विज्ञान और प्रयोग : भाग - तीन

सुशील जोशी

पिछले भागों में हमने देखा है कि कई मामलों में सिर्फ अवलोकनों से बात नहीं बनती और कुछ विशिष्ट अवलोकन करने के लिए हमें विशिष्ट परिस्थितियाँ निर्मित करनी होती हैं। ऐसे प्रयोगों, उनकी डिजाइन व खयाली प्रयोगों पर बातें इस भाग में। 

विज्ञान और प्रयेाग : भाग-एक इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है।

विज्ञान और प्रयेाग : भाग- दो इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है।

गिरती वस्तुएँ और पीसा की मीनार

उदाहरण के लिए एक पुरानी परिकल्पना को लेते हैं। यह तो सबका अनुभव है कि वस्तुओं को हवा में छोड़ दिया जाए तो वे धरती पर गिरती हैं। यह भी आम अनुभव है कि वस्तु हल्की-फुल्की हो (जैसे चिड़िया का पंख या कागज का टुकड़ा) तो वह किसी भारी वस्तु (जैसे लोहे की गेंद) की अपेक्षा धीरे-धीरे गिरती है।

तो एक धारणा बनी थी कि हल्की वस्तुएँ भारी वस्तुओं की अपेक्षा धीमी गति से गिरती हैं। इस धारणा को जाँचने का काम एक प्रयोग के माध्यम से किया गया था - मशहूर पीसा की मीनार वाला प्रयोग। आपने इसके बारे में अवश्य सुना होगा।

जैसा कि आप जानते ही होंगे, अरस्तू एक महान यूनानी दार्शनिक थे जिन्होंने प्रकृति के लगभग हर पहलू पर गौर किया था और अपने सिद्धान्त प्रस्तुत किए थे। उनके सिद्धान्त इस कदर तार्किक थे कि उनके बारे में सोचने का विचार भी किसी को नहीं आता था। एक तरह से अरस्तू के शब्दों को प्रमाण के रूप में पेश किया जाता था। मगर जब सवाल उठने लगे तो उठते ही गए, जब तक कि उनके विचारों का पूरा महल ढह नहीं गया।

इनमें से एक विचार वस्तुओं के पृथ्वी पर गिरने के बारे में था। अरस्तू के अनुयायियों का मत था कि सारी वस्तुएँ पृथ्वी पर गिरती जरूर हैं मगर एक ही गति से नहीं गिरतीं। उनकी मान्यता थी कि भारी वस्तु तेज रफ्तार से गिरती है और हल्की वस्तु धीमी रफ्तार से। इसका मतलब यह हुआ कि यदि एक भारी और एक हल्की वस्तु को बराबर ऊँचाई से एक साथ छोड़ा जाए, तो भारी वस्तु जल्दी धरती पर पहुँच जाएगी बनिस्बत हल्की वस्तु के। अगर एक वस्तु दूसरी से दस गुना भारी हो तो भारी वस्तु हल्की से दस गुना जल्दी पहुँच जाएगी।

आपको क्या लगता है, हल्की वस्तु पहले गिरेगी या भारी? दो अलग-अलग वजन के पत्थर के टुकड़ों को करीब 10 फीट की ऊँचाई से छोड़कर अपने मत की जाँच कीजिए।

यदि यही प्रयोग एक पत्थर और एक कागज के टुकड़े के साथ किया जाए तो क्या होगा?

और यदि उसी कागज की गोली बनाकर किया जाए, तो क्या अपेक्षा होगी?

