विज्ञान सीखने में पूर्वनिर्मित मानसिक प्रतिरूपों को चुनौती देना

विष्णुतीर्थ अग्निहोत्री एवं अनघ पुरन्दरे

अपने रोजमर्रा के अनुभवों से बच्चे जो अर्थ निकालते हैं या अनुमान लगाते हैं, क्या वे सभी वैज्ञानिक सत्य होते हैं? इस लेख में हम तीन ऐसे उदाहरणों की चर्चा कर रहे हैं जो दिखाते हैं कि किस तरह कक्षाओं में प्रवेश करने से पहले ही बच्चों के पास ‘पूर्वनिर्मित मानसिक प्रतिरूप’ होते हैं और किस तरह वे वयस्क अवस्था तक भी बने रह सकते हैं। हम कुछ ऐसे सम्भावना पूर्ण तरीकों की भी चर्चा करेंगे जो सीखने वालों को इन ‘पूर्वनिर्मित मानसिक प्रतिरूपों’ को सही वैज्ञानिक प्रतिरूपों के द्वारा विस्थापित करने में मदद करेंगे।

भूमिका

हमारे आसपास के संसार के अवलोकन सीखने के लिए बहुत महत्‍वपूर्ण होते हैं। दो साल का एक बच्चा खाने की चीजों को बार-बार ऊपर उछालकर यह सीख सकता है कि वह हमेशा वापिस नीचे गिरती है, हालाँकि इससे हमें बहुत परेशानी हो सकती है। दूसरी ओर हमारा अपना परिपक्व मन यह सीख सकता है कि यदि तापमान बहुत अधिक न होकर केवल पर्याप्त रूप से अधिक हो तो डोसा बर्तन से चिपकेगा नहीं। सहज बुद्धि से सीखे गए ऐसे सबक जीवन के लिए बहुत उपयोगी और कभी-कभी निर्णायक रूप से महत्‍वपूर्ण होते हैं, लेकिन क्या अवलोकनों और सहज बुद्धि से इकट्ठे किए गए ऐसे सबक वैज्ञानिक तथ्य होते हैं? चलिए हम रोजमर्रा की कुछ घटनाओं का नजदीक से अध्ययन करके इनकी जाँच-पड़ताल करें।

उदाहरण 1 :  एक ही कमरे में रखी एक लकड़ी की चम्मच से एक धातु का सिक्का ज्यादा ठण्डा होता है।

हम शर्त लगाते हैं कि आप में से कई लोग सोचते हैं कि धातु का सिक्का ज्यादा ठण्डा होता है - निश्चित ही आप नहीं चाहेंगे कि कोई शरारती व्यक्ति सर्दियों की किसी ठण्डी सुबह आपकी कमीज के भीतर एक धातु का सिक्का खिसका दे! परन्तु, वास्तविकता यह है कि धातु का सिक्का और लकड़ी की चम्मच उसी तापमान पर होते हैं (बशर्ते कि उनमें से एक को गरम न किया जा रहा हो या उसे फ्रिज में न रखा गया हो या तभी बाहर से कमरे में न लाया गया हो)। पर ऐसा कैसे हो सकता है। आखिरकार धातु का सिक्का छूने में लकड़ी की चम्मच से कहीं ज्यादा ठण्डा महसूस होता है!

ऐसा क्यों हो रहा हो सकता है, उसके बारे में यहाँ हम आपको एक परोक्ष संकेत देते हैं - यदि आप सहारा के रेगिस्तान में कहीं एक कमरे में 55 डिग्री सेल्सियस के तापमान का सामना कर रहे होते, तो आपको लकड़ी की चम्मच से धातु का सिक्का ज्यादा गरम महसूस होता।

जो बात यहाँ हो रही है, वह यह है कि मनुष्य बहुत अच्छे थर्मामीटर का काम नहीं करते - जब हम एक धातु के सिक्के को छूते हैं, तो ऊष्मा हमारे शरीर से ज्यादा तेज गति से (लकड़ी की चम्मच की तुलना में, जो कि ऊष्मा की ज्यादा खराब चालक है) बाहर प्रवाहित होती है और ऊष्मा की इस क्षति को ही हम उसके ज्यादा ‘ठण्डा’ होने की तरह महसूस करते हैं। यदि आप एक थर्मामीटर का इस्तेमाल करें तो आप पाएँगे कि वास्तव में दोनों एक ही तापमान पर हैं।

यह एक आम भ्रांति है - कक्षा 8 के 86 प्रतिशत विद्यार्थी* सोचते हैं कि एक लकड़ी की चम्मच और एक धातु की चम्मच को आधे दिन तक गरम पानी में रखने के बाद धातु की चम्मच ज्यादा गरम होगी। (*यह आँकड़े ASSET पर आधारित है, जो एजुकेशनल इनीशिएटिव्स का निदानात्मक टेस्‍ट है।  www.ei-india.com/asset/ )

एक धातु की चम्मच, एक लकड़ी की चम्मच और एक प्लास्टिक की चम्मच को आधे दिन तक गरम पानी में रखा जाता है। पानी को पूरे समय एक ही तापमान पर बनाए रखा जाता है।

प्रयोग के अन्त में इन चीजों को बाहर निकाला जाता है और तत्काल उनका तापमान नापा जाता है। निम्नलिखित में से किसका तापमान सबसे ज्यादा होने की सम्भावना है?

