अग्रेंजी माध्यम के छात्रों की हिन्दी विषय के प्रति उदासीनता

By kamleshkumarsaini | अक्टूबर 19, 2018

नमस्कार,
यह देखने मेंं आया है की अग्रेंजी माध्यम के छात्रों की रुचि हिन्दी विषय के प्रति उदासीन हैं मैं भी एक अध्यापक हु ,जब मेरे साथी मेरे से इस विषय पर चर्चा करते है तब यह लगता हैं कि हमें कुछ नया करना चाहिए जिससे उन छात्रों मे भी हिन्दी विषय के प्रति रुचि उभर सके । मैं आप सभी महानुभावों से यह निवेदन करता हूं की अपेक्षित सूझाव प्रदान करें

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शिक्षा मे नवाचार हेतु

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यह देखने मेंं आया है की अग्रेंजी माध्यम के छात्रों की रुचि हिन्दी विषय के प्रति उदासीन हैं मैं भी एक अध्यापक हु ,जब मेरे साथी मेरे से इस विषय पर चर्चा करते है तब यह लगता हैं कि हमें कुछ नया करना चाहिए जिससे उन छात्रों मे भी हिन्दी विषय के प्रति रुचि उभर सके । मैं आप सभी महानुभावों से यह निवेदन करता हूं की अपेक्षित सूझाव प्रदान करें
हिंदी विषय या भाषा के प्रति उदासीनता सिर्फ बच्चों में ही नहीं बल्कि बड़ों में भी है| हिंदी के प्रति यह भाव बच्चों को बड़ों से ही देखने सीखने को मिले हैं | इसके जिम्मेदार आप हम सब ही है | क्योंकि हम ही बच्चों के मन मे यह दृष्टिकोण पैदा कर देते हैं कि कोई एक भाषा किसी दूसरी भाषा से कम या जयादा महत्वपूर्ण है | हम ही बच्चों को जोर देते हैं कि अंग्रेजी अच्छे से बोलना सीखो पढ़ना सीखो | अंग्रेजी विषय को खूब मन लगाकर पढ़ो हिंदी तो ऐसे ही जान जाओगे | हिंदी विषय पढ़ने में कुछ नहीं रखा हिंदी तो सिर्फ परीक्षा में अंक बढ़ाने के लिए है उसे बिना मेहनत किये उस विषय में पास हो जाओगे | बच्चों के सामने ही अंग्रेजी भाषा बोलने समझने वाला व्यक्ति/बच्चे की क़द्र हम हिंदी भाषी व्यक्ती/बच्चे से कहीं बढ़कर करते हैं | अंग्रेजी बोलने को हम शान समझते हैं यही सब बच्चा देखता और समझता है | हम ही उन्हें बिना सोचे समझे किसी भी ऐसे स्कूल में सिर्फ इसलिए प्रवेश दिलाते है कि जहाँ हमारा बच्चा फर्राटेदार अंग्रेजी बोले भी और पढे भी | हिंदी माध्यम कि जगह बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में बिना सोचे समझे दाखिला दिलाना भी बच्चों के मन में यह विकार बढ़ने देता है | अंग्रेजी माध्यम के नाम पर खुले स्कूलों में जाकर भले ही बच्चे अंग्रेजी बोलना पढ़ना सीखे ना सीखे पर हम खुश हैं कि हमारा बच्चा अंग्रेजी जो शायद हम में से भी बहुतों को अच्छी तरह बोलनी और समझनी ना भी आते हो पर फक्र करते है कि बच्चा अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहा है | चाहे स्कूल हो या घर या बाहर हर जगह बच्चा अंग्रेजी कि लोकप्रियता को देखता है और उसे हिंदी कमतर भाषा लगने लगती है और वह इसकी अवहेलना करने लगता है | भले ही अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तक अपना महत्व रखती है पर हमारे परिवेश के ज्यदातर बच्चों के घर या आसपास अंग्रेजी भाषा को सुनने बोलने समझने का माहौल ही नहीं मिल पाता तो बच्चे इस अपरिचित भाषा को सीखें कैसे | मैं किसी भाषा कि अवहेलना नहीं कर रही किन्तु कोई भी भाषा किसी अन्य भाषा से कमतर नहीं होती और किसी भी भाषा को सीखने का जब तक महौल नहीं होगा उसे आसानी से सीखा नहीं ज सकता | गलती हमारी है हम एक भाषा से दूसरी किसी भाषा को कम ज्यदा के तराजू में तौलने लगते हैं | और यही अनुकरण फिर बच्चे भी करते हैं |

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