विकलांग बच्चों में यौन भावना और यौन स्वास्थ्य शिक्षा

डॉ. गिफ्टी जोएल

मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन का एक मुख्य पहलू यौन भावना या यौनिकता है जिसमें विभिन्न शारीरिक, संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक पहलू सम्मिलित होते हैं। विकलांग बच्चे भी यौन प्राणी हैं। जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, वे यौन विकास और परिवर्तनों का अनुभव करते हैं और अपने ग़ैर-विकलांग साथियों की तरह उनकी भी यौन भावनाएँ, इच्छाएँ और आवश्यकताएँ होती हैं। दुर्भाग्य की बात है कि उनकी यौन भावनाओं को अकसर स्वीकार या सम्बोधित नहीं किया जाता जिसके कारण कई विकलांग बच्चे घर या स्कूल में यौन स्वास्थ्य शिक्षा प्राप्त नहीं करते। एक स्वस्थ यौन पहचान विकसित करने के लिए जो ज्ञान या जानकारी अपेक्षित है, वह उनमें नहीं होती, अतः नकारात्मक यौन परिणामों का अनुभव करने की उनकी अरक्षितता बढ़ जाती है। शोध लगातार यही बताते हैं कि विकलांगजनों को यौन उत्पीड़न, शोषण, अवांछित गर्भधारण और यौन संचारित रोगों का अधिक ख़तरा होता है।

एक शोधकर्ता के रूप में मैंने विशेष आवश्यकताओं वाले कई बच्चों के माता-पिता और शिक्षकों के साथ यौन स्वास्थ्य शिक्षा के क्षेत्र में काम किया है, विशेषकर स्वलीन बच्चों के साथ। हालाँकि यह काफ़ी चुनौतीपूर्ण रहा है, लेकिन साथ ही यह एक ऐसे विषय को सम्बोधित करने की दृष्टि से बहुत अच्छा रहा है जिसे अभी भी कई प्रकार से वर्जित माना जाता है।

यौन भावना

यौन भावना में व्यक्ति के अस्तित्व के लगभग सभी पहलू आ जाते हैं, जैसे उसकी प्रवृत्ति, मूल्य, भावनाएँ या अनुभव। इसमें केवल यौन विकास के शारीरिक पहलू या सेक्स के भौतिक पहलू ही नहीं आते, बल्कि इसमें मुख्य बात तो यह है कि व्यक्ति यौनिक रूप से कैसा अनुभव करता है और ख़ुद को कैसे व्यक्त करता है। यह बात व्यक्ति के चयन में नज़र आती है जैसे कि वे क्या पहनना पसन्द करते हैं, दूसरों के साथ कैसे बातचीत करते हैं, किस तरह की गतिविधियों में भाग लेना पसन्द करते हैं, किसके प्रति आकर्षित होते हैं और अपना स्नेह और घनिष्ठता कैसे प्रदर्शित करते हैं। जन्म से लेकर वयस्कता तक यौन भावना मानव अनुभव का एक मुख्य हिस्सा है। यह उसके पालन-पोषण, अनुभवों, मूल्यों, आध्यात्मिकता और संस्कृति से प्रभावित होती है।

सामान्य बच्चों में यौन भावना 

विकलांग बच्चों में यौन भावना को समझने के लिए यह आवश्यक है कि सामान्‍य बच्चों में यौन भावना को समझा जाए। जीवन के प्रारम्भिक वर्षों के दौरान बच्चे के भीतर यौन भावनाओं के लिए सूक्ष्म तरीक़ों से भावनात्मक और शारीरिक आधार विकसित होने लगता है और ऐसा दैनिक जीवन की गतिविधियों के माध्यम से होता है, जैसे जब उसे दूध पिलाते हैं, गोद में लेते हैं, गले से लगाकर प्यार करते हैं, नहलाते हैं या उसके कपड़े बदलते हैं। जब वे ख़ुद को छूते हैं या ख़ुद को दर्पण में देखते हैं तो वे अपने शरीर के बारे में जान पाते हैं। तीन साल की उम्र तक अधिकांश बच्चे लैंगिकता के बारे में जागरूकता विकसित कर लेते हैं। वे ख़ुद को और दूसरों को पुरुष या महिला के रूप में पहचान सकते हैं और कुछ व्यवहारों के बारे में इस तरह का सम्बन्ध जोड़ सकते हैं कि यह व्यवहार पुरुष वाला अधिक या महिला वाला अधिक है, और इस तरह से वे लैंगिकता से जुड़ी हुई भूमिकाओं को समझ सकते हैं।

