विज्ञान शिक्षण में ज्ञान निर्माण

विज्ञान के दो घटक होते हैं - एक ज्ञान का संगठन (विषय वस्तु), और दूसरा, वह प्रक्रिया जिसके द्वारा उस ज्ञान का उत्पादन किया जाता है। विज्ञान के इस दूसरे घटक ‘वैज्ञानिक प्रक्रिया’ से हमें सोचने और दुनिया के बारे में जानने के एक तरीके की समझ मिलती है। लेकिन आमतौर पर, हम केवल विज्ञान का ‘ज्ञान का संगठन’ घटक देखते हैं। वैज्ञानिक अवधारणाएँ हमारे सामने एक कथन के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं जैसे - पृथ्वी गोल है, इलेक्ट्रॉनों पर ऋणात्मक आवेश पाया जाता है, हमारे आनुवंशिक कोड हमारे डीएनए में निहित हैं, ब्रह्माण्ड 13.7 अरब साल पुराना है। लेकिन इसके बारे में बहुत ही सीमित पृष्ठभूमि दी जाती है कि किस प्रक्रिया द्वारा यह ज्ञान अर्जित किया गया और हमें इस पर विश्वास क्यों करना चाहिए। इसके बावजूद ऐसी कई चीजें हैं जो वैज्ञानिक प्रक्रिया की पहचान कराती हैं और इस प्रक्रिया से उत्पन्न ज्ञान में हमारा विश्वास जगाती हैं।

विज्ञान विषय का शिक्षण करते हुए इसकी प्रकृति को लेकर एक समझ विकसित हुई थी। हममें से अधिकतर लोग ये जानते हैं कि वैज्ञानिक प्रक्रिया क्या है। यह ज्ञान के निर्माण और दुनिया के बारे में भविष्यवाणी करने का एक ऐसा तरीका है जिसका परीक्षण किया जा सकता है। वैज्ञानिक विधि का एक चरण है - परिकल्पना बनाना। आमतौर पर हम ये मानते हैं कि परीक्षण के चरण के दौरान, वैज्ञानिकों के प्रयोग का उद्देश्य इस परिकल्पना को सच साबित करना हो सकता है।

ज्ञान-निर्माण की शुरुआत

2015 के मार्च महीने में अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा ‘शिक्षा के दृष्टिकोण’ (perspectives of education) पर आयोजित कार्यशाला में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ। इस कार्यशाला में मानव की क्षमताओं, सामाजिक महत्व और शिक्षा की आवश्यकता से लेकर ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया, ज्ञान की प्रकृति और उसके शैक्षणिक सम्बन्धों पर प्रभाव और शिक्षा कैसी हो जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। ज्ञान की प्रकृति पर होने वाली चर्चा से पूर्व सम्भागियों को एक समूह गतिविधि दी गई। इसमें चार कथन दिए गए थे। समूह को इन कथनों पर एक मिलीजुली राय बनानी थी कि क्या वे इस कथन पर विश्वास करते हैं, और यदि हाँ, तो उन्होंने ये कैसे जाना और ऐसा विश्वास करने के पीछे क्या तर्क हैं। इस गतिविधि को पूरा करने के लिए हमें पुस्तकालय, इंटरनेट व अन्य सहायक सामग्री इस्तेमाल करने की पूरी छूट थी। इस हेतु समय सीमा थी - एक घण्टा।

चन्द्रमा के आकार का प्रमाण

हमारे समूह को जो कथन मिला, वह था ‘चन्द्रमा गोलाकार है और यह पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमण करता है।’ हममें से अधिकतर का ध्यान विषय वस्तु पर केन्द्रित था। अभी तक तो हमने अपनी पाठ्य-पुस्तकों में यह पढ़ा था, तस्वीरों में, चलचित्रों में देखा था, परन्तु हमने इस कथन को सत्य साबित करने के लिए सबूत जुटाना शुरू किया। हमारे समूह ने बैठकर इंटरनेट की सहायता से चन्द्रमा के आकार, पृथ्वी के उपग्रह के रूप में उसकी गतियों और कलाओं आदि का विस्तार से अध्ययन किया, और इस कथन के समर्थन में अपने विचार बनाए तथा सम्बन्धित प्रमाणों एवं तर्कों को लिख लिया। एक घण्टे का समय बहुत जल्दी समाप्त हो चला था, और ऐसा लग रहा था कि अभी और जानना बाकी है। बहरहाल, प्रस्तुतीकरण का समय हो चला था। पहले समूह ने गणितीय अवधारणा पर अपनी सफल प्रस्तुति दी जिसके बाद हमारा नम्बर आया।
हममें से एक साथी पूरे विवरण के साथ प्रस्तुतीकरण के लिए पहुँचे। अपनी जानकारी का आधार कुछ किताबों और वैज्ञानिक पर्चों को बताते हुए उन्होंने इस कथन के समर्थन में अपने तर्क देना आरम्भ किया।

