स्‍कूल चलें संग

जमीलउद्दीन शेख

विद्यालय में विद्यार्थियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए अध्‍यापक को तरह तरह के प्रयास करने पड़ते हैं। उसे यह भी देखना होता है कि विद्यार्थी के घर की स्थिति कैसी है, क्‍या समस्‍याएँ हैं, अगर विद्यार्थी विद्यालय नहीं आ रहा है तो उसका कारण क्‍या है। अध्‍यापक जमीलउद्दीन शेख अपने ऐसे ही कुछ उदाहरणों का जिक्र यहाँ कर रहे हैं।


हंसराज का मैं यहाँ जिक्र करना चाहूँगा। मैं एक बार दीपक कुमार सेनी को बुलाने घर पर गया। वह जुलाई में स्कूल खुलने के कई दिनों बाद तक भी स्कूल नही आया था। मैं जब उसके घर गया तो उसकी माँ रोटी पका रही थी। उसका भाई हंसराज भी वहाँ बैठा हुआ था। मैंने व मेरे साथी नासिर जी ने दीपक को स्कूल भेजने के लिए कहा। तब उसकी माँ ने कहा कि माडसाब अभी इसकी ड्रेस नहीं सिली इसलिए नहीं जा रहा। हमने उससे कहा कि कोई बात नहीं ड्रेस भी सिल जाएगी तुम तो इसे अभी हमारे साथ स्कूल भेजो।

पास ही बैठे हंसराज के बारे में पूछा कि इसे स्कूल क्यों नहीं भेजतीं ? तब तक उसका पिता भी वहाँ आ चुका था। दोनों ने यह कहा कि हम तो इसे समझाकर हार गए स्कूल जाने की हाँ ही नहीं भरता। हमने बच्चे से बात की। समझाया कि बेटा पढ़ाई जीवन में बहुत जरूरी है। हम यह बातचीत करके स्कूल आ गए। दूसरे दिन हंसराज का पिता उसे लेकर आया कि माडसाब यह पढ़ना चाहता है। हमने समझा कि शायद मारपीट कर लाया होगा। स्वयं बच्‍चा अपनी मर्जी से नहीं  आया होगा। हमने पिता से कहा कि आप इसे छोड़ जाएँ और स्कूल आने दें। जब बच्‍चा निरन्तर स्कूल आने लगा तब हमने पिता को बुलाकर उसको कक्षा 3 में प्रवेश दिया। आज हमें खुशी होती है कि वह इस समय स्‍कूल का होनहार बच्‍चा है। यह सम्पर्क का ही व्यापक प्रभाव था।

इसी प्रकार सोना धाकड़ भी सम्पर्क से ही शिक्षा से जुड़ी हुई बालिका है। मैं एक दिन सोना धाकड़ की बहन मैना धाकड़ को बुलाने उसके घर गया तब उसकी माँ सो रही थी। सोना धाकड़ अपनी छोटी बहन को खिला रही थी। मैंने मैना के बारे में पूछा कि वह स्कूल नहीं जा रही है। मेरी आवाज सुनकर बच्ची की माँ उठ गई, उसने कहा कल से भेजेंगे। मैंने बड़ी बच्ची के बारे में बात की। पूछा कि यह कौन से विद्यालय में जाती है। तो माँ ने बताया कि इसका स्कूल छुड़ा दिया है। मैं काम पर चली जाती हूँ, यह छोटी बहन को संभालती है। उस लड़की का इस तरह घर पर छोटी बहन को संभालने के कारण स्कूल नहीं जाना मुझे अन्दर तक कचोट गया। मैंने उसकी माँ को समझाया कि आप इस छोटी बच्ची की खातिर इस बच्ची का जीवन नही बिगाडे़ं। उसके पिता से सम्पर्क कर उसको भी समझाया। उन्‍होंने दूसरे ही दिन बालिका को स्कूल मे भर्ती करवा दिया। हंसमुख स्वभाव की वह बालिका जब शाला आती है तो मेरे मन को बहुत शान्ति प्राप्त होती है।

