महामारी में गणित की एक गतिविधि

महामारी के इस दौर में बच्चों के साथ सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को जारी रखना सच चुनौतीपूर्ण है।  हम भी हाथ-पर हाथ रखकर नहीं बैठना चाहते थे। संस्थागत रूप से सामूहिक समझ के साथ बच्चों के साथ समुदाय में जाकर काम करने की योजना बनी।  छोटे-छोटे समूहों में जाकर बच्चों के साथ काम करने के दौरान यह भी चुनौतीपूर्ण था कि अलग-अलग कक्षाओं के विभिन्न विषयों पर कैसे काम किया जाए। इसलिए गणित और भाषा की आधारभूत संकल्पनाओं पर योजनाबद्ध रूप से काम करने पर सहमति बनी।  लगभग डेढ़ महीने में के काम के दौरान 25 दिन बच्चों के साथ काम हो पाया।

गणित विषय में बुनियादी संख्यात्मक कौशल बहुत जरूरी हैं। यह सभी के जीवन में समान रूप से उपयोगी हैं। रोज़मर्रा के जीवन में जोड़ना, घटाना, गुणा करना और भाग देने की क्षमता का होना सभी के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह संक्रियाएँ प्राथमिक स्तर के गणित के पाठ्यक्रम का एक मुख्य घटक भी हैं। लेकिन बच्चे इन्हें ठीक से सीख नहीं पाते हैं। संख्याओं का अमूर्त होना इसका एक प्रमुख कारण हो सकता है। छोटे बच्चों द्वारा अमूर्त अवधारणाओं की समझ बना पाना भी चुनौतीपूर्ण रहता है।  इसीलिए अधिकांश बच्चों को इबारती सवालों को हल करने में दिक्कत आती है। उन्हें पता नहीं होता कि कब किस संक्रिया का उपयोग करना है।  इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए हमने बच्चों के साथ संक्रियाओं की समझ पर काम करने के लिए एक बाज़ार का एक नाटकीय दृश्य बनाने की योजना बनाई। इसमें बच्चे ही दुकानदार और खरीददार होंगे।

उद्देश्य

  • बच्चे गणित की संक्रियाओं को यांत्रिक तरीकों से इतर आनन्द के साथ सीखें।
  • चारों संक्रियाओं का अनुप्रयोग करना।
  • गणित की अमूर्त संक्रियाओं को मूर्त रूप में अपने दैनिक जीवन से जोड़कर सीखना।

पूर्व तैयारी

  • बच्चे अपने-अपने घर से पाँच या अधिक अलग-अलग वस्तुएँ लाएँगे जिन्हें दुकान में बेचने के लिए रखा जाएगा।
  • प्रक्रिया को प्रभावी और रोचक रूप देने के लिए 1, 2, 5, 10, 20, 50, 100, 200, 500 और 2000 के पर्याप्त मात्रा में मनोरंजन बैंक के नकली नोटों के कलर प्रिंट निकलवाए गए। साथ ही उन पर लेमिनेशन भी किया गया।
  • ग्राहकों को देने के लिए बिल बुक तैयार करवाई गई।
  • रेट लिस्ट चार्ट तैयार किया गया।
  • वस्तुओं पर लगाने के लिए प्राइस टैग की व्यवस्था की गई। 

गतिविधि

गतिविधि वाले दिन बच्चों की तरह हम भी उत्सुक थे। हम दोनों शिक्षक समय से लगभग 10 मिनिट पूर्व ही हमारे अस्थायी शिक्षण केन्द्र पर पहुँच गए। लेकिन पहले वहाँ सभी बच्चे हमसे भी पहले आ चुके थे। कुल 16 बच्चे उपस्थित थे। दो बच्चे अलग से यहाँ जुड़े थे जो हमारे विद्यालय के नहीं थे लेकिन नियमित रूप से जुड़कर पढ़ना चाहते थे। सामान्य चर्चा और हाथों को सेनेटाइज करने के बाद उन्हें गतिविधि के बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण निर्देश दिए गए। जैसे- शारीरिक दूरी बनाए रखना, दुकानदार और ग्राहकों को चिन्हित करना, बिल बनाना आदि। बच्चे बहुत ज्यादा उत्सुक थे इसलिए उन्होंने निर्देशों को सुनने के बाद तुरन्त ही अपने-अपने समूह बनाकर दुकानें सजा लीं। बच्चों ने अपनी पसन्द से अपनी-अपनी दुकानों का नामकरण निम्न प्रकार किया -

  • रोहित और सुमित – तेजाजी जनरल स्टोर
  • राहुल और आशीष – राहुल बर्तन भण्डार
  • रजनीश, विकास और निकिता  – रजनीश स्टेशनर्स