इसके अलावा वैबसाइट http://youtu.be/vqDbMEdLiCs

 पर एक बहुत रोचक वीडियो भी देखें जिसमें एक शोधकर्ता इस ‘ट्रिक’ को विभिन्न लोगों पर आजमाता है और समझाता है कि क्या हो रहा है।

 

 

उदाहरण 2 : यदि हम काफी देर तक प्रतीक्षा करें तो हम अँधेरे में देख सकते हैं।

आप एक कमरे में हैं जहाँ पूरी तरह से अँधेरा है - क्या आपको लगता है कि आपके सामने रखी हुई एक कुर्सी को कुछ सेकेण्ड बाद आप देख सकेंगे? अब फिर, जब आपसे यह सवाल पूछा जाता है तो हो सकता है कि आपको याद आए कि आपने जब भी किसी अँधेरे कमरे में प्रवेश किया है, तब आप एकदम से तो कुछ नहीं देख पाए, लेकिन कुछ मिनट के बाद, आपकी आँखें अपने को कमरे में मौजूद प्रकाश के अनुकूल बना लेती हैं और आपको कम से कम कुछ चीजें दिखाई देने लगती हैं। यह बात सही है न ? इसलिए उपरोक्त सवाल का आप यह उत्तर दे सकते हैं कि, “हाँ, कुछ समय बाद मैं कुर्सी को देख लूँगा।’’ लेकिन यदि कमरा पूरी तरह से अँधकार में डूबा हुआ हो, तब क्या? यदि कमरे में कोई प्रकाश प्रवेश नहीं कर रहा है, तब हम चाहे जितना भी समय उस कमरे में बिताएँ, हमें कुछ भी दिखाई नहीं देगा, क्योंकि कुछ भी देखने के लिए हमें कुछ प्रकाश के वस्तु से परावर्तित होकर हमारी आँखों में  प्रवेश करने की जरूरत होती है। हमारे रोजमर्रा के अनुभव में हमें पूरी तरह से अँधेरे कमरे का कभी अनुभव नहीं होता (किसी भी कमरे में हमेशा कुछ प्रकाश कहीं से झरकर आ ही जाता है - हो सकता है कि वह चाँद की रोशनी हो, या किसी सड़क की बत्ती का प्रकाश) और इसलिए हमारी यह मानने की प्रवृत्ति होती है कि यदि हम पर्याप्त लम्बे समय तक प्रतीक्षा करें, तो हम अँधेरे में भी चीजों को कम से कम धुँधले ढंग से देख सकेंगे।

उदाहरण 3 : एक अधिक भारी वस्तु हल्की वस्तु की अपेक्षा हमेशा ऊपर से ज्यादा तेज गति से नीचे गिरती है।

मान लीजिए कि आप अपने एक हाथ में एक भारी ईंट और दूसरे हाथ में एक छोटी किताब (जिसे टेप से चिपकाकर बन्द कर दिया गया हो ताकि वह खुले नहीं) पकड़कर किसी भवन की तीसरी मंजिल पर खड़े हुए हैं। यदि आप दोनों चीजों को एक ही समय पर छोड़ दें, तो उनमें से किस चीज के जमीन पर पहले पहुँचने की सम्भावना है? हो सकता है कि अभी आपके लिए यह करके देखना मुश्किल हो, तो हम दूसरा प्रयोग करके देखें - यदि आप एक पन्ने को एक किताब के ऊपर रख दें जिसे आप हाथ में पकड़े हुए हैं और आप कागज के पन्ने समेत किताब (उसे टेप से चिपकाकर बन्द कर दें ताकि वह खुल न जाए) को ऊपर से गिरा दें तो आपके विचार से क्या होगा? क्या आप कागज और किताब दोनों के एक साथ गिरने की अपेक्षा करते हैं या आपका अनुमान है कि कागज ‘पीछे रह जाएगा’ और किताब की तुलना में धीमी गति से जमीन पर आएगा? इस प्रश्न का उत्तर दें और आगे पढ़ने से पहले इस प्रयोग को सचमुच में करके अपने उत्तर की पुष्टि करें -आपको क्या पता चला? क्या आपको आश्चर्य हुआ?

