विज्ञान और प्रयोग : भाग-एक

सुशील जोशी

विज्ञान के बारे में सोचते ही प्रयोग और प्रयोगशाला की बात मन में आती है। वैज्ञानिक लोग आम तौर पर प्रयोग करते दिखाए जाते हैं। विज्ञान के इतिहास में भी प्रयोगों की खूब बातें होती हैं। कई लोग तो प्रयोगों को विज्ञान की विधि का अभिन्न अंग मानते हैं। ऐसा लगता है कि विज्ञान और प्रयोगों का चोली-दामन का साथ है। सवाल है कि यह बात कितनी सही है और यदि सही है तो विज्ञान में प्रयोगों का क्या स्थान है और क्या भूमिका है?

  • क्या आपने कोई प्रयोग किया है (शिक्षण के दौरान या उससे अलग)?
  • अपने द्वारा किए गए किसी एक प्रयोग के बारे में लिखिए कि आपने यह प्रयोग क्यों किया था।
  • क्या आपके मन में कोई अपेक्षा थी?इसे कैसे किया था? क्या परिणाम आपकी अपेक्षा के अनुरूप मिले थे?
  • आपके प्रयोग से क्या निष्कर्ष निकला था? विस्तार में लिखिए।

विज्ञान हमें क्या बताता है?

आगे बढ़ने से पहले यह देखते हैं कि विज्ञान का मकसद क्या है। यहाँ हम सिर्फ प्राकृतिक विज्ञान की बात कर रहे हैं, हालाँकि इनमें से कई बातें सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में लागू हो सकती हैं।
प्राकृतिक विज्ञान के मकसद पिछली सदियों में बदलते रहे हैं। आज हम मानते हैं कि विज्ञान का मकसद है कि अपने आसपास की दुनिया का एक विवरण देना और उसके अलग-अलग अवयवों के बीच सम्बन्ध स्थापित करना। इसके ज़रिए हम इस विश्व की एक तस्वीर निर्मित करते हैं और उसके कामकाज को समझने की कोशिश करते हैं। हमारी कोशिश होती है कि इस विश्व के नियमों का एक खाका तैयार कर पाएँ और यह देख पाएँ कि इसका संचालन किन नियमों के अन्तर्गत होता है।

इन नियमों की मदद से हम यह भी बता सकते हैं कि ऐसी ही परिस्थितियों में अन्य अवलोकनक्या होने की उम्मीद है।

विज्ञान का दूसरा मकसद यह समझाना भी है कि जो भी नियम हम खोजते हैं वे वैसे ही क्यों हैं। यदि दो अवयवों के बीच सम्बन्ध है, तो हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि क्या यह सम्बन्ध संयोगवश ही है या इन दो अवयवों में ऐसी कोई बात है कि इनके बीच सम्बन्ध अनिवार्य है। फिर यह भी देखने की कोशिश करते हैं कि क्या दो अवयवों के बीच सम्बन्ध ऐसा है कि एक के कारण दूसरा घटित होता है या क्या ये दोनों किसी तीसरे अवयव के क्रिया परिणाम हैं।
जब हम प्रकृति के विभिन्न अवयवों, क्रियाओं और घटनाओं के बीच सम्बन्धों का ताना-बाना बनाते हैं तो हम कहते हैं कि हम विश्व का एक मॉडल विकसित कर रहे हैं। यह मॉडल वास्तविकता के जितना निकट हो उतना ही अच्छा माना जाता है। ज़ाहिर है विज्ञान लगातार परिवर्तनशील उद्यम है।

इसमें एक साथ कई सिद्धान्त उभर सकते हैं जो विश्व की व्याख्या करने का दावा करते हैं। इनके बीच फैसला करना विज्ञान का एक प्रमुख काम होता है।

जब कोई व्याख्या या एक से अधिक व्याख्याएँ प्रस्तुत की जाती हैं तो उनके आधार पर भविष्यवाणियाँ करना भी विज्ञान का एक मकसद होता है। जाहिर है अलग-अलग व्याख्याओं के द्वारा अलग-अलग भविष्यवाणियाँ होती हैं। इन भविष्यवाणियों की जाँच करके इनमें से अपेक्षाकृत सही व्याख्या को चुनना विज्ञान में आगे बढ़ने का मुख्य रास्ता है।

