विज्ञान और प्रयोग : भाग-दो

सुशील जोशी

अवलोकन-आधारित दुनिया

प्रकृति का काफी सारा अध्ययन व विश्लेषण तो मात्र अवलोकनों के जरिए सम्भव है। विज्ञान के कई महत्वपूर्ण सिद्धान्त महज अवलोकनों की देन हैं। इनमें डार्विन का जैव-विकास का सिद्धान्त,  सूर्य  केन्द्रित  विश्व  का सिद्धान्त, सजीवों के वर्गीकरण की प्रणाली वगैरह गिनाए जा सकते हैं।

जैसे जैव-विकास की बात को ही लें। काफी समय तक यह माना जाता था कि आज जो भी जीव हमें दिखते हैं वे शुरू से उसी रूप में विद्यमान रहे हैं। यानी एक बार में सारे जीव-रूपों का निर्माण (सृजन) हुआ था और तब से इनमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। इस मान्यता का आधार क्या था? इसका सीधा-सादा आधार यह था कि मनुष्यों के जीवन काल में या यहाँ तक कि कई पीढ़ियों के जीवन काल में भी हमें इनमें कोई परिवर्तन नहीं दिखता है। कई सदियों तक हम इसी सामान्य अवलोकन के आधार पर एक अचर विश्व की कल्पना करते रहे। मगर फिर अवलोकनों का दायरा बढ़ा और हमें कई ऐसी चीजें नजर आने लगीं जो पहले नजर नहीं आती थीं।

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आपके ख्याल में वे कौन-सी नई चीजें होंगी जो नजर आने पर हम एक अपरिवर्तनशील विश्व की धारणा पर सवाल खड़े करने लगेंगे? एक सूची बनाइए।

एक तो हमारे अवलोकनों की समयावधि बढ़ी। अवलोकनों के रिकॉर्ड रखे जाने के कारण हमें काफी लम्बे समय की सूचनाएँ एक साथ उपलब्ध हो गईं। इस सूचना भण्डार में हमें ऐसी कई चीजों में परिवर्तन नजर आए जो अल्पावधि के अवलोकनों में उजागर नहीं होते थे।
दूसरी बात यह हुई कि भौगोलिक दृष्टि से भी हमारे अवलोकनों का दायरा विस्तृत हुआ। यह विस्तार न सिर्फ धरती की सतह पर हुआ बल्कि धरती की गहराइयों में हुआ। अर्थात् एक तो लोग लम्बी-लम्बी यात्राएँ करके दूर-दूर के स्थानों पर पहुँचने लगे तथा दूसरी ओर खनन कार्य के चलते पृथ्वी की गहराइयों में भी झाँकने लगे। साथ ही, पेड़-पौधों और पक्षियों के बारे में सुन्दर सचित्र पुस्तकें प्रकाशित होने लगीं। लोगों ने देखा कि इनमें से अधिकांश जीवों का जिक्र न तो बाइबल में है, न ही महान प्राचीन दार्शनिकों के ग्रन्थों में। तो यह सवाल उठने लगा कि क्या हम अपनी दुनिया के बारे पर्याप्त जानकारी रखते हैं।

नए-नए स्थानों की यात्रा करने से नए-नए जीव-जन्तु और वनस्पतियाँ हमारे अवलोकन पटल पर उभरने लगे। मगर जब पृथ्वी की गहराइयों में देखा तो पता चला कि वहाँ कई ऐसे जीव-जन्तुओं के अवशेष संरक्षित हैं जो आजकल दुनिया में नहीं पाए जाते। जीवों के ऐसे संरक्षित अवशेषों को जीवाश्म कहते हैं।

यदि हम यह मानें कि जीवाश्म के रूप में दिखने वाले जीव अतीत में कभी पृथ्वी पर विचरते होंगे, तो अपरिवर्तनशीलता की धारणा पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। एक बात यह भी देखी गई कि जीवाश्मों में कई ऐसे जीवों का नामो निशान नहीं मिलता जो आज पृथ्वी पर बहुतायत में पाए जाते हैं। यह भी पता चला कि धरती के गर्भ में अलग-अलग गहराइयों पर अलग-अलग किस्म के जीवाश्म मिलते हैं।

इस तरह के तमाम किस्म के अवलोकनों ने हमें यह मानने पर मजबूर कर दिया कि शायद पृथ्वी और उस पर  पाए  जाने  वाले  जीव,  दोनों परिवर्तनशील हैं। यह परिवर्तन कैसे होता है, इसकी व्याख्या की कोशिश जरूरी हो गई।

