शिक्षक-शिक्षार्थी सम्बन्ध कैसे हों : एक शिक्षिका की नजर से

विद्यालय की अवधारणा में बहुत सारी बातों, विचारों व प्रक्रियाओं को शामिल किया गया है। अक्सर उन पर शिक्षक समाज में हर अवसर पर बात करने के अवसर भी निकाले जाते रहे हैं। विद्यालय की संरचना को और ठोस रूप देने या यूँ कहा जाए, कि विद्यालय के आदर्श स्वरूप को परिभाषित करने को हर शिक्षक तत्पर भी दिखाई देता है क्योंकि शिक्षक तभी शिक्षक है जब विद्यालय है। नहीं तो शिक्षक का अपना कोई स्वरूप समाज में बनता दिखाई नहीं देता। एक समय था जब शिक्षक का स्वरूप समाज में अलग तरह का था। विद्यालय के भौतिक स्वरूप व संसाधनों का इतना महत्व नहीं था जितना जैविक परिस्थितियों का महत्व है। शायद इसलिए एक शिक्षक ‘गुरु’ ज्यादा शिक्षक कम होता था। गुरु परम्परा को आज का आधुनिक शिक्षा ढाँचा नकारता है।

मैंने अधिकांशतः यह देखा है कि जब शिक्षक वर्ग किसी समूह में बैठता है तो अक्सर एक विद्यालय को बेहतर विद्यालय कैसे बनाया जाए या आदर्श विद्यालय कैसे बने ? इन प्रश्नों पर चर्चा होती है तो ज्यादातर जो शिक्षक वर्ग के विचार हैं वो विद्यालय के भौतिक स्वरूप, प्रबन्ध विकास पर्यावरण स्वच्छता, अनुशासन, नामांकन, ठहराव तथा विद्यालय के संचालन को लेकर अधिक प्रभावी दिखाई देते हैं। वास्तव में एक विद्यालय कब एक बेहतर विद्यालय है, इसकी मूल अवधारणा पर चर्चा के अवसर बहुत कम होते हैं। क्यों ? आखिर क्यों शिक्षक वर्ग बचता है हर बार इन चर्चाओं से कि विद्यालय में शिक्षक व शिक्षार्थी सम्बन्ध कैसे हों? और मेरे विचार से शायद ये इसलिए है, क्योंकि विद्यालय का भौतिक स्वरूप बहुत सुन्दर बना देना इतना मुश्किल नहीं है, जितना कि शिक्षक व शिक्षार्थी के मानवीय सम्बन्धों को सुन्दर बनाना। क्योंकि इन सम्बन्धों को सुन्दर बनाने में शिक्षक को स्वयं भी छात्र बनना पड़ता है।

यहाँ सुन्दर शब्द से मेरा तात्पर्य है, सम्बन्धों की खूबसूरती। मैंने ऊपर एक बात कही है कि शिक्षक को वह दूरी जो हर विद्यालय में अमूमन दिखाई देती है शिक्षक- शिक्षार्थी के बीच उसको पाटना होता है और तभी शिक्षार्थी यानि बच्‍चे शिक्षक से जुड़ाव महसूस करते हैं, उसके मन का डर दूर होता है। वह अपने विचारों को खुलकर अभिव्यक्त कर पाते हैं और सीखने-सिखाने की प्रक्रियाओं में बेझिझक शामिल होते  हैं।

बच्‍चा जिस परिवार व परिवेश से आता है। उसके लिए नवीन परिस्थितियाँ और माहौल मन में अन्तर्द्वन्द् उत्पन्न करता है। ऐसे में बच्‍चे के लिए सीखना व शिक्षक के लिए सिखाना ये बहुत बड़ी चुनौती होती है पर शिक्षक वर्ग ने इस को कभी चुनौती नहीं माना। सीखना-सिखाना को मात्र एक कार्य माना है, जिसे मशीन की भाँति बस करते हुए चलते जाना है। कक्षा में जाकर पाठ्यपुस्तक, चॉक डस्टर उठाना, विषयवस्तु पर बातचीत करने का कार्य करता है। पाठ पढाना, अभ्यास प्रश्न करवाना, गृहकार्य देना, गृहकार्य जाँच करना, निश्चित समयावधि में मूल्यांकन करना एवं अन्तिम लक्ष्य परीक्षा परिणाम तक पहुँचना। इसके अलावा कभी बच्‍चे से कोई अपेक्षा न तो शिक्षक करता है न शिक्षार्थी को करने देता है। क्योंकि शिक्षक वर्ग का मानना है कि शिक्षक बच्‍चे में दूरी होना आवश्यक है वर्ना वह सीखेगा नहीं। क्योंकि दूरी रहेगी तो डर रहेगा और डर रहेगा तो वो शिक्षक की बात मानेगा और सीखेगा भी। और इसी मानसिकता ने हमें शिक्षा के वास्तविक स्वरूप तक जाने ही नहीं दिया। यह हमने कभी नहीं सोचा कि बालमनोविज्ञान बच्‍चों के सीखने के बारे में क्या कहते है, यह कभी अध्ययन किया नहीं। हमें उन अनुसंधानों को पढ़ना चाहिए, कैसे शिक्षक व बच्चों के अच्छे सम्बन्ध बच्चों के सीखने में मदद करते है।