इस मामले में भी एक जवाब तो तर्क आधारित था मगर नाटकीय जवाब मिला था एक प्रयोग से। कहते हैं कि गैलीलियो गैलीली ने पीसा की मीनार पर चढ़कर दो अलग-अलग वजन वाली ठोस गेंदों (सम्भवत: तोप के गोलों) को एक साथ ऊपर से गिराया था और सबने देखा कि दोनों गोले एक साथ जमीन पर गिरे थे।

वैसे विज्ञान के इतिहासकारों के बीच मतभेद है कि गैलीलियो ने ऐसा कोई प्रयोग किया था या नहीं। यह प्रयोग शायद एक फ्लेमिश गणितज्ञ साइमन स्टेविन ने किया था।

जब पीसा की मीनार पर चढ़कर भारी और हल्के गोलों को एक साथ गिराया गया तो...जी नहीं, वे एक साथ नहीं गिरे थे। कहते हैं कि प्रयोग कई बार किया गया था और गोलों के धरती को छूने के समय में अन्तर हर बार अलग-अलग रहा था मगर भारी गोला हर बार हल्के गोले की अपेक्षा थोड़ा जल्दी जमीन पर पहुँचता था।

यहाँ प्रयोगों के दो और पहलुओं की चर्चा करना आवश्यक है। पहली बात तो यह है कि गैलीलियो की दुनिया में प्रयोगों को किसी बात को सिद्ध करने की एक विधि के रूप में आज़माना शुरू ही हुआ था। उस समय मापन में होने वाली त्रुटियों को मान्यता नहीं थी। या तो आप गलत होंगे या सही होंगे। इस पर हम आगे और बात करेंगे मगर यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त है कि खुले आसमान के तले किए गए इस प्रयोग में त्रुटियों की सम्भावनाएँ काफी ज्‍यादा हैं।

दूसरी बात यह है कि जब आप प्रयोग करते हैं तो त्रुटियों के चलते आप एकदम परिशुद्ध परिणाम हासिल नहीं कर सकते। लेकिन गैलीलियो सन्तुष्ट थे कि उनका प्रयोग यह दर्शाता है कि गोलों के एक साथ गिरने की बात को मानना ज्‍यादा सही है बजाय यह मानने के कि वे एकदम अलग-अलग समय पर गिरते हैं। यानी यह कहना सच के ज्‍यादा करीब है कि अलग-अलग वजन के गोले एक साथ गिरते हैं बनिस्बत यह कहने के कि उनके गिरने के समय में काफी अन्तर होता है।

इस प्रयोग ने यह नई बात हमारे सामने रखी थी - प्रयोग के परिणामों के आधार पर यह तय करना कि कौन-सी बात सच के ज्‍यादा करीब है। दूसरे शब्दों में, यदि यह प्रयोग निहायत आदर्श परिस्थितियों में किया जाए तो कैसे परिणामों की अपेक्षा की जा सकती है। इसे हम एक दोषपूर्ण प्रयोग का आदर्शीकरण (आइडिए-लाइज़ेशन)  कह  सकते  हैं।  इस आदर्शीकरण का ही एक रूप गैलीलियो ने विज्ञान को तोहफे के रूप में दिया था और वह है खयाली प्रयोग।

खयाली प्रयोग

गैलीलियो (या साइमन स्टीवन) के पीसा की मीनार वाले प्रयोग की एक रोचक बात है - गैलीलियो का यह आग्रह कि प्रयोग की परिस्थितियों को देखते हुए थोड़ी-बहुत गलती होना लाजमी है। और यही कहना बेहतर है कि छोटा और बड़ा गोला एक साथ ही गिरते हैं। इसका मतलब यह भी है कि यदि यह प्रयोग आदर्श परिस्थितियों में किया जाए तो परिणाम क्या होंगे। यानी आप उन परिस्थितियों की कल्पना करें जिनमें बाकी हर चीज आपकी मर्ज़ी के अनुरूप हो। ऐसी परिस्थितियाँ तो विचारों में ही सम्भव थीं।  

गैलीलियो ने ऐसे खयाली प्रयोगों की रवायत भी शुरू की।

पीसा की मीनार पर चढ़कर शायद उन्होंने गोले नहीं गिराए थे मगर वस्तुओं के गिरने को लेकर उन्होंने अन्य बहुत सुन्दर प्रयोग किए थे। इनमें से एक प्रयोग था जिसमें एक ढलवाँ सतह (नत समतल) पर एक गेंद को लुढ़काया जाता है और अलग-अलग ढलान लेकर उसके लुढ़कने की दर का मापन किया जाता है।

