रेखा चमोली की ‘मेरी स्कूल डायरी’ प्रतिभा कटियार की नजर से

प्रतिभा कटियार

डायरी और पत्र पढ़ने का चाव मुझे बचपन से ही है। सच कहूँ तो जैसे ही किसी का लिखा पसन्‍द आने लगता था उस लेखक के बारे में दिलचस्पी बढ़ने लगती थी और उसके खत और डायरियों की तलाश शुरू हो जाती थी। इसकी वजह दोनों विधाओं में सहजता, ईमानदारी, किसी किस्म का शैलीगत, भाषागत, विन्यासगत दबाव का न होना ही रहा होगा शायद। बस जब जैसा महसूस हुआ, उसे जस का तस उकेर देना, यह सोचे बिना कि कभी इस डायरी को कोई और भी पढ़ेगा, पढ़ेगा तो क्या कहेगा। या मैं इस डायरी को छपवाऊँगा तो इसे कितनी प्रसिद्धी मिलेगी आदि। डायरी के इसी प्रेम के चलते दुनिया भर के लिखने पढ़ने वालों की डायरियों की खोज जारी रहती है।

डायरियों की यह खूबी होती है कि वो अपने को किसी नियम में नहीं बाँधतीं, न किसी की परवाह करती हैं, उन्हें बीच में कहीं से भी खोलकर, कभी भी पढ़ा जा सकता है और लिखने वाले के उस लम्हे के साथ रहा जा सकता है। इन दिनों ऐसा ही एक नया अनुभव साथ है। रेखा चमोली की ‘मेरी स्कूल डायरी’ से गुजरना। रेखा चमोली उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी के पास के एक गाँव गणेशपुर के प्राथमिक विद्यालय की शिक्षिका हैं। उन्होंने अपने शिक्षकीय अनुभवों को इस डायरी में दर्ज किया है। शिक्षा में काम करने के नाते यह जानने में दिलचस्पी होना लाजिमी था कि आखिर क्या है इस डायरी में? इसी जिज्ञासा के चलते जब डायरी के पन्नों से गुजरना हुआ तो लगा कि इसमें हैं तो जरूर एक शिक्षिका के स्कूली अनुभवों के टुकड़े लेकिन उन अनुभवों में स्कूली प्रक्रियाओं और अनुभवों के साथ-साथ किस तरह मनुष्य होने की पौध लगाई जाती है, किस तरह उसकी परवरिश की जाती है यह दर्ज है। एक शिक्षक की अपने बच्चों को बेहतर से और बेहतर दे सकने की जिजीविषा, बच्चों से बहुत कुछ जानने की, सीखने की इच्छा और मिलकर हर दिन को खूबसूरत दिन बनाकर जीने की कोशिश इसमें नजर आती है।

शिक्षक को कैसा होना चाहिए? इस सवाल के जवाब में या तो ढेर सारे ग्लोरिफाइड तर्क, उदाहरण और सूक्तियाँ परोस दी जाती हैं या उनके लिए कैसा हो आदर्श शिक्षक की सूची पेश कर दी जाती है। लेकिन एक शिक्षक है मनुष्य ही। कोई संत, महात्मा नहीं है वो। न ही दीन-हीन बेचारा कि कोई भी उसे कुछ न कुछ समझा कर चला जाए। शिक्षक भी जीवन की तमाम आपाधापियों के बीच अपने प्रोफेशन के साथ ज्यादा से ज्यादा न्याय कर पाने की जद्दोजेहद करता हुआ सामान्य मनुष्य ही है। रेखा चमोली ऐसे ही शिक्षकों का चेहरा बनकर उभरती हैं। वो अपनी भूमिका में लिखती हैं कि उन्होंने डायरी लिखना इसलिए शुरू किया ताकि अपने शिक्षण के दौरान पीछे मुड़कर अपने ही अनुभवों को देखा जा सके और उनसे सीखा जा सके।