पूर्वस्कूली वर्षों के दौरान बच्चे अपने आस-पास की हर चीज़ के बारे में बहुत उत्सुक होते हैं। वे बेशुमार सवाल पूछते हैं और ऐसे सवालों के सरल जवाब पा सकते हैं, जैसे ‘बच्चे कहाँ से आते हैं?’ या ‘लड़कियाँ लड़कों से अलग क्यों हैं?’ ‘लड़कियों के पास शिश्न क्यों नहीं हैं?’ इसके अतिरिक्त अपने साथियों के साथ सामाजिक सम्पर्क और डॉक्टर-डॉक्टर या मम्मी-डैडी जैसे खेल खेलने से उन्हें यौन भावना की बेहतर समझ मिलती है। शिशु काल के बाद वाली अवस्था में बच्चे सेक्स से सम्बन्धित मामलों में कम रुचि रखते हैं और अपने ही लिंग के साथियों के साथ खेलना पसन्द करते हैं। भले ही इस अवधि को अकसर बच्चों के यौन विकास में अप्रकट अवधि के रूप में जाना जाता है, लेकिन वे अभ्रद भाषा तथा गन्दे चुटकुलों के सम्पर्क में आते हैं और उन्हें अपने साथियों या भाई-बहनों से सेक्स के बारे में कुछ जानकारी मिल जाती है।

बचपन समाप्त होते-होते अधिकांश बच्चों में तरुणायी (puberty) के स्पष्ट संकेत विकसित होने लगते हैं, जैसे कि गुप्तांगों पर बालों का बढ़ना; लम्बाई, वज़न और शरीर की संरचना में परिवर्तन, चेहरे पर मुँहासे व बालों का दिखाई देना आदि। इसके बाद लड़कियों में मासिक धर्म और लड़कों में स्‍वप्‍नदोष होने लगता है। अधिकांश युवा किशोरों के लिए यह बहुत ही भ्रमकारी और अशान्त समय होता है, क्योंकि वे अपने शरीर में होने वाले परिवर्तनों के साथ-साथ अपने मूड में भी बदलाव का अनुभव करते हैं। वे बड़ी सक्रियता के साथ ऐसे विभिन्न स्रोतों से सेक्स के बारे में अधिक जानने का प्रयास करने लगते हैं जिनके साथ वे सहजता का अनुभव करते हैं, जैसे कि दोस्त, पुस्तकें और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। किशोरावस्था के इन विकासों के दौरान वे अपनी पहचान बनाना चाहते हैं और अपने माता-पिता से दूरी बना लेते हैं। वे अपने साथियों के साथ अधिक समय बिताते हैं और अकसर विपरीत लिंग वालों के प्रति आकर्षित होते हैं। वे एकान्तता चाहते हैं और ख़ुद को सजाने-संवारने में बहुत समय लगाते हैं। हार्मोनल परिवर्तन और द्वितीयक यौन विशेषताओं के विकास के कारण वे तीव्र यौन इच्छा और उत्तेजना का अनुभव करते हैं। अपने विकसित होते शरीर की खोज करते समय उन्हें अपने जननांगों की स्व-उत्तेजना बहुत ही सुखद और सन्तोषदायी लग सकती है। कुछ लोग अपने साथी के साथ यौन सम्बन्धों का अनुभव करने के लिए प्रेमिका या प्रेमी की तलाश कर सकते हैं।

विकलांग बच्चों में यौन भावना

यौन परिपक्वता

विकलांग बच्चे यौन विकास के शारीरिक पहलुओं से उसी तरह गुज़रते हैं जैसे कि उनके ग़ैर-विकलांग साथी। जैसे-जैसे वे यौन परिपक्वता प्राप्त करते हैं, उनके शरीर बढ़ते और बदलते हैं। कुछ विकलांग बच्चों में, अपने विकसित हो रहे अन्य सामान्य साथियों की तुलना में तरुणायी पहले शुरू होती है और उनके बाद समाप्त होती है। जैसा कि अन्य विकासात्मक पहलुओं के साथ भी होता है, उन्हें इस बात में भी अपने साथियों से थोड़ा अधिक समय लग सकता है। उनके लिए भी तरुणायी, अगर अधिक नहीं तो, उतनी उतना ही भ्रमकारी है जितनी बाक़ी के लिए है।

