अधिगम प्रक्रिया

By Madhav Patel | मार्च 5, 2019

अधिगम जिसको हम सामान्य शब्दों में सीखना कहते है ऐसी प्रक्रिया है जो सम्पूर्ण जीवन संचालित रहती है यह एक अनवरत चलनेवाली महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। वैसे तो मनुष्य भ्रूणीय अवस्था से ही सीखने लगता है और सारे जीवन भर कुछ न कुछ सीखता रहता है। धीरे-धीरे वह अपने को वातावरण से समायोजित करने का प्रयत्न करता है। जब वह स्वयं को समायोजित करता है तो इस समायोजन के दौरान वह अपने अनुभवों से अधिक लाभ उठाने का प्रयास करता है। इस पूरी प्रक्रिया को मनोविज्ञान की भाषा में सीखना कहते हैं। इसी क्षमता पर व्यक्ति का विकास निर्भर करता है जिस व्यक्ति में सीखने की जितनी अधिक शक्ति होती है, उतना ही उसके जीवन का विकास होता है।वास्तव में सीखने की प्रक्रिया व्यक्ति की शक्ति और रुचि के कारण विकसित होती है। बच्चों में स्वयं अनुभूति द्वारा भी सीखने की प्रक्रिया होती है, जैसे-बालक किसी जलती वस्तु को छूने का प्रयास करता है और छूने के बाद की अनुभूति से वह यह निष्कर्ष निकालता है कि जलती हुई वस्तु को छूना नहीं चाहिए। अधिगम की यह प्रक्रिया सदैव एक समान नही रहती है। इसमें प्ररेणा के द्वारा वृद्धि एवं प्रभावित करने वाले कारकों से इसकी गति धीमी पड़ जाती है।
प्रसिद्ध अमेरिकी मनोवैज्ञानिक ई॰एल॰ थार्नडाइक ने सीखने की क्रिया को मुख्यतः दो प्रकार के नियमो में विभक्त किया है

1मुख्य नियम (Primary Laws) इसके अंतर्गत तीन प्रकार के नियम समाहित है
1. तत्परता का नियम - जब व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए स्वतः अपनी इच्छा से तैयार होता है तो उसे इस कार्य को करने में आनंद की अनुभूति होती है तो वह इसे तत्परता से सम्पन्न करता है तथा इसे सबसे पहले सीखता है साथ ही उसके सीखने की गति भी बहुत तीव्र होती है

2. अभ्यास का नियम - इसकी बात करे तो पाते है कि इस नियम के अनुसार व्यक्ति जिस काम को बार बार लगातार करता है तो उसको संबंधित कार्य मे महारत हासिल हो जाती है अर्थात बार बार करने से व्यक्ति कार्य को जल्दी सीख जाता है जैसे साइकिल चलाना आदि। इसे उपयोग तथा अनुपयोग का नियम भी कहते हैं।

3. प्रभाव का नियम - इसके अनुसार जिस कार्य को करने पर व्यक्ति पर अच्छा प्रभाव पड़ता है अर्थात उसको सुख का या संतुष्टि मिलती है उन्हें वह सीखने का ज्यादा प्रयत्न करता है एवं जिन कार्यों को करने पर व्यक्ति पर बुरा प्रभाव पडता है उन्हें वह करना छोड़ देता है। इस नियम को सुख तथा दुःख या पुरस्कार तथा दण्ड का नियम भी कहा जाता है।

गौण नियम
1. बहु अनुक्रिया नियम - इसके अनुसार जब किसी व्यक्ति के सामने नई समस्या आने पर वह उसे सुलझाने के लिए वह अनेक तरीके से हल ढूढने का प्रयत्न करता है। वह यह तब तक दुहराता रहता है जब तक समस्या का सही हल न खोज ले हल खोजने पर ही उसे संतोष मिलता है थार्नडाइक का प्रयत्न एवं भूल द्वारा सीखने का सिद्धान्त इसी नियम पर आधारित है।

2. मानसिक स्थिति या मनोवृत्ति का नियम - इसके अनुसार जब व्यक्ति किसी काम को सीखने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहता है तो वह उसे शीघ्र ही सीख लेता है। और जब व्यक्ति मानसिक रूप से किसी कार्य को सीखने के लिए तैयार नहीं रहता तो उस कार्य को वह सीख नहीं सकता

3. आंशिक क्रिया का नियम - इस नियम के अनुसार व्यक्ति किसी समस्या को सुलझाने के लिए अनेक क्रियायें प्रयत्न एवं भूल के आधार पर करता है। वह अपनी अंर्तदृष्टि का उपयोग कर आंषिक क्रियाओं की सहायता से समस्या का हल ढूढ़ लेता है।