इसी व्याख्या की कोशिश में फ्रांसीसी जीव वैज्ञानिक ज़्याँ बेप्टिस्ट डी लैमार्क ने 1809 में अपना सिद्धान्त प्रस्तुत किया जो अंगों के उपयोग-अनुपयोग पर आधारित था। उनकी पुस्तक फिलॉसॉफिक ज़ुऑलॉजिक में प्रस्तुत लैमार्क का सिद्धान्त चार प्रमुख बातों पर टिका था:

1.सजीव और उनके अंग लगातार   साइज़ बदलते रहने की प्रवृत्ति दर्शाते हैं।

2.नए अंग नई ज़रूरतों और चाहतों के परिणामस्वरूप बनते हैं।

3.किसी अंग का उपयोग किया जाए तो वह विकसित होता है और कोई अंग बेकार पड़ा रहे तोउसका क्षय होता जाता है।

4.किसी जीव के जीवन काल में जो नई संरचनाएँ बनती हैं वे उसकी सन्तानों को विरासत में मिलती हैं।

अर्थात् कोई भी जीव अपने पर्यावरण में जीने के लिए खुद को ढालता है। इस प्रयास में वह नए गुण या संरचनाएँ अर्जित करता है या किसी गुण या संरचना में इजाफा करता है और ये गुण व संरचनाएँ अगली पीढ़ी को प्राप्त हो जाती हैं। इस प्रकार से क्रमश: जीवों का विकास होता है।
मगर चार्ल्स डार्विन ने जैव-विकास की प्रक्रिया की एक सर्वथा भिन्न धारणा पेश की।

जीवजगत की उत्पत्ति और उसके बाद की उसकी यात्रा के बारे में आज हमारे पास गहरी समझ है। इस समझ को पुष्ट करने में सबसे बड़ा योगदान दिया उन्नीसवीं शताब्दी के चार्ल्स डार्विन नामक अँग्रेज वैज्ञानिक ने। बीगल नामक शोध-नौका पर यात्रा के दौरान डार्विन को जीवजगत की असीमित विविधता समझ में आने लगी, भिन्न-भिन्न महाद्वीपों और टापुओं पर उसका विस्तृत स्वरूप दिखाई देने लगा, और उनके मन में कई सवाल उठने लगे। यदि ईश्वर ने सब प्रजातियों को जहाँ हैं वहीं बनाया है, तो दक्षिण अमेरिका महाद्वीप पर पाई जाने वाली प्रजातियों और उसके समीप स्थित टापुओं पर पाई जाने वाली प्रजातियों में इतनी समानता क्यों है? और अफ्रीका महाद्वीप के पास स्थित टापुओं की प्रजातियाँ इतनी भिन्न क्यों हैं? मीठे पानी के भण्डार वाले समुद्री टापुओं पर ऐसी छिपकलियाँ दिखाई देती हैं जो समुद्र के पानी में तैर सकती हैं, फिर मीठे पानी में आराम से रह सकने वाले पतली त्वचा वाले मेंढक वहाँ क्यों नहीं हैं? डार्विन को लगने लगा कि सच्चाई यह है कि बड़े महाद्वीपों पर पहले प्रजातियों का विकास हुआ, फिर वे संयोगवश या दुर्घटनावश दूरस्थ टापुओं पर पहुँच गईं, और वे वहाँ की परिस्थिति के अनुरूप ढल गईं। इन सब परिवर्तनों का मूल आधार है सब प्रजातियों में पाया जाने वाला विविधता का भण्डार। इस प्राकृतिक विविधता से ही कालान्तर में नए-नए रूपों वाली, शरीर रचना वाली और प्रकृति में नई भूमिका निभा सकने वाली प्रजातियाँ उपजीं।

डार्विन ने प्राकृतिक वरण (नेचुरल सिलेक्शन) की अवधारणा को और अधिक विस्तार देते हुए सुझाव दिया कि सब जीवधारी अपने आपको सुरक्षित रखते हुए लगातार यह प्रयास करते रहते हैं कि उनकी सन्तानें संसार में सफलतापूर्वक जीएँ। एक ही जीव की सन्तानें एक ही साँचे में ढली हुईं बिलकुल एक समान नहीं होतीं। प्रकृति की परिस्थितियों के अनुसार कुछ को फायदा मिलता है, कुछ को नुकसान होता है। जिन्हें फायदा मिलता है अगली पीढ़ी में उनकी ज्‍यादा सन्तानें होती हैं। यदि जिस गुण की वजह से उन्हें फायदा मिला था, वह अगली पीढ़ी  तक  पहुँचने  योग्य  (यानी वंशानुगत) है तो अगली पीढ़ी में वह गुण भी ज्‍यादा सदस्यों में होगा। यानी डार्विन का मत था कि विकास के दो आधार हैं - पहला सजीवों की किसी भी आबादी में भरपूर विविधता और प्रकृति की परिस्थितियों के अनुसार व उसके दबाव के अन्तर्गत इस विविधता में से चयन। इसे प्राकृतिक चयन या वरण का सिद्धान्त कहते हैं।

तो उन्नीसवीं सदी में हमारे सामने जैव-विकास के दो प्रमुख सिद्धान्त थे और  दोनों  महज़  अवलोकनों  व अवलोकनों की तर्कसंगत व्याख्या पर टिके थे।

कौन सही - लैमार्क या डार्विन?

