बाल भाषा विकास -एक प्रयोग

By AESAM | नवंबर 19, 2015

हम सभी जानते हैं कि शिक्षा के क्षेत्र मे बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए भाषा मूल स्तम्भ है| भाषा हमें समाज के हर पहलू के बारे मे शुरूआती समझ प्रदान करती है| हमारे बच्चे पारिवारिक परिवेश में भाषा को सीखना शुरु कर लेते हैं जो कि उनके स्कूल जाने से पहले तक पुख्ता हो जाती है| प्रयोगात्मक दृष्टी से इसका शुरुआती चरण हमारे परिवार और आस-पास के समाज में पूरा हो जाता है परन्तु इसके विस्तारित रूप की पहल स्कूल से ही होती है|

हाँ, स्कूल आने पर भाषा के साथ नए प्रयोग शुरू हो जाते हैं जिसमे शिक्षक बच्चे की मदद करते हैं| प्रत्येक शिक्षक के मदद कार्य विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से होते हैं| अगर इस विषय की कार्य विधि की गहराई मे जाएँ तो देखना होगा कि इसमें बच्चे के पास आजादी कितनी है? क्या वो ही स्वतंत्र माहौल बच्चे को मिलता है, जो उसको अपनी मातृभाषा को सीखने मे मिला था? क्या उसको समाज को अवलोकित करने का मौका मिलता है? क्या उसे पाठ्यक्रम के दबाव के बिना सीखने का मौका मिलता है? क्या उसे अपनी क्षमता और कुशलता के अनुरूप काम करने का मौका मिलता है? और कई सवाल...।

मेरे ख्याल से भाषा एक ऐसा औजार है जो जीवन को सहज और सरल बनाता है| भाषा की अभिव्यक्ति के बिना अकादमिक,विषयगत कार्य की कल्पना नहीं की जा सकती| ये शिक्षक वर्ग के शोध का विषय है| बालमन में इस तरह के ख्याल और समझ होना अभी थोडा जटिल काम है| उसे बस खुद के लिए मनोरंजक कार्य विधियों की जरुरत होती है जिनके द्वारा वो अपनी किताबों के साथ रिश्ता कायम रख सके| इसमे सबसे अहम है कि बच्चे की निर्णय लेने की क्षमता को विकसित करने के प्रयास किये जाएँ और उसे खुले मन से अपने विचार अभिव्यक्त करने के अवसर मिलें|

विद्या एंड चाइल्ड के दृष्टीकोण की बात करूँ तो हम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रणाली मे विश्वास करतें हैं| हम भाषा या विषयगत कार्य को सिखाने की विधियों की तलाश करने का प्रयत्न करते हैं जिससे बच्चे के सीखने के स्तर के अनुसार उसको मौका मिल सके| अपनी कक्षा में बैठ कर बच्चा स्वयं विषयों के साथ खेल सके| जहाँ उसे विषयों की तुलना के साथ-साथ हर एक विषय की समझ हो और वो दैनिक जीवन से उसका सम्बन्ध आत्मसात कर सके| भाषा का जिक्र इसलिए किया जा रहा है क्योंकि इसके उपयोग और प्रयोग का दायरा उनके दैनिक वार्तालाप और अन्य कार्यों मे समाहित है| तो क्या हमें उनके उत्साहवर्धन के लिए कुछ सोचना चाहिए? उनकी भाषागत अभिरुचि को विकसित करने के लिए थोड़ा सा प्रयास करना चाहिए? क्या पाठ्यक्रम के संदर्भ को शामिल करते हुए अन्य गतिविधियों की योजना बनाई जाये? जी हाँ, मैं उम्मीद करता हूँ आप सबका जवाब हाँ होगा|