कक्षा 5 में अध्ययनरत जावेद खानसलमान खान निजी विद्यालयों से हटाकर लाए गए, उद्वण्डी छात्र थे। उनके पिता प्रवेश के समय यह कह गए कि इनको मारो पीटो, इनके टुकडे़ कर दो, हम तो इनसे परेशान हो गए। मैंने उनको भर्ती कर लिया। लेकिन सलमान ने 15 दिन में ही स्कूल को अपने सिर पर उठा लिया। हम  सबने मिलकर यह फैसला किया कि इसके पिता को बुलाकर इसका नाम शाला से काट दिया जाए। उसके पिता को बुलाया और कहा कि आप अपने लड़के को कहीं और पढा़एँ। हम इसकी शैतानी से परेशान हैं। पिता ने कहा कि मास्टर साहब यह लड़का आपके स्‍कूल में ही पढ़ेगा। आपको जो तरीका अपनाना हो अपनाओ, यह लड़का मर भी गया तो मैं आपसे उफ भी नहीं कहूँगा। मैंने व मेरे साथी नासिर जी ने उस पर मेहनत की, धीरे-धीरे उसमें आश्चर्यजनक परिवर्तन आता चला गया। आज जावेद व सलमान कक्षा की अग्रिम पंक्ति में बैठने वाले  बच्‍चे हैं। जावेद की रुचि गणित में अधिक है। सलमान की रुचि गणित व अँग्रेजी में समान रूप से देखने को मिलती है। यह सब भय मुक्त वातावरण , स्नेह प्रेम व शाला में खिलाए जाने वाले खेलों का प्रभाव है।

कक्षा 5 में ही अध्ययनरत एक जिन्दादिल हंसमुख स्वभाव का लड़का रामफूल बैरवा है। यदि मै इसके परिवार के सतत् सम्पर्क में नहीं रहता तो यह पढ़ाई छोड़ चुका होता। सत्र के प्रारम्भ में जुलाई माह में लगभग 10-15 दिन तक यह बच्‍चा पढ़ने नहीं आया। मैं एक दिन इसके घर पर गया। यह मुझे घर पर ही मिल गया। घर में इसकी माँ और छोटे भाई-बहिन थे। जब मैंने इसके शाला नहीं आने के बारे में बातचीत की तो इसकी माँ ने दुख भरे लहजे में बताया कि माडसाब न तो ड्रेस है, न फीस के पैसे, न कापियाँ और न ही किताबों के लिए पैसे हैं। इससे भी ज्यादा दुख की बात उसने और बताई। उसने कहा कि कल शाम को घर पर खाना नहीं बना बच्चे भूखे ही थे। अभी मोहल्ले में से आटा उधार माँग कर लाई हूँ । इस बात को सुनकर मै अन्दर से एकदम टूट सा गया। मै अपने आँसू नही रोक सका। फिर भी मैंने हिम्मत करके उसकी माँ से कहा कि तुम इसे स्कूल भेजो, ड्रेस और फीस की चिन्ता मत करो। मैंने उस छात्र को अपने पास से एक बस्ता, कापियाँ, निशुल्क पाठ्य पुस्तकों से पुस्तकें, ज्यामिति बॉक्स दिया और उससे कहा कि फीस की परवाह मत करना। ड्रेस सिलेगी तब सिल जाएगी। आज वह बच्‍चा निरन्तर स्कूल आ रहा है और अपने बात करने के अन्दाज से कक्षा के वातावरण को जीवन्त बनाए रखता है।

कक्षा 4 में अध्ययनरत अशफाक खान अपने पिता के मदरसा पैरा टीचर से प्रबोधक बन जाने के कारण मदरसे से मेरे स्कूल में आया था। शिक्षण में बहुत पिछड़ा हुआ था। गुस्सा करना, छोटी -छोटी बातों मे रोना उसकी आदत थी। किन्तु यहाँ के वातावरण में धीरे-धीरे उसमे बदलाव आया जो बच्‍चा जोड़ ,बाकी, गुणा, भाग तक नहीं जानता था वही बच्‍चा वर्ष के अन्त में जब परीक्षा परिणाम आया तो उस कक्षा के अन्‍य बच्‍चों मोईन खान,  राजकुमार गोस्वामी, नरेश हेरवाल को भी पीछे छोड़ते हुए आगे निकल गया था।

यह कई सारे उदाहरण हैं जो हमें प्रयास के फलस्वरूप परिवर्तन के रूप मे देखने को मिले हैं।(ये सभी उदाहरण सत्र 2009-10 में राजकीय प्राथमिक विद्यालय शोप, पंचायत समिति उनियारा, टोंक, राजस्‍थान के हैं।)


जमीलउद्दीन शेख , वर्तमान में राजकीय प्राथमिक विद्यालय, औंकारपुरा की ढानी , पंचायत समिति उनियारा, टोंक, राजस्‍थान में अध्‍यापक हैं।

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om parkash sharma का छायाचित्र

शिक्षक वास्तव में वही है जो अपने प्रयासों से बालक के व्यवहार में परिवर्तन ला दे। आज इसी प्रकार के अध्यापकों की देश को आवश्यकता है।

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