ढलवाँ सतह का उपयोग करने का एक बड़ा फायदा था। जब वस्तुओं को सीधे गिरने दिया जाता है तो वे इतनी तेजी से गिरती हैं कि मापन असम्भव हो जाता है। ढलवाँ सतह पर वस्तुओं के गिरने की गति को नियंत्रित करके मापन करना सुविधाजनक हो जाता है। ढलान को बदल-बदल कर प्रयोग किए जा सकते हैं। प्रयोग करने का एक मकसद यह भी होता है कि अवलोकन को आसान बनाया जाए।

उन्होंने विभिन्न वजन और आकार की गेंदों को ढलवाँ सतह पर से लुढ़काया था और उनकी गति का मापन किया था। उन्होंने यह भी देखा था कि जब गेंद को ढलवाँ सतह पर मुक्त रूप से लुढ़कने दिया जाता है, तो उसकी चाल लगातार बढ़ती जाती है। उन्होंने चाल में इस परिवर्तन (यानी त्वरण) की गणना भी अपने आँकड़ों की मदद से की थी। उन्होंने पाया था कि जब सतह की ढलान बराबर हो तो विभिन्न वजन की गेंदों को नीचे पहुँचने में बराबर समय लगता है। उन्होंने यह भी बताया कि एक-सी ढलान पर अलग-अलग गेंदें बराबर त्वरण से नीचे की ओर गति करती हैं। यह भौतिक शास्त्र का हुलिया बदल देने वाला प्रयोग है। मगर गैलीलियो इतने पर नहीं रुके थे।

गेंद जब ढलवाँ सतह के निचले छोर पर पहुँचती है तो तत्काल रुक नहीं जाती बल्कि कुछ दूरी तक समतल सतह पर भी लुढ़कती रहती है। कुछ देर तक लुढ़कने के बाद वह रुक जाती है। तो गैलीलियो ने यह देखा कि ढलान के अन्तिम छोर पर पहुँचने के बाद गेंद कितनी दूरी पर जाकर रुकती है। फिर उन्होंने यह पता किया कि गेंद द्वारा तय की गई दूरी पर किन बातों का असर पड़ता है। उन्होंने पाया कि गेंद द्वारा तय की गई दूरी पर सिर्फ इस बात का असर पड़ता है कि सतह कितनी चिकनी है। सतह जितनी अधिक खुरदरी होगी, गेंद उतनी ही जल्दी रुक जाएगी। सतह को चिकनी करते जाएँ तो गेंद ज्‍यादा-से-ज्‍यादा दूरी तय करती है। इसके आधार पर उनका निष्कर्ष था कि सतह का खुरदरापन गेंद की गति की विपरीत दिशा में बल लगाता है। सही समझा आपने...घर्षण बल।

अब उन्होंने सोचा...जी हाँ, इसी प्रयोग को मन ही मन विस्तार देते हुए उन्होंने सोचा कि यदि सतह एकदम चिकनी हो तो क्या होगा। यानी यदि ढलान के बाद वाली सतह का घर्षण शून्य कर दिया जाए तो गेंद को क्या होगा? ऐसी सतह बनाना उनके लिए मुमकिन नहीं था मगर सोचने में क्या बुराई है।

आपका क्या खयाल है कि गेंद को क्या होगा? यह खयाली प्रयोग कीजिए और बताइए कि इस खयाली पुलाव में से भौतिकी का कौन-सा बुनियादी सिद्धान्त निकलता है। चाहें तो खयाली प्रयोग करने से पहले ढलवाँ सतह पर गेंद को लुढ़काने वाला भौतिक प्रयोग भी करके देख लीजिए और तसल्ली कर लीजिए।

हाँ, इस प्रयोग को सतह को अलग-अलग कोण पर झुकाकर कीजिए और पता कीजिए कि क्या गेंद की गति में त्वरण है। यह बताइए कि आपने यह कैसे पता किया कि गेंद की गति में त्वरण है। क्या आप त्वरण का मापन भी कर सकते हैं?