वो लिखती हैं ‘मेरी शिक्षण डायरी कुछ इसी तरह के अनुभवों को अपने में समेटे हुए है। अपने स्कूल के अनुभवों को लिखने के पीछे मेरा उद्देश्य था कि यह देख पाऊँ कि मैं बच्चों के साथ किस तरह काम कर रही हूँ। इस दौरान बच्चों की क्या प्रतिक्रियाएँ रही हैं वे शैक्षिक सम्बोधों को किस हद तक सीख पा रहे हैं? उनके न सीख पाने की वजहें क्या हैं? मैं जानना चाहती थी कि बच्चे सीखते कैसे हैं? जब कभी मैं इन पन्नों को पढ़ती, तो कुछ न कुछ जरूर सीखती। मैं देखती कि मैंने पिछली बार कहाँ गलती की थी। मुझे आगे क्या करना चाहिए, या मेरी कौन-सी गतिविधियाँ दोहराने से बच्चों को मदद मिलेगी व किन गतिविधियों पर मुझे पुनर्विचार करने की जरूरत है।’

भूमिका का यह टुकड़ा कई बातों को स्पष्ट करता है एक कि यह डायरी किस उद्देश्य से लिखी गयी है। दूसरे सीखना कैसे होता है यह बात शिक्षिका ने बच्चों के सन्दर्भ में कही है लेकिन इस बात की रेंज बहुत बड़ी है। हमारा सीखना भी कैसे होता है, कब हम अपने जिए हुए को दोबारा पलटकर देखते हैं और उससे सीखते हैं, हम शिक्षक हों या न हों लेकिन शिक्षा से तो जुड़े ही हैं कभी पढ़ते हुए, कभी अपने बच्चों को स्कूल भेजते हुए, उन्हें पढ़ाते हुए। कहाँ अटकन है, यह समझना हम सबकी जरूरत है।

खुद को पलटकर देखना और अपने जिए हुए से खुद को माँजना यह किसी भी जीवन के परिमार्जन की बुनियादी शर्त है यह डायरी इस गहरी जरूरत की ओर इशारा करती है।

इस डायरी से गुजरना कई तरह के अनुभवों से गुजरना है। कई बार अपने बचपन के दिन याद आते हैं, शरारतें याद आती हैं। अपने शिक्षक याद आते हैं जो ज्यादातर रेखा मैडम की तरह नहीं थे। रेखा की कक्षा में होने को जी चाहता है। एक ऐसे शिक्षक के करीब होने का सुख जिसे अपने बच्चों पर यकीन हो।

यह डायरी पढ़ते हुए समझ में आता है जीवन में छोटी-छोटी चीजों का महत्व, उनसे सीखना, मुश्किलों को आनन्द में तब्दील करना और बन्‍द रास्तों में नई पगडंडियाँ तलाशना। बतौर शिक्षक और बतौर विद्यार्थी (जो हम सब हैं) शायद हम सबको यह सीखने की जरूरत है। रेखा चमोली इस डायरी के बारे में कहती हैं कि ‘यह किसी आदर्श स्कूल के आदर्श शिक्षक की डायरी नहीं है, यह उन्हीं स्कूलों में से एक स्कूल की डायरी है जैसे स्कूल देश भर में हैं। उन्हीं हालात में काम करने वाले शिक्षक की डायरी है जिन हालात में देश भर के तमाम शिक्षक काम कर रहे हैं।