हम लोग शिक्षक व बच्चे के सम्बन्ध के बारे में क्या सोचते हैं-

  1. शिक्षक बहुत कुछ जानता है बच्‍चा कुछ नहीं जानता।
  2. शिक्षक बड़ा होता है और बड़ों का सम्मान करना उसका नैतिक कर्तव्य है।
  3. शिक्षक व शिक्षार्थी को सीखने-सिखाने के दौरान दूरी रखना चाहिए।
  4. कुछ नियम हैं जो विद्यार्थियों को पालन करना अनिवार्य है।
  5. शिक्षार्थी को सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई पर (किताबों) ध्यान देना चाहिए।
  6. अनुशासन छात्र के जीवन को आगे ले जाता है।

ऊपर जो पाँच छः बातें जो मैंने लिखी हैं वो वास्तव में सिखाने में हमारी कितनी मदद करती हैं, इस पर शिक्षक को विचार करना चाहिए। क्योंकि अगर बच्‍चे को इन नियमों का पालन करना पड़ता है तो ये शिक्षक व शिक्षार्थी के बीच कभी अपनत्व व खूबसूरत सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकते। जो दूरी पहले थी,वो आज भी है और आगे भी बनी रहेगी और शिक्षकों के सामने जो चुनौती है वो हमेशा बनी रहेगी और ये सवाल उठते ही रहेंगे कि बच्‍चे के साथ कितने ही प्रयास कर लिए जाएँ वह नहीं सीख पाता है।

अगर इस सम्बन्ध को लेकर मेरे व्यक्तिगत विचार जाने जाएँ तो मेरा मानना है कि ‘‘शिक्षक-शिक्षार्थियों से वैसा ही व्यवहार करे जैसा वह स्वयं के लिए चाहता है तो शायद ये सम्बन्ध गहरे होंगे।’’ जब भी कक्षा-कक्ष में जाएँ मुस्कान साथ लेकर जाएँ। जाते ही उनसे अनौपचारिक बातचीत करें, माहौल को सीखने का बनाना हो तो पहले बच्‍चों से हँसकर बातचीत करें। उनसे विद्यालय आने व नहीं आने के कारणों को भी जानने का प्रयास करें। शिक्षक का व्यवहार बच्‍चे को विद्यालय से जोड़ने में काफी मदद करता है। कभी बच्‍चों के बीच बैठने का अवसर मिले तो उसे न छोड़ें। मैंने कई बार ये अनुभव किया कि बच्‍चे मेरे बहुत करीब आकर मुझे छू कर बात करना चाहते हैं। कुछ सवाल पूछते हैं। पर मुझे कभी याद नहीं की मैंने उनको डाँटा या फटकारा हो।

किसी दिन उनका मन पढ़ने में न हो तो पूरा कालांश सिर्फ बातचीत करना, उनके बारे में जानना, उनके अपने बारे में बताना, मुझे बहुत अच्छा लगता है।