4. समानता का नियम - इसके अनुसार किसी समस्या के सामने आने पर व्यक्ति पूर्व कार्यो के अनुभव या परिस्थितियों में समानता पाये जाने पर उसके अनुभव स्वतः ही स्थानांतरित होकर सीखने में मदद करते हैं।

5. साहचर्य परिवर्तन का नियम - इसके अनुसार व्यक्ति प्राप्त ज्ञान का उपयोग अन्य परिस्थिति में या सहचारी उद्दीपक वस्तु के प्रति भी करने लगता है।
6.आंशिक क्रिया का नियम-इसके अनुसार किसी कार्य को यदि छोटे छोटे टुकड़ों में विभाजित करके सीखा जाता है तो उस कार्य को सरलता से तथा जल्दी सीखता है ।यदि शिक्षक सम्पूर्ण विषय सामग्री का छोटे छोटे अंशो में विभाजित करके छात्रों के समक्ष प्रस्तुत करता है तो छात्रों को सीखने में आसानी रहती है

शिक्षण-अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Influencing Teaching-Learning Process)

1 बालक का शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य -
प्रायः ऐसा देखा जाता है कि शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ्य बालक सीखने में अधिक रुचि लेता है और जल्दी सीखता भी है शारीरिक और मानसिक दृष्टि से पिछड़े बच्चे प्रायः पढ़ने लिखने में कमजोर रहते हैं और वे देर से सीखते हैं।
2 परिवक्वता-
छात्रों को सिखाने वाली क्रियाएं उनकी आयु और मानसिक स्तर के अनुरूप होनी चाहिए मानसिक और शरीरिक परिपक्वता सीखने में बहुत सहायक होती है।

3 सीखने की इच्छा-
सीखना बहुत कुछ व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है जिस बात को सीखने के लिए बच्चों में प्रबल इच्छा होती है, उसे सीखने उतना ही शीघ्र होता है। उनकी इच्छा के विरूद्ध उन्हें कुछ नहीं सिखाया जा सकता है।

4 अभिप्रेरणा –सीखने के लिए छात्रों को प्रेरित करना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए समय-समय पर प्रशंसा, प्रोत्साहन जरूरी है जिससे सीखने वालो की गति और संख्या में बढ़ी होती है तथा दूसरे इससे प्रेरित होते है।

5 विषय सामग्री का स्वरूप -प्रत्येक स्तर के छात्रों के लिए उनकी बुद्धि, रुचि एवं अभिक्षमता के अनुरूप पाठ्यवस्तु सरल, रोचक एवं अर्थपूर्ण होने पर छात्र उन्हें रुचिपूर्ण एवं शीघ्रता से सीखते है। कठिन, नीरस तथा अर्थहीन विषय-सामग्री बच्चे शीघ्रता से नहीं सीख पाते हैं

6 उचित वातावरण-अधिगम प्रक्रिया में सभी प्रकार का वातावरण चाहे वह
भौतिक एवं सामाजिक वातावरण हो दोनों ही शिक्षण अधिगम को प्रभावित करते हैं। शुद्ध वायु, उचित प्रकाश, शान्त वातावरण एवं मौसम की अनुकूलता के बीच बच्चे शीघ्र सीखते है। इसके अभाव में वे शीघ्र थक जाते हैं तथा अधिगम प्रक्रिया बाधित होती है।

7 शारीरिक एवं मानसिक थकान
शिक्षण की अधिगम प्रक्रिया में समय-सारिणी का बड़ा महत्व है। कठिन विषय थोड़े समय में ही छात्रों का थका देते हैं। इसलिए समय सारिणाी में कठिन विषयों को पहले एवं सरल विषयों को बाद में स्थान दिया जाता है। कालांशो के बीच अंतर का भी ध्यान रखना चाहिए, इससे थकान का प्रभाव कम हो जाता है तथा छात्र जल्दी सीखते है। थकान की स्थिति होने पर अधिगम प्रक्रिया बाधित होती
8 प्रशंसा और निंदा
प्रशंसा और नींद दण्ड और पुरुस्कार का ही प्रकार है मनोवैज्ञानिकों का मत है कि प्रशंसा तीव्र बुद्घि वाले बालको की अपेक्षा सामान्य और मंद बुद्धि वाले बालको के लिए प्रभावशाली प्रेरक है
इनके अतिरिक्त ये कारक भी अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करते है
पुरुस्कार एवं दंड
स्पर्धा और सम्मान
अभ्यास का उचित विभाजन
थकान
अध्यापक का व्यवहार
पाठ्यक्रम की संरचना
ध्यान और रुचि
भोजन
शिक्षण विधि

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