माता-पिता लड़कियों में मासिक धर्म के बारे में चिन्ता करते हैं और अकसर इसे अपने और अपने बच्चे दोनों के लिए बोझ समझते हैं। लेकिन शोध से पता चलता है कि विकलांग लड़कियाँ मासिक धर्म को बहुत ही व्यावहारिक तरीक़े से स्वीकार लेती हैं। हो सकता है कि उन्हें अपनी व्यक्तिगत स्वच्छता और स्वयं की देखभाल के प्रबन्धन में अतिरिक्त मदद की आवश्यकता पड़े। अपने शरीर में बदलाव के साथ उन्हें सहज महसूस कराने का उपाय यही है कि उन्हें सही शिक्षा प्रदान की जाए, व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाए, कौशल निर्माण के विभिन्न अवसर दिए जाएँ, अपनी देखभाल करने की स्वतन्त्रता दी जाए और उसे बढ़ावा देने के लिए उसका सुदृढ़ीकरण किया जाए।

यौन भावना और सामाजिक विकास

सामाजिक विकास काफ़ी हद तक अनुभवात्मक है और विकलांग बच्चों पर इसका बहुत असर पड़ता है। उनकी अपनी सीमाएँ हैं और इसलिए हो सकता है कि उनके पास अपने सामान्य विकासशील साथियों की तुलना में सामाजिक सम्पर्क के बहुत कम अवसर हों। इससे शायद उन्हें अधिगम के उतने महत्वपूर्ण अनुभव न मिल पाएँ जिनका अनुभव सभी बच्चों को करना चाहिए। हो सकता है कि यौन भावना की अभिव्यक्ति को नियन्त्रित करने वाले सूक्ष्म सामाजिक नियमों के बारे में उन्होंने अपने परिवेश से कोई संकेत न लिया हो और चूँकि वे अपने साथियों और दोस्तों से सेक्स तथा यौन भावना के बारे में नहीं जान पाते, इसलिए वे इस बारे में कम जानते हों। इन सबका परिणाम यह होता है कि वे अकसर कुछ अजीब-से लगते हैं।

यही नहीं, उनके आस-पास के अन्य लोग उनकी यौन भावना की अभिव्यक्ति को अनुचित और समस्यात्मक मानते हैं क्योंकि सामाजिक निर्णय लेने में उनके द्वारा की गईं त्रुटियाँ उनकी इस आकलन क्षमता में दख़लअन्दाज़ी कर सकती हैं कि उन्हें कौन-से व्यवहार सार्वजनिक स्थानों पर करने चाहिए और कौन-से निजी स्थानों पर। इसलिए स्वस्थ तरीक़े से अपनी यौन भावनाओं को व्यक्त करने के साथ जो खुशी और तृप्ति की भावना पैदा होती है, विकलांग बच्चों और युवाओं को अकसर उन्हीं बातों के लिए बुरा-भला कहा जाता है और उन्हें उनके अनुचित सामाजिक-यौन व्यवहार को लेकर शर्मिन्दा महसूस कराया जाता है।

यौन व्यवहार

जब विकलांग किशोर या किशोरी हार्मोनल परिवर्तन और यौन भावनाओं को महसूस करना या उस पर प्रतिक्रिया करना शुरू करते हैं तो माता-पिता और पेशेवर लोग अकसर उनके नए व्यवहार से परेशान, भ्रमित और यहाँ तक कि अपमानित भी होने लगते हैं। हस्तमैथुन एक सामान्य व्यवहार है जिसके माध्यम से अधिकांश किशोर अपनी स्वयं की यौन कार्य पद्धतियों के बारे में सीखते हैं और जिसमें अधिकांश ग़ैर-विकलांग बच्चे बचपन से किशोरावस्था तक अलग-अलग परिमाण में संलग्न होते हैं। लेकिन इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता क्योंकि वे अच्छी तरह से जानते हैं कि इन सब बातों को दूसरों से कैसे छिपाना चाहिए। वे आस-पास के वयस्कों की प्रतिक्रियाओं के आधार पर जल्दी ही यह बात सीख जाते हैं कि कौन-से व्यवहार स्वीकार्य हैं और समय के साथ-साथ यौन व्यवहार का प्रकटन अधिक गुप्त हो जाता है। लेकिन विकलांग बच्चों को यह सिखाना पड़ता है कि सार्वजनिक रूप से उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। यह भी एक कारण है कि हम विकलांगों में यौन व्यवहार अधिक देखते हैं।