प्रयोग की भूमिकाएँ

विज्ञान में प्रयोगों की कई भूमिकाएँ हैं। सबसे पहले तो कुछ अवलोकनों को बेहतर ढंग से समझने के लिए हमें प्रयोग का सहारा लेना पड़ता है। कई बार किसी परिघटना को समझने के लिए उससे सम्बन्धित प्रयोग करते हैं। ऐसा भी होता है कि कुछ घटनाएँ साथ-साथ होती हैं और उनके परस्पर सम्बन्ध के बारे में जानने के लिए प्रयोग करना होते हैं। प्रकृति को समझने की कोशिश में जब कोई नया सिद्धान्त सामने आता है तो हमें यह देखना होता है कि यह सिद्धान्त प्रकृति के बारे में क्या कह रहा है। सिद्धान्तों द्वारा किए गए दावों की जाँच के लिए भी प्रयोग किए जाते हैं। प्रयोगों में हमें बेहतर-से-बेहतर अवलोकन प्राप्त करने के लिए उपकरणों की जरूरत पड़ती है। इन उपकरणों के विकास के लिए भी प्रयोग किए जाते हैं। हर प्रयोग करते समय हम एकदम शुरू से तो शुरू नहीं कर सकते। हम जिन चीजों के बारे में प्रयोग कर रहे हैं, हमें उनके बारे में पहले से बहुत कुछ पता होता है। पदार्थों, वस्तुओं वगैरह के बारे में ऐसी जानकारी प्राप्त करने के लिए भी प्रयोग किए जाते हैं।

अर्थात् स्पष्ट है कि प्रकृति की खोजबीन करने और प्रकृति का एक अमूर्त ढाँचा खड़ा करने के काम में अवलोकनों और प्रयोगों की भूमिका है। दरअसल, प्रयोग और कुछ नहीं, विशेष मकसद सेअवलोकन करने की एक व्यवस्था ही तो है।

विज्ञान में प्रायोगिक विधि की स्थापना करने वाले फ्रांसिस बेकन के शब्दों में, “हमारे पास कुछ सीधे-सादे अनुभव (अवलोकन) होते हैं; यदि उन्हें वैसे ही स्वीकार किया जाए जैसे वे हैं, तो इसे संयोग कहते हैं, और यदि उनकी माँग की जाए तो वे प्रयोग होते हैं।” (फ्रांसिस बेकन, नोवम ऑर्गेनम, 1620)

यों भी कह सकते हैं कि प्रयोग एक सोची-समझी संरचना है जिसे इस तरह बनाया जाता है कि हम प्रकृति की किसी परिघटना को अलग-थलग करके, नियंत्रित ढंग से, अपनी मर्ज़ी से तोड़ मरोड़कर, परिस्थितियों में हेर-फेर करके उसका अवलोकन कर सकें। तब हम उस परिघटना का अवलोकन विभिन्न उपकरणों के माध्यम से कर पाते हैं और नाप-तौल भी कर सकते हैं। प्रकृति में होने वाली परिघटनाएँ काफी पेचीदा होती हैं और प्रत्येक परिघटना में तमाम किस्म के बल और क्रियाएँ काम करती हैं। प्रयोग करने के पीछे मकसद यह होता है कि हम इन्हें अलग-अलग करके देख पाएँ और अपनी मर्जी से नियंत्रित कर पाएँ।