गैलीलियो के खयाली प्रयोग में से विज्ञान का जो महत्वपूर्ण सिद्धान्त निकला उसे आगे चलकर न्यूटन ने एक नियम का रूप दिया था जिसे हम न्यूटन का गति का पहला नियम या जड़त्व का नियम कहते हैं। गैलीलियो ने सोचा था कि यदि घर्षण शून्य होगा तो वह गेंद कभी नहीं रुकेगी, चलती ही जाएगी। यह बात भी युगान्तरकारी थी कि किसी वस्तु को चलते रहने के लिए जरूरी नहीं कि उस पर लगातार बल लगाया जाए।

दो खयाली प्रयोग आपके लिए

आप यह तो जानते ही हैं कि चुम्बक और लोहे के बीच आकर्षण होता है। सवाल यह है कि चुम्बक लोहे को आकर्षित करता है या लोहा चुम्बक को? कैसे पता करेंगे कि कौन किसको आकर्षित करता है? खयाली घोड़े दौड़ाइए और जवाब खोजिए। जो भी प्रयोग आप सोचें, उसे करके भी देख सकते हैं।

गैलीलियो के खजाने से एक खयाली प्रयोग और। मान लीजिए हमारे पास एक भारी और एक हल्की वस्तु है। धारणा यह है कि भारी वस्तु को तेजी से गिरना चाहिए। अब हम इन दो वस्तुओं को आपस में बाँध देते हैं। अब क्या होगा? क्या हल्की वस्तु धीमी गति से गिरते हुए भारी वस्तु को भी धीमा कर देगी? क्या भारी वस्तु हल्की वस्तु को खींचते हुए उसकी चाल बढ़ा देगी? तो क्या भारी चीज धीमी चलने लगेगी या हल्की चीज तेज चलने लगेगी? या दोनों वस्तुएँ बीच की किसी चाल से चलने लगेंगी? यदि ऐसा हुआ तो समस्या पैदा हो जाएगी क्योंकि अब जो नई वस्तु बनेगी वह तो दोनों मूल वस्तुओं से अधिक वजनदार है। आप भी इस प्रयोग को अपने मन में कीजिए और अपने निष्कर्ष लिख डालिए।

अब तक हमने बड़े-बड़े प्रयोगों की चर्चा की। यानी ऐसे प्रयोगों की जो किसी परिकल्पना, धारणा या सिद्धान्त को परखते हैं या जिनके विश्लेषण से बड़ी-बड़ी बातें निकलती हैं। वैसे आपने ध्यान दिया होगा कि ऐसे प्रयोग सदा बहुत पेचीदा नहीं होते और न ही उनमें  हमेशा महँगे,  भारी-भरकम, नफीस उपकरणों की जरूरत होती है। अब चलिए कुछ अलग ढंग के प्रयोगों की बात करते हैं।

अवलोकनों का बेहतर अवलोकन

विज्ञान में प्रयोग करने की एक प्रमुख प्रेरणा इस बात से मिलती है कि हम प्रकृति में घटने वाली घटनाओं का कारण समझना चाहते हैं। इस प्रेरणा की प्रकृति को लेकर कई मत हैं मगर दो मत प्रमुख हैं। पहला मत है कि जब आपके सामने कोई घटना आती है, तो आप विभिन्न परिस्थितियों में उस घटना का अवलोकन करके कुछ सामान्य नियम बनाने की कोशिश करते हैं। दूसरा मत यह है कि जैसे ही आप कोई घटना देखते हैं, आप एक सिद्धान्त बना लेते हैं (शायद परिकल्पना कहना बेहतर होगा) कि वह घटना किस कारण से होती है।

