विज्ञान की कक्षा में वर्गीकरण का खेल

मैं जयपुर के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, नृसिंहपुरा महल में पिछले कुछ दिनों से जा रही थी। वहाँ बच्चों के साथ विज्ञान में कुछ काम करने का प्रयास कर रही थी। विज्ञान विषय का अध्ययन करते समय हम बच्चों में कुछ क्षमताओं के बारे में बात करते हैं- जैसे अवलोकन, दर्ज करना, वर्गीकरण, व्याख्या करना, प्रयोग करना, निष्कर्ष निकालना आदि। इसी को आधार बनाते हुए मैंने बच्चों के साथ एक खेल खेलने का विचार किया। मैंने अपने थैले में नाना प्रकार की चीजों को एकत्रित कर लिया। इनमें पेंसिलें, पेन, रबर, कागज, एल्युमिनियम फोइल, कटोरी, चाबी, पत्ते, फ़ूल, लकड़ी और लोहे के ब्लॉक, गेंद, सेलोटेप, बैटरी आदि शामिल थे।

मैंने सबसे पहले कक्षा 3 के बच्चों के साथ बात की। ये बच्चे लगभग 8 वर्ष की उम्र के होंगे, बड़े खुश थे कि आज हम खेलेंगे। मैंने अपने थैले में से वस्तुएँ निकालकर एक टोकरी में रख दीं। बच्चे बड़े कौतूहल से इन सब चीजों को देख रहे थे। हम एक गोला बना कर बैठ गए। बीच में टोकरी रख कर मैंने कहा, मेरे पास इतनी सारी चीजें हैं और मैं इनको जमा कर रखना चाहती हूँ। इसमें आप मेरी मदद करो तो एक जैसी चीजों का एक ढेर बना लें और उन्हें एक साथ रख लूँ। ऐसे ये चीजें हम जमा लेंगे।

बच्चे खुश हो गए और जुट गए चीजों को जमाने में, लेकिन जल्दी ही उनकी उलझन शुरू हो गई थी। शुरू में उन्होंने अपनी अपनी पसन्‍द की चीज चुन के पकड़ ली। और कोशिश करने लगे कि और क्या उठाएँ।

इस ही बीच हिमांशु बोला, सफेद-सफेद सब मेरे पास हैं, ये कागज भी मुझे दे दो। उसके ऐसा कहते ही मैंने देखा कि, किसी ने नीला, किसी ने हरा और किसी ने लाल रंग अपना लिया। जल्दी ही रंग आधारित ढेरियाँ तैयार थीं। एक ढेरी लकड़ी-नुमा रंग की थी जिसमें उन्होंने पत्थर और चाबी भी रख दी थी, उधर एल्युमिनियम फोइल, स्टील की कटोरी और एक रुपये का सिक्का एक साथ थे। एक विजेता की सी मुस्कान इन सब के चेहरे पर थी, आखिर खेल में वो जीत ही गए, सभी वस्तुएँ  किसी न किसी ढेर में फिट हो गईं थीं।

अपनी टोकरी समेटकर मैंने कक्षा 4 के बच्चों के साथ फिर यही खेल खेला। ये कुल 6 ही बच्चे थे। आज इनकी कक्षा में उपस्थिति कम थी, लेकिन खेल को लेकर ये भी बहुत उत्साहित थे। सामान को फैलाकर, ढेरी बनाने के क्रम में इन्होंने तीसरी कक्षा के बराबर ही समय लगाया लेकिन जब मैंने ढेर देखे और पूछा कि कैसे उन्होंने चीजों को बाँटा है तो एक आधार था आकार। हालाँकि बच्चे आकार को नाम नहीं दे पा रहे थे। लेकिन गोलाकार वस्तुएँ एक साथ थीं, बेलनाकार एक साथ और आयताकार एक साथ। लम्‍बे और चपटे कंघा और स्केल एक साथ थे जबकि कागज, फोइल और पुड़िया एक साथ। लेकिन उन्होंने आयताकार के दो ढेर लगाए थे, पूछने पर बताया कि, एक ढेर में हल्की चीजें थीं और दूसरी में भारी। बेलनाकार वस्तुओं में पेंसिल, पेन और स्केच पेन के अलग-अलग ढेर थे, ये ढेर उपयोग के आधार पर बनाए थे। गोलाकार में भी कटोरी और सिक्का गेंद से अलग रखे थे। जिनका कोई निर्धारित आकार नहीं था, उनमें फूल और पत्ती को एक साथ रखा जबकि चाबी अकेली रह गई। यहाँ वर्गीकरण के लिए एक से अधिक पैमाने काम में लिए गए थे जो न सिर्फ आकार-प्रकार, भार बल्कि उनके उपयोग पर भी निर्भर थे।

