विज्ञान शिक्षण में मूल्यांकन : एक शिक्षक के विचार

पिछले कुछ समय से विभिन्न प्रशिक्षणों व कार्यशालाओं में सतत् एवम् व्यापक मूल्यांकन की अवधारणा पर चर्चा होती रही है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या-2005 की संस्तुतियों से इस विचार को बल मिला है। सामान्यतः हम सभी मूल्यांकन प्रक्रिया को प्राप्त दिशा-निर्देशों के अनुसार सम्पन्न करते रहते हैं लेकिन मूल्यांकन व शिक्षण हेतु बार-बार पुनः सोचने समझने की आवश्यकता है। पूर्व में शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में समझा जाता था कि शिक्षक सर्वज्ञाता है, शिक्षक एक ज्ञान से भरा बर्तन है और विद्यार्थी एक खाली बर्तन है या कोरी स्लेट है जिसे शिक्षक को अपने ज्ञान  से भरना पड़ता है। समय बीतने के साथ-साथ इस सोच में परिवर्तन हुआ।                        

आज के शिक्षा युग में विद्यार्थी अपने ज्ञान का सृजन स्वयं करें इस अवधारणा को बल दिया जा रहा हैं। अध्यापक की भूमिका एक सुगमकर्ता के रुप में बदलते हुए दिख रही है और विद्यार्थी ज्ञान को अपने तरीके से गढ़ने लगे हैं। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में यह एक महत्वपूर्ण व बहुमूल्य परिवर्तन हो रहा है, जिसे सभी शिक्षक स्वीकार करने लगे हैं। अगर हम विचार करें तो मूल्यांकन की अवधारणा बड़ी ही व्यापक है। जिसमें निरन्‍तरता, सृजन करने के मौके, समस्या आने पर निदानात्मक कदम व कुछ उपचारात्मक विधियाँ निहित हैं। प्रत्येक विद्यार्थी में कुछ न कुछ विशेष गुण होते हैं, तथा उनके अन्दर कुछ न कुछ क्षमताएँ होती हैं। ज्ञानात्मक, भावात्मक, मनोगत्यात्मक और क्रियात्मक पक्ष आदि मिलकर उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को दर्शाते हैं। मूल्यांकन में इन्ही पक्षों के समग्र व सन्तुलित विकास की भावना समाहित है।

वर्तमान समय में शिक्षा प्रणाली की अगर बात की जाए तो “बच्चे ज्ञान का सृजन कैसे करें” ये ही सबसे बड़ा चर्चा का विषय है। बच्चों से शिक्षक किसी बिन्दु पर बातचीत करें, तो बच्चे उस मुद्दे पर प्रश्न करें, शिक्षक उनके प्रश्नों के जवाब दें, फिर बच्चें उस पर प्रश्न करें, इस तरह के अवसर देकर हम कहीं न कहीं मूल्यांकन प्रक्रिया से जुड़कर अपनी भूमिका को और अधिक प्रभावी बना रहे होते हैं। मूल्यांकन की प्रक्रिया केवल प्रश्नों के उत्तर जाँचने तक ही सीमित नहीं है बल्कि इससे आगे कुछ और भी है। मूल्यांकन प्रक्रिया को परम्परागत सोच से हटकर कुछ नए दायरों से बाहर आकर देखने की आवश्यकता है। मूलतः अगर हम विचार करें तो मूल्यांकन को शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के साथ सम्मलित करते हुए शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के एक हिस्स के रूप में देखे जाने की आवश्यकता है। इसका परिणाम एक ओर सभी विद्यार्थियों में परीक्षा के बढ़ते दबाव व भय का निवारण होगा वहीं दूसरी ओर शिक्षक मूल्यांकन को अपनी अध्यापन प्रक्रिया का एक अंश मानते हुए अपने कार्य के क्रियान्वयन को बेहतर रूप में प्रस्तुत कर सकेंगे।

मूल्यांकन से जुड़ी एक मुख्य समस्या यह भी है कि हम समस्त बच्चों को एक ही नजर से देखते हैं व उनसे एक ही अपेक्षा करते हैं। जबकि वास्तव में यह होना चाहिए कि बच्चा स्वयं से ज्ञान का निर्माण कर उसे अर्जित करे। मूल्यांकन हेतु हम सभी शिक्षक द्वारा विभिन्न कियाक्रलाप, प्रश्नों में विविधता, छात्रों को सोचने को बाध्य करने वाले प्रश्नों के द्वारा मूल्यांकन की सतत् प्रक्रिया जारी रखी जा सकती है।

कक्षा-कक्ष प्रक्रिया में एक शिक्षक ने बच्चों से प्रश्न पूछा कि, “पौधे अपना पोषण कैस करते हैं?” वहीं दूसरे अध्यापक ने बच्चों से पूछा कि, “अगर हम एक गमले वाले पौधे को कुछ दिन के लिए बन्द अंधेरे कमरे में रखें तो क्या होगा?”

क्या हम इस प्रकार के प्रश्नों का निर्माण कर विद्यार्थियों को सोचने-समझने के मौके दे सकते हैं ताकि वे निष्‍कर्ष तक स्वयं पहुँच सकें।

एक अध्यापक ने विद्यार्थियों से यह प्रश्न किया कि, “चिड़िया का आकार उसके अनुकूलन में किस प्रकार सहायक हो सकता है” ? वहीं दूसरे अध्यापक ने इस प्रश्न को इस तरीके से पूछा कि, “अपने परिवेश में पाई जाने वाली किसी एक चिड़िया का चित्र बनाइए और उसके पंजे, चोंच पंखों की बनावट व बुनावट से उसकी भोजन सम्बन्धी आदतें क्या होंगी?’’

यहाँ पर सन्दर्भ यह बिल्कुल नहीं है कि कौन-सा प्रश्न सही है या कौन-सा प्रश्न गलत। बल्कि ये सोच विकसित करने का प्रयास किया गया कि कौन-सा प्रश्न विद्यार्थियों को सीखने व करने के अधिक अवसर प्रदान कर रहा है। अतः विद्यार्थियों की बुनियादी क्षमताओं के विकास, अवलोकन, खोजना, अन्तःक्रिया करना आदि के पर्याप्त अवसरों से मूल्यांकन की अवधारणा को सुदृढ़ किए जाने की आवश्यकता है।

शिक्षक मूल्यांकन के आधार पर शिक्षण की विभिन्न क्रियाओं के बारे में निर्णय ले सके, इस प्रकार की समझ सभी को विकसित करना आवश्यक है। दक्षताएँ एक प्रकार के कौशल ही है जिनका विकास किसी व्यक्ति में कोई कार्य करते हुए, कार्यानुभव द्वारा, अध्ययन अथवा प्रशिक्षण द्वारा होता है।

अतः शिक्षण अधिगम प्रक्रिया प्रत्येक विद्यार्थी की सीखने की प्रक्रिया व व्यक्तिगत विभिन्नताओं को ध्यान में रखकर तथा तद्नुरूप मूल्यांकन द्वारा समुचित दक्षताओं/कौशलों का विकास किया जा सकता है। जिससे विज्ञान अधिगम बच्चे के लिए और आनन्ददायक व रूचिपूर्ण हो जाएगा।  


संजीव डोभाल, सहायक अध्‍यापक विज्ञान, राजकीय उच्‍चतर माध्‍यमिक विद्यालय,भकड़ा,डुण्‍डा, उत्‍तरकाशी  चित्र : प्रशांत सोनी

 

टिप्पणियाँ

Zafar का छायाचित्र

काफी महत्वपूर्ण बात को उजागर किया है, धन्यवाद

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