अभी हाल ही का मेरे वर्तमान विद्यालय का अनुभव शेयर कर रही हूँ। मैं कक्षा नवीं में सामाजिक विज्ञान पढ़ाती हूँ। तो कक्षा में पहुँचते ही एक दिन मैंने देखा कि बच्चे पर्याप्त संख्या में उपस्थित नहीं थे। मुझे लगा आज पढ़ाने के बजाय इनसे बातचीत की जाए। मैंने कहा कि बताओ आज हमें पढ़ना चाहिए या नहीं ?  जैसा कि अपेक्षित था, वैसा ही जवाब मिला, कि पढ़ने का मन नहीं है। मैंने कहा चलो बातें करते हैं। तो सब एक-दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुराने लगे, शायद उनको ये आश्चर्य लगा होगा। फिर एक बच्‍चा बोला मैडम जी क्या बात करेंगे। तो मैंने कहा जो भी तुम लोग कहो, और मैंने बातचीत शुरू की। लेकिन उससे पहले मैंने कहा कि देखा बातचीत करने से पहले एक-दूसरे का जानना जरूरी है। तो पहले तुम सब अपने बारे में बताओ। मैंने उनसे उनके नाम, निवास स्थान व पारिवारिक वातावरण को लेकर कुछ बातचीत की सब बहुत खुश हुए। जब सब अपने बारे में बता चुके तब मैंने उनसे कहा कि मैंने तुम्हारे बारे में जाना, तुम नहीं जानना चाहोगे मेरे बारे में ?  तो वो हल्के से मुस्कुरा दिए। मैंने कहा मेरा नाम नहीं जानना चाहोगे ? तुम लोगों ने तो पूछा भी नहीं कि मैडम आपका नाम क्या है?  तो उनका जवाब था मैडम जी हमें डर लगता है। मैंने पूछा क्यों ? डर किस बात का तो उनका कहना था कि हमने एक बार एक मैडम से पूछ लिया था तो उनका जवाब था कि तुम्हें क्या मतलब है मेरे नाम से, काम करो अपना। और एक घण्टे तक उनका लेक्चर सुनने को मिला। पहली बार कोई टीचर ऐसा मिला है जो हमें जानना चाहता है और अपने बारे में बताना चाहता है। सुनकर बड़ा  अजीब लगा। और उन बच्‍चों से न जाने क्यों अपनापन और बढ़ गया। वो मेरी हर बात मानने लगे और पढ़ने के लिए भी सजग होने लगे। आज भी रोजाना एक-दो छात्र दिन में मुझे कॉल करके सवाल पूछते रहते हैं। स्कूल के बारे में सूचना लेते रहते हैं। बहुत अच्छा लगता है, खुशी मिलती है।       

एक शिक्षक को बच्‍चों के साथ संवाद करते रहना चाहिए। सही व गलत के चुनाव का फैसला उनका स्वयं का हो, ऐसा वातावरण तैयार होना चाहिए। शिक्षक सिर्फ विषय वस्तु को बच्‍चों तक पहुँचाने हेतु साधन मात्र नहीं होना चाहिए। बल्कि उनके जीवन को दिशा देने वाला साध्य होना चाहिए। विद्यालय परिवार से जुडी गतिविधियों के बीच एक कड़ी का कार्य शिक्षक का हो। बच्‍चे को विद्यालय आने पर मजबूर कर दे ऐसा शिक्षक का व शिक्षार्थी का सम्बन्ध हो। शिक्षित होना और पढ़ना इन दोनों शब्दों के अर्थ की समझ बच्‍चों में विकसित हो जाए ऐसी गतिविधियाँ हमारे व्यवहार में शामिल हो जाएँ। आदर्श की बातें करना और आदर्श स्थापित करने की प्रक्रिया को एक शिक्षक को स्वयं में विकसित करना प्रथम अनिवार्यता है।

कक्षा-कक्ष में ठहाकों की गूँज भी हो, गीतों की सरगम भी हो, कहानियों व प्रेरक प्रसंगों को सुनाने व सुनने के अवसर भी हों। दोस्ताना व्यवहार भी हो। अभिव्यक्ति के अवसर भी हों। विषय वस्तु को लेकर चर्चाएँ भी हो, विद्यालय व समाज के प्रति चिन्‍तन भी हो, राष्ट्र भक्ति की चेतना भी हो। मानवीय गुणों को विकसित करने के अवसर भी हो। आदर्श की कोरी बातें न हो। आदर्श स्थापित भी हो। अनुशासन थोपा न जाए स्वानुशासन के लिए प्रेरणा हो। और ये सब जब ही हो पाएगा जब शिक्षक शिक्षार्थी में जो दूरी है कुछ नियमों से बाँधने वाली उस दूरी को पाट दिया जाए। खुलकर संवाद हो। सही-गलत की समझ के अवसर हों। झिझक न हो खुलकर शिक्षक व शिक्षार्थी के मध्य वार्ता हो, विचारों का आदान प्रदान हो। हर बात पर टोका-टाकी न हो। किसी भी विषय पर सकारात्मक व नकारात्मक दोनों पहलुओं पर बातचीत हो।

