विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में समावेश

एस. इन्दुमति

यह बात पूछी जा सकती है कि यदि विज्ञान बस प्राकृतिक घटनाओं को स्पष्ट करने वाले तथ्यों, अमूर्त अवधारणाओं, परिभाषाओं, सिद्धान्तों और नियमों का जोड़ है, तो विज्ञान की पाठ्यपुस्तकें किस तरह समावेशी हो सकती हैं? सामाजिक सन्दर्भ तो उदाहरणों के माध्यम से पाठ्यपुस्तकों में प्रवेश कर लेता है। भौतिकशास्त्र में धक्का देने और खींचने को स्पष्ट करते हुए, किसी के द्वारा ठेले को धक्का देने या भारी वस्तु को धक्का देने के उदाहरण दिए जाते हैं। यहाँ पर समावेश से जुड़ा हुआ प्रश्न होगा कि धक्का ‘कौन’ दे रहा है और ‘किसको’ धक्का दे रहा है। पर सवाल यह है कि ऐसे उदाहरणों, छवियों, दृष्टान्तों और व्याख्याओं में सभी जातियों, वर्गों, धर्मों, लिंगों और अन्य सामाजिक पहचानों वाले बच्चों का समावेश किया जाता है या नहीं। 

चाहे विज्ञान हो, गणित हो या सामाजिक विज्ञान, पाठ्यपुस्तकें ऐसी होना चाहिए जिनसे विद्यार्थी सम्बन्ध बना सकें। सवाल यह है कि क्या ये सभी तरह के विद्यार्थियों से सम्बन्ध स्थापित करते हुए उनसे जुड़े दृष्टिकोणों और मूल्यों को प्रस्तुत कर पाती हैं? एक अच्छी और प्रभावी पाठ्यपुस्तक वह है जो विविधता और भिन्नताओं को निरूपित करे। मजूमदार और मूइज (2009, पृ. 136) के अनुसार यहाँ तीन भिन्न मुद्दे हैं “अ) प्रासांगिकता, ब) चुप्पी बनाम विभिन्नताओं को खुले ढंग से स्वीकार करना, और स) समावेश का प्रकार, जहाँ सच्चा सम्मान और प्रतीकवाद दो अतियाँ होती हैं।‘‘ इस विश्लेषण में, मैं इन तीन मुद्दों को एक चश्मे के रूप में इस्तेमाल करते हुए विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में समावेश और बहिष्कार की स्थिति को देखना चाहती हूँ।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एन.सी.एफ.) 2005 में सभी विद्यार्थियों के समावेश तथा पाठ्यपुस्तकों को किस प्रकार लिखा जाना चाहिए, इसके बारे में महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ की गई हैं। पाठ्यपुस्तक की विषयवस्तु ऐसी होना चाहिए जो  बहुसांस्कृतिक और विविधतापूर्ण कक्षाओं तथा लिंग, वर्ग, संस्कृति, धर्म, भाषा और भौगोलिक स्थिति से सम्बन्धित भिन्नताओं की जरूरतों को ध्यान में रखे। एन.सी.एफ. 2005 को ध्यान में रखकर बनाई गई एन.सी.ई.आर.टी. पाठ्यपुस्तकों में इस बात का प्रयास किया गया है। मैंने ई.वी.एस. की पाठ्यपुस्तकों का विश्लेषण किया और पाया कि उनकी विषयवस्तु में भारत के सभी भौगोलिक क्षेत्रों, भाषाई पृष्ठभूमियों और लिंगों के विद्यार्थियों को शामिल किया गया है। अब मैं इस लेख के उद्देश्य के लिए कक्षा 8 की एन.सी.ई.आर.टी. की विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों का विश्लेषण करूँगी।

किसके लिए प्रासंगिक ?