विषयों को पढ़ाने के लिए अपनाई गई शिक्षक की तमाम रणनीतियों की झलक इस डायरी में मिलती है जिसमें मुझे मुख्य तत्व लगा ‘संवाद’ और ‘अपनापन’। शिक्षिका अपने बच्चों के साथ खूब संवाद है, वो हर विषय को पढ़ाने का मुख्य तरीका संवाद लेकर चलती हैं। इससे उन्हें बच्चों के मन तक, उनके समुदाय, परिवार, पसन्‍द-नापसन्‍द तक पहुँचने का रास्ता भी मिलता है और शिक्षण भी होता है। अवलोकन, रचनात्मकता, कल्पनालोक में किल्लोल करना साथ ही यथार्थ का हाथ थामे रहना सब उनकी कक्षाओं में होता है। बच्चे खूब कहानियाँ बनाते हैं, कविताएँ बनाते हैं, साक्षात्कार करते हैं और खुलकर कक्षा में बात रखते हैं। जिस तरह के संवाद यहाँ नजर आते हैं उनसे यह स्पष्ट है कि बच्चों में और शिक्षक में भरोसे का रिश्ता बहुत गहरा है और दूसरी महत्वपूर्ण बात कि बच्चों को पढ़ने में मजा आ रहा है वो इसे बोझ नहीं मानते। इसीलिए कई जगह बच्चे मध्यान्तर में भी काम करते नजर आते हैं। उपस्थिति स्कूल में लगातार अच्छी रहती है और सभी बच्चे स्कूली गतिविधियों में उत्साह से प्रतिभाग करते हैं। अगर उनकी मैडम किसी मुश्किल में होती हैं तो बच्चे उस मुश्किल को समझते हैं और अपनी समझ भर उनका साथ देते हैं, समझने की कोशिश करते हैं, मैडम खुश होती हैं तो वो उनकी खुशी में शरीक होते हैं। यह मीठा रिश्ता स्कूलों की बुनियादी जरूरत है, यह किसी भी तरह के सीखने-सिखाने का जरूरी तत्व है।

इस में बच्चों के जिस तरह के संवाद हैं उनकी तैयारी भी शिक्षक की तैयारी ही दिखती है। समुदाय के साक्षात्कार के बारे में बात करते हुए बच्चों के जो सवाल हैं वो उनके चैतन्य होने को दर्शाते हैं। ‘अगर कोई जवाब न दे तो क्या करेंगे, एक व्यक्ति से कितनी बार साक्षात्कार लिया जा सकता है, अगर कोई रोजगार का काम नहीं करता है तो क्या उसका भी साक्षात्कार लेना चाहिए, कॉलेज जाने वाले दीदी, भईया का भी साक्षात्कार लिया जा सकता है क्या?’ ये सामान्य सवाल नहीं हैं। बच्चे अगर इस तरह के सवाल कर रहे हैं तो इसमें शिक्षक की वो मेहनत दिखती है जहाँ बच्चों को इस तरह सोचने, तर्क करने और सवाल करने के लिए तैयार किया जाता है। आँख मूँदकर शिक्षक की बात को मानकर काम में जुट जाने की बजाय उस पर सोचना, उस पर बात करना यही तो असल में होना है कक्षाओं में।

‘मेरी स्कूल की डायरी’ पहली नजर में थोड़ी मोटी लगती है, 329 पृष्ठों की यह किताब हालाँकि है भी मोटी। लेकिन एक बार पढ़ने बैठी तो कम से कम 100 पन्ने पढकर ही उठ सकी और तब लगा कि मोटाई से डरने की जरूरत नहीं, इसके भीतर लिखा हर पेज इतना तरल है, इतना गहन कि कब अन्तिम पृष्ठ पर पहुँच जाते हैं पता ही नहीं चलता। यह लेखन की विशेषता है कि सारे विवरण काफी दृश्यात्मक हैं।