एकान्तता

देखरेख करने वाले कभी-कभी अति-सुरक्षात्मक हो जाते हैं और इसलिए हो सकता है कि वे उन विकलांग बच्चों को शैशवता की स्थिति में ले आएँ जिन्हें लम्बे समय तक अपनी देखभाल सम्बन्धी गतिविधियों के लिए सहायता की आवश्यकता होती है, जैसे कि शौचालय जाना, स्नान करना और कपड़े पहनना। बच्चों की फ़िक़्र करने के कारण वे हमेशा बच्चे के आसपास रहते हैं, उसकी गतिविधियों की देखरेख करते हैं जिसके परिणामस्वरूप बच्चे को कभी भी व्यक्तिगत समय या एकान्त नहीं मिलता है। सेरेब्रल पॉल्ज़ी वाले एक लड़के को बोलने से सम्बन्धित समस्याएँ भी हैं; उसने मुझे एक बार मैसेज भेजा कि वह अपनी माँ से तंग आ चुका है क्योंकि वह हमेशा उसके साथ ही बनी रहती हैं। उसे अपने लिए समय सिर्फ़ तब मिलता था जब उसकी माँ बाथरूम जाती थीं क्योंकि जब वह शौचालय जाता था तो वहाँ पर भी उसकी सहायता करने के लिए माँ मौजूद रहती थीं।

माता-पिता को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वे अपने बड़़े होते बच्चों को प्रतिदिन थोड़ी एकान्तता दें क्योंकि यह विकासात्मक आवश्यकता है, विशेष रूप से किशोरावस्था के दौरान। नियमित रूप से एकान्तता प्रदान करने से उन्हें निरापद वातावरण में अपनी यौन भावना का पता लगाने और सार्वजनिक रूप से अनुचित व्यवहार को कम करने में मदद मिलेगी। यदि माता-पिता बच्चे को अलग कमरा नहीं दे सकते तो बिस्तर के चारों ओर पर्दा लगाकर उसे अलग किया जा सकता है। माता-पिता के लिए यह बात महत्वपूर्ण है कि वे विकलांग बच्चों की आवश्यकताओं के प्रति सहज प्रतिक्रिया दिखाने के उपाय करें ताकि वे भविष्य में अधिक परिपक्वता और आत्‍मनिर्भरता प्राप्त कर सकें।

दैनिक जीवन में यौन अभिव्यक्ति

छोटे बच्चे तक अपनी बात को दृढ़ता से कहते हैं और अपने दैनिक जीवन में छोटे-छोटे निर्णय लेते हैं, जैसे कि वे क्या पहनना चाहते हैं या अपने बालों को कैसे संवारना चाहते हैं। विकलांग बच्चों को अकसर ऐसी ही मिलती-जुलती स्थितियों में ख़ुद चयन करने की स्वतन्त्रता से वंचित कर दिया जाता है क्योंकि उनकी देखरेख करने वाले ही यह सब कर देते हैं। किशोरावस्था में भी अधिकतर विकलांग लड़कियों के बाल छोटे ही रखे जाते हैं, क्योंकि इससे उनकी देखरेख करने वालों को सुविधा होती है। इसके लिए इस तरह के कारण दिए जाते हैं जैसे कि छोटे बालों की देखभाल करना आसान है या क्योंकि यह उन्हें कम आकर्षक बनाएगा। उन्हें लगता है कि इस तरह के उपाय से उनके बच्चों पर किसी का अवांछित ध्यान नहीं जाएगा और वे सम्भावित अनुचित व्यवहार से बच जाएँगे। विकलांग बच्चों को अकसर सादे कपड़े पहनाए जाते हैं क्योंकि उनकी देखरेख करने वाले मानकर चलते हैं कि इस तरह की चीज़ें उनके लिए कोई मायने नहीं रखतीं।

लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि विकलांगता की उपस्थिति अपने आप में एक स्वस्थ यौन पहचान, विश्वास, इच्छा, कार्य और यहाँ तक कि भविष्य में, यदि वे चाहें तो, अपने लिए एक साथी खोजने की उनकी क्षमता के विकास को भी प्रभावित करती है। विकलांग बच्चों और किशोरों को यथासम्भव उन चीज़ों के बारे में निर्णय लेना सिखाना चाहिए जो उनसे सम्बन्धित हैं। माता-पिता, देखरेख करने वालों और पेशेवरों को विकलांग बच्चों के अधिकारों को सशक्त बनाने की दिशा में काम करना चाहिए, न कि उसे घटाने में।

यौन उत्पीड़न

कई अध्ययनों में बताया गया है कि सामान्‍य बच्चों की तुलना में विकलांग बच्चों के यौन उत्पीड़न की सम्भावना दोगुनी है। इसे निम्नलिखित कुछ कारणों से समझाया जा सकता है।

  • हर रोज़ अपनी अन्तरंग देखभाल के लिए दूसरों पर निर्भर रहने के कारण वे अपने स्वयं के शरीर पर स्वामित्व की भावना खो बैठते हैं। देखरेख करने वाले नियमित रूप से उनकी अनुमति के बिना या उन्हें कोई नियन्त्रण दिए बिना बहुत अन्तरंग तरीक़े से उन्हें छूने के लिए ख़ुद को स्वतन्त्र महसूस करते हैं और अकसर उनके शील और गरिमा की भावनाओं के बारे में नहीं सोचते हैं। दुर्भाग्यवश, इससे बच्चों के लिए दुर्व्यवहार को पहचानना मुश्किल हो जाता है जब कोई उनका फ़ायदा उठा रहा होता है।
  • ये बच्चे कई परिस्थितियों में कई देखरेख कर्ताओं के सम्पर्क में आते हैं, जिसका अर्थ है कि कई लोग कई कारणों से उन्हें अलग-अलग तरीक़ों से छूते हैं।
  • उनके अपर्याप्त सामाजिक कौशल और कमज़ोर निर्णय उन्हें कभी-कभी ऐसी स्थितियों में ले जा सकते हैं जहाँ उनका शोषण होता है। माता-पिता और देखरेख करने वाले यौन उत्पीड़न की आशंकाओं के कारण इन बच्चों को असुरक्षित सामाजिक सम्पर्कों से बचाते हैं, जिससे अनजाने में ही ये बच्चे सामाजिक कौशल और उचित व्यक्तिगत सीमाओं को विकसित करने के महत्वपूर्ण अवसरों से वंचित हो जाते हैं।
  • अपनी विकलांगता की वजह से वे मदद लेने या उत्पीड़न की रिपोर्ट करने में असमर्थ हो सकते हैं। अकसर बच्चे उत्पीड़न की रिपोर्ट सिर्फ़ इसलिए नहीं करते क्योंकि वे यह नहीं जानते कि उन्हें क्या कहना है।
  • उनके पास उत्पीड़न के ख़िलाफ़ ख़ुद की रक्षा करने के लिए रणनीतियों की कमी है।
  • विकलांग बच्चों को बहुत कम उम्र से अनुपालन करना सिखाया जाता है। उनसे जो कुछ करने के लिए कहा जाता है, वे वैसा ही करने के आदी हो जाते हैं और उन्हें कभी ना कहना नहीं सिखाया जाता।

इन कारणों से कुछ ऐसी ख़ास बातें सामने आती हैं, जिन्हें देखरेख करने वालों को अपने बच्चों के लाभ के लिए सीखना चाहिए। साथ ही कुछ बातें ऐसी भी हैं जिन्हें भुला देना ज़रूरी है। अपनी विकलांगता की श्रेणी के आधार पर बच्चे दृढ़ता के साथ अपने स्वयं के शरीर की गोपनीयता की रक्षा करना सीख सकते हैं और अगर इसका उल्लंघन हो तो उसे पहचानकर विश्वसनीय वयस्कों से इसकी शिकायत कर सकते हैं। ये सब वे तभी सीख सकते हैं जब उन्हें ये बातें साभिप्राय सिखाई जाएँ। बाल अधिकारों के बारे में संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में कहा गया है कि सभी बच्चे अभिगम्य और उचित शिक्षा, मार्गदर्शन, समर्थन और खेलने के अवसरों के हकदार हैं। उन्हें अधिकार है कि उनकी बात सुनी जाए, उन्हें सम्मान मिले और उन्हें शोषण तथा उत्पीड़न से सुरक्षा मिले।