इनके बीच फैसला कैसे हो? किस तरह के अवलोकन हमें यह तय करने में मदद करेंगे कि लैमार्क ज्‍यादा सत्य के करीब हैं या डार्विन?

इससे पहले कि हम इस सवाल के जवाब में घुसें, एक सवाल और। डार्विन ने अपना जैव-विकास का सिद्धान्त मूलत: इस बात पर विकसित किया था कि सजीवों में कुदरती तौर पर विविधता पाई जाती है। एक ही प्रजाति के कोई दो पेड़ एक जैसे नहीं होते, कोई दो पक्षी एक जैसे नहीं होते।

यहाँ अवलोकन का आशय स्पष्ट करना जरूरी है। अवलोकन से आशय सिर्फ यह नहीं है कि आपने आँख-कान खुले रखे और देख-सुन लिया। या गंध का एहसास कर लिया या छूकर देख लिया। अवलोकन में ज्‍यादा व्यवस्थित रूप से सूचनाएँ एकत्रित करना भी शामिल है और उपकरणों का उपयोग भी शामिल है। जैसे नाप-तौल करना अवलोकन का अंग हो सकता है। जब हम कहते हैं कि हम महज़ अवलोकन कर रहे हैं, तो मतलब इतना ही होता है कि हम उस परिदृश्य में कोई हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं। हाँ, अवलोकन की क्रिया की वजह से थोड़ा-बहुत हस्तक्षेप तो हो ही जाता है मगर हम जानबूझकर ऐसा कोई काम नहीं करते जिसकी वजह से हम उस क्रिया या घटना में कोई फेरबदल कर दें।

आप भी एक अध्ययन कीजिए। किसी एक पेड़ की पत्तियों को ध्यान से देखिए। क्या आप कोई भी दो पत्ती ऐसी खोज पाए जो हूबहू एक जैसी हों? यदि मिलती हैं, तो उन्हें और ध्यान से देखकर पक्का कीजिए कि वे हूबहू एक समान हैं। आप चाहें तो यही अध्ययन किसी भी सजीव पर दोहरा सकते हैं - जैसे टिड्डे,  फूल  या  बीज।  अपने अवलोकनों को विस्तार में लिखकर बताइए कि आपको किस तरह की विविधता देखने को मिलती है।

अपने आठ-दस साथियों के साथ मिलकर भी विविधता पर एक अध्ययन कर सकते हैं। इसमें आपको थोड़ी नपाई भी करनी होगी। अपने साथियों की तर्जनी उँगली की तुलना कीजिए। तुलना के लिए आप उँगली की कुल लम्बाई, पहली कटान पर उँगली की परिधि के नाप तथा पहली और दूसरी कटान के बीच की दूरी, इन तीन नापों का उपयोग कर सकते हैं। अपने आँकड़े तालिका -2 में भरें।

क्या आपकी उँगली अनोखी है? क्या हर व्यक्ति की उँगली अनोखी है? क्या इस गतिविधि के आधार पर  यह  कहा  जा  सकता है कि दुनिया के किन्हीं भी दो व्यक्तियों की तर्जनी उंगली एक-सी नहीं होंगी? फिंगर प्रिंट सम्बन्धी अपनी जानकारी के आधार पर उत्तर दीजिए।
उंगलियों की तुलना के लिए आपने नपाई का सहारा लिया। यह एक मायने में जैव विविधता की एक बानगी है। वास्तव में डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धान्त के विकास में जैव विविधता के अध्ययन का काफी महत्व रहा था। खास तौर से उनके द्वारा अर्जेंटीना के समीप गैलापेगोस द्वीपसमूह के अलग-अलग द्वीपों पर जन्तुओं के अध्ययन ने उनके विचारों को एक नई दिशा प्रदान की थी। यहाँ के विभिन्न द्वीपों पर फिंच नामक पक्षी पाए जाते हैं। डार्विन ने इन फिंच पक्षियों का काफी गहराई से अध्ययन किया था। फिंच पक्षियों के अवलोकनों के दौरान डार्विन ने उनकी चोंच पर भी ध्यान दिया था और उनके आकार को ध्यान से देखने के अलावा उनकी नपाई भी की थी। उन्होंने पाया कि अलग-अलग पक्षी अलग-अलग किस्म के बीज खाने में ज्‍यादा निपुण हैं। इस तरह के कई अवलोकन उन्होंने किए थे।

