शिक्षक की सबसे बड़ी ताकत

 गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय,

बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताये।।।

इस दोहे में कबीर गुरु की महिमा का गुणगान करते हुए उसे गोविन्द के बराबर ला कर खड़ा कर देते हैं। गोविंद हैं या नहीं, यह इतर विषय है । जब कबीर ने शिक्षक को ईश्वर के बराबर में ला कर खड़ा किया होगा तब निश्चित ही उन्होंने समाज में शिक्षक का दर्जा सबसे ऊँचा माना होगा। हमारे समाज में आज भी शिक्षक / गुरु का पद गौरवपूर्ण माना जाता है। इसलिए जो विद्यालय में पढ़ाता है उसे ही नहीं बल्कि जो जीवन को दिशा देता है उसे भी गुरु कहा जाता है।

अभी कुछ दिनों पहले ही राजस्थान के एक छोटे से कस्बे में, छोटे से स्तर पर एक घटना घटित हुई। जिसमें गाँव में राजपूत जाति के परिवार में एक भोज का आयोजन किया गया। जिसमें गाँव में चलने वाले राजकीय प्राथमिक विद्यालय के बच्चों को भी निमंत्रित किया गया। शिक्षक निमंत्रणानुसार निर्धारित समय पर बच्चों को लेकर उनके घर पहुँच गए। जब शिक्षक मेजबान परिवार से मिला भेंटी कर ही रहे थे तभी उनकी नजर, उस व्यक्ति पर पड़ी जो घर के मुख्य दरवाजे पर बैठा था और तथाकथित सवर्ण, ओ.बी.सी. और एस.टी. जाति समाज के बच्चों को अन्दर आने दे रहा था और एस.सी. जाति समाज के बच्चों को बाहर दरवाजे पर ही रोक रहा था। कार्यक्रम में सवर्ण बच्चों के लिए अन्दर बिठाकर भोजन करवाने की व्यवस्था तय की गई थी और दलित / एस.सी. समाज के बच्चों को बाहर बिठाकर भोजन करवाने की व्यवस्था थी। पहले तो शिक्षक ने यह सोचा कि हो सकता है अन्दर सभी बच्चों के बैठने के लिए पर्याप्त जगह नहीं होगी। लेकिन गौर करने पर उन्हें माजरा समझ में आया कि ये जाति विशेष के बच्चे हैं इसलिए इन्हें बाहर बिठाकर भोजन करवाया जा रहा है। इस पर उन्होंने मेजबान परिवार से कहा कि वे यहाँ भोजन नहीं करेंगे और बच्चों को उठाकर तुरन्‍त वापस ले जा रहे हैं। यह अलग–अलग बैठने की व्यवस्था करके उन्होंने, उनका और उनके बच्चों का अपमान किया है।

काफी मान-मनुहार के बाद मेजबान परिवार का वह सदस्य शिक्षक और बच्चों को वहाँ रोक पाया। शिक्षक की नाराजगी दूर करने के क्रम में ही वह मेजबान व्यक्ति जब शिक्षक के साथ भोजन करने बैठा तब शिक्षक ने कहा, “आप भी तो मुझसे नीची जाति के हैं फिर आप मेरे साथ क्यों बैठे हैं ? ’’ उस व्यक्ति ने कहा “सर सचमुच बहुत कड़वी बात है, दिल को लगती है, हम माफी चाहते हैं।’’  शिक्षक ने कहा आपने तो कह दिया लेकिन वो नन्हे बच्चे जिनके साथ ऐसा हुआ, वो तो कुछ कह भी नहीं पाए।

यह एक घटना है। हर दिन ऐसी कितनी ही अन्यायपूर्ण और गैरबराबरी की घटनाएँ हमारे इर्द – गिर्द घटती रहती हैं लेकिन क्या कभी हम उनसे लड़ने की ताकत जुटा पाते हैं ? ये ताकत, कहाँ से आती है ? यह ताकत इंसानियत और बराबरी के मूल्य में विश्वास रखने से आती है। यही ताकत एक मामूली आदमी को भी चट्टान जैसी ताकत से  भिड़ने का और किसी भी अन्याय से लड़ने का हौसला देती है। एक शिक्षक जहाँ अपने विद्यालय में आने वाले विद्यार्थियों के साथ इस प्रकार कुरीतियों से लड़ने के लिए जहाँ तैयार कर सकता है वहीं वह समाज में व्याप्त कुरीतियों से लड़ते हुए समानता और बराबरी जैसे मूल्यों को विकसित करने के लिए भी काम कर सकता है। आखिर आज भी शिक्षक का काम समाज को प्रत्यक्ष / अप्रत्यक्ष रूप से दिशा देने का है और यही शिक्षा का एक बड़ा उद्देश्य भी है।


अनुपमा तिवाड़ी, जयपुर,राजस्‍थ्‍ाान

टिप्पणियाँ

kumarRakesh का छायाचित्र

सारगर्भित लेख दी

murslinkhan2544@gmail.com का छायाचित्र

You said right. This main thing of teacher.

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