यौन स्वास्थ्य शिक्षा

विकलांग बच्चों के जीवन में महत्वपूर्ण हितधारक माता-पिता और शिक्षक हैं। माता-पिता अपने बच्चे को यौन भावना के बारे में पढ़ाने के लिए बेहतर स्थिति में होते हैं, लेकिन वे अकसर बच्चे की विकलांगता के अन्य पहलुओं से इतने परेशान हो गए होते हैं कि उनमें अपने बच्चे को उचित रूप से यौन स्वास्थ्य शिक्षा देने के लिए ज्ञान और कौशल की कमी हो सकती है। उन्हें अपने बच्चे के साथ यौन भावना पर बातचीत करने में अटपटा-सा लग सकता है। इसलिए वे अकसर शिक्षकों से मदद की अपेक्षा करते हैं। इसलिए शिक्षकों और स्कूलों को यौन स्वास्थ्य शिक्षा देने के लिए भली प्रकार से लैस होना चाहिए। स्वास्थ्य एवं कल्याण के लिए शिक्षा पर यूनेस्को की रणनीति में निर्दिष्ट किया गया है कि अच्छी गुणवत्ता वाली स्कूल-आधारित व्यापक यौन शिक्षा आवश्यक है क्योंकि यह सही ज्ञान को बढ़ाती है, सकारात्मक दृष्टिकोण और मूल्यों को बढ़ावा देती है और सोच-समझकर चयन करने के कौशल विकसित करती है। व्यापक यौन-शिक्षा की परिभाषा इस प्रकार की जा सकती है कि, ‘यह वैज्ञानिक रूप से सटीक, यथार्थवादी, अनिर्णायक रूप से जानकारी प्रदान करके सेक्स और सम्बन्धों के बारे में पढ़ाने का एक आयु-उपयुक्त एवं सांस्कृतिक रूप से प्रासंगिक दृष्टिकोण है।’

यौन स्वास्थ्य शिक्षा देने के लिए शिक्षकों को अपने सुविधा क्षेत्र से बाहर निकलना होगा और यौन सम्बन्धों पर खुली और विस्तृत चर्चा करने में किसी भी तरह की बाधा या परेशानी को दूर करने के लिए तैयार रहना होगा। यौन अंगों, गर्भावस्था या प्रसव के बारे में बताने के लिए उन्हें जीव विज्ञान की पाठ्यपुस्तक प्रदान करना आसान हो सकता है, लेकिन दुर्भाग्य से विकलांगजन इसे समझ नहीं पाते। यौन भावना के बारे में उन्हें भी वैसी ही शिक्षा की आवश्यकता होती जैसी उनके साथियों को दी जाती है, लेकिन इस जानकारी को संशोधित करके इस तरह से प्रस्तुत करना चाहिए कि वे अपनी सीमाओं के बावजूद इसका लाभ उठा सकें। विकलांग बच्चों के लिए एक उपयुक्त यौन स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रम में इन विषयों को शामिल करना चाहिए :  शरीर के अंग, युवावस्था सम्बन्धी परिवर्तन, व्यक्तिगत देखभाल और स्वच्छता, चिकित्सकीय जाँच, सामाजिक कौशल, यौन अभिव्यक्ति, उत्पीड़न की रोकथाम के कौशल और यौन व्यवहार के अधिकार और ज़िम्मेदारियाँ।

जैसे नियमित कक्षा-शिक्षण को विकलांग बच्चों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप संशोधित किया जाता है, वैसे ही नियमित यौन स्वास्थ्य शिक्षा पाठ्यक्रम को भी विकलांग बच्चों के लिए संशोधित किया जा सकता है। ऐसा करने के लिए विशेष शिक्षण-सामग्री जैसे चित्र, कठपुतलियाँ, कहानियाँ, शारीरिक रूप से ठीक (दोष-रहित) गुड्डे-गुड़ियों का उपयोग किया जा सकता है और साथ ही जो पढ़ाया गया है उसका लगातार पुनरावलोकन करना और जानकारी को सरल बनाना भी लाभदायक होगा। जब शिक्षक व्यक्तिगत शिक्षा योजनाएँ (आईईपीएस) बनाएँ तो वे उसमें विकलांग बच्चों के लिए आयु तथा आवश्यकता के उपयुक्त यौन शिक्षा भी सम्मिलित कर सकते हैं। यौन स्वास्थ्य शिक्षा को शिक्षार्थियों के लिए और अधिक सार्थक बनाने के लिए एक बुनियादी सलाह यह है कि इसे जल्दी शुरू करना चाहिए। बच्चों को शरीर के सभी अंगों के नाम सिखाए जाने चाहिए, उन अंगों के भी जिन्हें हम अकसर छोड़ देना चाहते हैं, जैसे कि शिश्न, स्तन इत्यादि। शरीर के अंगों के नाम जानना यौन भावना के बारे में और अधिक जानने के लिए महत्वपूर्ण है।