जब भौतिक स्वरूप से ज्यादा हमारा ध्यान विद्यालय की मूल अवधारणा पर होगा तो वो एक बेहतर विद्यालय होगा। और ये निर्भर करता है शिक्षक-शिक्षार्थी सम्बन्धों पर शिक्षक व छात्र, विद्यालय की संकल्पना की प्राथमिक आवश्यकता है। क्योंकि अगर भवन है और अन्य भौतिक संसाधन पूर्ण हैं, तो भी छात्र व शिक्षक के बिना वह विद्यालय नहीं है। यह बात प्रत्येक शिक्षक भी जानता है और समुदाय भी। लेकिन छात्र की व्यक्तिगत रुचियों, आवश्यकताओं जिज्ञासाओं, विचारों व भावनाओं को समझने का सार्थक प्रयास शिक्षक समुदाय या बाहरी परिवेशीय समुदाय कितना कर पाया है, इसका सटीक उत्तर हम नहीं ढूँढ पाए। बालमन की अपेक्षाएँ शिक्षक से व अभिभावकों से क्या  व कितनी हैं इसको जानने के प्रयास में शायद अभी तक हम असफल से हैं। क्योंकि अभी तक थोपा हुआ ज्ञान ज्यादा व अनुभव से प्राप्त किया गया ज्ञान कम महसूस सा होता है।

बच्‍चे की रूचि व इच्छाओं को परिवार से ही नकारे जाने की शुरूआत शिक्षा प्राप्त करने के प्रथम पायदान से हो जाती है। अभिभावक कभी बच्‍चे से यह नहीं जानना चाहता कि वह क्या चाहता है। स्कूल चयन से लेकर भाषा चयन तक की छूट बच्‍चे को नहीं है। अगर मैं आज के परिवेश की बात करूँ तो ढाई साल का बच्‍चे जो सिर्फ माँ की गोद, पिता का दुलार व भाई, बहिन व अन्य परिवाजनों का स्नेह चाहता है,उसको शिक्षा ग्रहण करने हेतु बड़े-बड़े चमक-दमक वाले नामी गिरामी विद्यालयों में भेजा जाने लगता है। नए लोग, नया परिवेश, अनजान जगह जहाँ जाकर बच्‍चे के मन में अगर मासूम सवाल भी उठते है तो उनका जवाब देने वाला आसपास कोई नहीं। माँ-बाप के पास सबके जानने गौरवान्वित होने के बहुत अवसर आ जाते हैं कि हमारा बच्चा ऐसे हाई-फाई स्कूल में पढ़ता है। और उस बच्‍चे को नहीं पता इन सभी बातों के दौरान कब उसका बचपन छीन लिया गया।

अब आगे हम बाते करते हैं कि बच्‍चे व शिक्षक की जहाँ शिक्षक सिर्फ बच्‍चे को सिखाने के लिए तत्पर है समझने के लिए नहीं। वो क्या चाहता है, क्या सोचता है उसके बालमन में कितने सवाल होगें। इनसे किसी को सरोकार नहीं वह शिक्षक के व्यक्तित्व को देखकर, उसकी आँखों की तरफ देखकर सहम जाता है। क्योंकि वहाँ उस तरफ मुस्कुराहट नहीं रौब है। हो सकता है सभी शिक्षक मेरी बात से सहमत नहीं हों  और अभिभावक भी। लेकिन इस बात से तो सभी सहमत होंगे अगर सच में एक शिक्षक की भूमिका में हैं तो।

ढाई या तीन साल के बच्‍चे को विद्यालय भेजा जाना अनुचित है पर आज के इस मशीनी दौर में इतना सोचने व किसी की राय जानने व मानने का समय नहीं है। बच्‍चे का बचपन विद्यालयों की प्रतिस्पर्धा में कहीं गुम सा हो गया। अब इसके बाद जब बच्‍चा विद्यालय आने लगा उसकी पहचान व संज्ञा बदलने लगी अब वह विद्यार्थी है जिसका काम है विद्या अर्जन करना।

