रश्‍नों के आधार पर मूल्यांकन करते हैं। पाठ्यसामग्री के संदर्भ की भिन्नताओ तथा पढ़ाने के विभिन्न सिद्धांतों को वे ध्यान में नहीं रखते। पठन सामग्री में संदर्भानुसार भिन्‍नताएँ और अपनाई गई शिक्षण तकनीक में विविधता पर सामान्‍यतया ध्‍याननहीं जाता है, क्‍योंकि इनके आकलन की कोई कसौटी नहीं है। प्रत्येक कक्षा के सीखने के प्रतिफल शिक्षकों को केवल शिक्षा के वांछित तरीके अपनाने में ही सहायक नहीं है, बल्‍कि अन्य साझेदारों, जैसे– संरक्षक, माता-पिता, विद्यालय प्रबंध समिति के सदस्यों, समुदाय तथा राज्य स्तर के शिक्षा अधिकारियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने में उनकी भूमिका के प्रति सर्तक और ज़िम्‍मेदार भी बनाता है। स्पष्ट रूप से परिभाषित सीखने के प्रतिफल विभिन्न साझेदारों की जि़म्‍मेदारी तथा उत्तरदायित्वों को सुनिश्चित करते हुए और दिशा-निर्देश दे सकता है ताकि विभिन्न पाठ्यचर्या क्षेत्र से अपेक्षाओंकी पूर्ति हो सके.
बच्‍चे विद्यालय में अपने सीखने के अनुभवों  के साथ प्रवेश करते हैं। विद्यालय बच्‍चे के मौजूदा अनूभवों के आधार पर सीखने की आगामी प्रक्रिया के गठन का दायित्‍व उठाता है। इस प्रकार हम किसी भी स्‍तर की शरुआत बच्‍चे की ‘अधिगम शून्यता’ से नहीं करते। एक शिक्षक, जो कि विद्यार्थियाें के सीखने का परामर्शदाता और सगुमकर्ता है, को भिन्‍न शिक्षणशास्‍त्रीय तकनीकों और बच्‍चेकी सीखने में उन्‍नति के प्रति भी जागरूक बनाना आवश्‍यक है। यह मुद्दा नि:शल्‍क एव  अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, बारहवीं  पंचवर्षीय योजना और वैश्‍विक स्‍तर पर सतत विकास के लक्ष्‍यों में भी परि‍लक्षित होता है। शिक्षा में गुणवत्ता में सुधार बच्‍चों के सर्वांगीण विकास काे समेटे हुए है। अत: शिक्षा व्‍यवस्‍था में अनकुूल स्‍थितियों को सनिु श्‍चित करना आवश्‍यक है जो प्रत्‍येक बच्‍चेकी सीखने और प्रगति में सहायता करे। इस के लिए एक उपयुक्त वातावरण में गुणवत्तापूर्ण पाठ्यचर्या और उसके प्रभावी क्रियान्‍वयन के लक्ष्‍य को  पूर्ण करने वाले बहुआयामी उपागम की आवश्‍यकता है । निःशुल्क एव अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, सतत एवं
 व्‍यापक मूल्यांकन (सीसीई) पर बल देता है जो कि शिक्षक को प्रत्‍येक बच्‍चेकी सीखने संबंधी प्रगति की समझ विकसित करने, सीखने संबंधी कमियों को पहचानने, समय-समय पर उन्‍हें दूर करने तथा तनाव रहित वातावरण में उनकी वृद्धि तथा विकास में सहायता करता है। राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनसुंधान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा प्राथमिक एवं उच्‍च प्राथमिक स्‍तर पर सतत एवं व्‍यापक मल्‍यांकन मूल्यांकन संबंधी  उदाहरण स्‍वरूप पैकेज तैयार किए गए है। ये पुस्तिकाएं विषयानसार उपयुक्त उदाहरणों के साथ सतत एवं व्‍यापक मल्‍यांकन
मूल्यांकन के संदर्भ में एक समझ बनाता है कि सीखने-िसखाने की प्रक्रिया के दौरान सतत एवं मूल्यांकन का कैसे उपयोग करें। इस तरह वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में विद्यार्थी और शिक्षक के अलावा माता-पिता, समुदाय के सदस्‍य और शैक्षिक प्रशासकों को भी विद्यार्थियों के सीखने के बारे में जानने और उसके अनुसार बच्‍चों  की सीखने संबंधी उन्‍नति पर नज़र बनाए रखने की ज़रूरत है। इसके लिए उन्‍हें आवश्‍यकता है और उनकी माँग है कि कुछ मानदड उपलब्‍ध कराए जाएँ जिनकी सहायता से अपेक्षित सीखने के स्‍तर का आकलन व उसका पता लगाया जा सके । सीखने की निरन्तरता को ध्‍यान में रखते हुए व्‍यवस्‍था को यह जानकारी देना कि बच्‍चेने सटीक रूप से क्‍या सीखा, एक चनुौती भरा कार्य है। फिर भी राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनसुंधान और प्रशिक्षण परिषद (ए्नसीईआरटी) ने अपना एक प्रयास किया और एक ऐसा दस्‍तावेज़ तैयार किया जिसमें प्रारंभिक स्‍तर के समस्‍त पाठ्यचर्या क्षेत्रों के सीखने के प्रतिफलों को उनकी पाठ्चर्या संबंधी अपेक्षाओ और  शिक्षणशास्‍त्रीय प्रक्रियाओ को जोड़कर शामिल किया गया है विभिन्न प्रकार के शैक्षिक सर्वे व उपलब्ध डाटा यह बताते है कि बच्चों में स्कूल स्तरीय विषयों में सीखने का उपलब्धि स्तर निर्धारित स्तर के अनुरूप नही है इसमें जिस तरह के प्रयास होते रहे है इसमें शिक्षक अपना पाठ्यपुस्तक के आधार पर पाठ्यक्रम पूरा करा देते है परंतु यह बात स्पष्ट नही हो पाती की बच्चों को उन विषय वस्तु में किस प्रकार के अवसर देने की जरूरत है अर्थात सत्र के अंत मे बच्चों को क्या क्या आना चाहिए यह शैक्षिक अपेक्षाओं के रूप में परिभाषित किया गया है विद्यालय से संबंधित सभी हितग्राहियों को शामिल करते हुए सीखने की संप्राप्तियों (Learning outcomes)को निर्धारित किया गया है ये बेंच मार्क के रूप में चिन्हित किये गए है क्योंकि इनकी प्राप्ति के बगैर छात्रों के सर्वागींण विकास की बात उचित नही है
माधव पटेल

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