इस बात को पौधों में फूल खिलने की खोजबीन के सन्दर्भ में देखा जा सकता है कि कैसे एक सामान्य-से अवलोकन ने प्रयोगों की पूरी शृंखला की शुरुआत की और हमें पौधों की जैव रासायनिक क्रियाओं को गम्भीरता से देखने-समझने को उकसाया।

फूलों का खिलना

पौधों में फूल खिलना एक महत्वपूर्ण घटना है। महत्वपूर्ण इस अर्थ में है कि फूल खिलने के बाद परागण और निषेचन की क्रियाएँ होती हैं और फल व बीज बनते हैं। तो जिन पेड़-पौधों में हमारी रुचि उनके फलों व बीजों के कारण है, उनके बारे में यह जानना महत्वपूर्ण है कि उनमें फूल कब लगेंगे। फसल का चक्र इसी बात से निर्धारित होता है। कई पौधों में हमारी दिलचस्पी फूलों के कारण ही होती है, ये सजावटी पौधे हैं या इनके फूलों के कई उपयोग हैं। इनमें भी फूल लगना हमारे लिए महत्व रखता है। मतलब हम जानना चाहते हैं कि पौधों पर फूल लगने (पुष्पन) के लिए जिम्मेदार कारक कौन-से हैं। और इन कारकों को जानकर हम उन पर नियंत्रण भी करना चाहते हैं।

अब चलते हैं खोजबीन के रास्ते पर। बात दरअसल एक अवलोकन से शुरू हुई थी। 1920 के आसपास की बात है। संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि विभाग के दो वैज्ञानिकों डब्लू. डब्लू. गार्नर और एच. ए. एलार्ड को बताया गया कि तम्बाकू की एक किस्म (मेरीलैण्ड मैमथ) को वॉशिंगटन डी.सी. के आसपास बोया जाए, तो उसमें बहुत देर से फूल लगते हैं। वहाँ इसमें फूल इतनी देर से लगते हैं कि उसके बीज पक ही नहीं पाते। मगर तम्बाकू की यह किस्म व्यापारिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसका पौधा काफी बड़ा (इन्सान के कद से दुगना) हो जाता था और पत्तियाँ भी सैकड़ों की संख्या में लगती थीं। दिक्कत यही थी कि इसमें फूल नहीं आते थे और अगले साल बोने के लिए बीज नहीं मिलते थे।

दरअसल तम्बाकू का यह विशाल पौधा 1906 में अपने आप एक तम्बाकू कम्पनी मैरीलैण्ड नैरोलीफ टोबेको के बागान में उग आया था।

सबसे पहले एलार्ड और गार्नर ने पौधों पर फूल खिलने सम्बन्धी सामान्य अवलोकन सामने रखे। पता चला कि कुछ पौधों में फूल वसन्त ऋतु में आते हैं तो कई में जाड़े के दिनों में। कई पौधे ऐसे भी पहचाने गए थे जिन पर साल भर हर मौसम में फूल आते रहते हैं। यानी पौधों के तीन समूह बने - वसन्त में फूलने वाले, जाड़ों में फूलने वाले और सदाबहार।

एक बात आपने भी देखी होगी कि कुछ पौधों में फूल दिन के एक निश्चित समय पर खिलते हैं - कुछ पौधों में सुबह-सुबह, कुछ में रात ढलने के बाद।

इतना तो समझ में आया कि प्रत्येक किस्म के पौधे के लिए साल का एक निश्चित समय है पुष्पन के लिए।

आप चाहें तो इन तीन समूहों के पौधों की सूची बना सकते हैं।

सूची के आधार पर शायद आप यह भी पहचान पाएँ कि क्यों कुछ फसलों के मौसम निश्चित हैं। समझाइए कि ऐसा क्यों है।

अब सवाल उठता है कि मौसम का असर अलग-अलग प्रजाति के पौधों पर अलग-अलग क्यों पड़ता है?