इसी विचार को अमल मे लाने और धरातल पर लागू करने के लिए हमारे भाषा विकास कार्यक्रम दल ने योजना बनाई| जिसका मुख्य उद्देश्य कक्षा कक्ष मे की जा रही गतिविधियों और काम को मजबूती प्रदान करना था| इस योज़ना में बच्चों द्वारा लिखित कविता, कहानी, लेख आदि को प्रकाशित करने का समर्थन किया गया| हमने माना कि बच्चों को कुछ नया, रोचक और अपना काम पसंद होता है जिसे करते समय और करने के बाद उनको आनन्द की अनुभूति हो, जिसके माध्यम से विषय की रोचकता बनी रहे और इसमें मदद भी मिले, कुछ ऐसा जिससे विषय के काम के साथ-साथ उपलब्धियां भी साथ जुडती चलें, बच्चों को अपने मन की बात रखने का मौका मिले, बच्चे उस काम/विषय को बोझ न समझें, भाषा की पढाई करने पर फक्र महसूस करें, कुछ ऐसा काम जिसको दूसरों के सामने प्रस्तुत कर सकें, जो उनकी पहचान बने, एक भरोसा जो उन्हें खुद पर हो, जिससे बच्चों की कल्पनाशक्ति का विकास हो, सबसे महत्वपूर्ण- खुद को लेखक, कवि, आलोचक, समीक्षक के रूप मे महसूस करें । बच्चे आजादी से लिखना शुरू करें , उन पर किसी प्रकार की पाबंदियां न हों, लेखन विषय का चुनाव बच्चे खुद करें, लेखन विद्या का चुनाव वो खुद करें, प्रस्तुतीकरण का तरीका उनका का हो, उनकी अभिरुचियों का समावेश हो, वो सामाजिक अनुभवों को कागज पर उकेर पायें ।

योजना के समय चर्चा शुरू हुई तो ये बातें थोड़ी बड़ी और मुश्किल लग रही थीं| समय की सीमा भी थी| एक एक बच्चे के साथ काम करना था जो थोड़ा चुनौतीपूर्ण था| एक ही बात ने सबको हिम्मत दी कि शायद ये सब बच्चों को रोचक लगे और वो इसमें अपनी शत-प्रतिशत भागीदारी दें| काम शुरू किया गया| दल के सदस्यों ने अपने-अपने समूह के साथ कम शुरू किया| काम के दौरान बच्चों के काफी सवालों का सामना करना पड़ा| उनमे से एक सवाल था कि कहानी,कवितायेँ और किताबें लिखना बड़े लोगों का काम है हम बच्चे ये कैसे लिख पाएंगे? इस पर पूरी बातचीत हुई जिसमें कहानी और कविता के प्राथमिक स्वरुप से लेकर उसकी रचना की गई| ये शायद आपको एक साधारण बात लगे लेकिन बच्चों को सबसे ज्यादा ये ही बात परेशान करने लगी कि उनके लेख किसी को पसंद नहीं आने वाले हैं क्योंकि उन्होंने कभी किताबों में लिखा ही नहीं| कुछ बच्चों ने अच्छा लिखने का दबाव भी मन ने बना लिया था| सदस्य दल ने इस विषय पर मीटिंग्स और फोन कॉल पर काफी चर्चाएँ की जिनमें तय हुआ कि हम बच्चों से बिना कोई विषय दिए लिखने का मौके देंगे, वो शायद भाषागत गलतियाँ करें जिन पर अभी सुधार कार्य नहीं करेंगे, वो हिंदी या अंग्रेजी भाषा का चुनाव अपने मन से कर सकते है, लेख के विषय का चुनाव भी खुद करें, उन्हें जो पसंद है उसी शैली में अपनी बात लिखें| यह योजना काम आई और बच्चों ने अपने मन की बातें कागज पर उतरना शुरू कर किया|
लिखने के बाद उन पर ग्रुप में चर्चाएँ की गईं और एक दुसरे को जरुरी सुझाव दिए गये| कंप्यूटर पर टाइप करने का काम भी बच्चों ने पूर्ण किया और अंततः यह प्रयोग सफल रहा|

ऐशम दीन, कार्यक्रम समन्यवयक, विद्या एंड चाइल्ड

editor_hi का छायाचित्र

ऐशम जी आपके कार्यक्रम के बारे में जानकर अच्‍छा लगा। बच्‍चों के साथ आपने जो काम किया है, उसके बारे में विस्‍तार से लिखकर हमें अलग से मेल से भेजें। हम उसे लेख के रूप में प्रकाशित करेंगे। यह बॉक्‍स किसी विषय विशेष पर चर्चा के लिए है।

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