हमने पिछले कई वर्षों में अनेक विद्यार्थियों, शिक्षकों तथा बुद्धिमान वयस्क व्यक्तियों के साथ उपरोक्त तीनों सवालों को (अन्य कई सवालों के साथ) आजमाया। उनमें से अधिकांश वास्तविकता का पता चलने पर चकित थे - कि धातु का सिक्का तथा लकड़ी की चम्मच का तापमान एक-सा होता है, कि हम अँधेरे में देख नहीं सकते या कि भारी वस्तुएँ भी उसी गति से नीचे गिरती हैं जितनी कि हल्की वस्तुएँ।

उदाहरण के लिए, ASSET के नीचे दिए गए एक अन्य प्रश्न को देखें, जिसके उत्तर में कक्षा 9 के लगभग आधे विद्यार्थियों का ख्याल था कि ज्यादा भारी गेंद ज्यादा तेज गति से जमीन पर गिरेगी।

दो गेंदें, P तथा Q, जिनका आकार समान किन्तु द्रव्यमान अलग-अलग है (P का भार 5 किलोग्राम है और Q का भार 10 किलोग्राम है), रस्सियों से लटक रही हैं, जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। रस्सियों को एक साथ काट दिया जाता है। उनमें से कौन-सी ज्यादा तेजी से नीचे गिरेगी और क्यों? 

तालिका में दी गई जानकारी ASSET पर आधारित है, जो एजुकेशनल इनीशिएटिव्स के निदानात्मक टेस्‍ट से मिली है।  http://www.ei-india.com/asset

 

ऐसा क्यों होता है? अक्सर हमने किसी घटना के पीछे के विज्ञान को सीखा भी होता है - फिर भी यह इतना मुश्किल क्यों होता है? चलिए हम ज्यादा विस्तार में जाकर इसकी जाँच-पड़ताल करते हैं।

हालाँकि, हमने पढ़ा हो सकता है कि भारी वस्तुएँ तथा हल्की वस्तुएँ समान गति से गिरती हैं, और वे ऐसा करती हैं यह दर्शाने वाले समीकरणों का इस्तेमाल करते हुए हो सकता है कि हमने कई सवाल भी हल किए हों, फिर भी हम यह मानना क्यों जारी रखते हैं कि हल्की चीजों की अपेक्षा भारी चीजें ज्यादा तेजी से नीचे आती हैं? ऐसा शायद हवा के प्रतिरोध के विचार को न समझ पाने के कारण होता है,क्योंकि हवा दिखाई नहीं देती। जब हम किसी पत्ती या पंख को हवा में तिरते हुए धीरे-धीरे नीचे आता देखते हैं, तो हो सकता है कि ऐसे अवलोकन की व्याख्‍या हम यह धारणा (या ‘मानसिक प्रतिरूप’) निर्मित करने के लिए कर लें कि ‘हल्की चीजें ज्यादा धीमी गति से गिरती हैं।’ यदि हम हवा के प्रतिरोध के विचार को समझते भी हैं (जैसा कि बड़े बच्चे या वयस्क व्यक्ति जानते हैं), तो भी हम भूल करते हुए ऐसी धारणा को आगे बढ़ाते रहते हैं कि भारी वस्तुओं को अधिक गुरुत्वाकर्षण का अनुभव होता होगा और उससे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि इसलिए उनके गिरने की गति भी ज्यादा तेज होगी। ऐसा सोचना कि हल्की चीजों की तुलना में भारी चीजें ज्यादा तेजी से गिरेंगी, काफी कुछ ‘अन्तर्ज्ञान या सहज ज्ञान’ की बात लगती है (और यह पूरी तरह गलत भी नहीं है) यह बस एक सीमित विचार है जो केवल विशेष मामलों में लागू होता है, पर जो निश्चित रूप से एक व्यापक वैज्ञानिक सिद्धान्त नहीं होता।

“दुर्लभ अपवादों को छोड़कर, वैज्ञानिक विचार अन्तर्ज्ञान के विपरीत होते हैं, उन्हें घटनाओं के साधारण निरीक्षणों से हासिल नहीं किया जा सकता और वे अक्सर रोजमर्रा के अनुभवों से परे होते हैं।”

लुइस वोलपोर्ट, द अननैचुरल नेचर ऑफ साइंस

पारम्परिक विज्ञान शिक्षण का एक प्रमुख दोष है कि वह इस तथ्य पर गौर नहीं करता कि विद्यार्थी कक्षा में ‘पूर्वनिर्मित मानसिक प्रतिरूपों’ को साथ लेकर आते हैं और इसलिए सिखाने-सीखने की प्रक्रिया के लिए जरूरी है कि:

  • ऐसे मानसिक प्रतिरूपों को सतह पर चेतन रूप से सामने लाया जाए, ताकि सीखने वाला तथा शिक्षक इनके बारे में जागरूक रहें।
  • इन मानसिक प्रतिरूपों को चुनौती देने के लिए तरीके खोजे जाएँ।
  • ऐसी चर्चाएँ तथा अभ्यास किए जाएँ जो सीखने वाले को उसके पूर्वनिर्मित, गलत, मानसिक प्रतिरूपों के स्थान पर वैज्ञानिक प्रतिरूपों को स्थापित करने की सुविधा दें।

लेकिन ज्यादातर स्थितियों में न ही शिक्षक और न ही सीखने वाले को इन मानसिक प्रतिरूपों के बारे में सचेत रूप से पता रहता है। हर चीज स्पष्ट रूप से समझ ली गई प्रतीत हो सकती है... जब तक कि आप ‘संज्ञानात्मक द्वन्द’ की किसी स्थिति का सामना नहीं करते। एक अच्छा विज्ञान शिक्षक यह जानता है कि भ्रम और द्वन्द को पहचानना और उस पर काम करना गहराई से सीखने के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है।

चलिए देखें कि गिरती हुई वस्तुओं के मामले में यह कैसे काम करेगा। सबसे पहले शिक्षक विद्यार्थियों को ऊपर बताया गया ‘किताब पर कागज का पन्ना’ रखकर गिराने वाला प्रयोग करने के लिए कह सकता है और उसके द्वारा एक संज्ञानात्मक द्वन्द की स्थिति निर्मित कर सकता है। हो सकता है कि वह प्रयोग विद्यार्थियों को हवा के प्रतिरोध के मौजूद होने के बारे में सचेत कर सकता है और उनके दिमाग में उसके बारे में पर्याप्त सन्देह पैदा कर सकता है जो पहले उन्हें स्वतः स्पष्ट प्रतीत होता था (कि ज्यादा भारी वस्तुएँ ज्यादा तेजी से गिरती हैं)। अब शिक्षक विद्यार्थियों से उन सभी कारकों के बारे में गहराई से विचार करने के बारे में कह सकता है जो इस प्रक्रिया में कोई भूमिका निभा सकते हैं। चर्चा के माध्यम से हो सकता है कि विद्यार्थी इस प्रकार के कारकों को चिन्हित करें - जैसे कि सतह का क्षेत्रफल, खोखलापन, खुरदुरापन, वातावरण की तेज हवा आदि। यह करने के बाद, फिर विद्यार्थी विभिन्न वस्तुओं के साथ विविध प्रकार के प्रयोग करेंगे जब तक कि वे उन पर आधारित इस गहरे निष्कर्ष पर न पहुँच जाएँ कि हल्की वस्तुएँ भी वाकई में उसी गति से गिरती हैं जितनी गति से भारी वस्तुएँ।

लेकिन क्या आपके दिमाग में वह 1% सन्देह अभी भी बचा रहता है कि यदि वायु का प्रतिरोध मौजूद न हो तो क्या सचमुच में एक पंख उसी समय जमीन पर पहुँचेगा जिस समय एक भारी बोलिंग बॉल पहुँचेगी? 100% पक्का विश्वास होने के लिए क्या लगेगा? उसके लिए तो एक ही रास्ता है कि इन वस्तुओं को एक निर्वात वातावरण में गिराया जाए - पर ऐसा वातावरण आपको कहाँ मिलेगा! हमारे सौभाग्य से यह खर्चीला प्रयोग किया जा चुका है - बी.बी.सी. की ह्यूमन यूनिवर्स नामक शृंखला से ली गई उसकी यह चकित करने वाली वीडियो क्लिप इस वैबसाइट पर देखें  http://youtu.be/E43-CfukEgs


विष्णुतीर्थ अग्निहोत्री एजुकेशनल इनीशिएटिव्स में पिछले 10 सालों से मूल्यांकन तथा सीखने में सुधार करने पर काम कर रहे हैं और उनकी दिलचस्पी एक समेकित तथा बहु-विषयी पाठ्यक्रम विकसित करने में है।

अनघ पुरन्दरे एजुकेशनल इनीशिएटिव्स में एक शिक्षा विशेषज्ञ हैं और विज्ञान में, खासतौर पर विज्ञान शिक्षा में, उनकी दिलचस्पी है।  

यह अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय द्वारा की विज्ञान पत्रिका i wonder : Issue 01, November 2015 में प्रकाशित लेख Challenging Prior Mental Models in Science Learning : Vishnuteerth Agnihotri and Anagh Purandare का हिन्‍दी अनुवाद है। अनुवाद : भरत त्रिपाठी   

 

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