चन्द्रमा के गोलाकार होने के समर्थन में प्रमाण देते हुए, उन्होंने बताया कि सभी खगोलीय पिण्ड अन्तरिक्ष में लगातार भ्रमणशील हैं। अत: द्रव्यमान का केन्द्र मध्य में बनाए रखने हेतु आवश्यक है कि वे गोलाकार हों। उन्होंने पानी के बुलबुले से इसकी तुलना करते हुए पृष्ठ-तनाव का भी जिक्र किया।

कुछ कठिन सवाल

यह प्रस्तुति पूरी होते ही बड़े समूह में बहुत सारे सवाल खड़े हुए। किसी ने बोतल के पेन्दे, तश्तरी और बेलन का उदाहरण देते हुए इन वस्तुओं के एक आयाम में गोलाकार होने की बात कही। प्रश्न था कि क्या ऐसा सम्भव नहीं कि चन्द्रमा भी इनमें से किसी एक के जैसा हो? सवाल एकदम सटीक था और हमारे साथी इसके सामने अपना तर्क मजबूती से नहीं रख पा रहे थे।
अब समय था कि चित्र की सहायता से चन्द्रमा, सूर्य एवं पृथ्वी की स्थिति स्पष्ट करते हुए इनके आकार पर समझ बनाने का प्रयास किया जाए। अमावस्या से पूर्णिमा तक बढ़ते और फिर पूर्णिमा से अमावस्या तक पुन: घटते चन्द्रमा की आकृतियाँ बनाने का प्रयास कर यह समझ बनाने की कोशिश की गई कि ऐसी आकृतियाँ तभी सम्भव हैं जबकि चन्द्रमा गोलाकार हो। किन्तु बड़े समूह को यह प्रमाण स्वीकार्य नहीं था।

व्यापक समूह के एक साथी का प्रश्न था कि प्रकाश का संचार कण के रूप में भी होता है, ऐसे में वह सूरज से चन्द्रमा पर गिरने के बाद पथ से मुड़ भी सकता है। ऐसे में चन्द्रमा की आकृति के बारे में दिए गए प्रमाण से वे सन्तुष्ट नहीं दिखे।

न बेलन न तश्तरी

सुगमकर्ता की मदद से अब एक टॉर्च, तश्तरी और गेंद जुटाई गई और उनकी मदद से टॉर्च को सूर्य मानते हुए बारी-बारी से तश्तरी और बॉल पर अलग-अलग दिशा से प्रकाश डाला गया और दिखने वाले आकार का पैटर्न नोट किया गया। इस प्रक्रिया में सभी ने अनुभव किया कि चन्द्रमा के जो रूप हम देखते हैं वैसे रूप सिर्फ गेंद पर ही दिख रहे थे, न कि तश्तरी अथवा बोतल या बेलन पर। इस प्रकार समूह में चन्द्रमा के गोलाकार होने पर एक राय तो बन गई, अब बारी थी कि घूर्णन कोकैसे प्रमाणित करें।

कुछ परिकल्पनाओं की जाँच

समूह का ध्यान एक बार पुन: रात में किए जाने वाले अवलोकन पर ले जाया गया। चन्द्रमा पर दिखने वाले पर्वत और खाइयों की सहायता से जाना गया कि हम चन्द्रमा का एक ही आयाम या हिस्सा देखते हैं। वर्षभर किए गए अवलोकन दिखाते हैं कि अन्य तारों एवं ध्रुव तारे के सापेक्ष चन्द्रमा की स्थिति बदलती रहती है, अर्थात् वह घूमता है। इन आधार पर दो बातें पुष्ट होती हैं

  1. चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमता है (परिक्रमण)।
  2. चन्द्रमा स्वयं अपने अक्ष पर भी घूमता है (घूर्णन)।

चन्द्रमा के घूर्णन और परिक्रमण में लगने वाला समय लगभग बराबर होने से हम सदैव एक आयाम यानी हिस्सा ही देख पाते हैं।

इस परिकल्पना को जाँचने के लिए मैंने एक साथी को आगे बुलाया। उनसे कहा कि वे मेरे चारों ओर इस प्रकार घूमें कि हर समय उनका चेहरा मेरी ओर हो। इस प्रक्रिया में यह बताने का प्रयास किया कि जैसे साथी एक परिक्रमा पूरी करने के साथ ही अपने अक्ष पर भी घूर्णन पूरा कर लेते हैं, ठीक उसी प्रकार चन्द्रमा भी पृथ्वी के चारों ओर एक परिक्रमा पूरी करने के साथ, अपने अक्ष पर भी 3600 घूम जाता है (चित्र-1)।

लेकिन फिर एहसास हुआ, विज्ञान को देखने के लिए इस तरीके के साथ एक दिक्कत है। हम प्राकृतिक दुनिया में 100% निश्चितता के साथ कुछ भी साबित नहीं कर सकते, इसलिए विज्ञान का उद्देश्य यह साबित करना नहीं है कि बात सही है, बल्कि यह कि क्या उसे झुठलाया जा सकता है? यदि एक परिकल्पना लम्बे समय तक परीक्षणों के बावजूद कायम रहती है, तो उसे एक सिद्धान्त मान लिया जाता है। इसका मतलब यह है कि हमारी रुचि उन सिद्धान्तों में नहीं है जो सत्य हैं, बल्कि उन सिद्धान्तों में है जिन्‍हें असत्य साबित नहीं किया जा सका है। यह विचार हमें वैज्ञानिक परिकल्पना की एक सुविधाजनक परिभाषा प्रदान करता है: एक बयान या सिद्धान्त जिसके गलत साबित होने की सम्भावना है; यदि ऐसी सम्भावना नहीं है तो यह बात वैज्ञानिक नहीं है।