इस सन्दर्भ में कई लोग मानते हैं कि प्रयोग भी एक किस्म का अवलोकन ही है। उनका मत है कि प्रयोग एक खास किस्म से किए गए अवलोकन ही हैं। प्रयोगों का मकसद मात्र इतना है कि हम प्रकृति के बारे में जो कुछ जानना चाहते हैं, उसे एक विशेष तरीके से जानने की कोशिश करें। प्रयोग में हम उसी परिघटना को कुछ विशेष परिस्थितियों में करके देखते हैं ताकि अवलोकन ज्‍यादा स्पष्टता से लिए जा सकें और एक-एक स्थिति के असर को परखा जा सके। प्रयोग से हमें कई बार वे चीजें देखने में भी मदद मिलती है जो वैसे हमारी पहुँच से बाहर हैं। जैसे आकाश के अवलोकन के लिए दूरबीन का उपयोग करने से हमारे सामने सौर मण्डल और उससे भी आगे के कई तथ्य उजागर हुए जो वैसे ओझल थे। इसी प्रकार से सूक्ष्मदर्शी तकनीक के विकास ने हमें यथार्थ के उन रूपों से परिचित कराया जो वैसे कभी नजर न आते। तो पहले यह देखते हैं कि अवलोकन हमें कहाँ तक ले जा सकते हैं और प्रयोगों का पदार्पण किस चरण में होता है।
अपने आसपास के कुछ अवलोकन कीजिए। निम्नलिखित में से कोई एक गतिविधि करके अपने परिणाम लिखिए।

गतिविधि : 1

पेड़-पौधों का अवलोकन करना ज्‍यादा मुश्किल नहीं है। यहाँ जो गतिविधि सुझाई गई है उसमें हम यह मानकर चल रहे हैं कि कुछ सामान्य परिभाषाएँ आपको पता हैं। वैसे हम शुरू से भी शुरू कर सकते हैं। उम्मीद है कि आप कम-से-कम 10 पौधों का अध्ययन करके अपने अवलोकन अच्छी तरह नोट कर लेंगे। कुछ पौधों के उदाहरण तालिका-1 में दिए गए हैं।

प्रत्येक पौधे के दो अवलोकन कीजिए। पहला पत्तियों का और दूसरा जड़ों का।
पत्तियों में वैसे तो देखने को बहुत कुछ होता है और विविधता भी भरपूर पाई जाती है मगर यहाँ हम पत्ती के एक विशिष्ट गुणधर्म पर ध्यान देंगे। आप जानते ही हैं कि पत्तियों पर कुछ उभरी हुई-सी नसें या शिराएँ दिखाई देती हैं। इन शिराओं को ध्यान से देखेंगे तो इनकी जमावट के दो प्रकार पहचान सकते हैं। पहले प्रकार में ये नसें एक-दूसरे से समान्तर   जमी होती हैं और एक-दूसरे को काटती नहीं। इस प्रकार की जमावट को समान्तर  शिरा विन्यास कहते हैं। दूसरे प्रकार का   विन्यास  जाली विन्यास कहलाता है और उसमें ये शिराएँ एक जाली जैसी रचना बनाती हैं।
पहला अवलोकन इसी बात का करना है कि आपके 10 पौधों की पत्तियों में किस तरह का विन्यास है। इसे तालिका में नोट कर लीजिए।

दूसरा अवलोकन जड़ों का करना है। जड़ें भी दो प्रकार की होती हैं। एक प्रकार की जड़ें वे होती हैं जहाँ तने के निचले सिरे से एक मुख्य जड़ निकलती है और फिर इसकी शाखाओं के रूप में छोटी-छोटी जड़ें निकलती हैं। इस प्रकार की जड़ों को मूसला जड़ कहते हैं। दूसरी प्रकार की जड़ें वे हैं जिनमें तने के निचले सिरे से कई सारी जड़ें एक ही जगह से निकलती हैं। इन्हें झकड़ा जड़ कहते हैं।

दूसरे अवलोकन में यह देखना है कि उन्हीं 10 पौधों में जड़ें किस-किस प्रकार की हैं। इसे भी तालिका-1 में नोट कर लीजिए।

क्या इस तालिका के आधार पर आप जड़ों के प्रकार और पत्तियों के शिरा विन्यास के आपसी सम्बन्ध के बारे में कोई नियम बना सकते हैं? इस नियम को लिखिए।

अपने नियम की मदद से निम्न-लिखित सवालों के जवाब दीजिए:
 

1.नीम के पेड़ की जड़ें कैसी होंगी?
2.मूली की पत्तियों का शिरा विन्यास कैसा होगा?
3.नागफनी की जड़ें कैसी होंगी?