इस प्रकार 7 बच्चे दुकानदार बने और शेष 9 ग्राहक की भूमिका में थे। दुकानदारों ने निर्देशों के अनुसार अपनी-अपनी दुकानों को सजाना शुरू किया और रेट लिस्ट तैयार की। रेट लिस्ट के अनुसार प्रत्येक वस्तु पर प्राइस टैग लगाया। इसके बाद शिक्षक द्वारा सभी को नोट वितरित किए गए। हमने जानबूझकर दुकानदारों को छोटे नोट (1, 2, 5, 10, 20, 50, 100, 200 के नोट) और ग्राहकों को बड़े नोट (100, 200, 500 और 2000 के नोट) वितरित किए। हमारा उद्देश्य था कि जब ग्राहक बड़े नोट दुकानदार को देगा तब दुकानदार विभिन्न संक्रियाओं का उपयोग करते हुए ग्राहकों को बकाया राशि लौटाएँगे। बिल बनाने की सम्पूर्ण प्रक्रिया को एक उदाहरण देकर शिक्षक द्वारा बच्चों को समझाया गया। साथ ही ग्राहकों से अपने-अपने नोटों का जोड़ करने के लिए कहा गया। सभी ने अपनी कुल राशि गिनकर शिक्षक को बताई। अब दुकानदार और ग्राहक दोनों ही तैयार थे। कोरोना को ध्यान में रखते हुए एक बार में एक दुकान पर एक ही ग्राहक को जाने की अनुमति दी गई। इस प्रकार भीड़ न होने का फायदा दुकानदारों को भी मिला और सारी प्रक्रिया व्यवस्थित रूप से संपन्न हो गई।

चूँकि अन्त में समय की कमी के कारण गतिविधि पर चर्चा मात्र 10 मिनट के लिए ही हो पाई थी, इसलिए अगले दिन बच्चों से इस सम्पूर्ण प्रक्रिया से सम्‍बन्धित इबारती सवाल बनाने के लिए कहा गया। आशीष, निकिता, रजनीश और राहुल ने मिश्रित संक्रियाओं वाले सवाल बनाए जबकि अन्य बच्चों ने एक ही संक्रिया से सम्‍बन्धित सवाल बनाए। बच्चों द्वारा बनाए गए सवालों को बोर्ड पर लिखते हुए उनको हल करने के अलग-अलग तरीकों के द्वारा विभिन्न संक्रियाओं पर समझ बनाई गई।

 इस सम्पूर्ण प्रक्रिया के दौरान हमने पाया कि –

  • सम्पूर्ण गतिविधि में बच्चों ने उत्साह और आनन्द के साथ भाग लिया।
  • बच्चे अपने रोल के अनुसार अपनी भूमिका को निभा रहे थे।
  • बिल बनाने की प्रक्रिया के दौरान ग्राहक स्वयं भी अपनी राशि की मानसिक गणना कर रहे थे।
  • जब बिल बनाने की प्रक्रिया को शिक्षक द्वारा समझया जा रहा था तो एक समूह द्वारा दुकान सजाने में व्यस्तता के कारण ध्यान से नहीं सुना गया। जिसके कारण उनको बिल बनाने में शुरुआती तौर पर दिक्कत आई।
  • बच्चों ने अपने समूह में काम को बाँट लिया जैसे-ग्राहक से बात करना, बिल बनाना, पैसे का लेनदेन आदि।
  • कुछ बच्चों की गणना इतनी तेज थी कि उन्होंने 2000 के नोट का हिसाब भी तुरन्त मानसिक गणना द्वारा कर लिया।
  • बिल बनाने के दौरान बच्चे जोड़, गुणा और संख्याओं को शब्दों में लिखने का काम कर रहे थे।
  • ग्राहक वस्तुओं के मूल्यों के आधार पर उपयुक्त नोट ही दुकानदार को दे रहे थे।
  • गतिविधि के दौरान दुकानदार ग्राहकों को दूरी बनाए रखने का निर्देश दे रहे थे। एक दुकानदार ने अपने ग्राहकों के हाथ सेनेटाइज करवाए।
  • खरीददारी के बाद ग्राहकों ने अपने द्वारा ख़रीदे गए सामान का कुल हिसाब लगाया।

हमारी सीख

एक शिक्षक के रूप में इस सम्पूर्ण प्रक्रिया के बारे में हमने पाया कि-

  • बच्चों ने खेल-खेल में एक से अधिक संक्रियाओं का अनुप्रयोग स्वयं करके देखा।
  • जब बच्चे मूर्त चीजों के साथ गणितीय प्रक्रियाओं से जुड़ते हैं तो समझ और अधिक प्रभावी होती है।
  • ऐसी गतिविधि गणित के उबाऊपन को दूर करने में भी मददगार साबित हो सकती है।
  • संक्रियाओं के व्यवस्थित क्रम को बच्चे स्वयं करके सीखते हैं।
  • गतिविधि के दौरान बच्चे और शिक्षक इतने मशगूल हो गए कि समय का ध्यान नहीं रहा जिसके कारण कुछ चीजें छूट गईं, जैसे- दुकानदार की कुल बिक्री, ग्राहक के पास कितने रुपये शेष बचे ?  अतः समय को और अधिक बढ़ाया जा सकता है।

आकलन

बच्चों के काम का आकलन करने के लिए वर्कशीट की मदद ली गई। इन वर्कशीट्स में बच्चों द्वारा बनाए गए इबारती सवालों और बिल बुक का प्रयोग किया गया। चूँकि ये सवाल और प्रक्रिया उनके द्वारा स्वयं की गई थी इसलिए उन्होंने इन सवालों को करने में भी रूचि ली और अपना काम शीघ्र निपटा लिया।


अरविन्द शर्मा, अज़ीम प्रेमजी संस्थान,टोंक, राजस्थान

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