एक शिक्षक की ही तरह, मैं इसे जितना आसान समझ रही थी, अब यह उतना आसान नहीं लग रहा था। एक साथी ने डोरी से एक वस्तु को बाँधकर घुमाया और पूछा कि बताइए परिक्रमण हो रहा है या घूर्णन। मैंने ठहरकर इस प्रक्रिया को चित्र-2 अनुसार चित्रित किया।

इस प्रक्रिया में यदि वस्तु की स्थिति को देखें तो यह अपने अक्ष पर भी घूमी और चित्र-2 के बिन्दु ‘O’  के चारों ओर भी। ऐसा एक ही समय अन्तराल में हो रहा था। अब सदन में परिक्रमण और घूर्णन की समझ बन रही थी और मुझे अपना काम आसान लगने लगा था। यह बताते हुए कि चन्द्रमा का परिक्रमण काल लगभग 27 1/3 दिन व घूर्णन काल लगभग 29 1/2 दिन का होता है जिसके कारण हम चन्द्रमा का लगभग 58% हिस्सा देख पाते हैं, मैं अपना काम पूरा हुआ समझ रही थी।

यहाँ विज्ञान के दो घटक स्पष्टत: दिख रहे थे। एक, ज्ञान का संगठन (विषय वस्तु) जिस पर हमारे समूह का ध्यान केन्द्रित था, और दूसरा जिस ओर सुगमकर्ता ले जा रहे थे - वह प्रक्रिया जिसके द्वारा उस ज्ञान का निर्माण किया जाता है। सुगमकर्ता ने इस हेतु एक और प्रश्न किया - कि क्या पूरी पृथ्वी पर चन्द्रमा का वही भाग दिखता है? ऐसा कैसे सम्भव है कि हम भारत में जो देख पाते हैं वही अमरीका में भी दिखता है?

हमारी सैद्धान्तिक रूप से इस बात पर सहमति थी कि किसी भी दिन चाँद की एक ही कला पृथ्वी के सारे स्थानों से दिखाई देनी चाहिए। इसे प्रयोग के रूप में करके देखने के लिए हमने गेंद, टॉर्च और ग्लोब की सहायता से इसे करके समझने का प्रयास किया। गेंद पर कम्पनी का नाम लिखे भाग को चन्द्रमा का दिखाई देने वाला हिस्सा मानते हुए, ग्लोब के चारों ओर घुमाया। गेंद को भूमध्य रेखा के ऊपर भारत और अमरीका के ऊपर से घुमाया। चित्र-3 देखिए।

परन्तु यह प्रयोग करके देखना आसान नहीं है। आप भी ऐसा मॉडल बनाकर समझने की कोशिश कर सकते हैं कि ऐसा क्यों होता है।

वैज्ञानिक प्रक्रिया से ज्ञान-निर्माण

वैज्ञानिक प्रक्रिया से ज्ञान निर्माण को समझने की इस कड़ी में हममें से हर-एक के पास इस कथन को प्रामाणिक मानने के लिए तर्क मौजूद था, सिर्फ इसलिए नहीं कि हमने पाठ्य-पुस्तक में या इंटरनेट पर पढ़ा बल्कि इसलिए कि हमने ऐसा करके देखा। अपने अनुभव और तर्क-वितर्क के आधार पर हमने ये जानकारी पाई। सभी प्रयासों के बावजूद ये कथन असत्य साबित नहीं हो सके थे।

वैज्ञानिक प्रक्रिया में अर्जित ज्ञान पर विश्वास करना आसान है, खासतौर पर जब हमारे पास अकाट्य सबूत मौजूद हों, जैसे हम एक अन्तरिक्ष यान में पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा लगाते हुए इस गेंदनुमा ग्रह की तस्वीरें लेने में सक्षम हैं। लेकिन ज्‍यादातर वैज्ञानिक परीक्षण ऐसे परिणाम तक नहीं पहुँचते जिन्हें इतनी सहजता से परखा जा सके एवं स्वीकारोक्ति मिल जाए; और तब भी हम वैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा जनित ज्ञान पर निर्भर करते हैं और उस पर विश्वास भी करते हैं।
इस सत्र के दौरान मैंने विज्ञान में ज्ञान के निर्माण की प्रक्रिया को समझा और यह महसूस किया कि एक शिक्षक को भी कक्षा कक्ष में इस प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया पर यदि उसकी समझ हो तो वह विद्यार्थियों के साथ बेहतर तरीके से काम कर सकती है।


अम्बिका नाग: अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन, जयपुर में विज्ञान की स्रोत व्यक्ति के तौर पर कार्यरत हैं। वनस्पति शास्त्र में पीएच.डी. की है।

शैक्षणिक संदर्भ अंक 102 से साभार।

 

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