मैं समझी रसायन शास्त्र पढ़ा रही हूँ!

यदि एक शिक्षक से पूछा जाए, “तुम विज्ञान पढ़ाते हुए क्या पढ़ाते हो?”तो उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी?

एक परम्परागत विज्ञान-शिक्षक के लिए जवाब देना आसान है. उस का जवाब होगा, “जीव-विज्ञान, न्यूटन के नियम, गन्धक (सल्फ़र) की अभिक्रियाएँ ....” एक नवाचारी शिक्षक का उत्तर  हो सकता है – “केवल जानकारी नहीं, अवलोकन तथा परीक्षण भी, प्रयोग कर पाने और निष्कर्ष तक पहुँच पाने की योग्यता भी, आदि-आदि।”एक पेशेवर वैज्ञानिक कह सकता है, “मैं इस ब्रह्माण्ड के एक बहुत छोटे अंश की खोज में लगा हूँ और उस खोज के मॉडल तैयार कर रहा हूँ।”और दार्शनिक शायद उन विशेषताओं की बात करेगा जो विज्ञान को मानव की अन्य गतिविधियों से अलग करती हैं - यानी वैज्ञानिक गतिविधि में अनिवार्य निरन्तरता, उसमें वैयक्तिकता के अभाव और पूर्वाग्रह से स्वतन्त्रता की विशेषताएँ।

कक्षाओं के दौरान ये सब पक्ष यकीनन मेरे दिमाग़ में रहते हैं। तथ्यों का महत्व है; गन्धक की अभिक्रियाओं की जानकारी होनी ही चाहिए; अवलोकन/निरीक्षण और सिद्धान्‍त के एक हो जानेपर उत्पन्न होने वाला रोमांच बच्चों के हिस्से आना ही चाहिए; और उन्हें कुदरत की मशीन के कमाल का, उस के अद्भुत स्वरूप का बोध भी होना चाहिए।

रटन्त और बातों को याद रखने के दबाव से रहित इस प्रकार के वातावरण में विज्ञान-शिक्षा एक आनन्ददायक गतिविधि बन जाती है। इस में विज्ञान का इतिहास पढ़ने की बात भी शामिल हो जाती है और इसी सन्दर्भ में कुछ गम्भीर किस्म के सवाल भी पूछे जाने की शुरुआत हो पाती है। क्या जानवरों पर प्रयोग किए जाने से सम्बद्ध नैतिक सवालों को बीच में लाए बिना जीव-विज्ञान पढ़ाया जाना चाहिए? क्या इन सवालों से जूझे बिना वह पढ़ाया भी जा सकता है? क्या आप भौतिक विज्ञान और रसायन विज्ञान को कुछ अलग-थलग, सन्दर्भ और संसार से कटे हुए प्रयोगों के रूप में पढ़ा सकते हैं? इन सवालों को एक परिप्रेक्ष्य और सन्दर्भ में स्थित करने के लिए आवश्यक है कि वैज्ञानिकों और उन्हें प्रेरित करने वाले कारकों के बारे में भी बात हो।

वैज्ञानिकों को प्रशिक्षित किया जाता है कि वे पैनी दृष्टि से अवलोकन करें, निष्कर्षों तक पहुँचें, तटस्थ और निर्लिप्त रहें। उनका प्रशिक्षण उन्हें दिल के बहुत करीब, संजो कर रखे गए मॉडलों को तोड़ना सिखाता है, मतों और धारणाओं पर बेझिझक प्रश्न उठाना, विचारों को राष्ट्रीय या भाषाई सरहदों से ऊपर उठ कर साझा करना सिखाता है। और यही वे गुण हैं जो इस संसार को किसी भी प्रकार के विभाजनों से रहित एक सच में वैश्विक गाँव बनाएँगे। लेकिन पिछले सौ सालों में विज्ञान को मिले महत्व को ध्यान में रखें तो हम हैरत में पड़ जाते हैं – विज्ञान और वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण के इन गुणों के बावजूद इस दुनिया में अब भी युद्ध और झगड़े होते हैं।

देखें इस विडम्बना को, अलग-अलग रूपों में।

हेबर् हवा में मौजूद नाइट्रोजन से अमोनिया बनाने की प्रक्रिया ईजाद करते हैं। इससे खेती की दुनिया में एक क्रांति आ जाती है और उन्हें मानव जाति के एक महान उद्धारक के रूप में प्रशंसित किया जाता है। कुछ ही सालों बाद वे ज़हरीली गैस ईजाद करते हैं और एक राष्ट्रभक्त जर्मन के रूप में इसे समाज के लिए अपनी एक और, पहले किए गए योगदान के बराबर की, आहुति के रूप में प्रस्तुत करते हैं!