उपरोक्त 10 पौधों के बारे में पता कीजिए कि उनके बीज कैसे होते हैं - एक-बीजपत्री या दो-बीजपत्री?
क्या आपके नियम को विस्तार देकर उसमें बीजपत्रों की संख्या की जानकारी को भी शामिल किया जा सकता है? यदि हाँ, तो विस्तृत नियम को लिखिए।
क्या अब आप बता सकते हैं कि चीकू की पत्तियों का शिरा विन्यास और जड़ें कैसी होंगी?
आप देख ही सकते हैं कि यह गतिविधि मूलत: अवलोकनों पर टिकी है। हाँ, यह ज़रूर है कि शायद आपको जड़ों को देखने के लिए थोड़ी खुदाई करनी पड़े।
एक और अवलोकन आधारित आसान-सी गतिविधि करने के बाद हम आगे बढ़ेंगे।

गतिविधि  2

कुछ ऐसे जन्तुओं की सूची बनाइए जिनके बाहरी कान (हमारे जैसे) होते हैं।
अब इन जन्तुओं का ध्यानपूर्वक अवलोकन करके निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

1.क्या इन सारे जन्तुओं की चमड़ी पर बाल पाए जाते हैं?

2.क्या इनमें से कोई जन्तु ऐसा है जो अण्डे देता हो?

3.क्या इन सभी जन्तुओं में मादा अपने बच्चों को दूध पिलाती है?

4.क्या ऐसे सभी जन्तुओं के सींग होते हैं?

5.क्या चमगादड़ इस समूह का सदस्य है?

उपरोक्त दो गतिविधियों में कुछ उल्लेखनीय बातें थीं। पहली बात तो यह थी कि हमने जन्तुओं, पेड़-पौधों के समूह बनाए। यही काम आप अन्य वस्तुओं के साथ भी कर सकते हैं। समूह बनाने के लिए हमने वस्तुओं के एक-एक गुणधर्म का अध्ययन किया। इसके बाद समूहों की आपस में तुलना करके उनके बीच सम्बन्ध खोजने की कोशिश की।
हमने देखा कि जड़ों के प्रकार, पत्तियों के विन्यास और बीजपत्रों की संख्या के बीच एक सम्बन्ध पाया जाता है। जब हमें यह सम्बन्ध निरपवाद रूप से नजर आया तो हमने इसे एक नियम का रूप दे दिया। इस नियम के आधार पर हम अगले उदाहरण के बारे में भविष्यवाणी की क्षमता से लैस हो गए हैं।

मगर सवाल यह उठता है कि क्या हमारा नियम सार्वभौमिक है? यानी क्या हम पक्के तौर पर कह सकते हैं कि यह नियम भविष्य में देखे जाने वाले हर मामले पर खरा उतरेगा? ज़रा सोचकर जवाब दीजिए। कितने ऐसे उदाहरण देख लेने के बाद हम कह सकेंगे कि हमारा नियम सार्वभौमिक सत्य है?

कई अवलोकनों के आधार पर सामान्यीकरण करके नियम प्रतिपादित करने के इस तरीके को आगमन कहते हैं। आगमन की यह प्रमुख समस्या है कि ढेर सारे अवलोकनों के बाद भी आप यह निश्चित रूप से नहीं कह सकते कि अगला अवलोकन उसी नियम के अनुरूप होगा। इस समस्या की ओर कई दार्शनिकों ने ध्यान दिलाया था जिनमें डेविड ह्यूम प्रमुख थे। बहरहाल, हमने देखा कि अवलोकनों और समूहीकरण की मदद से हम प्रकृति के नियम खोज सकते हैं। इसका अगला कदम आता है इन नियमों की व्याख्या करने का। ( जारी..) 

इस लेख का दूसरा भाग पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ।


सुशील जोशी: एकलव्य द्वारा संचालित स्रोत फीचर सेवा से जुड़े हैं। विज्ञान शिक्षण व लेखन में गहरी रुचि।
सभी चित्र: बाल वैज्ञानिक पुस्तक, कक्षा-6

शैक्षणिक संदर्भ अंक 109 से साभार।

 

18914 registered users
7393 resources