रेखा चमोली का कविता संग्रह ‘पेड़ होती स्त्री’ आ चुका है। उन्हें इस संग्रह पर सूत्र सम्मान भी मिल चुका है लेकिन वो सिर्फ संग्रह या पुरस्कार वाली कवि नहीं हैं वो जिन्दगी को कविता की तरह जीती हैं। उनके मन में बहुत सवाल होते हैं। हर समय वो कुछ नया सीखने को तत्पर रहती हैं और यह सब उनकी डायरी को सहज बनाता है। भाषाई चमत्कारों से दूर, मुझे कुछ आता है, मैंने कुछ कमाल का कर दिया जैसे एहसासों से बहुत दूर किसी विद्यार्थी की तरह यह शिक्षिका हर वक्त कुछ सीखने को तत्पर नजर आती है। शिक्षक होने की रेंज इस डायरी में दिखती है, कि किस तरह जाति, वर्ग, धर्म, लड़के-लड़कियों के बीच भेदभाव, लड़कियों की सुरक्षा आदि के मुद्दे उन्हें परेशान करते हैं जो बतौर संवेदनशील मनुष्य हर किसी को करने चाहिए। शिक्षा जगत में इस तरह की पुस्तकों का होना बहुत जरूरी है, बहुत से शिक्षक साथी इसे पढ़ते हुए ज़रूर महसूस कर सकते हैं कि ‘अरे, यह तो मेरी ही बात है, ऐसा तो मेरे स्कूल में भी होता है।’

समता, समानता, सबके लिए न्याय जैसी बुनियादी बातों पर काम करते हुए, खूबसूरत हर किसी के सम्मान से रह पाने लायक समाज का सपना देखने वाली अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी ने इसे प्रकाशित करके एक अलग तरह की शुरुआत की है। अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी ने इस पुस्तक का प्रकाशन क्यों किया इस बारे में भूमिका में दर्ज है कि

‘यह डायरी उदाहरण प्रस्तुत करती है कि एक हुनरमन्द शिक्षिका और पचास बच्चों की शैक्षिक साझेदारी से कैसे शिक्षा की जड़ता को तोड़ने की पहल की जा सकती है। यह हमें एक शिक्षिका की अपने कर्म में दक्ष बनने की यात्रा पर ले जाती है। एक गुणवान शिक्षक को कैसा होना चाहिए इसके कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं के उदाहरण हम इस डायरी में पाते हैं। इसे पढ़ने के दौरान महसूस करते हैं कि शिक्षिका द्वारा किए जाने वाले विविध सुचिन्तित क्रियाकलाप उसे पारम्परिक शिक्षकों से खास बनाते हैं व उसे नई मानवीय और माहिर शिक्षक बनने की पहचान देते हैं। कुल मिलाकर यह डायरी हमें सरकारी स्कूली व्यवस्था और यहाँ पढ़ाने वाले शिक्षक-शिक्षिकाओं के बारे में अटूट भरोसा देती है।’

किताब का सम्पादन इसे चुस्त बनाता है और इसकी लय को बनाए रखता है। यह डायरी 2011 से 2014 के दरम्यान की डायरी है। जाहिर है डायरी के सारे पन्ने इस किताब में नहीं होंगे ऐसे में सम्पादकीय चयन की भूमिका महत्वपूर्ण है। अपने सम्पादकीय में गुरबचन सिंह जी लिखते हैं, ‘यह डायरी किसी शिक्षिका की सफलताओं का वृतान्‍त नहीं है वरन यह एक विचारशील शिक्षिका की निर्मिति की यात्रा पर ले जाती है।’

यह डायरी निशुल्क है इसे अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी और अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन की लाइब्रेरी से या सीधे रेखा के जरिये प्राप्त किया जा सकता है।

डायरी के कुछ अंश-

‘कई बार वे अपने प्रति हो रही किसी असमानता या अपने द्वारा हो रहे किसी दुर्व्यवहार को समझ भी नहीं पाते और धीरे-धीरे वैसे व्यवहार के आदी हो जाते हैं।’ (13।12।11, पेज- 95)

‘आज कक्षा 4 और 5 के साथ चाँद पर बात हुई’ (20।9।11, पेज 69)