यह भी सवाल उठा कि मौसम में होने वाले किस परिवर्तन का सम्बन्ध पुष्पन से है। मौसम के साथ तापमान बदलता है, वायु में नमी की मात्रा बदलती है, दिन छोटे-बड़े होते हैं, प्रकाश की तीव्रता बदलती है, सूर्य का राशि परिवर्तन होता है वगैरह। तो इनमें से किस बात का सम्बन्ध पुष्पन से है? दूसरा सवाल यह भी उठा कि मौसम के साथ होने वाले प्रासंगिक परिवर्तन पौधे को किस तरह प्रभावित करते हैं क्योंकि स्पष्ट दिख रहा था कि एक-से परिवर्तन पौधों को अलग-अलग ढंग से प्रभावित करते हैं। तो क्या पुष्पन की कोई ऐसी व्याख्या हो सकती है जो सब पौधों पर लागू हो मगर मौसम के परिवर्तनों के भिन्न-भिन्न प्रभावों को भी समझा सके? या क्या हमें यह मानना होगा कि भिन्न-भिन्न पौधों में पुष्पन की प्रक्रिया अलग-अलग है?

इन सवालों के जवाब पाने के लिए सम्भवत: मात्र अवलोकन करने से काम नहीं चलेगा। आपको प्रयोग करने होंगे जिनमें मौसम के विभिन्न लक्षणों को अलग-अलग करके उनके अलग-अलग प्रभावों का अध्ययन कर सकें।

क्या आप सोच सकते हैं कि जाड़ों और वसन्त में कौन-कौन-से अन्तर होते हैं? एक सूची बनाइए। सूची बनाते हुए शुरू में इस बात को नजरअन्दाज कर दें कि पुष्पन की क्रिया को प्रभावित कर सकने वाले लक्षण कौन-से हो सकते हैं।

अब इन अन्तरों में से उन कारकों को पहचानने की कोशिश कीजिए जो आपके खयाल में पुष्पन को प्रभावित कर सकते हैं।

क्या आप इनके प्रभावों को अलग-अलग परखने के लिए प्रयोग सुझा सकते हैं? कम-से-कम किसी एक कारक को परखने के लिए प्रयोग सोचकर लिखिए। यह जरूर बताइए कि आपने बाकी कारकों को एक समान रखने की क्या व्यवस्था की।

ऐसे मामलों में जहाँ किसी एक घटना को एक से अधिक कारक प्रभावित करते लगते हैं वहाँ हमें विशेष तरह से प्रयोग डिजाइन करना होता है। हर बार बाकी सारे कारकों को समान रखते हुए किसी एक कारक को बदलकर देखना होता है कि घटना किस तरह प्रभावित होती है। इसे कहते हैं प्रयोग में तुलना का प्रावधान करना या प्रायोगिक कंट्रोल का उपयोग करना। प्रयोगों में तुलना का प्रावधान विज्ञान की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। ऐसे प्रयोगों को कंट्रोल्ड प्रयोग कहते हैं।

गार्नर और एलार्ड यह समझना चाहते थे कि आखिर इस मैरीलैण्ड मैमथ तम्बाकू के पौधे में पत्तियाँ ही क्यों आती रहती हैं, फूल क्यों नहीं आते। इस सवाल के जवाब में कई अवलोकनों और प्रयोगों की भूमिका रही। गौरतलब बात यह है कि गार्नर और एलार्ड यूएस के कृषि विभाग में वैज्ञानिक थे। उनकी प्रयोगशाला वर्जिनिया प्रान्त के आर्लिंगटन में स्थित थी।

एलार्ड का पहला अवलोकन यह था: इस पौधे को गमले में लगाया जाए, या मिट्टी की अन्य परिस्थितियाँ इसकी वृद्धि को बाधित करें, तो भी इस पर फूल आने का समय वही रहता है। तो कारण पोषण और वृद्धि से सम्बन्धित नहीं लगता था।