आठवीं की पाठ्यपुस्तक में करीब 18 अध्याय हैं। दो किरदार हैं, पहेली और बूझो। वे  सवाल करते हैं, बातों को स्पष्ट करते हैं, भ्रमित होते हैं और फिर स्पष्टीकरण ढूँढ़ने में एक-दूसरे की मदद करते हैं। इस किताब को बातचीत की भाषा में लिखा गया है। हर बार इसकी शुरुआत पाठकों से यह कहते हुए होती है, ‘आपने यह देखा होगा कि, क्या आपने पाया, आपने यह नहीं देखा होगा..।’ इस खण्ड में, मैं इस बात पर चर्चा करना चाहूँगी कि यह किताब किनको पाठक मानती है।

सूक्ष्मजीवों के पाठ में कहा गया है कि, ‘बूझो को उसके दोस्त द्वारा एक पार्टी में आमन्त्रित किया गया है, और वहाँ उसने तरह-तरह के व्यंजन खाए’। सवाल यह है, कि कौन-से वर्ग समूह ऐसे हैं जो पार्टियों में आमन्त्रित किए जाते हैं और उन्हें तरह-तरह के व्यंजनों को चखने या खाने का अवसर मिलता है? संरक्षण की चर्चा करते हुए, यह वाक्य इस तरह शुरू होता है ‘इसी प्रकार हम अपना खाना रेफ्रिजरेटर में रखते हैं’ - क्या सभी विद्यार्थी खाना रेफ्रिजरेटर में रख सकते हैं, या रखते हैं? ‘आपके बचपन में आपको निश्चित ही इंजेक्शन और टीके लगे होंगे’ - कितने गरीब बच्चों को बीमारियों से बचाने के लिए टीके लगाए जाते हैं या क्या यहाँ यह माना जा रहा है कि यदि कोई कक्षा 8 में पढ़ रहा है और जीवित है तो पक्के में उसे टीका लगा होगा? 

संश्लेषित रेशे (सिंथेटिक फाइबर) और प्लास्टिक के अगले अध्याय में उपयोग किए गए उदाहरण इस प्रकार हैं, ‘हम नायलॉन से बनी कई चीजें इस्तेमाल करते हैं, जैसे मोजे, रस्सियाँ, तम्बू, टूथब्रश, कार के सीटबेल्ट, स्लीपिंग बैग, परदे आदि।’ फिर आगे लिखा गया है ‘मेरी माँ चावल और शक्कर रखने के लिए हमेशा पी.ई.टी. बोतलें खरीदती हैं। मैं सोच में पड़ गई कि यह पी.ई.टी. क्या है!’ पी.ई.टी. जार सिर्फ कुछ लोग (मध्यम वर्गीय और उच्च वर्ग के) खरीद सकते हैं। प्लास्टिक को बताने के लिए उपयोग की गई कुछ तस्वीरें हैं।                                                      

चित्रों में दिखाए गए बच्चे भली-भाँति तैयार होते हैं और अधिकांशतः जूते-मोजे पहनते हैं। ऊपर दिए गए उदाहरण बिलकुल स्पष्ट हैं और यह चिन्ताजनक बात है कि यह पाठ्यपुस्तक मध्यमवर्गीय और शहरी बच्चों को अपने पाठकों के रूप में देखती है।

महिलाओं की भूमिका को लेकर चुप्पी और लिंग-आधारित भूमिकाओं की रूढ़िबद्धताः

फसलोत्पादन और उसके प्रबन्धन के अध्याय में, सभी किसान पुरुष हैं - चाहे बुवाई की बात हो, जुताई या कीटनाशक नियन्त्रकों की, तथा तस्वीरों में दिखाए गए मवेशी सफेद झक (दूध जैसे सफेद) और एकदम स्वस्थ हैं! कृषि में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले श्रम पर कोई बात नहीं की गई है और इसे स्वीकार्यता नहीं दी गई है, पर हकीकत तो यही है कि महिलाएँ खेतों और जमीनों की देखभाल कर रही हैं, वहीं पुरुष नौकरियों की तलाश में शहरों को जा रहे हैं क्योंकि खेती आय का भरोसेमन्द स्रोत नहीं है। इसके अलावा, मैंने अपने पूरे जीवन में इतने सफेद मवेशी कभी नहीं देखे। क्या आपने देखे हैं? इस अध्याय में फसलोत्पादन और संग्रहण में आने वाली विभिन्न समस्याओं पर भी कोई बात नहीं की गई है।  

कई अध्यायों में पुरुष वैज्ञानिकों के नाम और कुछ जगहों पर उनके चित्र दिए गए हैं जैसे - पाश्चर, फ्लेमिंग और जैनर आदि। महिला वैज्ञानिकों के विज्ञान में योगदान की कोई बात नहीं की गई है।