इसके अतिरिक्त हमारे समाज में यौन स्वास्थ्य शिक्षा प्रदान करने के दृष्टिकोण को प्रतिक्रियाशील होने की बजाय अग्रसक्रिय होना चाहिए। अधिकांश माता-पिता और शिक्षक यौन स्वास्थ्य को केवल तभी सम्बोधित करते हैं जब बच्चे का व्यवहार समस्याग्रस्त हो जाता है या जब बच्चा कुछ अनुचित करता है। माता-पिता और शिक्षक लड़कियों से यौन स्वास्थ्य के बारे में अधिक बात करते हैं क्योंकि मासिक धर्म बच्चे के जीवन में एक अधिक स्पष्ट घटना है। दूसरी ओर लड़कों को यौन स्वास्थ्य के बारे में अकसर नहीं सिखाया जाता है : उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे इसके बारे में विभिन्न स्रोतों से ख़ुद पता लगाएँ। विकलांग जन-समुदाय में, स्वास्थ्य में सुधार लाने और युवाओं को सशक्त बनाने के लिए यौन स्वास्थ्य पर सोच-विचार के साथ सक्रिय रूप से अनुदेशन प्रदान करना चाहिए। यह  नहीं होना चाहिए कि जब कुछ ग़लत हो जाए तो उसे ठीक करने के उपाय के रूप में इसका प्रयोग किया जाए।

निष्कर्ष

जब बात यौन भावनाओं की हो तो विकलांग बच्चे ग़ैर-विकलांग बच्चों से अलग नहीं हैं। बस अपने जीवन के इस जटिल पहलू से निपटने के लिए उन्हें अतिरिक्त सहायता, समर्थन और शिक्षा की आवश्यकता है। विकलांग होने का मतलब यह नहीं है कि बच्चों और किशोरों को अपनी यौन भावना को व्यक्त करने, अपने साथ गरिमापूर्ण व्यवहार करवाने या उचित यौन स्वास्थ्य शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार ही न दिया जाए। माता-पिता, देखरेख करने वालों और शिक्षकों को विकलांगों के यौन स्वास्थ्य से सम्बन्धित मामलों में अपनी जागरूकता बढ़ानी चाहिए। हमें उनकी समग्र भलाई को बढ़ावा देने के लिए मिलकर काम करना चाहिए। मेरा मानना है कि शिक्षक इन बच्चों के जीवन में बदलाव ला सकते हैं। मैं पेशेवरों और परिवार के सदस्यों को इस बात के लिए दृढ़ता से प्रोत्साहित करती हूँ कि वे इस विषय पर अधिक जानकारी हासिल करें और अपने ज्ञान को दूसरों के साथ साझा करने के लिए समय निकालें।

References

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  5. UNESCO (2016) UNESCO Strategy on Education for Health and Well-being: Contributing to the Sustainable Development Goals.

डॉ. गिफ्टी जोएल ने मानव विकास के क्षेत्र में बेंगलूरु विश्वविद्यालय से पीएचडी की है। उन्होंने स्वलीन बच्चों के माता-पिता और शिक्षकों के लिए ‘गाइडबुक ऑन सेक्सुअल हेल्थ फॉर पेरेंट्स एण्ड टीचर्स ऑफ चिल्ड्रन विथ ऑटिस्म’ शीर्षक पुस्तक का सह-लेखन किया है जो amazon.in  पर उपलब्ध है। उन्होंने कई विशेष स्कूलों में यौन स्वास्थ्य शिक्षा पर कार्यशालाएँ आयोजित की हैं। उनसे giftyjewel@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

यह Azim Premji University Learning Curve, December 2019 में प्रकाशित लेख Sexuality and Sexual Health Education in Children with Disabilities : Dr Gifty Joel  का हिन्दी अनुवाद है।

अनुवाद : नलिनी रावल   

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