दूसरा उन्होंने सोचा कि शायद तम्बाकू की इस किस्म पर भी देर-सबेर फूल तो आने चाहिए। उनका खयाल था कि शायद उसे वृद्धि के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है और फूल आने के पहले ही हिमपात शुरू हो जाता है। इसलिए उसे फूल आने के लिए जितना समय चाहिए उतना नहीं मिल पाता।

तो यदि इन पौधों को पर्याप्त समय मिले तो फूल आना चाहिए। यह अतिरिक्त समय देने के लिए गार्नर और एलार्ड ने इनके बीज थोड़े समय पहले बो दिए।

मगर यह क्या! इन पौधों पर फूल समय से पूर्व ही खिलने लगे और ठण्ड के पूरे मौसम में फूल आते रहे। पिछले साल के पौधों के बचे हुए ठूण्ठों पर भी फूल आए। और ये पौधे सामान्य ऊँचाई के ही रहे। और आगे चलकर अप्रैल माह में सारे पौधों के उन्हीं तनों पर सामान्य शाखाएँ और पत्तियाँ उगने लगीं जहाँ अब तक फूल खिल रहे थे। तो उन्होंने क्या निष्कर्ष निकाला होगा?

निष्कर्ष यह था कि पौधों की साइज़ और उम्र में भारी अन्तर के बावजूद एक साथ फूल खिलना और फिर फूलना बन्द हो जाना दर्शाता है कि कोई बाहरी कारक है जो पुष्पन को प्रभावित करता है। उनका यह भी निष्कर्ष था कि यह कारक मौसम से सम्बन्धित होना चाहिए।

इसी तरह का एक अवलोकन सोयाबीन की कुछ किस्मों को लेकर भी था। यह देखा गया था कि सोयाबीन को खेत में कभी भी बोया जाए, फूल लगभग एक ही तारीख को खिलने लगते हैं। इस वजह से किसानों की यह कोशिश बेकार हो जाती थी कि वे सोयाबीन पर फली लगने के समय को थोड़ा दूर-दूर कर सकें।

गार्नर और एलार्ड ने सोचा कि हो सकता है कि सोयाबीन को फूलने के लिए शायद एक विशेष तापमान की जरूरत होती है। उससे अधिक तापमान हो जाए तो फूल नहीं आते होंगे। तो तापमान के असर को देखने की कोशिश की गई। उन्होंने सोयाबीन के पौधों को जाड़े के दिनों में ग्रीनहाउस में रखकर गर्मी देने का प्रयोग किया।

ग्रीनहाउस के प्रयोग से कैसे यह सम्भव हुआ कि प्रकाश की तीव्रता और तापमान के असर को अलग-अलग देखा जा सके? पता कीजिए कि ग्रीनहाउस क्या सुविधा प्रदान करता है।

आम तौर पर माना जाता था कि सोयाबीन पर फूल तब आते हैं जब तापमान में गिरावट होती है। मगर यहाँ तो ग्रीनहाउस में रखकर तापमान बढ़ाया जा रहा था और इन पौधों पर फूल खिलने लगे मगर दिक्कत यह हुई कि फूल खिलने के समय तक इनकी पर्याप्त वृद्धि नहीं हुई थी, इसलिए फलियाँ ठीक से नहीं बन पाईं।

गार्नर और एलार्ड चक्कर में पड़ गए। वे मौसम से सम्बन्धित एक कारक, तापमान का निष्प्रभावी होना देख चुके थे। उन्होंने यह भी परख लिया था कि पानी की मात्रा और मिट्टी की उर्वरता का भी इस बात पर कोई असर नहीं होता था कि फूल कब लगेंगे।