यहाँ दिए गए उदाहरण लैंगिक भूमिकाओं की रूढ़िवादी छवि प्रस्तुत करते हैं और उनके साथ जो कुछ लिखा गया है वह हतप्रभ करने वाला है। ‘तुमने देखा होगा कि तुम्हारी माँ दूध का संग्रह करने या उसे इस्तेमाल करने से पहले उसे उबालती हैं।’ ‘ओह! अब मैं समझा कि मेरी माँ किचन में काम करते वक्त कभी भी पॉलिएस्टर के कपड़े क्यों नहीं पहनती।‘ 

भोग द्वारा किए गए पाठ्यपुस्तकों के विश्लेषण से पता चलता है कि जिन 75 पाठों की समीक्षा की गई है उनमें से लगभग 50 प्रतिशत में सिर्फ पुरुष ही कर्ता थे। विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में महिलाएँ बहुत मामूली भूमिकाओं में सामने आती हैं और ऐसी सकारात्मक आदर्श महिलाएँ नदारद हैं जिनके साथ लड़कियाँ तादात्म्य स्थापित कर सकें। महिलाओं को माताओं और बहनों की परम्परागत भूमिकाओं में पेश किया गया है (भोग 2002, पृ. 1640)। भोग दलील देती हैं कि मैरी क्यूरी के चित्रण (जो पाठ्यपुस्तकों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली अकेली महिला हैं) को भी लैंगिक चश्मे से प्रस्तुत किया गया है क्योंकि उनसे जुड़े विवरण में उनकी घरेलू जिम्मेदारियों को विशेष रूप से दर्शाया गया है और ‘पुरुष वैज्ञानिकों जैसे विक्रम साराभाई और जे.सी. बोस की कहानियों के विपरीत महिलाओं की उपलब्धियों को, घरेलू गतिविधियों में उनकी भागीदारी के माध्यम से, सीमित कर देना और सामान्य बना देना जरूरी है’ (2002, पृ. 1641)।

संश्लेषित रेशे और प्लास्टिक वाले अध्याय में सभी वस्तुएँ ‘मैन-मेड (पुरुषों द्वारा निर्मित)’ हैं। यहाँ नायलॉन की रस्सी का उपयोग करते हुए पहाड़ पर चढ़ते एक आदमी की तस्वीर दी हुई है।

पौधों और जानवरों के संरक्षण के बारे में बात करने के लिए जिन किरदारों को प्रस्तुत किया गया है वे सभी पुरुष हैं, और उनके नाम हैं प्रोफेसर अहमद तथा टीबू और माधवजी-जो वन पथ प्रदर्शक हैं। लेख के शुरू में दी गई तस्‍वीर में बल और दाब के अध्याय में जोर डालते हुए सिर्फ पुरुषों और लड़कों की तस्वीरें दी गई हैं। लड़के फुटबॉल, हॉकी खेल रहे हैं और गेंद को रोक रहे हैं, तथा अपने वाहन को धक्का लगाते, मवेशियों को हाँकते आदमियों की तस्वीरें, और बक्से को धक्का देते, चके को चलाते लड़कों की तस्वीरें दी गई हैं, जबकि लड़कियों को झूला झूलते हुए ‘मजा-मौज’ करते हुए प्रस्तुत किया गया है। कार को चलाने वाला ड्राइवर भी पुरुष है।    

विज्ञान और समाज

“ऐसा लगता है कि हाशिए पर सीमित पृष्ठभूमियों के विद्यार्थियों की नई पीढ़ी के लिए ये पाठ्यपुस्तकें, ऐसा आईना दिखाने के बजाय जिनमें वे अपने जीवन की वास्तविकताओं को देख सकते, केवल एक ऐसा झरोखा प्रदान करती हैं जिसके माध्यम से वे प्रभुत्वसम्पन्न वर्ग के यथार्थ को देख सकें” (मजूमदार और मूईज, 2009)। इस हकीकत के बावजूद कि जल अपने आप में एक सीमित साधन है, पाठ्यपुस्तकें यह बताती चलती हैं कि ‘कई घरों में पानी को उबालकर सुरक्षित पीने का पानी प्राप्त किया जाता है’। ऐसा प्रतीत होता है कि यह पाठ्यपुस्तक कई मुद्दों को समस्या के रूप में प्रस्तुत नहीं करतीं और विज्ञान व समाज के मुद्दे को सामने नहीं लातीं हालाँकि ऐसे कई अध्याय हैं जहाँ इस चर्चा को जगह दी जा सकती थी। यह पाठ्यपुस्तक वंचित समुदाय के बच्चों की जिन्दगियों के बारे में बिलकुल मौन है और उनका चित्रण प्रस्तुत नहीं करती, इसमें केवल मध्यम वर्ग और शहरी (लड़के) विद्यार्थियों की जिन्दगियों को प्रस्तुत किया गया है।