अब बारी थी कक्षा 5 के साथ खेलने की। यहाँ बच्चे कोई 10-11 आयु वर्ग के रहे होंगे। इस खेल में इन बच्चों ने सर्वाधिक समय लगाया। वस्तुओं को समूह में बाँटने के लिए कई पैमाने खोजते नजर आए, और जैसे ही किसी अपवाद में उलझते, नया पैमाना खोज लेते थे। कभी आकार तो कभी लकड़ी/ प्लास्टिक में बाँटने की कोशिश करते। आपस में बातचीत करते। पेन, पेंसिल, स्केल, स्केच पेन को एक समूह में रखकर जब सेलोटेप और फेविस्टिक में उलझे तो झट से इन्हें पढ़ने-लिखने के काम आने वाला बता कर पेन-पेंसिल के साथ रख दिया। अब तक दो अलग समूह में दिख रहे कटोरी और बर्तन साफ करने का स्क्रब रसोई में इस्तेमाल के आधार पर एक समूह में रख दिए गए। यहाँ एक बच्चे ने सवाल किया कि पुड़िया में क्या है? मैंने बताया नमक है तो उसे रसोई के ढेर में रख दिया गया। अब से पहले कक्षा 3 और 4 में इसके बारे में किसी ने नहीं पूछा था। सफ़ेद रंग के शुगर क्यूब को भी तोड़ने की कोशिश हो रही थी, पर उसे पत्थर समझ कर साबुन, लकड़ी और लोहे के ब्लॉक्स के साथ रख दिया गया। बाग-बगीचे में मिलने वाले पत्ते-फूल एक साथ और खेलने के लिए काम आने वाले गिल्ली और बॉल एक साथ रख दिए गए। बैटरी, कंघा, मोमबत्ती और चाबी अपने अलग उपयोगों के कारण अलग ही रह गए थे। काफी जद्दोजहद के बाद बच्चे समूह बनाकर अलग-अलग उपयोग की वस्तुओं को अलग-अलग स्थान पर रखने के निर्णय पर पहुँच गए थे। अपना निर्णय समझाकर बच्चे अत्यन्‍त प्रसन्न थे।

कक्षा 8 में इस खेल में 6 बच्चों को शामिल किया। इन्होंने वर्गीकरण के सैद्धान्तिक आधार अपनाते हुए वस्तुओं को पहले जैविक/ अजैविक में बाँटा। जैविक को जीवित और मृत में बाँट दिया। अजैविक को अब उन्होंने धातु/ अधातु में बाँटने का निर्णय किया। ये सब करने के बाद, उन्होंने और नए आधार चुने और पानी में डालने पर घुलनशील/ अघुलनशील, डूबने/ तैरने वाली वस्तुओं में शीघ्रता से बाँट दिया। मैं अचरज से देख रही थी, उनके लिए यह एक बहुत आसान-सा खेल था। इस तरह का वर्गीकरण कुछ तय पैमानों पर आधारित था जो एक क्रम में आगे बढ़ता था, जैसे जैविक में जीवित और मृत के आधार पर पत्ते-फूल अलग और लकड़ी की वस्तुएँ अलग। अजैविक में धातु अलग और अधातु अलग। शुगर क्यूब और नमक पानी में घुल गए, जबकि प्लास्टिक तैरने लगे और चाबी डूब गई। समूह बनाने के ये आधार भी मजेदार थे जो किसी न किसी सैद्धान्तिक अवधारणा से जुड़े थे।