आज कक्षा 3, 4, 5 के साथ कामता प्रसाद की कविता ‘भोलू के घर टंगा कैलेंडर’ पर काम किया। यह कविता हमारे पुस्तकालय में है। पुस्तकालय में ढेर सारी ऐसी कविताएँ हैं जिनकी विशेषता है कि इनसे कक्षा 3, 4 व 5 के साथ अलग-अलग तरह से कार्य किया जा सकता है। ये पढ़ने में बहुत ही मजेदार हैं। मैंने इस कविता का चार्ट बनाकर बच्चों के सामने टांग दिया। हमने खूब मजे ले लेकर पाँच-छह बार कविता को पढ़ा।

इस कविता में महीने के हिसाब से मौसमों के बारे में बताया गया है। जैसे मार्च सुहाना हो जाता है, अप्रैल जंगल महकाता है।’ (29।9।11 पेज- 69)

मैंने महसूस किया है कि प्राथमिक स्तर के बच्चों में रचनात्मकता एक प्रमुख गुण होता है। इस उम्र में बच्चे प्रकृति व कल्पना के बीच सह-सम्बन्ध स्थापित करना सीखते हैं। एक ओर वे चीजों के होने के कारणों को जानने समझने की दिशा में बढ़ रहे होते हैं और दूसरी ओर अपनी कल्पनाओं की उड़ानें भर रहे होते हैं। आमतौर पर बच्चों की काल्पनिक बातों को काफी हल्के में लिया जाता है। बहुत बार तो इन्हें महज मनोरंजन के साधन के तौर पर मान लिया जाता है। मुझे लगता है कक्षा में बच्चों को इन विषयों पर लिखने व बोलने के पूरे अवसर देने चाहिए जहाँ उन्हें कल्पना के पूरे अवसर मिलते हों। शैक्षिक दक्षताओं को ध्यान में रखकर देखें तो कल्पनाशीलता भाषाई कौशलों को निखारती है। अगर भाषा की कक्षा में कल्पनाशीलता के भरपूर मौके मिलें हों तो गणित की कक्षा में भी बच्चों को आसानी होती है। (12।8।11 पेज- 44)

संतुलित भोजन पर बच्चों से बात करना हमेशा आत्मग्लानि से भर देता है। बच्चों से कहना होता है कुछ चीजें हम रोज खाते हैं कुछ कभी-कभार। इनमें से बहुत से बच्चे ऐसे हैं जिन्हें घर पर रोज दाल-सब्जी या दूध नहीं मिल पाता है। शुक्र है विद्यालय में रोज दोपहर में दाल-चावल मिल जाता है। (4।2।13 पेज- 191)

आज दोपहर जब हमारी सृजनात्मक कक्षा चल रही थी तो एक साधू व एक जापानी महिला एक बड़ी परात में लड्डू लेकर आए और बिना मुझसे कुछ बात किए बच्चों को बाँटने लगे। जब तक मैं बच्चों से कुछ बात करती बच्चे उन्हें घेर चुके थे। बड़ी मुश्किल से मैंने बच्चों को बिठाया और लड्डू बँटवाए। होना तो यह चाहिए था कि वो पहले मुझसे बात करते फिर लड्डू बाँटते। मैं कोई शंकालु नहीं हूँ पर ये सब दान/दया सरकारी विद्यालय के बच्चों के प्रति ही क्यों है? बगल में प्राइवेट स्कूल भी है, जरा कोई वहाँ जाकर बिना पूछे बच्चों को लड्डू खिलाकर दिखाए। खाना खिलाना बुरी बात नहीं पर दया भाव से बेचारा समझकर खिलाना मुझे कतई पसन्‍द नहीं। बाद में बच्चों से बातचीत की पर बच्चे तो बच्चे हैं। सब उनसे ऐसे ही व्यवहार करते हैं तो झट से हाथ फैलाना उनकी आदत बन गई है। (9।3।13 पेज- 207)

डायरी की पीडीएफ यहाँ उपलब्‍ध है। उसे डाउनलोड किया जा सकता है।


समीक्षक : प्रतिभा कटियार,अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन,देहरादून, उत्‍तराखण्‍ड  

 

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