विज्ञान में अलग-अलग तरह के, एक-दूसरे से विपरीत दृष्टिकोण प्रस्तुत करने से विभिन्न मुद्दों के बारे में समीक्षात्मक सोच, तार्किक दृष्टि और विश्लेषण क्षमता विकसित करने में मदद मिलेगी। विज्ञान पढ़ने से विद्यार्थियों को वैज्ञानिक रूप से साक्षर होने में तथा नागरिकों के रूप में लोकतन्त्र में सक्रिय रूप से भाग लेने में भी मदद मिलेगी। पाठ्यपुस्तकों की भूमिका ऐसी होना चाहिए कि बच्चों की बौद्धिक क्षमताओं के विकास में उनका योगदान रहे तथा विरोधी दृष्टि और कई तरह के यथार्थों को प्रस्तुत करके वे निष्पक्षता को बढ़ावा दें (मजूमदार और मूइज, 2009)। निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है कि कक्षा आठ की विज्ञान की यह पाठ्यपुस्तक इस प्रकार की पाठ्यपुस्तक तो नहीं है।

यह भी सम्भव है कि विद्यार्थी पाठ्यपुस्तक में प्रस्तुत जानकारियों को ज्यों-का-त्यों ग्रहण न करें। वे अपने अर्थों को भी शिक्षण की प्रक्रिया में ला सकते हैं, शिक्षक भी पाठ्यपुस्तक की सामग्री को प्रस्तुत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पर भारत में कई विद्यार्थियों के लिए पाठ्यपुस्तकें ही पढ़ने का अकेला स्रोत या अकेली पाठ्यसामग्री होती हैं और वे उनकी शिक्षा में बहुत ही खास भूमिका निभाती हैं, और इसलिए इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि पाठ्यपुस्तकों में सभी तरह के विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व हो और निष्पक्षता को सुनिश्चित किया जाए। आश्चर्य की बात है कि कक्षा पाँच तक ई.वी.एस. की पाठ्यपुस्तकें विभिन्न तरह के दृष्टिकोणों को प्रस्तुत करती हैं और भाँति-भाँति के उदाहरण देकर सभी तरह के विद्यार्थियों का खयाल रखती हैं। दुर्भाग्य से जब हम ऊँची कक्षाओं की तरफ बढ़ते हैं और किसी अध्ययन शाखा विशेष के विषयों पर ध्यान देते हैं, तो पाते हैं पाठ्यपुस्तकों की प्रकृति कतई समावेशी नहीं है और हम इस सोच में पड़ जाते हैं कि अमूर्त अवधारणाओं को प्रस्तुत करने पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित करते समय क्या किसी अध्ययन शाखा की  प्रकृति और उसकी सीमाएँ समावेशी होना मुश्किल बना देती हैं!

References:

  • Bhog, D. (2002). Gender and Curriculum, Economic and Political Weekly, 37(17), pp. 1638-1642.
  • Majumdar, M., & Mooij, J. (2011). Education and Inequality in India: a classroom view, London: Routledge.

NCERT. (2005). National Curriculum Framework, NCERT: New Delhi


एस.इन्दुमति अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, बेंगलूरु में फेकल्टी की सदस्य हैं। उनकी रुचियों में शामिल हैं विज्ञान शिक्षा, लिंगभेद और शिक्षा तथा पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा। उनसे s.indumathi@azimpremjifoundation.org पर सम्पर्क किया जा सकता है।

यह Learening Curve  ‘Inclusive Education’ (Issue XXIII,October 2014) में मूल अँग्रेजी में प्रकाशित लेख  Inclusion in Science Textbooks  : S.Indumathi का अनुवाद है। अनुवाद: भरत त्रिपाठी

 

 

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