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब बात फैली कि जर्मनी अणु-बम बनाने की कगार पर ही है, तो अमेरिकी वैज्ञानिकों के एक समूह ने अमेरिका की राजनैतिक व्यवस्था को अणु-बम बनाने की ओर पूरे ज़ोर-शोर से धकेला। सैंकड़ों जाने-माने वैज्ञानिकों के एकजुट प्रयास से अमेरिका ने बम बना लिया। लेकिन जर्मनी पराजय की दहलीज पर था और बम की कोई आवश्यकता नहीं थी। मगर बना लिए गए हथियारों का प्रयोग तो करना ही होता है। वैज्ञानिकों के विरोध के बावजूद  जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर बम फैंके गए। इस घटना से बम बनाने वाले वैज्ञानिकों को अपनी अन्तरात्मा में झाँकने पर मजबूर होना पड़ा।

मुझे लगता है कि वैज्ञानिकों का प्रशिक्षण जो उनमें बेझिझक सवाल खड़े करने की सामर्थ्य पैदा करता है, बहुत ही संकुचित ढ़ंग से लागू किया जाता है। इसीलिए उसका प्रभाव भी प्रयोगशाला तक ही सीमित रहता है। प्रयोगशाला में तो वैज्ञानिक एक निरीक्षणकर्ता है। वह इस बात के प्रति बहुत सजग है कि उसके पूर्वाग्रहों का असर उसके निरीक्षण पर पड़ सकता है, और उसे इस बात से सावधान रहने की ज़रूरत है। लेकिन घर पहुँचते ही प्रयोगशाला का कोट उतर जाता है, सवाल करने और पूर्वाग्रह के प्रति सावधान रहने की क्षमता ग़ायब हो जाती है। और उसे अपने सामने दिखाई देता है एक व्यक्ति जो पूर्वाग्रह से भरा है, अन्धभक्त है भयपूर्ण है; यहाँ व्यक्तिगत अभिप्रेरणाएँ और सम्बन्ध निरीक्षण की उसकी सामर्थ्य के दायरे में नहीं आते; और इस व्यक्ति की पहचान उतनी ही राष्ट्रवादी या सामन्तवादी हो सकती है जितनी उसके किसी ऐसे पड़ोसी की, जो वैज्ञानिक नहीं है।

वैज्ञानिक इस परस्पर विरोध का हल मुख्य तौर पर दो तरह से निकालने की कोशिश करते हैं। एक तो वे उन सब प्रश्नों को अप्रासंगिक मान लेते हैं जिन्हें वैज्ञानिक रीति के तहत नहीं लाया जा सकता। दूसरे तरीके के तहत इस प्रकार के प्रश्नों को विज्ञान के क्षेत्र से बाहर रख कर किन्हीं अन्य तरीकों से हल करने की बात होती है।

इसी का नतीजा है कि विज्ञान और वैज्ञानिक का समाज से अलगाव हो जाता है। और इसी के चलते यह होता है कि वैज्ञानिक विनाशकारी अनुसंधान पर कार्य करते रह सकते हैं - उसका यशोगान करते हुए, उसे सत्य की खरी-पवित्र खोज के रूप में प्रस्तुत करते हुए...। या फिर वे इस प्रकार के अनुसंधान का प्रयोग रोकने का ज़िम्मा सार्वजनिक सदाचार और नैतिकता पर डाल सकते हैं। लेकिन सार्वजनिक नैतिकता भी तो वैयक्तिक नैतिकता को ही प्रतिबिम्बित करती है। बहुत कम वैज्ञानिक हैं जिन्होंने किसी विशेष प्रकार के अनुसंधान की नैतिकता पर चर्चा की हो - वह चाहे कृषि में हो या फिर उद्योग, चिकित्सा या सुरक्षा के क्षेत्रों में। और उन वैज्ञानिकों की संख्या तो और भी कम है जिन्होंने विनाशकारी अनुसंधान के स्थगन या उस पर रोक की बात कही हो। अमूमन ‘जन साधारण के’ परिप्रेक्ष्य या भय ही अनुसंधान की नैतिकता की बहसों पर हावी रहते हैं, वह चाहे अस्त्र-शस्त्र बनाए जाने की बात हो या फिर आनुवंशिक अभियांत्रिकी (जेनेटिक इंजिनियरिंग) की बात। यानी वैज्ञानिकों की ओर से इस प्रकार की बहसों का छेड़ा जाना आम तौर पर बहुत ही कम देखने में आता है।

बच्चों द्वारा प्रकृति में आधारभूत सम्बन्धों को और प्रकृति में सामंजस्य के मूल्य को समझ पाना, और इस बारे में रोमांच महसूस करना - हमारे स्कूलों में विज्ञान का इस प्रकार पढ़ाया जाना आसान है । बड़ी चुनौती तो एक और है। यह चुनौती विज्ञान को आरम्भिक बिन्दु के रूप में प्रयोग करते हुए यह दिखा पाने की है कि सीमित रूप में प्रश्न करना सीमित उत्तरों तक ही ले जाता है, और इस का नतीजा होता है कि इन्सान भी सीमा में ही बन्धे रहते हैं। जब मैं रसायन शास्त्र पढ़ाती हूँ तो क्या मेरी ज़िम्मेदारी विद्यार्थियों को यह सम्पूर्ण चित्र भी दिखा पाने की नहीं है - बल्कि क्या हमारी आशा उससे भी आगे तक जाने की नहीं होनी चाहिए, ताकि हम अपने संसार को भी उसी जागरूकता के साथ खोज-टटोल पाएँ जिस सजगता के साथ हम एक फूल की या एक जूँ की जाँच-पड़ताल करते हैं?

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लेखिका यासमीन जयतीर्थ सेन्टर फॉर लर्निंग, बंगलौर में पढ़ाती हैं।

यह लेख पहले-पहल कृष्णमूर्ति फाउण्डेशन की पत्रिका स्‍कूल्‍स जर्नल में छ्पा था और यहाँ इसे उनकी अनुमति से छापा जा रहा है। हिन्दी अनुवाद रमणीक मोहन ने किया है।

टिप्पणियाँ

Avinaash.S का छायाचित्र

अति सुंदर लेख है !!

सादर
अविनाश

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