बच्चे असंख्य चीजों में समान तत्वों की पहचान कर पाते हैं और अपनी अवधारणाओं के आधार पर उन्हें ‘समान प्रकार की’ श्रेणी में रख पाते हैं। कक्षा 3 के बच्चे वर्गीकरण के लिए रंग को आधार बनाते समय एक प्रत्यक्ष बोधात्मक अवधारणा का आधार चुनते हैं। रंग और आकार इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त अनुभवों के आधार पर बनी एक प्रारम्भिक अवधारणा है। रंग को पहचानने और उसे चिन्हित कर लेने में अनेक प्रक्रियाएँ शामिल हैं, जैसे भाषा। लेकिन यहाँ बच्चों ने स्वीकार्य प्रयोग या उपयोग को आधार नहीं बनाया और इसलिए तीन रंगों की पेंसिलें अलग-अलग ढेरी में थीं। और इस ही तरह फूल लाल ढेरी में और पत्ते हरी ढेरी में रखे गए थे। कक्षा चार के बच्चे आकार के आधार पर वर्गीकरण कर रहे थे लेकिन आयताकार वस्तुओं में अधिक भारी वस्तुएँ अलग रख दी गईं थीं। आकार और भार सभी इन्द्रियों के माध्यम से ही अनुभव किए गए थे, लेकिन इन बच्चों ने पेंसिल, पेन और स्केच पेन को अलग कर दिया था- यह वर्गीकरण सामाजिक रूप से स्वीकार्य उपयोग के आधार पर किया गया जो कि एक क्रियात्मक अवधारणा है। जैसे चीजें कैसे काम करती हैं? लोग उन्हें कैसे प्रयोग में लाते हैं? या उनकी उपयोगिता क्या है? इन सब क्रियात्मक अवधारणाओं के निर्माण के लिए बोधात्मक अवधारणाओं का अस्तित्व में होना बेहद जरूरी है।

कक्षा 5 के बच्चे वस्तुओं के आकार, भार, रंग आदि के बजाय उनके सामाजिक रूप से स्वीकार्य उपयोग को अधिक वरीयता दी। साथ ही उनके बीच हुई चर्चा भी इस पर केन्द्रित थी कि वे इसे घर के किस हिस्से में रखना उचित समझेंगे और फिर वे हर वस्तु के लिए स्थान तय कर रहे थे, किसी को रसोई तो किसी को पढ़ाई-लिखाई के स्थान पर रख रहे थे।

कक्षा आठ के विद्यार्थी वर्गीकरण के लिए जैविक/ अजैविक, धातु/ अधातु जैसी अवधारणाओं का इस्तेमाल कर रहे थे जो एक उच्च स्तरीय बौद्धिक समझ से विकसित हुई हैं जिन्हें उसी सामाजिक रूप और अर्थ में साझा होना आवश्यक है। धातु की अवधारणा विज्ञान विषय में अन्वेषकों के समुदाय द्वारा विकसित हुई और उसकी वैधता की जाँच के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है। सैद्धान्तिक अवधारणा को समझने के लिए क्रियात्मक और बोधात्मक अवधारणाओं को समझना जरूरी है और बहुत सम्‍भव है कि ये उनकी तरह मूर्त हों या कई मामलों में अमूर्त हों।

इस तरह हम कह सकते हैं कि कक्षा में पढ़ाते समय शिक्षक को विद्यार्थियों में वर्गीकरण सम्‍बन्‍धी क्षमताओं पर काम करते समय प्रारम्भिक कक्षाओं में ऐसे आधार चुनने होंगे जो बोधात्मक अवधारणाओं पर आधारित हों। जिन्हें विद्यार्थी अपनी ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से ही पहचान लें, आगे चलकर उच्च प्राथमिक कक्षाओं में अमूर्त और सैद्धान्तिक अवधारणाओं पर आधारित वर्गीकरण को समाहित किया जा सकता है। शुरू में ही अमूर्त आधार चुनने पर विद्यार्थियों को अवधारणा को समझने और फिर उस आधार पर वर्गीकरण करने में दिक्कतें आ सकती हैं और ऐसे में वे गलतियाँ कर बैठते हैं। 


अम्बिका नाग,संदर्भ व्‍यक्ति, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन,जयपुर

 

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