विद्यालय में सबसे पहले तो शिक्षण प्रक्रियाओं के दौरान बच्‍चे को एक विद्यार्थी के रूप में यह अहसास करवाया जाता है कि वह कुछ नहीं जानता है। एक शिक्षक बच्‍चे को बहुत कुछ सिखाने में सक्षम है। यहाँ मैं इस बात को नहीं नकार रही कि शिक्षक सीखता है बहुत कुछ सिखाता है। लेकिन क्या ये बच्‍चे के साथ अन्याय नहीं कि वो जो जानता है उसको कभी नए ज्ञान के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। उसे खुलकर मौखिक अभिव्यक्ति के अवसर दिए जाने चाहिए। जो भाषा और अनुभव वह साथ लेकर आया है उनको शिक्षण प्रक्रियाओं में जोड़कर सिखाया जाना चाहिए। बच्‍चे के सवालों का एक शिक्षक के रूप में बहुत सहजता से जवाब दिया जाना चाहिए। नई विचारधारा व शिक्षा में आए नवीन बदलावों में एक नई अवधारणा ही है और वह यह कि शिक्षक कम सहजकर्ता ज्यादा है। बच्‍चे की मौखिक व लिखित अभिव्यक्ति पर नकारात्मक टिप्पणी भी मानसिक हिंसा में आती है। कई बातें ऐसी भी हो सकती हैं  जो बच्‍चे हमें सिखा सकते हैं तो क्या हमें नहीं सीखना चाहिए। क्या हमें उसके विचारों व भावनाओं को सम्मान नहीं देना चाहिए। बेशक हम उम्र में बड़े हैं लेकिन बच्‍चे का सम्मान उसकी अभिव्यक्ति को सराहना ये भी सहजकर्ता को करना चाहिए। तभी बच्‍चे शिक्षक का अनुकरण कर सीखने की प्रक्रिया में शामिल होंगे।

हम सभी जानते हैं कि बच्‍चा कैसे सीखता है तो क्यों न उसको अनुकरण के लिए हम स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करें। बच्‍चे को अनुशासन सिखाने से पहले स्वयं अनुशासन के उदाहरण प्रस्तुत करें। मेरा मानना तो यह है कि अनुशासन के नियमों का पालन थोपा नहीं जाना चाहिए, बल्कि, देखकर स्वयं पालन कर बच्‍चे स्वानुशासन के लिए प्रेरित हो। ऐसा कुछ हो-जैसे-बच्‍चे को विद्यालय समय पर आने के लिए कहा जाता है, पंक्तिबद्ध खड़े होने को कहा जाता है। कक्षा में प्रार्थना सभा में व अन्य गतिविधियों के समय चुप रहने को कहा जाता है विद्यालयी गणवेश पहनकर आने को कहा जाता है। बड़ों  से ‘जी’ कहना, अभिवादन करना सिखाया जाता है। जूते चप्पल लाइन से खोलकर बैठना, पोषाहार खाते समय पंक्तिबद्ध बैठना बातचीत नहीं करना, स्वयं अपने बर्तन धोकर रखना, उस स्थल की सफाई करना, कक्षा-कक्ष में शिक्षक के निर्देशों का पालन करना सिखाया जाता है, पर क्या इन सभी नियमों का पालन शिक्षक करते हैं ? क्या हमने सीखने के अवसर स्वयं के उदाहरणों से दिए। अगर वास्तव में हम ऐसा करते हैं  तो हम सही मायने में एक कुशल शिक्षक हैं अन्यथा हमें अभी बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है।

आप सोच रहे होंगे, कि क्या ये सवाल मुझ पर लागू नहीं होते तो मैं आपको बता दूँ, ये सब सवाल स्वयं मेरे लिए भी उतने ही शोचनीय हैं जितना सबसे अपेक्षित है। क्योंकि हम सब जीवन भर सीखने की प्रक्रिया में रहते है। मनुष्य जीवन पर्यन्त सीखता रहता है और जब सीखना बन्द कर देता है वह मृतप्रायः है। बच्चों के साथ अधिक से अधिक संवाद एक रिश्ता कायम करते हैं। बच्‍चे से आप कभी उसके बारे में उसकी जिज्ञासाओं को जानने का प्रयास कीजिए। वह आपसे एक रिश्ता बना लेगा। उसकी भाषा, उसके परिवेश, परिवार, विचार उसके अनुभवों को सम्मान देकर देखिए, फिर उसे कहना नहीं पड़ेगा कि हमसे अभिवादन करो। वह दूरी खत्म होगी जो सीखने में बाधा पहुँचाती है।


ममता जाट, राजकीय उच्‍च माध्‍यमिक विद्यालय, कोठीना तमाम, टोंक

चित्र : प्रशांत सोनी

 

 

                                  

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