अब रह गया प्रकाश।

तो एक और प्रयोग। शोधकर्ताओं ने विश्लेषण किया कि ठण्ड के दिनों में प्रकाश में दो तरह से परिवर्तन आता है - कुल प्रकाश की मात्रा भी कम हो जाती है और दिन की अवधि घटने के साथ प्रकाश की अवधि भी कम हो जाती है। यदि आपको याद नहीं आ रहा है कि जाड़े के दिनों में प्रकाश की तीव्रता और दिन की लम्बाई क्यों कम होती है तो अपने भूगोल के सबक को याद कीजिए।

प्रयोगों से वे देख चुके थे कि जिन पौधों पर कपड़े की छाया कर दी जाती है (ताकि उन्हें कम धूप मिले), वे थोड़े कमज़ोर होते हैं लेकिन खुले में उग रहे पौधों के साथ ही पुष्पित होते हैं। यानी... प्रकाश की तीव्रता का कोई असर नहीं है।

अब रह गई दिन की लम्बाई। तो एक और प्रयोग।

दिन की लम्बाई और पुष्पन के सम्बन्ध की जाँच के लिए एक विशेष डिब्बा डिजाइन किया गया। यह एक दड़बे जैसे था जिसमें हवा की आवाजाही का अच्छा इन्तज़ाम था और एक दरवाज़ा लगा था। अन्दर इसमें अँधेरा रहता था। 10 जुलाई 1918 के दिन शाम 4 बजे एलार्ड ने पिकिंग सोयाबीन का एक गमला और मैरीलैण्ड मैमथ तम्बाकू के तीन गमलों को इस दड़बे में रख दिया। अगले दिन सुबह 9 बजे दड़बे को खोलकर पौधों को बाहर निकाला गया। फिर इन्हें शाम 4 बजे तक खुले में रखा गया। यह प्रक्रिया कई दिनों तक रोज़ाना सुबह-शाम दोहराई गई। इस तरह से इन पौधों को प्रतिदिन 7 घण्टे धूप और 17 घण्टे अन्धकार मिला। उस समय आर्लिंगटन (जहाँ एलार्ड और गार्नर की प्रयोगशाला स्थित थी, अक्षांश 32042’ उत्तर) में दिन की कुदरती लम्बाई 14 घण्टे से कुछ अधिक थी।

इस परिस्थिति में तम्बाकू के पौधों में फूल आने लगे जबकि कुदरती दिन में रखे गए पौधों में पत्तियाँ ही आती रहीं।

7 घण्टे के कृत्रिम दिन में रखे गए सोयाबीन के पौधों में फूल खिल गए और दो सप्ताह के अन्दर फलियाँ भी लग चुकी थीं।

इन तमाम प्रयोगों से आप क्या निष्कर्ष निकालेंगे?

गार्नर और एलार्ड का निष्कर्ष था कि इन प्रयोगों से स्पष्ट है कि पर्यावरण के जो विविध कारक पौधों पर असर डालते हैं उनमें से दिन की लम्बाई लैंगिक प्रजनन की दृष्टि से अनोखा कारक है।

दरअसल गार्नर ने इस परिघटना को फोटोपीरियॉडिज़्म का नाम दिया था यानी प्रकाश अवधि के साथ आवर्तता।

तो विज्ञान में प्रयोग की एक भूमिका यह है कि हम किसी पेचीदा कुदरती परिघटना को समझने के लिए सही ढंग से प्रयोग डिजाइन करके उसके एक-एक घटक को अलग-अलग करके देख-परख सकते हैं। वैसे इसके बाद पौधों के पुष्पन को लेकर कई प्रयोग किए गए और फोटोपीरियॉडिज़्म अपने आप में एक शाखा बन गया। उन्हें वहीं छोड़कर अगले भाग में हम प्रयोगों की कुछ अन्य भूमिकाओं पर विचार करेंगे।

(...जारी)

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सुशील जोशी : एकलव्य द्वारा संचालित स्रोत फीचर सेवा से जुड़े हैं। विज्ञान शिक्षण व लेखन में गहरी रुचि।

शैक्षणिक संदर्भ अंक 111 से साभार।

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