चूँकि विविधता है, इसलिए इनके बीच चयन हो सकता है। अलबत्ता, जैव-विकास के लिए महत्वपूर्ण चयन तो उसी विविधता में से होगा जो आनुवंशिक है यानी जो अगली पीढ़ी को हस्तान्तरण के योग्य है। मगर डार्विन को यह पता नहीं था कि यह विविधता पैदा कैसे होती है। यानी वे यह नहीं जानते थे कि जैव-विकास की प्रक्रिया का कच्चा माल (विविधता) कहाँ से व कैसे अस्तित्व में आता है। वे तो यह भी नहीं जानते थे कि माता-पिता के गुण सन्तानों को कैसे मिलते हैं। उन्होंने इसके बारे में एक अटकल लगाई थी।

डार्विन व उस समय के कई अन्य वैज्ञानिकों का विचार यह था कि माता और पिता, दोनों के प्रत्येक अंग से कुछ रस निकलकर सन्तान में पहुँचता है।  कुछ  लोग मानते थे कि हर अंग का एक सूक्ष्म रूप जाकर शुक्राणु को  मिलता  है। सन्तान में इस रस के मिले-जुले प्रभाव से गुण उत्पन्न होते हैं। मगर दिक्कत यह है कि यदि यह धारणा सही है तो हर पीढ़ी में गुणों का मिश्रण होता जाएगा और कुछ ही पीढ़ियों में सारी विविधता समाप्त हो जाएगी। जैसे हम देखते हैं कि मनुष्यों में चमड़ी के रंग में बहुत विविधता है। यदि हम यह मान लें कि मनुष्य की चमड़ी का रंग किसी तरल के द्वारा निर्धारित होता है और इस तरल का अंश सन्तान को माता-पिता, दोनों से मिलता है और सन्तान की चमड़ी का रंग इस मिश्रित रस के प्रभाव से तय होता है, तो हर पीढ़ी में चमड़ी का रंग मिश्रित होता जाएगा और जल्दी ही सारे मनुष्यों की चमड़ी का रंग एक जैसा हो जाएगा; विविधता एकरूपता में बदल जाएगी। यह प्रक्रिया तो डार्विन के अपने सिद्धान्त के खिलाफ थी क्योंकि जिस विविधता के आधार पर प्राकृतिक चयन होना प्रस्तावित है, वही समाप्त होती जा रही है।

जैव-विकास  की  ओर  लौटें। विविधता का पैदा होना और गुणों का अगली पीढ़ी में पहुँचना, ये दो सवाल हल किए बिना जैव-विकास के उक्त दो सिद्धान्तों के बीच फैसला करना मुश्किल हो जाता है। समस्या यह थी कि डार्विन ने यह तो स्पष्ट कर दिया कि जीवजगत में उपस्थित विविधता में से चयन के द्वारा ही विकास होता है। मगर वे यह नहीं बता पाए कि विविधता पैदा कैसे होती है। वे यह भी स्पष्ट नहीं कर पाए कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुणों का हस्तान्तरण कैसे होता है। दूसरी ओर लैमार्क कह रहे थे कि कोई भी जीव जो गुण अपने जीवन में अर्जित करता है वे उसकी सन्तानों को मिल जाते हैं। उन्हें भी यह स्पष्ट नहीं था कि गुण अगली पीढ़ी को कैसे मिलते हैं। तो इन दो सिद्धान्तों के बीच फैसले के लिए यह समझना जरूरी था कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुण कैसे पहुँचते हैं, और जीवनकाल में अर्जित गुणों का हस्तान्तरण सम्भव है या नहीं।


सुशील जोशी : एकलव्य द्वारा संचालित स्रोत फीचर सेवा से जुड़े हैं। विज्ञान शिक्षण व लेखन में गहरी रुचि।
सभी चित्र: बाल वैज्ञानिक पुस्तक, कक्षा-6

शैक्षणिक संदर्भ अंक 109 से साभार।  ( 'विज्ञान और प्रयोग' लेख की यह पहली किश्‍त है, जिसे हमने यहॉं दो भागों में दिया है। संदर्भ पत्रिका के आगामी तीन अंकों में  इसकी तीन और किश्‍तें प्रकाशित होंगी। हम उन्‍हें उस समय प्रस्‍तुत करेंगे।)

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